ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
सुषमा शर्मा
सुषमा शर्मा
14 अक्टूबर को ललितपुर, उ.प्र. में जन्म। बुन्देलखण्ड वि·ाविद्यालय, झाँसी से वाणिज्य में स्नातक। बरकतउल्ला वि·ाविद्यालय, भोपाल से कम्प्यूटर साइंस में डिप्लोमा। माधवराव सप्रे समाचार-पत्र संग्रहालय, भोपाल में मध्यभारत के समाचार-पत्रों पर शोध कार्य। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में सम-सामयिक आलेख एवं रचनाएँ प्रकाशित। सम्प्रति - गर्भनाल पत्रिका की सम्पादक।

भारतीय समाज में रवीश की आवाज़

इस समय भारत में रवीश कुमार की आवाज़ घर-घर में गूँज रही है। वे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े हुए एक प्रसिद्ध रिपोर्टर हैं। एक ऐसे समय में जब मीडिया राजनेताओं की भक्ति करने में लगा हुआ है रवीश कुमार भार

कवि, समय और भाषा

हिंदी के साहित्य प्रेमियों के लिये यह एक सुखद अनुभूति होनी चाहिये कि इस भाषा के अप्रतिम कवि श्री कुँवर नारायण नब्बे वर्ष की आयु पार कर रहे हैं। पर इसी के साथ एक दु:खद स्थिति भी बनी हुई है कि वे पिछ

भाषा का विश्वरूप और हमारा सॉफ्टवेयर

भारत में एक दार्शनिक पद्धति यह भी है कि पूरा विश्व शब्द रूप है। हमारे ज्ञानियों और भक्तिकाल के कवियों ने सदियों तक शब्द साधना की है तथा शब्द को पूरी सृष्टि के केन्द्र में जगह दी है। वे अपने अंतज्र्

वास्तविक हिंदी सेवी कौन?

भारत में हिंदी कभी सत्ता की भाषा नहीं रही। वह सत्ता के विरुद्ध संग्राम की भाषा रही है। इसीलिये अगर वो राजभाषा ना भी बन पाये तो उसमें उसका कोई अपमान नहीं है।
हिंदी का विकास दूसरी भारतीय भाषाओं


स्मृति के द्वार पर दस्तक

भाव तो सभी के मन में उठते हैं, अनुभूति बनते हैं और फिर कुछ कहने की इच्छा होती है। पर लेखक के जीवन में निरंतर एक ऐसा स्मृति संचय होता रहता है जो लेखक से खुद अपना साक्षात्कार तो करवाती ही है वह उसे द

कथामय विश्व

सं    सार की काल और गति को जानने के लिये मनुष्य ने
    जो पहले दो प्रयत्न किये होंगे उनमें पहला एक-दूसरे
    से सम्वाद और दूसरा सम्वाद करते हु

गाँव बसाये नहीं जाते

जिस तरह शहर बसाये जाते हैं गांव के बसने का ऐसा कोई प्रमाण पृथ्वी पर नहीं मिलता। गांव बसाये नहीं जाते - वे अपने आप बस जाते हैं।
आदिकाल से मानव जीवन हमेशा उस स्थानीयता को पहचानने की कोशिश करता

फिल्म : एक प्लास्टिक आर्ट

हम आज भी सिनेमा घरों में जाते हैं। बहुत रंगबिरंगी और भारत के गांवों-देहातों से दूर,
बल्कि भारत के स्मॉर्ट शहरों से भी दूर लंदन, हांककांग, न्यूयार्क, सिंगापुर में फिल्माई
गई फिल्में देखत


पत्रकारिता : स्वतंत्र या स्वच्छंद

समाचार-पत्र आधुनिक मनुष्य के ऊपर एक बहुत बड़ा अत्याचार है। साथ ही, वह हमारी संवैधानिक आज़ादी का माध्यम भी है। ...मनुष्य की आजादी एक टेढ़ी खीर है। किसी भी व्यवस्थित समाज में अभिव्यक्ति की पगडंडियां बनत

लोक-बोली के निहितार्थ

भारत में लोक शब्द बहुअर्थी है। यहां की पुराण कथाओं में चौदह लोकों की परिकल्पना की गई है। जिनमें पृथ्वी, आकाश और पाताल लोक भी शामिल हैं। लोक का एक अर्थ उस व्यापक बहुरंगी जीवन से भी है जिसकी सदियों प

अरे यायावर रहेगा याद

आज यात्राएं होती हैं पर वे पूंजी निवेश के लिये जितनी हैं उतनी शब्द निवेश के लिये नहीं। शब्द निवेश के बिना पूंजी की अर्थहीनता विश्व को ही डुबो देगी। क्योंकि विश्व पूंजी में नहीं शब्द में बसता है। इस

हमारा अतीत एक है, हमें गले लगाएँ

नीदरलैंड के भारतवंशी व्यवसायी भगवान प्रसाद से सुषमा शर्मा की बातचीत

अपनी तरह से जीने वाले कुछ शख्स अपनी तरह के होते हैं जो दूसरों के लिये ही जीते हैं। पूंजीवाद के इस जटि


वासी, प्रवासी, अप्रवासी

लगभग आधी सदी पहले राजकपूर अभिनीत एक फिल्म - जिस देश में गंगा बहती है बनी थी और उसका शैलेन्द्र का लिखा हुआ एक गीत बहुत प्रसिद्ध हुआ - होठों पे सचाई रहती है, जहाँ दिल में सफाई रहती है, हम उस देश के व

तुम निरखो, हम नाट्य करें...

भारत की नाट्य परम्परा पूरे संसार में अपने विशिष्ट रंग प्रयोजनों के लिये विख्यात है। भारत के रंगमंच की जड़ें आदिम और पौराणिक समय से ही बहुत गहरी होती आयी हैं। पिछले दो ढाई हजार सालों में इनमें अनेक प

छोड़ अइली हिंदुस्तनवा बबुआ  पेटवा के खातिर

भारत की हुनरमंद जातियां अपनी कारीगरी और कला कौशल के लिये पूरे संसार में पहचानी गयी हैं। भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के आने तक यही जातियां भारत को समृद्ध बनाने में सदियों से अपना योगदान दे रही थीं। व

निबंध गद्य की कसौटी है...

हिंदी में निबंध उन्नीसवीं सदी के उदारतावादी युग में उपजा है। क्योंकि उस समय वैचारिक स्वाधीनता ही मनुष्य की पहली प्रतिज्ञा थी। स्वाधीनता के साथ वैचारिक सहिष्णुता भी अपने आप आती है। विचार प्रतिपादन क


हिंदी नयी चाल में ढले...

इस बदलते विश्व में केवल अंग्रेजी को कोसने से काम नहीं चलेगा, बल्कि अपनी
भाषाओं को पोसने से ही हम पूरे संसार के साथ कदम मिलाकर चल सकेंगे।
हिंदी के लिये हिंदी

आज़ादी की कीमत

देश केवल लोगों के रहने की जगह का नाम नहीं है, वह तो सहकार भावना से जीवन को आपस में सँवारने की जगह है। किसी भी देश के लोग कभी भी अकेले-अकेले जीवन नहीं जी सकते, उन्हें तो साथ रहकर ही जीवन की सुन्दर क

वर्षा वर्णन

गोस्वामी तुलसीदास
प्रयाग के पास बाँदा जिले में राजापुर नामक गाँव में संवत् 1554 को जन्म। का¶ाी में पंद्रह वर्षों तक वेदों और दूसरे संस्कृत ग्रंथों का अध्ययन। विवाह के बाद पत्नी मोह और पत्

काले बादल

सुमित्रानंदन पंत
बीसवीं सदी का पूर्वाद्र्ध छायावादी कवियों का उत्थान काल था। उसी समय अल्मोड़ा निवासी सुमित्रानंदन पंत उस नये युग के प्रवर्तक के रूप में हिन्दी साहित्य में अभिहित हुये। इस युग को


बादल राग

सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला'
वसंत पंचमी, 1896, मेदिनीपुर, प¶िचम बंगाल में जन्म। मुख्य कृतियाँ : उपन्यास : अप्सरा, अलका, प्रभावती, निरुपमा, कुल्ली भाट, बिल्लेसुर बकरिहा। कविता संग्रह : अनाम

घर की याद

भवानीप्रसाद मिश्र
29 मार्च 1913, टिगरिया, हो¶ांगाबाद में जन्म। कविता संग्रह : गीतफरो¶ा, चकित है दुख, गांधी पंच¶ाती, बुनी हुई रस्सी, खु¶ाबू के ¶िालालेख, त्रिकाल संध्या,

भटका मेघ

श्रीकांत वर्मा
18 सितंबर 1931 को बिलासपुर में जन्म। कविता संग्रह : भटका मेघ, मायादर्पण, दिनारंभ, जलसाघर, मगध। कहानी संग्रह : झाड़ी, संवाद। उपन्यास : दूसरी बार। आलोचना : जिरह। यात्रा वृत्तांत :

मेरे राम का मुकुट भीग रहा है

विद्यानिवास मिश्र
28 जनवरी 1925 को पकड़डीहा, गोरखपुर में जन्म। मुख्य कृतियाँ : स्वरूप-विमर्¶ा, कितने मोरचे, गांधी का करुण रस, चिड़िया रैन बसेरा, छितवन की छाँह, तुलसीदास भक्ति प्रबंध का नया


चल हंसा वा देस

अपना देश, खासकर मध्यकालीन भारत फ़क़ीरों का देश रहा है। अरबी का एक मूल है -फ़-क़-र, जिसका अर्थ है - निर्धनता। इसी मूल से फ़क़ीर शब्द की निष्पत्ति हुई है। फ़क़ीर परंपरा को मध्यकाल में देश पर बाह्र आक्रमणों क

लोक में कबीर

बुन्देली

नैहर खेल लेव चार दिन चारी
पैले लुबउवा तीन जनें आये, नाई बामन बारी।
बाँह पकर माता सें बोली, अबकी गवन देव टारी।।
दुजे लुबउवा ससुर जू आये, कर घोड़ा असवारी।
बाँह

एडीसन में हिंदी महोत्सव सम्पन्न

न्यूजर्सी के एडिसन ¶ाहर में 21 व 22 मई को "हिंदी यूएसए' ने अपने पन्द्रहवें हिंदी महोत्सव का आयोजन किया। दो दिनों तक चले इस आयोजन में पूरी तरह से हिंदी का आधिपत्य रहा। भिन्न-भिन्न उम्र वर्ग के

जल-जागृति

जल ही जीवन है। इस ¶ाा·ात सत्य से कौन इनकार करेगा? लेकिन इस सत्य के पक्ष में बोलना एक बात है और रोजमर्रा के आचरण में उतारना बिलकुल दूसरी बात। जल की महिमा सनातनकाल गायी जाती रही है। रहिमन


सपनों को  साकार करने का  मिशन जारी है

भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम साहब कहते थे कि नई सोच का दुस्साहस दिखाओ। हमने भी अपनी सोच को नयी दिशा दी है। हमारी आँखों में भी सुनहरे सपने तैरते हैं, जो एक न एक दिन ज़रूर ही साकार होंगे।<

निवेशक  मित्र और विकास में सहभागी हैं

प्रश्न - मध्यप्रदेश में प्रवासी भारतीयों की पूंजी निवेश की आपकी महत्वाकांक्षी योजना में सिंगापुर यात्रा की उपलब्धि के बारे में क्या कहेंगे।
उत्तर - देखिये मैं सिंगापुर सरकार के नियंत्रण पर गया

उत्तर प्रदेश प्रवासी भारतीय दिवस यादगार होगा - अखिलेश यादव

प्रश्न : आगरा में 4 से 6 जनवरी 2016 को पहला "उत्तर प्रदेश प्रवासी भारतीय दिवस' मनाया जा रहा है। इसकी आवश्यकता पर प्रकाश डालेंगे। उत्तर : पिछली सरकार के ठीक उलट वर्तमान सरकार अपने गठन के बाद से ही प

QUICKENQUIRY
Related & Similar Links
Copyright © 2016 - All Rights Reserved - Garbhanal - Version 10.00 Yellow Loop SysNano Infotech Structured Data Test ^