ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
स्वतन्त्र वातावरण में घुटन
CATEGORY : कहानी 01-Sep-2018 08:24 PM 250
स्वतन्त्र वातावरण में घुटन

नीता तेज कदमों से चलकर पार्क में पहुँची। उसे डर था कि कहीं सुजाता उसकी प्रतीक्षा करके चली न जाये। रात उसने मुझे फोन करके जरूर ही आने को कहा था, शायद अपने मन की कोई बात मुझसे करना चाहती थी। तुषार आज जल्दी उठ गये और उन्होंने मुझे चाय के लिए रोक लिया और मुझे देर हो गई। सबेरे के समय पार्क में कितना आनन्द आता है, कितनी खुली हवा मिलती है और फिर सब मित्रों से भी तो गपशप हो जाती है। मन कितना प्रसन्न और हल्का हो जाता है। नीता यही सब सोचती जा रही थी कि इतने में उसे देख सुजाता चिल्ला पड़ी अरे नीता मैं तो कब से तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही हँू। बस मैं जाने ही वाली थी कि तुम दिखाई दे गईं सुजाता बोली।
सॉरा सॉरी मैं तो बहुत जल्दी आना चाहती थी, किन्तु देर हो गई। डर था कहीं तुम चली न जाओ, नीता ने कहा।
हाँ जाने वाली तो थी। चलो अच्छा हुआ तुम आ गईं। तुमसे मिलकर अच्छा लगता है। आज इतनी देर कैसे हो गई तुम्हें, सुजाता ने पूछा।
अरे क्या बताऊँ बस आज तुषार भी जल्दी उठ गये और फिर चाय पिये बिना तो वो आने ही नहीं देते और वो भी अपने हाथ से चाय बनाकर पिलाते हैं, नीता ने कुछ सकुचाते हुए कहा।
बहुत ही भाग्यशाली हो तुम। पति के हाथ की चाय का स्वाद ही और होता है। तुमने तो पहले जन्म में मोती दान किये होंगे। तुम्हारे दोनों बेटे कुणाल और मृणाल भी तो तुम्हारा कितना ख्याल करते हैं, कहते हुए सुजाता ने एक लम्बी साँस भरी।
हाँ वो तो है सुजाता पर तुम्हारी जैसी प्यारी और गुणी सहेली पाकर भी तो मैं अपने को धन्य समझती हूँ, नीता ने कहा।
नहीं नीता मुझे तो तुमसे मिलकर बहुत अच्छा लगता है। वैसे तो मैं अमेरिका में बीस साल से हूँ और मेरी पहचान भी बहुत लोगों से है किन्तु कुछ ही समय में तुम्हारे साथ बहुत ही अपनापन लगने लगा है। हाँलाकि कुछ तो पुराने साथ पढ़े हुए मित्र भी यहाँ आकर मिले हैं। वे इधर-उधर की बातें करती रहीं।
नीता को लगता रहा कि सुजाता उससे कुछ कहना तो चाहती है पर कह नही पा रही है और नीता भी चाहते हुए उससे कुछ न पूछ पाई। नीता कुछ ऐसा वातावरण बनाना चाहती थी कि सुजाता स्वयं ही उससे अपने मन की बात कहे।
नीता क्या सोच रही हो चलो अब घर चलें मेरा बेटा भी सो कर उठ गया होगा। चलकर उसके लिए कुछ गर्म गर्म नाश्ता बनाऊँगी, सुजाता ने कहा।
अच्छा चलो चलते हैं। मेरे साथ तुम मेरे घर चलती तो अच्छा रहता, नीता ने कहा।
नही फिर कभी सही, सुजाता बोली और दोनों अपने-अपने घर की ओर चल पड़ीं।
दिन इसी तरह बीतते गये दोनों सहेलियाँ पार्क में मिलती रहतीं। सुजाता कुछ कहना चाहती, शायद कह न पाती। फिर भी दोनों एक-दूसरे के करीब आती रहीं।
अचानक एकदिन सरला का फोन आया।अरे नीता मैं सरला बोल रही हँू।नही पहचाना। मैं तुम्हे मिली थी पन्द्रह अगस्त के प्रोग्रााम में।
अरे, हाँ हाँ, अच्छा तुम सरला सक्सेना। पहचान लिया कैसी हो? कैसे याद किया आज? नीता ने कहा।
कुछ नही वैसे ही तुमने तो फोन नहीं किया मैंने सोचा चलो मैं ही कर लँू। मैं आज तुम्हारे घर आने के लिए सोच रही थी, क्या आज तुम्हारे पास समय है? सरला ने पूछा।
हाँ आ जाओ मैं आज बिल्कुल खाली हँू, नीता ने कहा। जल्दी-जल्दी नीता काम समेटने में लग गई, जिससे कि सरला के आने से पहले वो अपने घर का सब काम समाप्त कर ले। ठीक दो घन्टे के पश्चात सरला आ पहुँची। आवभगत करने के बाद चाय की चुस्की लेते हुए नीता ने सरला से पूछा कि घर का पता ढँूढने में उसे कोई परेशानी तो नही हुई।
नहीं परेशानी कैसी मैं तो इधर आती रहती हँू, मेरी सहेली सुजाता इधर पास में ही रहती है।
अरे सुजाता तो मेरी भी सहेली है। चलो उसे भी बुला लेते हैं, नीता ने कहा।
नहीं वो नही आयेगी। वो तो बहुत दुखी है और बहुत परेशान रहती है। क्या उसने तुम्हें कुछ नही बतलाया। उसके बहू-बेटे की कुछ समस्या है।
नहीं तो, मुझसे तो कुछ नहीं कहा। मुझे लगता तो था कि सुजाता कुछ चिन्तित सी रहती है। पर न वो कुछ कह पाई, न मैं ही कुछ पूछ पाई, नीता बोली।
सुजाता का बेटा अल्कोहलिक है। बहुत शराब पीता है, इसलिए उसकी पत्नी उसके साथ नहीं रहना चाहती और बेटा उसे छोड़ना नहीं चाहता, क्योंकि उसे बहुत प्यार करता है। वैसे बहू तो इसके लिए सुजाता को ही दोषी ठहराती है क्योंकि उसे लगता है यह शादी करवाके उसकी सास ने उसके साथ धोखा किया है। खैर चलो मैं चलती हूँ पर तुम मेरे नाम से सुजाता को कुछ मत कहना। इतना कहकर सरला चली गई।
परन्तु उसके बाद नीता को बहुत ही चिन्ता होने लगी। रात भर ठीक से सो भी नहीं सकी क्योंकि उसे भी सुजाता से बहुत लगाव हो गया था।
अगले दिन सबेरे पार्क में जब सुजाता मिली तो उसे लगा कि सुजाता की आँखें रोने से सूज गई हैं और वह बहुत ही उदास लग रही है।
नीता से रहा न गया। उसने सुजाता का हाथ अपने हाथ में लेकर कहा कि क्या बात है तुम बहुत उदास हो। हम दोनों अच्छी मित्र हैं, एक-दूसरे से दुख बाँटने से कुछ हल्का होता है।
हाँ नीता तुम ठीक कहती हो, मेरा मन बहुत परेशान रहता है। मुझसे अपने बेटे की परेशानी देखी नहीं जाती और इतना कहकर सुजाता फूट-फूटकर रो पड़ी। उसका इतने समय से रुका हुआ बाँध जैसे फूट पड़ा।
नीता ने कुछ देर सुजाता को ऐसे ही रोने दिया ताकि उसका मन कुछ हल्का हो जाये फिर सांत्वना देते हुए नीता ने उससे कहा कि बताओ यदि मैं तुम्हारे किसी काम आ सकूँ।
मैं तुमसे अपने मन की व्यथा काफी दिन से कहना चाहती थी परन्तु कह नहीं पाई। मैं सोचती थी कि मैं तो दुखी हँू ही। तुम्हें भी अपने दुख से क्यों दुखी करूँ। सच बात तो यह है कि मुझे तो अमेरिका के इस स्वतन्त्र वातावरण में बहुत ही घुटन होती है।
स्वतन्त्र वातावरण में घुटन कैसी, मैं समझी नही। यहाँ सबको अपनी जिन्दगी अपने तरीके से जीने का पूरा अधिकार है। यदि आर्थिक रूप से आप किसी पर निर्भर नहीं करते तो आपको किसी प्रकार की परेशानी नहीं होनी चाहिए और फिर तुम्हें तो अच्छी खासी पेन्शन मिलती है, सुजाता फिर ये घुटन कैसी? मैं समझी नहीं, नीता ने कहा।
तुम्हारी बात ठीक है कि मुझे आर्थिक रूप से कोई कमी नहीं है परन्तु हम जिस वातावरण में पले और बढ़े हैं वह यहाँ से भिन्न था। माँ का दिल तो तुम समझती हो न वो बच्चों को दुखी नहीं देख सकती। बच्चे उसकी परवाह करें या न करें।
किसी सीमा तक तो ठीक है सुजाता। हमें बच्चों की परवाह तभी तक करनी चाहिए जब तक वो हमसे ऐसा चाहें। कई बार मैंने देखा है कि हमारे बहुत अधिक देखभाल करने से भी वो परेशान होने लगते हैं। वो लोग भी अपने और मित्रों की तरह स्वतन्त्र रहना चाहते हैं, नीता ने कहा। खैर छोड़ो बताओ आखिर बात क्या है।
सुजाता ने बताया कि किस तरह वो अपने हँसते-खेलते परिवार। दो बेटे और पति के साथ अमेरिका आई थी। दिल्ली में हमारी बहुत अच्छी नौकरी थी। बस हमारा कुछ बुरा समय आ गया था जो हम यहाँ आ गये। कुछ समय बाद दिल का दौरा पड़ने से मेरे पति का देहान्त हो गया। छोटी उम्र थी। बडा बेटा कुछ बुरी संगत में पड़ गया और शराब पीने लगा। मैंने बहुत कोशिश की पर उसकी आदत कुछ कम होने की बजाय और बढ़ती गई क्योंकि इस देश में किसी प्रकार की रोक टोक तो है ही नहीं। इसीलिए तो मुझे यहाँ के स्वतन्त्र वातावरण में घुटन सी होती है। अपने देश भारत में होते तो शायद रिश्तेदारों की रोकटोक और देखभाल से मेरा बेटा इस रास्ते से हट जाता सुजाता ने कहा।
इस तरह बात करते-करते बहुत समय हो गया था, इसलिए दोनों अपने-अपने घर चली गईं।
नीता सोचती रही, क्या सच में ये अमेरिका के स्वतन्त्र वातावरण का दोष है या इन्सान की अपनी समझ का।
समय बीतता गया और धीरे-धीरे सुजाता अपने दिल का दर्द नीता के साथ बाँटती रही। कहते हैं दुख बाँटने से बहुत राहत मिलती है। सच में सुजाता को मेरे साथ दुख बाँटने से राहत बहुत मिलती थी और मैं भी उसे जितना हो सकता था समझाती रहती थी।
एक दिन सुजाता ने बताया कि उसकी बहू मिताली ने तलाक के लिए प्रार्थनापत्र दिया है और इस बात से उसके घर का वातावरण बहुत ही खराब हो गया है क्योंकि अब तक तोे बेटे को आशा थी कि शायद समझौता हो जाये पर अब वह भी समाप्त हो गई। बात बहुत दुख की थी। एक बसा बसाया घर उजड़ने जा रहा था। सुजाता को तो खैर इस बात का बहुत ही दुख था। वह भी अपनी बहू को बहुत चाहती थी। बड़े ही चाव से उसे ब्याह कर लाई थी। लाखों में एक थी उसकी बहू। बार-बार सुजाता कहती मेरे घर को तो किसी की नज़र लग गई है। मैं उसे बहुत समझाती पर "जाके पैर न फटी बिबाई सो क्या जाने पीर पराई" या फिर "पर उपदेश कुशल बहुतेरे"। सुजाता का दुख कम न हो पाता और जो कुछ कम होता भी तो बेटे का दुख और उससे भी अधिक शराब पीकर उसका तड़पना उससे न देखा जाता। दिन तो ठीक ठाक निकल जाता पर शाम ढ़लते ही और उस पर मँडराती रात दर्दनाक और खौफ़नाक काली चादर ओढ़े हुए आती थी। सिहर उठती थी सुजाता। बेटा और बेटे की साथिन बोतल जिसमें बेटा अपने सारे ग़म उडेल देना चाहता था या जिसके सहारे वो अपने सारे ग़मों को भूल जाना चाहता था। न किसी से मिलना न किसी की कलेजे को चीरती हुई हमदर्दी। न किसी की झूठी सांत्वना। कुछ भी तो नहीं भाता था बेटे को। उसे तो यहाँ तक की परछाई की तरह साथ रहने वाली माँ, जो हर समय बेटे का मुँह ही देखती थी या बेटे की एक आवाज़ पर दौड़कर चूल्हा जला कर गर्म-गर्म रोटी सेंककर खिलाने में अपना सौभाग्य समझती थी, तनिक भी नहीं भाती थी। भाती भी क्यों उसे तो सारी मनुष्य जाति से ही दुराव सा लगने लगा था।
बेटा दूसरा हो जाये पर माँ दूसरी नहीं हो सकती। जब मन स्थिर न हो तो शरीर भी साथ छोड़ने लगता है यही हाल तो था बिचारी सुजाता का। मैं उसे प्रतिदिन समझाती उसकी हिम्मत वापिस लाती और वह भी मुझसे बराबर वायदा करती कि आज अवश्य बेटे से बात करेगी कि यह क्या पागलपन है? मर्द बच्चा है मर्द बन। जो भी मुसीबत है उसका हिम्मत से सामना कर। पर बेटे के सामने शायद उसकी अपनी ही सारी हिम्मत काफूर हो जाती या फिर बेटे का एक ही जबाब उसे निरूत्तर कर देता। अक्सर बेटा कहता, माँ मुझे पैसे का कोई ग़म नहीं, आधा क्या मिताली कहती तो मैं पूरा ही उसे दे देता पर मुझसे उसकी बेबफाई बर्दाश्त के बाहर है। जीवन निर्वाह के लिए पैसा मुझसे और उस पैसे से एैश किसी और से यह कहाँ का न्याय है। कई बार उसने मिताली को अपनी ही कम्पनी के किसी आदमी के साथ घूमते हुए देखा था और फिर उसकी ये सब चर्चा और लोगों से भी सुनने को मिलती थी कि मिताली ने गैरकानूनी तरीके से किसी के साथ घर बसा लिया है और उसी के कहने पर वह यह सब अपने अधिकार माँग रही है।
बात तो सही थी, इसका कुछ भी जबाब हमारे पास नहीं था सिवाय इसके कि यह तो अमेरिका का कानून है और यह सभी के लिए है इसमें कोई भी क्या कर सकता है, नियमानुसार ही आपको चलना होगा। समय अपनी गति से चलता है। आगे समय क्या करवा देगा या नियति अब क्या रंग दिखायेगी कौन जानता है। सुजाता का फोन आता रहता था। न मालूम उसका मन क्यों बार-बार कहता था कि कुछ न कुछ अनहोनी होकर रहेगी।
सबेरा होता तो मुझे भी लगता कि कहीं कोई बुरा समाचार सुजाता से सुनने को न मिले।
सुजाता को लगता रहता कि कहीं रोहित आत्महत्या न कर ले और उसका दिल काँपता रहता। रात को भी बार-बार उठकर बेटे के कमरे मे झाँक कर उसे सोया देख सन्तोष की साँस लेती।
एक दिन सुजाता मुझे पार्क में मिली और एकदम मेरे गले लग गई अरे नीता आज तो मैं बहुत खुश हूँ।
सुजाता को एक लम्बे अरसे बाद प्रसन्न देखकर मैं भी बहुत ही प्रसन्न हुई। इससे पहले कि मैं कुछ कहती सुजाता स्वयं ही बोली कल रोहित ने अपने मित्रों को चाय पर बुलाया था और अपने हाथ से उनके लिए कई किस्म के स्नैक्स भी बनाये थे। एक लम्बे अरसे के बाद उसके चेहरे पर इतनी प्रसन्नता देखी है और मुझे लगता है कि उसने हालात से समझौता कर लिया है।
अरे सुजाता इससे अच्छी तो कुछ बात हो ही नहीं सकती। चलो अब तुम भी चैन की नींद सो सकोगी। कुछ देर इधर-उधर की बातें करने के बाद हम दोनों अपने-अपने घर चले गये।
दो चार दिन मैं कुछ व्यस्त हो गई और सुजाता से मेरी बात न हो पायी। वैसे मैं इस बीच सुजाता की ओर से कुछ निश्चित सी भी हो गई थी।
तभी अचानक सबेरे-सबेरे सरला का फोन आया। बड़ी ही घबराई हुई आवाज़ में और कहने लगी, अरे नीता क्या तुमने आज का अखबार देखा। सब कुछ समाप्त हो गया। बिचारी सुजाता...
क्या हुआ सुजाता को, मैंने अखबार नही देखा।
देखो जल्दी, रोहित ने मिताली को...
इतने में मुझे तुषार ने अखबार से समाचार सुनाया कि रोहित ने अपनी पिस्तौल से मिताली को भून दिया और इससे पहले पुलिस उस तक पहुँच पाती उसने अपने को भी गोली मार ली। आगे और विस्तार से लिखा था कि मिताली मकान का और सामान का मूल्य निर्धारित करवाने खुद रोहित के घर आई थी। मिताली के द्वारा की हुई बेबफाई और उस पर यह सीनाजोरी रोहित सहन न कर पाया और उसने मिताली के पार्थिव शरीर को सदा के लिए ढ़ेर कर बेबफाई का सबक सिखा, अपने सीने की आग को बुझाया या कहें कि उसने खुद को भी मौत के हवाले कर सीने में दहकती आग को सदा के लिए शान्त कर लिया। इस लोक में न सही परलोक में ही सही। शायद दोनों साथ रह सकेंगे।
मुझे ध्यान आया कि शायद अपनी इसी योजना को निर्धारित करने के बाद उसने अपने मित्रों के साथ एक शाम हँसी खुशी से बिताई होगी।
सारा समाचार पढ़कर मेरी आँखों से झर-झर आँसू गिरने लगे। बेटे रोहित तूने ये क्या किया एक बार तो जन्म देने वाली माँ के बारे में सोचा होता जो टकटकी लगाये तेरी खुशियों की बाट जोहती रहती थी।
बहुत साहस कर मैं सुजाता के पास गई। गले से लगाया। दोनों के आँसू अपनी मूक भाषा में कुछ कहते रहे। इससे पहले मैंने भी अपने को शायद इतना शब्दविहीन कभी नहीं पाया था। सुजाता को सांत्वना देने के लिए शायद मेरे पास कोई शब्द ही नहीं थे।
सुजाता कि शून्य की ओर ताकती हुई आँखें शायद यही कह रही थीं कि इसीलिए मैं बार-बार कहती थी न कि अमेरिका के स्वतन्त्र वातावरण में मुझे घुटन होती हैै।

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