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सुनो माँ! बात करनी थी!
01-Jan-2018 04:00 PM 1927     

सुनो माँ! बात करनी थी!
तुम्हें वो याद है
मिट्टी की गुल्लक दो रूपये वाली
उसे मैं भूल आई हूँ वहीं आले के कोने में
वो पूरा भर गया होगा!
अब बाबूजी नहीं हैं तो
बड़े भैया ने हौले से
हरेक पहली सितम्बर को
रखे होंगे नए सिक्के...

सुनो माँ! कोश मेरे सब अधूरे हैं बिना उसके
कि जैसे सर ये सूना है
बिना तेरी हथेली के!

सुनो माँ! बात करनी थी!
वो मेरा छींट का झोला
टंगा ही रह गया होगा
बड़ी अलमारी के अन्दर
या खूंटी पे पड़ा होगा!
लटकती उससे लव-इन-टोकियो की
दो हरी लड़ियाँ
क्या भूरी हो गईं हैं वो?
कि अब भी सब्ज़ दिखती हैं?
लगाकर तेल, चोटी गूँथकर
मैं बाँधती जूड़ा
नए जब क्लिप लगाती हूँ
वहाँ क्या वो मचलतीं हैं?

 

ये भारत टूर पे आयेंगे
तुमसे भी मिलेंगे माँ!
मगर क्या देख पायेंगे
तुम्हें मेरी निगाहों से
करेंगे कैसे ज़िद कि
तीसी-सजमन अब ही खानी है
तुम्हें कैसे दिखायेंगे
थोड़ा भुन्ना के, अगरा के
मेरा चांदी का पहला बाल!
लगी हो ऊंचा सुनने तुम
मगर सुन पाओगी न सब!
कहेंगे वो तुम्हें, गुड़िया तुम्हारी ठीक है मम्मी
अमूमन ठीक ही हूँ... मान लेना!
सुनो माँ! बात करनी थी!

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