ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
सुषमा शर्मा
सुषमा शर्मा
14 अक्टूबर को ललितपुर, उ.प्र. में जन्म। बुन्देलखण्ड वि·ाविद्यालय, झाँसी से वाणिज्य में स्नातक। बरकतउल्ला वि·ाविद्यालय, भोपाल से कम्प्यूटर साइंस में डिप्लोमा। माधवराव सप्रे समाचार-पत्र संग्रहालय, भोपाल में मध्यभारत के समाचार-पत्रों पर शोध कार्य। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में सम-सामयिक आलेख एवं रचनाएँ प्रकाशित। सम्प्रति - गर्भनाल पत्रिका की सम्पादक।

इंसानी बिरादरी का ख़्वाब
जब भी दुनिया में छोटे-बड़े संघर्ष और जंग होती है तब एक सुर सुनाई देता है कि लड़ने से पहले बातचीत कर लो। संवाद से ही रास्ता निकलेगा। क्योंकि यह दुनिया ही ऐसी है कि इसमें बहुत दिनों तक दुश्मनी स्थायी रह ही नहीं सकती। दोस्ती की तरफ हाथ बढ़ाये बिना ये दु
लिपि रक्षा अभियान गर्भनाल-न्यास की
विगत 19 जनवरी 2019 को भोपाल में हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं की लिपियों की रक्षा और संरक्षण के अभियान में संलग्न गर्भनाल-न्यास की "इनस्क्रिप्ट की-बोर्ड सीखो" कार्यशाला, हिंदी भवन के महादेवी कक्ष में सम्पन्न हुई। कार्यशाला में केंद्रीय सरकार तथा बैं
ये आकाशवाणी है...
सुना है कि पिछले बत्तीस सालों से संध्याकाल छह बजे से प्रातःकाल छह बजे तक चलाया जा रहा ऑल इंडिया रेडियो का कार्यक्रम अब बंद किया जा रहा है। इस रेडियो चैनल पर उर्दू, हिंदी और अंग्रेजी में भी जो नाटक, कविता और वार्ताओं के रोचक कार्यक्रम प्रसारित किये
निवासिनी हिंदी, प्रवासिनी हिंदी
पिछली एक शताब्दी से हिंदी की व्यथा-कथा कही जाती रही है और आज लगता है कि शायद हम न तो हिंदी की व्यथा जान पाये हैं और न ही पूरी तरह उसकी कथा कह पाये हैं। भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में आखिर महात्मा गांधी से लेकर भारतेंदु हरिश्चंद्र तक ने यह

यायावर शिल्पी - पण्डित बनारसीदास चतुर्वेदी
पण्डित बनारसी दास चतुर्वेदी 20वीं सदी की शुरूआत में भारत के उन लोगों में से एक हैं जो स्वतंत्रता संग्राम को प्रारंभ होता देख रहे थे और उसके समानांतर स्वतंत्र हिंदी पत्रकारिता की चिंता भी उन्हें थी। वे अकेले पत्रकार नहीं थे, उन्हें पत्रकारिता को सा
सात सामाजिक पाप
दु निया में धर्मों का कुछ ऐसा सिलसिला चल निकला कि व्यक्ति पापी करार दिया गया। अगर वह यूरोप का है तो चर्च की खिड़की पर जाकर कन्फेस (स्वीकार) करता है। पर अगर भारतीय सभ्यता पर नजर दौड़ायें तो यहाँ व्यक्ति अपने पाप किसी धर्माचार्य के सामने स्वीकार नहीं
भाषा की दुनिया में आदमी
दुनिया का अर्थ ही यह है कि वह जब बनी होगी तो उसकी पहली इच्छा बोलने की रही होगी। क्योंकि दुनिया अगर है तो किसी से बोले बतियाये बिना आखिर चलेगी कैसे। जब शुरू-शुरू में आदमी पृथ्वी पर आया होगा, निश्चय ही उसने भोजन की तलाश की होगी, क्योंकि भूख अपने आप
भाषा, समाज और राज्य
यह एक तथ्य है कि भाषा पहले आती है और तरह-तरह के रूपाकारों में बहते हुए स्वरों में और पक्षियों के कलरव में बस जाती है। सदियों तक उसके निराकार शब्द वृक्षों पर लगी पत्तियों की तरह हवा में डोलते रहते हैं क्योंकि उन्हें कोई बोलने वाला नहीं होता। आदमी ब

शब्द, रंग और जीवन
पिछले दिनों सुप्रतिष्ठित चित्रकार, लेखक श्री अमृतलाल बेगड़ का दीर्घायु प्राप्त करने के बाद मध्यप्रदेश के जबलपुर शहर में निधन हो गया। बंगाल स्कूल से दीक्षित बेगड़ जी ने अपनी चित्रकला में लोकरंगी जीवन और उसकी संस्कृति को कई-कई बार उकेरा और उसके रेखाचि
मूल्यबोध और जीवन
क्या इस तरह भी विचार कर सकते हैं कि पुरानी पीढ़ी अब लगभग समाप्त हो रही है और कोई बिलकुल नयी तरह की संतति पूरी दुनिया में जन्म ले रही है जिसका मूल्यबोध पहले की पीढ़ी से कुछ अलग है। कभी-कभी ऐसा लगता होगा कि अब पुराने दादा-नानी नहीं रहे, वे पुराने शिक्
जीवन एक अनुवाद है
हमने यह कह तो दिया कि जीवन एक अनुवाद है और अनुभव में भी यही आता है कि जीवन एक अनुवाद से ज्यादा कुछ नहीं। एक सहज प्रश्न उठेगा कि जीवन किसका अनुवाद है। आमतौर पर संसार के जो तीन-चार प्रमुख धर्म हैं वे तो यही कहेंगे कि जीवन ईश्वर का अनुवाद है। तब फिर
ऊबे हुए सुखी
ऊबे हुए सुखी - यह पद आधुनिक हिंदी के अत्यंत महत्वपूर्ण कवि रघुवीर सहाय का गढ़ा हुआ है। यह उनके अनेक लेखों में से एक लेख का शीर्षक है। इसी नाम से उनके निबंधों की एक किताब 1983 में प्रकाशित हो चुकी है। रघुवीर सहाय सिर्फ कवि ही नहीं पत्रकार भी थे। वे

प्रकृति, भाषा और हम
आमतौर पर "प्रकृति" शब्द का अर्थ पर्यावरण मान लिया जाता है। पर अगर हम भारतीय दर्शन पर एक सामान्य दृष्टि डाल सकें तो यह भलीभाँति प्रतीत होता है कि प्रकृति का एक गहन अर्थ समूची सृष्टि का स्वभाव भी है। सृष्टि पंच तत्वों से बनती है जिनमें धरती, आकाश, अ
ख़ुद से पहले हो, ख़ुद के बाद भी हो
जब आदमी पर संसार की द्वंद्वमयी विविधता का भार नहीं आया था और वह अत्यंत प्राचीनकाल में अपने आपको उस प्रकृति के बीच देखता था जो उसकी पहुँच से बाहर थी और जिसके रहस्यों में वह प्रवेश करना चाहता था - हम यह कह सकते हैं कि जब वह बिल्कुल शिक्षित नहीं था -
हुनर की अभिव्यक्ति
दुनिया के इतिहास में हुनर हमेशा परम्परा सम्मत ही रहे हैं। यह ज़रूर है कि समय के अनुरूप उपकरण गढ़ने वाली दुनिया में उनकी नयी-नयी अभिव्यक्तियाँ होती रही हैं। आदमी अदिकाल में भी घड़ा बनाता था और उसे आज भी अपना पानी भरने के लिये घड़े की ज़रूरत है। भले ही उ
कहीं बोलना बेकार तो नहीं हो गया...
अगर गहराई से विचार करें तो मनुष्य का एक अद्भुत आविष्कार भाषा है। पृथ्वी पर रहने वाले अनेक मनुष्यों ने अपने-अपने भूदृश्यों और आकाश के अनुरूप अपनी-अपनी ध्वनियाँ सुनी हैं, अक्षर बनाये हैं, शब्द गढ़े हैं, वाक्य बनाये हैं और फिर बोले भी हैं। कितनी बोलिय

भारतीय समाज में रवीश की आवाज़
इस समय भारत में रवीश कुमार की आवाज़ घर-घर में गूँज रही है। वे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े हुए एक प्रसिद्ध रिपोर्टर हैं। एक ऐसे समय में जब मीडिया राजनेताओं की भक्ति करने में लगा हुआ है रवीश कुमार भारतीय समाज की अनेक समस्याओं को अपने "प्राईम टाइम" मे
कवि, समय और भाषा
हिंदी के साहित्य प्रेमियों के लिये यह एक सुखद अनुभूति होनी चाहिये कि इस भाषा के अप्रतिम कवि श्री कुँवर नारायण नब्बे वर्ष की आयु पार कर रहे हैं। पर इसी के साथ एक दु:खद स्थिति भी बनी हुई है कि वे पिछले तीन महीनों से अचेत अवस्था में पड़े हुए हैं। गर्भ
भाषा का विश्वरूप और हमारा सॉफ्टवेयर
भारत में एक दार्शनिक पद्धति यह भी है कि पूरा विश्व शब्द रूप है। हमारे ज्ञानियों और भक्तिकाल के कवियों ने सदियों तक शब्द साधना की है तथा शब्द को पूरी सृष्टि के केन्द्र में जगह दी है। वे अपने अंतज्र्ञान से यह समझ सके कि अगर शब्द नहीं तो यह विश्व भी
वास्तविक हिंदी सेवी कौन?
भारत में हिंदी कभी सत्ता की भाषा नहीं रही। वह सत्ता के विरुद्ध संग्राम की भाषा रही है। इसीलिये अगर वो राजभाषा ना भी बन पाये तो उसमें उसका कोई अपमान नहीं है। हिंदी का विकास दूसरी भारतीय भाषाओं की तरह केवल संस्कृत से नहीं हुआ है। उसके विकास मे

स्मृति के द्वार पर दस्तक
भाव तो सभी के मन में उठते हैं, अनुभूति बनते हैं और फिर कुछ कहने की इच्छा होती है। पर लेखक के जीवन में निरंतर एक ऐसा स्मृति संचय होता रहता है जो लेखक से खुद अपना साक्षात्कार तो करवाती ही है वह उसे दूसरों के सामने भी खड़ा कर देती है। प्रत्येक लेखक अप
कथामय विश्व
सं    सार की काल और गति को जानने के लिये मनुष्य ने    जो पहले दो प्रयत्न किये होंगे उनमें पहला एक-दूसरे    से सम्वाद और दूसरा सम्वाद करते हुए बन गयी कोई लोक कथा ही होगी। भारत का समस्त दर्शन
गाँव बसाये नहीं जाते
जिस तरह शहर बसाये जाते हैं गांव के बसने का ऐसा कोई प्रमाण पृथ्वी पर नहीं मिलता। गांव बसाये नहीं जाते - वे अपने आप बस जाते हैं। आदिकाल से मानव जीवन हमेशा उस स्थानीयता को पहचानने की कोशिश करता रहा है जिसमें उसने जन्म लिया है। अगर गहराई से विचा
फिल्म : एक प्लास्टिक आर्ट
हम आज भी सिनेमा घरों में जाते हैं। बहुत रंगबिरंगी और भारत के गांवों-देहातों से दूर, बल्कि भारत के स्मॉर्ट शहरों से भी दूर लंदन, हांककांग, न्यूयार्क, सिंगापुर में फिल्माई गई फिल्में देखते हैं, जिनमें विश्व सुंदरी के नाप की अभिनेत्री और

पत्रकारिता : स्वतंत्र या स्वच्छंद
समाचार-पत्र आधुनिक मनुष्य के ऊपर एक बहुत बड़ा अत्याचार है। साथ ही, वह हमारी संवैधानिक आज़ादी का माध्यम भी है। ...मनुष्य की आजादी एक टेढ़ी खीर है। किसी भी व्यवस्थित समाज में अभिव्यक्ति की पगडंडियां बनती जाती हैं। आज़ादी के औजार बने-बनाये रहते हैं। औसत
लोक-बोली के निहितार्थ
भारत में लोक शब्द बहुअर्थी है। यहां की पुराण कथाओं में चौदह लोकों की परिकल्पना की गई है। जिनमें पृथ्वी, आकाश और पाताल लोक भी शामिल हैं। लोक का एक अर्थ उस व्यापक बहुरंगी जीवन से भी है जिसकी सदियों पुरानी अनुभव सम्पदा से लोक संस्कृतियों का निर्माण ह
अरे यायावर रहेगा याद
आज यात्राएं होती हैं पर वे पूंजी निवेश के लिये जितनी हैं उतनी शब्द निवेश के लिये नहीं। शब्द निवेश के बिना पूंजी की अर्थहीनता विश्व को ही डुबो देगी। क्योंकि विश्व पूंजी में नहीं शब्द में बसता है। इस सृष्टि का गर्भनाल शब्द से जुड़ा है। पूंजी से नहीं।
हमारा अतीत एक है, हमें गले लगाएँ
नीदरलैंड के भारतवंशी व्यवसायी भगवान प्रसाद से सुषमा शर्मा की बातचीतअपनी तरह से जीने वाले कुछ शख्स अपनी तरह के होते हैं जो दूसरों के लिये ही जीते हैं। पूंजीवाद के इस जटिल समय में जहां लोग सिर्फ अपने लिये धन कमाना चाहते

वासी, प्रवासी, अप्रवासी
लगभग आधी सदी पहले राजकपूर अभिनीत एक फिल्म - जिस देश में गंगा बहती है बनी थी और उसका शैलेन्द्र का लिखा हुआ एक गीत बहुत प्रसिद्ध हुआ - होठों पे सचाई रहती है, जहाँ दिल में सफाई रहती है, हम उस देश के वासी हैं, जिस देश में गंगा बहती है। राजकपूर को याद
तुम निरखो, हम नाट्य करें...
भारत की नाट्य परम्परा पूरे संसार में अपने विशिष्ट रंग प्रयोजनों के लिये विख्यात है। भारत के रंगमंच की जड़ें आदिम और पौराणिक समय से ही बहुत गहरी होती आयी हैं। पिछले दो ढाई हजार सालों में इनमें अनेक परिवर्तन भी हुए हैं। वाल्मीकि रामायण से लेकर महाभार
छोड़ अइली हिंदुस्तनवा बबुआ  पेटवा के खातिर
भारत की हुनरमंद जातियां अपनी कारीगरी और कला कौशल के लिये पूरे संसार में पहचानी गयी हैं। भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के आने तक यही जातियां भारत को समृद्ध बनाने में सदियों से अपना योगदान दे रही थीं। वे लोहा गला सकती थीं, संसार का सबसे बारीक कपड़ा बुन
निबंध गद्य की कसौटी है...
हिंदी में निबंध उन्नीसवीं सदी के उदारतावादी युग में उपजा है। क्योंकि उस समय वैचारिक स्वाधीनता ही मनुष्य की पहली प्रतिज्ञा थी। स्वाधीनता के साथ वैचारिक सहिष्णुता भी अपने आप आती है। विचार प्रतिपादन के लिये लिखा गया गद्य आलोचकों ने निबंध ही माना है।

हिंदी नयी चाल में ढले...
इस बदलते विश्व में केवल अंग्रेजी को कोसने से काम नहीं चलेगा, बल्कि अपनी भाषाओं को पोसने से ही हम पूरे संसार के साथ कदम मिलाकर चल सकेंगे। हिंदी के लिये हिंदी में रुदन करना बंद होना चाहिये। रोते वे हैं जिनके प
आज़ादी की कीमत
देश केवल लोगों के रहने की जगह का नाम नहीं है, वह तो सहकार भावना से जीवन को आपस में सँवारने की जगह है। किसी भी देश के लोग कभी भी अकेले-अकेले जीवन नहीं जी सकते, उन्हें तो साथ रहकर ही जीवन की सुन्दर कल्पना करना पड़ती है। इस कल्पना के न होने से किसी भी
वर्षा वर्णन
गोस्वामी तुलसीदासप्रयाग के पास बाँदा जिले में राजापुर नामक गाँव में संवत् 1554 को जन्म। का¶ाी में पंद्रह वर्षों तक वेदों और दूसरे संस्कृत ग्रंथों का अध्ययन। विवाह के बाद पत्नी मोह और पत्नी की फटकार के बाद सन्यासी हो गये। संवत् 1631 में
काले बादल
सुमित्रानंदन पंतबीसवीं सदी का पूर्वाद्र्ध छायावादी कवियों का उत्थान काल था। उसी समय अल्मोड़ा निवासी सुमित्रानंदन पंत उस नये युग के प्रवर्तक के रूप में हिन्दी साहित्य में अभिहित हुये। इस युग को जय¶ांकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, सूर्यकांत त्र

बादल राग
सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला'वसंत पंचमी, 1896, मेदिनीपुर, प¶िचम बंगाल में जन्म। मुख्य कृतियाँ : उपन्यास : अप्सरा, अलका, प्रभावती, निरुपमा, कुल्ली भाट, बिल्लेसुर बकरिहा। कविता संग्रह : अनामिका,परिमल, गीतिका, द्वितीय अनामिका, तुलसीदास, कुकु
घर की याद
भवानीप्रसाद मिश्र29 मार्च 1913, टिगरिया, हो¶ांगाबाद में जन्म। कविता संग्रह : गीतफरो¶ा, चकित है दुख, गांधी पंच¶ाती, बुनी हुई रस्सी, खु¶ाबू के ¶िालालेख, त्रिकाल संध्या, व्यक्तिगत, परिवर्तन जिए, अनाम तुम आते हो, इदं न म
भटका मेघ
श्रीकांत वर्मा18 सितंबर 1931 को बिलासपुर में जन्म। कविता संग्रह : भटका मेघ, मायादर्पण, दिनारंभ, जलसाघर, मगध। कहानी संग्रह : झाड़ी, संवाद। उपन्यास : दूसरी बार। आलोचना : जिरह। यात्रा वृत्तांत : अपोलो का रथ। अन्य : बीसवीं सदी के अँधेरे में। अनुव
मेरे राम का मुकुट भीग रहा है
विद्यानिवास मिश्र28 जनवरी 1925 को पकड़डीहा, गोरखपुर में जन्म। मुख्य कृतियाँ : स्वरूप-विमर्¶ा, कितने मोरचे, गांधी का करुण रस, चिड़िया रैन बसेरा, छितवन की छाँह, तुलसीदास भक्ति प्रबंध का नया उत्कर्ष, थोड़ी सी जगह दें, फागुन दुइ रे दिना, बसंत

चल हंसा वा देस
अपना देश, खासकर मध्यकालीन भारत फ़क़ीरों का देश रहा है। अरबी का एक मूल है -फ़-क़-र, जिसका अर्थ है - निर्धनता। इसी मूल से फ़क़ीर शब्द की निष्पत्ति हुई है। फ़क़ीर परंपरा को मध्यकाल में देश पर बाह्र आक्रमणों के कारण हुई सामाजिक और आर्थिक विषमता की उपज माना जा
लोक में कबीर
बुन्देलीनैहर खेल लेव चार दिन चारीपैले लुबउवा तीन जनें आये, नाई बामन बारी।बाँह पकर माता सें बोली, अबकी गवन देव टारी।।दुजे लुबउवा ससुर जू आये, कर घोड़ा असवारी।बाँह पकर बाबुल सें बोली, अबकी गवन देव टारी।।तीजे
एडीसन में हिंदी महोत्सव सम्पन्न
न्यूजर्सी के एडिसन ¶ाहर में 21 व 22 मई को "हिंदी यूएसए' ने अपने पन्द्रहवें हिंदी महोत्सव का आयोजन किया। दो दिनों तक चले इस आयोजन में पूरी तरह से हिंदी का आधिपत्य रहा। भिन्न-भिन्न उम्र वर्ग के प्रतियोगियों ने बड़ी संख्या में नाटक मंचन, कविता पा
जल-जागृति
जल ही जीवन है। इस ¶ाा·ात सत्य से कौन इनकार करेगा? लेकिन इस सत्य के पक्ष में बोलना एक बात है और रोजमर्रा के आचरण में उतारना बिलकुल दूसरी बात। जल की महिमा सनातनकाल गायी जाती रही है। रहिमन पानी रखिए..., पानी बिच मीन पियासी..., पानी रे पान

सपनों को  साकार करने का  मिशन जारी है
भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम साहब कहते थे कि नई सोच का दुस्साहस दिखाओ। हमने भी अपनी सोच को नयी दिशा दी है। हमारी आँखों में भी सुनहरे सपने तैरते हैं, जो एक न एक दिन ज़रूर ही साकार होंगे।मेरा जन्म झाँसी में हुआ। कॉलेज की पढ़ाई के बाद
निवेशक  मित्र और विकास में सहभागी हैं
प्रश्न - मध्यप्रदेश में प्रवासी भारतीयों की पूंजी निवेश की आपकी महत्वाकांक्षी योजना में सिंगापुर यात्रा की उपलब्धि के बारे में क्या कहेंगे।उत्तर - देखिये मैं सिंगापुर सरकार के नियंत्रण पर गया था। मध्यप्रदेश ने सिंचाई, कृषि, महिला सशक्तिकरण स
उत्तर प्रदेश प्रवासी भारतीय दिवस यादगार होगा - अखिलेश यादव
प्रश्न : आगरा में 4 से 6 जनवरी 2016 को पहला "उत्तर प्रदेश प्रवासी भारतीय दिवस' मनाया जा रहा है। इसकी आवश्यकता पर प्रकाश डालेंगे। उत्तर : पिछली सरकार के ठीक उलट वर्तमान सरकार अपने गठन के बाद से ही प्रदेश के सर्वांगीण विकास के लिए लगातार काम कर रही
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