ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
स्वाधीनता
CATEGORY : स्वराज-स्मृति 01-Aug-2016 12:00 AM 515
स्वाधीनता

जिस प्रकार भी हो, हमें संघ को दृढ़प्रतिष्ठ और उन्नत बनाना होगा और इसमें हमें सफलता मिलेगी- अवशय मिलेगी। "नहीं' कहने से नहीं बनेगा! और किसी बात की आवशयकता नहीं- आवशयकता है केवल प्रेम, अकपटता और धैर्य की। जीवन का अर्थ है वृद्धि, अर्थात् विस्तार, और विस्तार ही प्रेम है। इसलिए प्रेम ही जीवन है- वही जीवन का एकमात्र गति-नियामक है। और स्वार्थपरता ही मृत्यु है। इहलोक और परलोक में यही बात सत्य है। यदि कोई कहे कि देह के विनाश के बाद और कुछ नहीं रहता, तो भी उसे यह मानना पड़ेगा कि स्वार्थपरता ही यथार्थ मृत्यु है।
परोपकार ही जीवन है, परोपकार न करना ही मृत्यु है। जितने नर-पशु तुम देखते हो, उनमें नब्बे प्रतिशत मृत हैं- प्रेत हैं, क्योंकि जिसमें प्रेम नहीं है, वह मृत नहीं तो और क्या है? ये युवकों, सबके लिए तुम्हारे ह्मदय में दर्द हो- गरीब, मूर्ख और पददलितों के दु:ख को ह्मदय से अनुभव करो, समवेदना से तुम्हारे ह्मदय की क्रिया रुक जाये, मस्तिष्क चकराने लगे, तुम्हें ऐसा प्रतीत हो कि हम पागल तो नहीं हो गये हैं। तब जाकर ईशवर के चरणों में अपने ह्मदय की व्यथा प्रकट करो। तभी उनके पास से शक्ति, सहायता और अदम्य उत्साह आयेगा। जब चारों ओर अंधकार-ही-अंधकार दिखता था, तब भी मैं कहा कहता था- प्रयत्न करते रहो; और आज जब थोड़ा-थोड़ा उजाला दिख रहा है, तब भी मैं कहता हूँ कि प्रयत्न करते जाओ। वत्स, डरो मत। ऊपर उस अनन्त नक्षत्र-खचित आकाश की ओर इस तरह भयभीत हो मत ताको, मानो वह तुम्हें कुचल डालेगा।
धीरज धरो, देखोगे, कुछ ही समय बाद वह सब-का-सब तुम्हारे पैरों-तले आ जायेगा। धीरज धरो! न धन से काम होता है, न नाम से; न यश काम आता है, न विद्या। प्रेम ही से सब कुछ होता है; चरित्र ही कठिनाइयों की संगीन दीवारें तोड़कर अपना रास्ता बना लेता है।
अभी हमारे सामने यह समस्या है। बिना स्वाधीनता के किसी प्रकार की उन्नति संभव नहीं। हमारे पूर्वजों ने धर्म-चिन्ता के क्षेत्र में स्वाधीनता दी थी और उसी के फलस्वरूप हमारा यह अपूर्व धर्म खड़ा है। पर उन्होंने समाज के पैर बड़ी-बड़ी जंजीरों से जकड़ दिये, जिसके परिणामस्वरूप हमारा समाज, दो शब्दों में, भयंकर और पैशाचिक हो गया है। पाशचात्य देशों में समाज को सदैव स्वाधीनता मिलती रही, उनके समाज को देखो और फिर दूसरी ओर उनका धर्म कैसा है, वह भी देखो।
उन्नति की पहली शर्त है- स्वाधीनता। मनुष्य को जिस प्रकार विचार और वाणी में स्वाधीनता मिलनी चाहिए, वैसे ही उसे खान-पान, रहन-सहन, विवाह आदि हर एक बात में स्वाधीनता मिलनी चाहिए- जब तक कि उसके द्वारा दूसरों को कोई हानि नहीं पहुँचती।
हम मूर्खों की तरह भौतिक सभ्यता की निन्दा किया करते हैं। और क्यों न करें, अंगूर खट्टे जो हैं! भारत की आध्यात्मिक सभ्यता की श्रेष्ठता को स्वीकार करने पर भी यह मानना ही पड़ेगा कि सारे भारतवर्ष में एक लाख से अधिक यथार्थ धार्मिक नर-नारी नहीं हैं। अब प्रशन यह है कि क्या इन मुट्ठीभर लोगों की धार्मिक उन्नति के लिये भारत के तीस करोड़ अधिवासियों को बर्बरों का सा जीवन व्यतीत करना और भूखों मरना होगा? क्यों एक भी आदमी भूखों मरे? भारत को उठाना होगा, गरीबों को दो रोटी देनी होगी, शिाक्षा का विस्तार करना होगा और पुरोहिती की बुराइयों को ऐसा धक्का देना होगा कि वे चक्कर खाती हुई एकदम अतलान्तिक महासागर में जा गिरें! ब्रााहृण हो या संन्यासी- किसी की बुराई को क्षमा न मिलनी चाहिए। ऐसा करना होगा, जिससे पुरोहिती की बुराइयों और सामाजिक अत्याचारों का कहीं नाम-निशान तक न रहे, सबके लिए अन्न अधिक सुलभ हो जाये और सबको अधिकाधिक सुविधा मिलती रहे।
स्वाधीनता पाने का अधिकार उसे नहीं, जो स्वयं औरों को स्वाधीनता देने को तैयार न हो। मान लो, अंग्रेजों ने सब अधिकार तुम्हारे हाथों में सौंप दिये। तो होगा क्या? तब तो तुम प्रजा को दबाओगे और उन्हें कुछ भी अधिकार न दोगे। गुलाम तो शक्ति चाहता है दूसरों को गुलाम बनाने के लिए।
इसीलिए अब केवल अपने धर्म पर जोर देकर तथा समाज को स्वतंत्रता देकर इस कार्य को धीरे-धीरे सिद्ध करना है। पुराने धर्म से पुरोहिती छल को उखाड़ फेंको, और इससे तुम्हें संसार में सर्वोत्तम धर्म प्राप्त हो जायेगा। समझ गये न मेरी बात? भारतीय धर्म के आधार पर क्या तुम यूरोप जैसा समाज बना सकते हो? मुझे विशवास है कि यह संभव है, और होना भी चाहिए।
उत्साह से ह्मदय भर लो और सब जगह फैल जाओ। काम करो, काम करो। नेतृत्व करते समय सबके दास हो जाओ, नि:स्वार्थ होओ और कभी एक मित्र को, पीठ पीछे दूसरे मित्र की निन्दा करते मत सुनो। सब संगठनों का सत्यानाश इसी से होता है। अनन्त धैर्य रखो, तभी सफलता तुम्हारे हाथ आयेगी। काम करो; काम करो; दूसरों के हित के लिये काम करना ही जीवन का लक्षण है।
हममें किसी प्रकार की कपटता, कोई दुरंगी चाल, कोई दुष्टता न रहे। मैं सदैव प्रभु पर निर्भर रहा हूँ- सत्य पर निर्भर रहा हूँ, जो दिन के प्रकाश की भाँति उज्ज्वल है। मरते समय मेरी विवेक-बुद्धि पर यह धब्बा न रहे कि मैंने नाम या यश पाने के लिये, यहां तक कि परोपकार करने के लिए दुरंगी चालों से काम लिया था। दुराचार की गन्ध या बदनीयती का नाम तक न रहने पाये।
किसी प्रकार का टालमटोल या छिपे तौर बदमाशी या गुप्त शठता हम में न रहे- पर्दे की आड़ में कुछ न किया जाये। गुरु का विशोष कृपापात्र होने का कोई भी दावा न करे। यहां तक कि हममें कोई गुरु भी न रहे। मेरे साहसी बच्चो, आगे बढ़ो, - चाहे धन आये या न आये; आदमी मिलें या न मिलें; क्या तुम्हारे पास प्रेम है? क्या तुम्हें ईशवर पर भरोसा है? बस, आगे बढ़ो, तुम्हें कोई न रोक सकेगा।
सतर्क रहो! जो कुछ असत्य है, उसे पास तक न फटकने दो। सत्य पर डटे रहो, बस तभी हम सफल होंगे। इसमें चाहे थोड़ा अधिक समय लगे, पर तो भी निस्सन्देह हम अपने इस कार्य में सफल होंगे- अवशय होंगे। इस तरह काम करते जाओ मानो मैं कभी था ही नहीं। इस तरह काम करो मानो तुमसे से हर एक के ऊपर सारा काम निर्भर है। भविष्य की पचास सदियाँ तुम्हारी ओर ताक रही हैं- भारत का भविष्य तुम पर निर्भर है! काम करते जाओ। भारत में लोग अधिक-से-अधिक मेरी प्रशंसा भर कर सकते हैं- पर वे किसी काम के लिये एक पैसा भी न देंगे। और दें भी तो कहाँ से? वे स्वयं भिखारी हैं न? फिर गत दो हजार या उससे भी अधिक वर्षों से वे परोपकार करने की वृद्धि ही खो बैठे हैं। "देश', "जनसाधारण' इत्यादि के भाव वे अभी-अभी सीख रहे हैं। इसलिए मुझे उनकी कोई शिाकायत नहीं करनी है।

QUICKENQUIRY
Related & Similar Links
Copyright © 2016 - All Rights Reserved - Garbhanal - Version 10.00 Yellow Loop SysNano Infotech Structured Data Test ^