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स्वच्छंदता के उपफल
01-Aug-2016 12:00 AM 3502     

आदमी समस्त सृष्टि पर तो नियंत्रण नहीं कर सकता लेकिन अपने समाज, परिवार और अपने संपर्क में आने वाले सभी मनुष्यों, पशु-पक्षियों और यहाँ तक कि प्रकृति के अवयवों और उपादानों से भी अपनी और अपने समाज की व्यवस्था के अनुसार एक विशिष्ट प्रकार के आचरण और व्यवहार की आशा करता है। यह बंधन नहीं बल्कि समाज के सुचारू संचलन के लिए आवश्यक है। यदि कभी किसी व्यवस्था में परिवर्तन किया जाता है तो भी पुनः उसकी जगह किसी और नियम या व्यवस्था का विधान होता है। बिना विधान के कोई समाज नहीं चलता। यदि सोचेंगे तो प्रकारांतर से समस्त प्रकृति और सृष्टि में भी एक अघोषित और अलिखित विधान है। बिना किसी विधान के किसी की भी स्थिति आकाश में स्वच्छंद भटकती उल्का जैसी हो जाती है जो दिशाविहीन कभी भी, कहीं भी जा गिरती है। संस्कृत में इस दिशा विहीनता को दिशा देने के विधान को ताडना कहते हैं- लालयेत् पञ्च वर्षाणि दश वर्षाणि ताडयेत्......
यहाँ यदि ताडयेत् का अर्थ पिटाई करना ही है तो इस देश में हजारों वर्षों तक सभी भारतीय परिवारों में पाँच से पंद्रह वर्ष अर्थात दस वर्षों तक बच्चों की डंडे से पिटाई की जाती थी। मानो बालविकास के लिए संतुलित भोजन और खेल-कूद की तरह यह भी एक अत्यन्त आवश्यक घटक था।
जिनका साहित्य और काव्यबोध महाभारत में एकलव्य का अंगूठा और रामचरितमानस में "ढोल, गँवार..." के अतिरिक्त कुछ नहीं देख सकता उन्हें यह समझाना कठिन है कि अनुशासन, व्यवस्था, संयम, यम-नियम क्या होते हैं। जब निर्जीव ढोल तक बिना अनुशासन के काम नहीं कर सकता तो पशु या पशुवत नियमानुशासन से अनभिज्ञ बालक या सेवक और किसी दूसरे परिवार से आकर नए परिवार की रीति-नीति, अर्थ, आचरण का केंद्र बनने वाली स्त्री के लिए नई परिस्थितियों का ज्ञान और उनके अनुकूल आचरण सीखना बिना किसी विशेष अनुशासन के नहीं हो सकता। यदि इस ताड़ना (अनुशासन) को कोई तथाकथित प्रगतिवादी विमर्श का विषय बनाए तो क्या कहा जाए। यहाँ राजनीति के छल-छंद पर अपनी रोटियाँ सेंकने वालों की बात भी नहीं की जा रही है। यदि महाभारत और रामचरित मानस का गलत अर्थ लगाकर कोई दलितों और स्त्रियों पर अत्याचार करता है तो कोई भी उसका समर्थन नहीं करेगा। इस अन्यायपूर्ण व्यवस्था के अवशेषों को भी जाना ही होगा।
चूँकि रामचरितमानस या भारतीय संस्कृति के इस पक्ष की व्याख्या करना यहाँ हमारा प्रतिपाद्य नहीं है। हमें तो यहाँ अमरीका के सन्दर्भ में अबाध और पूर्ण आज़ादी या कहें छूट के दुष्परिणामों पर विचार करना है।
जब Ïक्लटन पर महाभियोग चल रहा था तब हिलेरी की परिपक्वता ने ही Ïक्लटन को बचा लिया। कहते हैं उस समय Ïक्लटन की आँखों में आँसू थे। हो सकता है जब हिलेरी ने घर में Ïक्लटन की ताड़ना की होगी आँसू तो तब भी आए होंगे लेकिन क्या इस ताड़ना को अनुचित माना जा सकता है। इसी तरह जब नेल्सन मंडेला के तीए की बैठक में विश्व के बहुत से नेता इकट्ठे हुए थे तब स्वीडन की युवा और सुन्दर प्रधानमंत्री के साथ सेल्फी लेने के लिए ओबामा फिसले पड़ रहे थे और मिशेल कुढ़ रही थी। अब दो तीन दिन पहले ओबामा कह रहे थे कि उन्हें उनकी पत्नी ने एक बेहतर पुरुष बनाया। यह बेहतरी इस ताड़ना का ही प्रभाव है। क्या कोई भी दो राष्ट्रपतियों को उनकी पत्नियों द्वारा दी गई ताड़ना या अनुशासन की शिक्षा या मर्यादा को अनुचित मानेगा? क्या यही दृष्टिकोण अमरीकी समाज में अन्य क्षेत्रों में लागू नहीं किया जा सकता?
सृष्टि में कुछ भी पूर्ण नहीं है तो फिर पूर्ण स्वतंत्रता जैसी कोई अवधारणा कुछ नहीं है। यदि आपको पूर्ण स्वतंत्रता चाहिए तो फिर आप को स्वयं के पूर्णतया आत्मनिर्भर होना पड़ेगा। फिर आप किसी से किसी भी प्रकार की सहायता की आशा नहीं करनी चाहिए। जिएँ, मरें जैसा जो कुछ हो, सहें, लेकिन जब यह संसार और समाज अंतरनिर्भरता से विकसित हुआ और चल रहा है तो इस अंतर्संबंध को समाप्त करके हम खतरा ही मोल लेंगे। जिस पर सारी जिम्मेदारी है उसकी व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करने का आपको कोई अधिकार नहीं है। पिता की आमदनी के बजट में आपको रहना ही होगा। इसी तरह से समाज का ताना-बाना बना हुआ है। जब तक कोई नियम, प्रथा, अवधारणा व्यक्ति, समाज और व्यवस्था के लिए खतरा नहीं बन जाता और जब तक आपके पास कोई विकल्प नहीं है तब तक व्यवस्था को अचानक भंग नहीं करना चाहिए।
पहले योरप और अब अमरीका के लोगों में यहाँ के कामचोरों और हरामखोरों को उस खुलेपन के जो मौज़-मज़े दिख रहे हैं उसे योरप छोड़ता जा रहा है और आगे-पीछे अमरीका को भी समझ आएगी ही। विवाहेतर संबंधों की आज़ादी, समलैंगिक विवाहों की आज़ादी, कुँवारे मातृत्त्व की आज़ादी, निर्वस्त्र होकर विरोध प्रकट करने की आज़ादी तथा और भी इसी प्रकार की बहुत सी गैरज़िम्मेदारियों की आज़ादियाँ देने में सरकारों के घर से जाता क्या है? क्या इसके अलावा वहाँ के गरीबों, बेरोजगारों, खंडित परिवार के फ़ॉस्टर केयर (धात्री-प्रथा) में पलने वाले बच्चों, नशे की लत में डूबे लोगों को कुछ नहीं चाहिए? और फिर इन आज़ादियों से उस समाज के इन तथाकथित मूर्ख आजाद लोगों को जीवन में कौन-सा सुख मिल रहा है। बल्कि कुंठाएँ, अपराध, हताशा जगह-जगह दिखाई दे रही हैं। इनके परिणाम स्वरूप परिवार टूट रहे हैं और बच्चे और बुज़ुर्ग सबसे अधिक दुष्प्रभावित हो रहे हैं। मुझे लगता है कि चाहे जहाँ गोलियाँ चला देना, पागलों जैसा व्यवहार करना ये सब असंतुष्ट और कुंठित जीवन के दुष्परिणाम हैं। आप दुनिया के दूसरे देशों से आने वाले आतंकवाद को रोक सकते हैं। उसके लिए ट्रंप जैसे या भारत में ट्रंप की सफलता के लिए यज्ञ करने वाले वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले बुद्धिजीवी इस्लाम को दोष देकर बरी हो सकते हैं लेकिन जब अपने ही देश के नागरिक अचानक पागलों की तरह कहीं भी गोलियाँ चलाने लग जाएँ तो उसे क्या कहेंगे?
अमरीका में सबसे ज्यादा खंडित परिवार हैं, इसी कारण अपराध अधिक हैं, इसी कारण आनुपातिक रूप से सबसे ज्यादा जेलें और कैदी अमरीका में ही हैं। इतनी समृद्धि के बावजूद इतने अपराध और कुंठित जीवन। लोग तो कहते हैं गरीबी अपराधों की जननी है लेकिन यहाँ तो विश्व के सर्वाधिक समृद्ध देश में यह सब हो रहा तो इसका कारण मेरे ख्याल से उस देश की तथाकथित स्वतंत्रता की असंतुलित अवधारणा के पुनर्परीक्षण की आवश्यकता है।
अमरीका में 25 लाख कैदी हैं जो 9 प्रति हजार की दर है और यह दुनिया में सबसे ज्यादा है। इन 25 लाख में 80 प्रतिशत काले हैं। ये आँकड़े मानवीय विकास की ज़िम्मेदारी लिए बिना, केवल स्वच्छंद-स्वतंत्रता देने के दुष्परिणामों को ही नहीं बताती बल्कि पिछले पाँच सौ वर्षों में अमरीका में गोरे-कालों के बीच विकसित हुए मानवीय-सामाजिक संबंधों के असंतुलन को भी रेखांकित करती है। आज जिस तरह भारत की वर्ण व्यवस्था की सडाँध एक बड़ी निःस्वार्थ और निरपेक्ष शल्य क्रिया की अपेक्षा रखती है वैसे ही अमरीकी और अमरीकी तर्ज़ पर अन्य देशों में लाई जा रही विवेकहीन स्वतंत्रता पर भी पुनर्विचार किया जाना चाहिए।

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