ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
सुनहरे भविष्य की रौशनी का सच
01-Jan-2017 12:12 AM 2408     

आमतौर पर ऐसा माना जाता है कि एनआरआई याने अपने देश से दूर दोहरी जिंदगी जीने वाला भारतीय। भारत में अक्सर ही इन्हें बहुत सफल माना जाता है जिनका अपना एक विशेष स्टेटस बना हुआ है। विदेश में वे अपनी पहचान कैसे बनाये रखते हैं, उनका वहां क्या सामाजिक स्टेटस होता है? उनका जीवन क्या वैसा ही है जैसा दूर से दिखता है? ये ऐसे सवाल हैं जिनके उत्तर में अधिकतर विपरीत कहानियाँ सामने आती हैं। उदाहरण के लिये अमेरिकन सोसाइटी में बहुत से सफलता प्राप्त भारतीयों जो मध्यम वर्ग या उच्च मध्यम वर्ग से हैं, सिर्फ छोटे से अल्पसंख्यक समूह का हिस्सा हैं। यूरोप, अमेरिका या किसी अन्य विकसित देश में सफल प्रवासी भारतीय वे ही हैं जो पेशेवर होते हैं, मसलन भारतीय डॉक्टरों और इंजीनियरों को इस श्रेणी में रखा जा सकता है। ज्यादातर मामलों में उनकी स्थिति सम्मानजनक होती है। वे बड़े और आलीशान घरों और अन्य सुविधाओं से सम्पन्न होते हैं।
हालांकि पश्चिम में इस तरह के सफल प्रवासी लोगों के लिए कोई विशेष दर्जा नहीं है। इसके विपरीत स्थानीय लोग उन्हें बाहरी लोगों में गिनते हैं। इनको यहाँ कभी-कभी बढ़ती बेरोजगारी का कारण भी समझा जाता है। स्थिति उन लोगों की गंभीर हो जाती है जो यहाँ बस औसत काम कर रहे हैं। इनकी रोज़मर्रा तक की जिंदगी बहुत ज्यादा कठिन है। स्थिति तब और ज्यादा दुविधापूर्ण हो जाती है जब ये लोग अपनी मन की उलझनों को किसी से साझा करने की स्थिति में भी नहीं रहते। नौकरी के दौरान आने वाली मुश्किलों को ज्यादा तरजीह नहीं दी जाती और इसे उसका हिस्सा माना जाता है। दूर से वे विकसित देश में काम करने वाले विकसित भारतीय ही समझे जाते हैं।
विदेशी भूमि पर आना और मन मारकर तमाम तरह के समझौते करते हुए विदेशी जीवनशैली को ना-ना करते हुए अपनाने में अनेक उतार-चढ़ावों का सामना होता है। अपनी पहचान खोकर इस नयी जीवनशैली का स्वीकार इतने आहिस्ता से होता है कि धीरे-धीरे सालों बाद महसूस ही नहीं कर पाते कि जीवन इतना कब और कैसे बदल गया। सुविधाओं के इस कदर आदी हो जाते हैं कि पीछे की गुजर चुकी ज़िंदगी एक बीत गये सपने जैसी लगती है। थोड़े नॉस्टेल्जिक होकर कभी कभार ऐसे ख्याल भी आते हैं कि काश! पीछे जा पाते और थोड़ा बदल पाते - कम से कम कुछ जरूरी पल।
अनेक बारे ऐसे ख्याल आते हैं कि शायद विदेश आने का फैसला उस समय पर सही रहा हो और हम में से कुछ लोगों  के पास इससे बेहतर और कोई मौका न हो जब हमने पहली बार अपने घर और अपने देश को छोड़ा। बहुतों ने जेहन में देश छोड़ते समय शायद यह बात कभी न आई हो कि वे हमेशा के लिये देश छोड़ रहे हैं। अपनी पहली  यात्रा शुरू करते समय "जल्द ही वापस आने का" का वादा हर एक करता है, लेकिन कुछ समय के बाद यह वादा  धुंधला पड़ जाता है। या कहें कि खत्म ही हो जाता है। कुछ लोग पैसे के लिये, कुछ लोग आत्मतुष्टि के लिये, कुछ बेहतर जीवनशैली के लिये, कुछ लोग न जाने किन-किन बातों के लिये इस दुनिया में बने रहने की वजहें खोजते रह कर खुद को बहलाते रहते हैं।
कई तरह के समझौते करते-करते समझ आता है कि अपना देश, अपना घर छोड़ना कोई छोटी बात न थी। यहाँ पूरी सोच ही उलट-पुलट जाती है। अक्सर सोचते हैं क्या कर रहे है यहां, क्यों है यहाँ इतनी दूर। देश की जमीं अपनी ही  लगती रहती है सालों बाद भी, यहां की जमीं पर अपनापन पाना क्यों मुश्किल है इतना। बेहतर भविष्य के लिए हम शायद छोड़ चुके होते हैं अपने परिवार के सदस्यों, करीबी दोस्तों और यहाँ तक के अपनी व्यक्तिगत पहचान को भी।
विदेश की दुनिया दूर से हमेशा ही बहुत अधिक विलासिता और बिना किसी कठिनाई से भरी हुई दिखती है। पर सब सचाई के करीब नहीं है। इसमें कोई शक नहीं कि विकसित देश बहुत से नए अवसर देता है। यहां रोज़मर्रा की सुख-सुविधा से लेकर तरह-तरह के नए आकर्षण हैं। यहां तेज़ भागती जिंदगी है पर इसमें भावनाओं के लिए उतना समय ही नहीं कि खुलकर उनको व्यक्त किया जाये। व्यक्त किया नहीं कि आपको कमजोर लोगों की उपाधि से नवाज़ा जाने लगता है। यहां की रफ़्तार के साथ होने के लिए  जूझना पड़ता है।
संस्कृति, परंपरा, रीति-रिवाज़, भाषा, शिक्षा, सामान्य सामाजिक व्यवहार, खान-पान, आत्मविश्वास आदि बातों के लिये चहुंओर से बदलाव करने पड़ते है। फिर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप नयी बातें सीखने में कितने तेज हैं, खुलेपन में कितना यकीन करते हैं और नयी जीवनशैली को अपनाने में कितनी तेजी दिखाते हैं।
तमाम तरह की सावधानियों और अंदाजे के बावजूद हरेक को यहां एक तरह का "कल्चरल शॉक" लगता ही है। इस झटके का एक समय है जिससे कई पार हो जाते हैं और कई उसमें उलझ कर रह जाते हैं। जैसे-जैसे दिन जाते हैं एक अलग ही तरह का तनाव बनना शुरू हो जाता। खुद को बहलाते हुए, खुद के बदलते जाने के गवाह बनते जाते हैं। और एक समय ऐसा आता है जब प्रवासी न यहाँ के रहते हैं न वहां के। प्रवासी भारतीयों को न विदेश पूरी तरह से अपनाता है, न देश ठीक से छूट पाता है।
अपनापन खोजने की चाहत का नतीजा है कि प्रवासी भारतीयों के जितने अधिक संगठन अमेरिका में हैं शायद इतने खुद देश में न होंगे। अपने देश में उन्हें लोग विदेशी होने का ठप्पा लगा देते हैं या ये  कहें कि वो अक्सर कहीं मज़ाक तो कहीं ईष्र्या का पात्र बन जाते हैं। विदेश को वो अपना बना नहीं पाते और विदेश में उन्हें सिर्फ बाहरवालों के नाम से ही जाना जाता है। बस फिर वे मजबूर हो जाते हैं दोहरी जिंदगी जीने के लिए।
दोहरी जिंदगी के साथ उनके दो नाम भी हो जाते हैं। एक सही उच्चारण नाम जो भारतीय  परिवार और दोस्तों के लिए और दूसरा अमेरिकनीज़ेड उच्चारण नाम जो यहाँ की अलग पहचान बनाता है। दो तरह के व्यवहार भी दिखने लगते हैं। जैसे कि अमेरिकन बर्गर को शौक में और दिखावे में बाहर खा तो लेते हैं पर घर पर बर्गर में मिर्च मसाले मिलाकर बनाते हैं तभी उसका स्वाद ले पाते हैं। बच्चों को भरतनाट्यम और कर्नाटक शैली में गायन सिखाते हैं। भारतीय संगीत और फिल्मों का लगाव कभी नहीं छोड़ पाते, चाहे कितना भी अंग्रेजी संगीत सुन लें और कितने ही बच्चों के अंग्रेजी प्रोग्राम्स अटेंड करके तालियां ठोंक लें। रहते हैं विदेश में पर देश की खबर टीवी में, इन्टरनेट से सेट करते फिरते हैं। बेसबॉल को समझ तो जाते हैं पर क्रिकेट तो जैसे खून में बसा हुआ है। फिर कंफ्यूज होते रहते हैं कभी अपने लिए तो कभी बच्चों के लिए। यहां बच्चों के बिगड़ने का डर तो वहां बच्चों के एडजस्ट न हो पाने का डर। यहां अच्छे संस्कार से कहीं वंचित न रह जाए का डर, तो वहाँ इतनी अधिक लिबरल और आधुनिक लाइफ से दूर होने का डर। बस एक अजीब  सा डर घर बना लेता है दिल और दिमाग पर। इस डर और कंफ्यूजन से भरी जिंदगी से निकलने में लोग कहते नजर आते हैं यहां रहना है तो रहो, बसना है तो बसो, नहीं तो वापस आओ। पर इतना आसान भी नहीं है इस उलझन से निकलना। कोई रुपए और डॉलर की गिनती में, तो कोई दिखावे में, कोई बच्चों की ख़ुशी में, तो कोई किसी और मकसद में बस उलझकर ही रह जाते हैं विदेश में।
डॉलर तो डॉलर है। भारत में एक डॉलर मुद्रा विनिमय दर की वजह से उच्च मूल्य और सम्मान कमाता है, क्योंकि सौ डॉलर, रुपयों में कई हजारों हैं। पर यहाँ रहने वालों के लिए सौ डॉलर सिर्फ सौ डॉलर ही हैं।
प्रवासी भारतीयों के लिए मन में बस एक ही ख्याल आता है "सुनहरे भविष्य की एक चमकीली रौशनी जो कि एक बार कभी चमकी थी बहुत तेज़, वास्तविकता में वह इतनी चमकीली भी नहीं है।"

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