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सुलगती टहनी
01-Apr-2016 12:00 AM 3705     

मैं इस मेले में खाली होकर आया था। सब कुछ पीछे छोड़ आया था- तर्कबुद्धि, ज्ञान, कला, जीवन का एस्थेटिक सौन्दर्य। मैं अपना दुख और गुस्सा और शर्म और पछतावा और लांछना-प्रेम और लगाव और स्मृतियाँ भी छोड़ आया था। मैं बिल्कुल खाली होकर आया था- खाली और चुप- क्योंकि शब्द बहुत पहले किसी काम के नहीं रहे थे। चुप और अदृश्य। मैं अथाह भीड़ में अपने को अदृश्य पाना चाहता था।
कैम्प के बाहर आया तो असंख्य छायाएँ दिखाई दीं। बीच सड़क पर रेंगता हुआ प्रेतों का जुलूस। एक साल बाद मैं किसी जुलूस में निडर शामिल हुआ था। यहाँ कोई डर नहीं, कोई अफवाह नहीं, कोई झूठ नहीं। छायाओं से डर कैसा? प्रेतों के बीच मैं एक प्रेत था। न मैं उनसे डरता था, न वे मुझसे। सुबह का अँधेरा-जिसमें किसी का चेहरा नहीं दिखाई देता था। कहते हैं यह अँधेरा सबसे निबिड़, सबसे गहरा, सबसे ज्यादा रहस्यमय होता है। डूबते चांद की एक पतली, पीली परत झर रही थी- रेत के ढूहों पर, अखाड़ों की पताकाओं पर, फूस के झोपड़ों पर। पीछे बाँध की बत्तियां, सामने झूसी का मैदान-दोनों के बीच देवता हवा में उड़ते हुए जैसे वह जगह, वह बिन्दु, वह कोना ढूँढ रहे हों, जहाँ अमृत-घट को छिपा सकें। क्या वे अपने को असुरों की आँखों से बचा पाएँगे?
शायद यही खयाल मेरे सहयात्रियों को मथ रहा है- वे कभी इधर देखते हैं, कभी उधर। सीधी सड़क गंगा की ओर जाती है, दार्इं पगडंडीनुमा रेखा संगम की ओर। उनके शब्द, गाते हुए भजनों के कुछ पद, उनकी थकी हुई आहें, उच्छ्वास, छिटपुट बातें कानों में पड़ जाती हैं। लगता है, अँधेरे में मैं उनका चेहरा-मुहरा, वेश-भूषा न भी देख सकूँ तो भी सिर्फ शब्दों के उच्चारण, बातचीत के लहजे से पता चला सकता हूँ कि कौन मध्यप्रदेश से आया है, कौन बिहार से, कौन राजस्थान से। किन्तु ऐसे भी शब्द हैं जिन्हें मैं बिल्कुल नहीं समझ पाता, जो अँधेरे से निकलकर अँधेरे में लोप हो जाते हैं- अपने पीछे खामोशी का एक दायरा छोड़ जाते हैं। मेरा संबंध इस खामोशी से रहा है- चेहरों के पीछे कविता की लाइनों के बीच, अपने भीतर और अब-कुंभ के मैदान में।
अब मैं देख सकता हूँ- अचानक उजाले में! पूर्व में एक छोटा-सा लाल पिंड, एक सुर्ख आँख-सा डिस्क। उसे देखकर मैं उसी तरह चौंक जाता हूँ जैसे पहली बार बाइबिल में यह वाक्य पढ़कर रोमांचित हो उठा था- लेट देयर बि लाइट एंड देयर वॉज लाइट। मैंने कभी ऐसा आलोक नहीं देखा- और तब मुझे सहसा महसूस हुआ कि यह आज का दैनिक उजाला नहीं, कोई प्रागैतिहासिक आलोक है, जब दुनिया पहली बार अँधेरे से बाहर आई थी। मेले का मैदान एक घोंसले-सा धूप में औंधा पड़ा है- दूर गंगा को छूता हुआ। पीली सफेद बालू का द्वीप, जिसे गंगा एक कैंची की तरह काटकर आगे बढ़ गई है- जैसे जमुना की मन्थर गति से ऊबकर स्वयं बेचैनी में आगे बढ़कर छोटी बहिन से मिल रही है।
मेरे सहयात्रियों को अब चैन कहाँ? गिरते-पड़ते भाग रहे हैं- एक युवा बंगाली लड़की अपनी बूढ़ी माँ के साथ घिसटती हुई, दोनों हाथों से उसे घसीटती हुई चल रही है- बगल में एक पोटली, हाथ में लोटा, आँखें सूरज और संगम के बीच उठी हुर्इं। बूढ़ी माँ की धोती बार-बार घुटनों तक उठ आती है, काली सींक-सी टाँगें थरथराती हुई आगे बढ़ती हैं- रेत पर धँसते पैर ऊपर उठते हैं, नीचे गिरते हैं।
मैं वहीं बैठ जाना चाहता था, भीगी काली रेत पर, असंख्य पदचिन्हों के बीच अपनी भाग्यरेखा को बाँधता हुआ। पर यह असंभव था। मेरे आगे-पीछे अंतहीन यात्रियों की कतार थी- शताब्दियों से चलती हुई, थकी, उद्भ्रान्त, मलिन-फिर भी सतत प्रवहमान। पता नहीं वे कहाँ जा रहे हैं, किस दिशा में, किस दिशा को खोज रहे हैं, एक शती से दूसरी शती की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए? कहाँ है वह कुंभ-घटक जिसे देवताओं ने यहीं कहीं बालू के भीतर दबाकर रखा था। न जाने कैसा स्वाद होगा उस सत्य का- अमृत की कुछ तलछटी बूँदों का, जिसकी तलाश में यह लंबी, यातना-भरी, धूल-धूसरित यात्रा शुरू हुई है- हजारों वर्षाें की लांग मार्च, तीर्थ अभियान, सूखे कंठ की अपार तृष्णा-जिसे इतिहासकार "भारतीय संस्कृति' कहते हैं? मुझे नहीं मालूम। मैं सोचता नहीं- सिर्फ घिसटता जाता हूं, धक्के खाता, गिरता-पड़ता, एक-एक इंच आगे सरकता हुआ। गंगा मेरे साथ बह रही है, मटियाली, पीली, अपनी तेज धार से खुद अपने टापू को काटती हुई। उसके सामने जमुना कितनी शान्त दिखाई देती है- एक नीली झील की तरह निस्पन्द, मूक, गंभीर-जैसे उसे मालूम हो कि अब उसकी यात्रा का अंत आ पहुंचा है- अब कोई भी छटपटाहट बेमानी है- अब गंगा की गोद में अपनी समूची थकान को डुबो देना है।
नहान पर्व की घड़ी-मोमबत्ती-सा जलता सूरज, जनवरी की सफेद धुन्ध पर पिघलता हुआ। अनेक प्रार्थनाओं से जुड़ा शोर-जो शोर नहीं है, न आवाज है, न कोलाहल-सिर्फ मनुष्य का अपनी आत्मा से एकालाप, जिसे सिर्फ बहता पानी सुन सकता है। यह पानी इन आवाजों को अपनी धड़कन में पिरोता हुआ किस विराट मौन सागर में लय हो जायेगा, कोई नहीं जानता। दोनों धाराओं के बीच एक-एक काली रेखा दिखाई देती है। मैं समझता हूं, यह कोई दीवार है, संगम के बीच हिलती, घुलती, बदलती लाइन। लोग आते हैं, लाइन में डुबकी लगाते हैं और फिर अपनी जगह दूसरों को दे देते हैं- और वह नर-सेतु ज्यों-का-त्यों कायम रहता है। हर क्षण बदलता हुआ, किन्तु अपनी सम्पूर्णता में स्थिर और गतिहीन।
अब एक भी कदम उठाना असंभव है। यहां भीड़ इतनी घनी है कि स्त्री-पुरुष गंगा की मटियाली धार में ही नहाने लगे हैं- संगम से दो गज इधर या उधर, क्या फर्क पड़ता है। पुलिस के सिपाही लाइन बनाकर खड़े हैं- तटस्थ, शान्त, ध्यानावस्थित। मैंने भारतीय पुलिस को इतना शांत कम ही देखा है, इसलिए उत्सुकता से उनकी आँखों का अनुकरण करता हूँ और पाता हूं कि समूची बटेलियम अटेंशन की मुद्रा में नहाती हुई औरतों को देख रही है- रात-भर के जगे सिपाहियों को सुबह का यह दृश्य जरूर एक स्वप्न-सा जान पड़ता होगा।
तभी एक धक्का लगता है। एक पच्चीस-तीस वर्ष का युवक भीड़ को चीरता हुआ पुलिस-इंस्पेक्टर के पास आ खड़ा हुआ है, गिड़गिड़ाते स्वर में कुछ कह रहा है।
"यहां साइकिल पर?' इंस्पेक्टर साहब आश्चर्य से युवक को देखते हैं। "आपको मालूम नहीं, यहाँ कोई भी वाहन नहीं आ सकता।'
"जी, मेरी बात तो सुनिए।'
उसकी बात सुनी तो पता चला कि उसके अस्सी बरस के बाबा सैकड़ों मील की दूरी से प्रयाग तो चले आए हैं, किन्तु अपनी झोपड़ी से सुगम पैदल चलकर नहीं आ सकते। क्या वह उन्हें साइकिल पर बिठाकर नहीं ला सकता?
इंस्पेक्टर थोड़ा नर्म पड़ते हैं। "अच्छा, ले आइए- लेकिन देखिए- उन्हें आपको अलग नहलाना होगा, साइकिल समेत नहीं।'
दस मिनट बाद उन्हें दुबारा देखता हूं- वह एक पुरानी, जर्जरित साइकिल को घसीता आ रहा है, पहिये बार-बार गीली रेत में रपट जाते हैं- वह घबराकर इधर-उधर देखता जाता है कि कोई दूसरा सिपाही उसे न रोक ले। किन्तु पीछे कैरियर पर बैठा यात्री बिल्कुल अटल और निश्चिन्त है- आँखें मूंदी हुई, मुँह खुला हुआ, ठुड्डी पर थूक की लार बह रही है, नीचे लटकते पैर रेत पर रगड़ते जा रहे हैं, जिसका उन्हें कोई ध्यान नहीं। पूरी एक जिन्दगी साइकिल पर जी रही है। उन्होंने अपना सिर सीट पर रखी मैली पोटली पर टिका रखा है। साइकिल की चरमराहट में पता नहीं चलता कि ढीले कल-पुर्जाें की आवाज कितनी है, बूढ़ी हड्डियों की खटखटाहट कितनी। हर टूटी हुई साँस उन्हें अपनी यात्रा के अंत की ओर ठेलती जा रही है।
कैसा अन्.? क्या कोई ऐसी जगह है जिसे हम "अंत' कहकर छुट्टी पा सकें? जिस जगह एक नदी दूसरी में समर्पित हो जाए और दूसरी अविरल रूप से बहती रहे, वहां अंत कैसा? हिन्दू-मानस में कोई ऐसा बिन्दु नहीं जिस पर अँगुली रखकर हम कह सकें, यह शुरू है, यह अंत है। यहां कोई आखिरी पड़ाव, "जजमेंट डे' नहीं, जो समय को इतिहास के खंडों में बाँटता है। नहीं, अंत नहीं है और मरता कोई नहीं, सब समाहित हो जाते हैं, घुल जाते हैं, मिल जाते हैं। जिस मानस में व्यक्ति की अलग सत्ता नहीं, वहां अकेली मृत्यु का डर कैसा? मुझे रामकृष्ण परमहंस की बात याद हो आती है : "नदियां बहती हैं, क्योंकि उनके जनक पहाड़ अटल रहते हैं।' शायद इसीलिए इस संस्कृति ने अपने तीर्थस्थान पहाड़ों और नदियों में खोज निकाले थे- शाश्वत अटल और शाश्वत प्रवहमान- मैं एक के साथ खड़ा हूं, दूसरे के साथ बहता हूं। वे जा रहे हैं- गंगा-तट सूना पड़ता जा रहा है। विधवाएँ, मरणासन्न बूढ़े, वह बंगाली लड़की जिसे सुबह के अँधेरे में देखा था। वे लौट रहे हैं। सबके हाथ में गीली धोतियाँ, तौलिए हैं, गगरियों और लोटों में गंगाजल भरा है। मैं इन्हें फिर कभी नहीं देखूँगा। कुछ दिनों में वे सब हिन्दुस्तान के सुदूर कोनों में खो जाएँगे। लेकिन एक दिन हम फिर मिलेंगे- मृत्यु की घड़ी में आज का गंगाजल-उसकी कुछ बूँदें- उनके चेहरों पर छिड़की जाएँगी। आँख खुलेगी। संभव है आज की सुबह बरसों बाद स्मृति पर अटक जाए- फूस के छप्पर, इलाहाबाद का किला, मेले पर उड़ती धूल-क्या याद आएगा? एक बूँद में कितनी स्मृतियाँ गले के भीतर ढरती जाएँगी। अंगूर का रस जिस तरह फर्मेंट होकर शराब बन जाता है, उसी तरह आज का यह पानी अरसे बाद अमृत बनेगा- हजारों स्मृतियों की धूप में पका हुआ, लेकिन अभी नहीं, अभी यह मैला पानी है जिसमें नयपाल जैसे लेखक केवल मैल और गंदगी देखते हैं। जो आदमी बाहर से देखता है वह सिर्फ ऊपरी सतह देख पाता है, लेकिन ऊपर की सतह नीचे के मर्म से जुड़ी है- हम यदि कैंची से किसी अंधविश्वास को काटेंगे तो उसके साथ सच्चे विश्वास का मर्म भी उधड़ आएगा। किसी भी संस्कृति की धूल उसकी आत्मा से जुड़ी होती है- एक को हटाते ही खुद उसके मर्म का एक हिस्सा बाहर निकल आता है... खून और मांस से लिथड़ा हुआ-ड्राइक्लीनर की उस चेतावनी की तरह जिसमें कहा जाता है कि कुछ धब्बे नहीं धोये जा सकते, क्योंकि उन्हें धोने से कपड़ा भी फट जाएगा। हम पाँयचे उठाकर किसी संस्कृति के कीचड़ से क्यों न बच निकलें, दुर्भाग्यवश उसके सत्य से भी अछूते रह जाएँगे।
पर मैं कहाँ अलग हूँ! घंटों से हजारों यात्रियों को गाता, नहाता, प्रार्थना करता देख रहा हूँ- किन्तु मेरे भीतर कोई बिल्कुल निस्संग और चुप है। मैं उनमें नहीं हूं जो कीचड़ से भागते हैं, तो उनमें भी नहीं हूँ जो आसपास उसे देखते नहीं, उसमें रसे-बसे हैं। यह कौन-सी वर्जना है जो हर बार मुझे अंतिम मौके पर पकड़ लेती है, अपने अकेलेपन की ओर खींचने लगती है? मेरा रिश्ता अपनी संस्कृति से वैसा ही है जैसा किसी व्यक्ति का यातनापूर्ण प्रेम में दूसरे से होता है- चाहना और निराशा से भरा हुआ-निराशा जो धीरे-धीरे एक उदासीन, सुन्न किस्म की विरक्ति में बदल जाती है। इससे छुटकारा पाने के लिये ही मैं यहां चला आया हूं- जैसे दूसरों को देखने से ही अपने को पा जाऊँगा, एक दर्शक, संवाददाता, कुंभ के मैदान में भटकता हुआ एक रिपोर्टर।

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