ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
सुधा दीक्षित
सुधा दीक्षित
मथुरा में जन्म। अंग्रेजी साहित्य में एम.ए.। लखनऊ वि·ाविद्यालय से स्नातकोत्तर एवं बनारस हिन्दू वि·ाविद्यालय से एल.एल.बी. की उपाधि प्राप्त की। कविता एवं सृजनात्मक लेखन में विशेष रुचि। सम्प्रति - बंगलुरू में रहती हैं।

आशिक़ी.कॉम
जी हाँ ये बात सौ फ़ीसदी सही है। जिस किसी को प्रेम का रोग लग जाता है उसका इलाज हक़ीम लुकमान भी नहीं कर सकते। इस बीमारी के बारे में सिर्फ़ शायरों ने ही नहीं बल्कि विशुद्ध पंडित कवियों ने भी लिखा है -कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय व खाये ब
सात जन्मों का बंधन
केवल सात ही क्यों आठ या नौ क्यों नहीं? सवाल टेढ़ा है। पर जाने दो। सवालों का कोई अंत थोड़े ही है। कोई और पूछने लगेगा ग्यारह क्यों नहीं? लेकिन ये बंधन न तो माँ-बाप के साथ होता है न ही भाई-बहनों के साथ। बाक़ी रिश्ते-नाते, अड़ौसी-पड़ौसी तो अल्ला-अल्ला खैरस
आधी दुनिया - अधूरी दुनिया
भगवान ने अपनी तरफ़ से बड़े इंतज़ाम के साथ कार्य प्रारम्भ किया था। एक अच्छे सीईओ की तरह उन्होंने दो बराबर के पार्टनर बनाये - आदम और हौव्वा। उनके लिये रोटी, कपड़ा और मकान का पूरा बंदोबस्त किया गया था। उन्हें खुली छूट थी कि वे जैसे चाहें दुनिया काम को अन
मैं भी
ये सिर्फ मानव जाति पर लागू नहीं होता बल्कि संसार की हर वस्तु पर लागू होता है। ज़रा-सी हवायें अगर एक साथ मिलकर चलने लगें तो झंझावात पैदा कर दें। धरती के सीने से विनाशकारी लावा यूँ ही नहीं निकलता। सदियों से जमी आक्रोश की आग जब अपनी तीव्रता तक पहुँच ज

नुक़्ता-ए-नज़र बनाम तर्क-कुतर्क
ऊँचाई पर खड़े व्यक्ति को नीचे खड़े लोग बहुत छोटे (चींटियों जैसे) नज़र आते हैं। मज़े की बात ये है कि नीचे वालों को भी ऊँची इमारत, पहाड़ आदि यानि बुलंदी पर खड़ा आदमी उतना ही छोटा दिखाई देता है। यह कमाल है दृष्टिकोण का। जनाब! आईना भी कहने को सच बोलता है, ल
भारत एक कृषि प्रधान देश है। यहाँ की अस्सी प्रतिशत जनता गाँवों में रहती है। गाँव के लोग बहुत खुशहाल रहते हैं। भारत के गांव प्राकृतिक सौंदर्य से भरे पूरे होते हैं - हरियाली से सजे हुए, शांति से परिपूर्ण। वहाँ स्वच्छ, ठंडा पानी प्रदूषण से विहीन होता
एक दो : सुधा दीक्षित
एकजब श्याम मेघ क्षिति पर झुक कर चातक की प्यास बुझायेतब तुम चकोर बिरहन को नभ में रह कर ना तरसाना विधु बदली में छुप जाना। जब रिमझिम वर्षा की फुहार या कुहुक कोकिला की पुकार सुनकर दामिनी खिलखिला
बहुत नाइंसाफी है
देखिये साहब नाइंसाफी तो हुई है। इस बात से क़तई इंकार नहीं किया जा सकता कि समाज के एक समूचे वर्ग के साथ अन्याय किया गया है। कोई भी व्यक्ति पैदाइशी दलित नहीं होता। नेक इरादे से किया गया एक वर्गीकरण सियासत के लालच का शिकार हो गया। जी हाँ, गये वक़्त के

पीतल पे सोने का पानी
कभी-कभी विपरीतार्थक शब्द भी बड़े सार्थक होते हैं, जैसे "झूठा सच" और कभी-कभी स्थितिपरक शब्द भी प्रयोग में लाये जाते हैं मुहावरे के तौर पर, जैसे "आँख के अंधे नाम नयनसुख"। ख़ैर नाम में क्या रखा है। नाम तो फिल्म वालों ने नामुमकिन की हद तक विचित्र किन्तु
मसला तीन तलाक़ का
इतना शोर-शराबा क्यों है भाई! ग़ौर कीजियेगा हमने शोले फिल्म का मशहूर जुमला "इतना सन्नाटा क्यों है" नहीं इस्तेमाल किया। इसलिये नहीं किया क्योंकि सन्नाटा तो "था" "है" नहीं। मसला दरअसल तलाक़ नहीं शादी है। शादी ना हो तो तलाक़ का सवाल ही नहीं उठता। मगर लोग
भारतवंशी और भारतीयता
व क़्त की रफ़्तार भी अजीब है। कभी सुस्त (जब बोरियत हो) तो कभी तेज़ (जब ख़ुशगवारी हो)। देखो ना, अभी पिछले साल ही तो नौ जनवरी को प्रवासी दिवस मनाया था। लो, अब फिर सामने आ खड़ा हुआ। ऐ उम्र-ए-रवां आहिस्ता चल। और किसी का नहीं तो हमारी बढ़ती उमर क
गर्म हवा
जाड़े का मौसम आ गया यारों लेकिन हवा गर्म है। आप पूछेंगे भई ये क्या बात हुई? बताते हैं, पहले हम तो समझ लें। बरसात का धूप से कुछ लेना-देना नहीं होता। सर्दियों का भी तपती लू से कोई संबंध नहीं होता। परन्तु क़ुदरत को तमाशा करने की खुजली उठती है। अब इस मज़

ये हंगामा ऐ ख़ुदा क्या है
एक ज़माने में इंग्लैंड का चर्च वहां के राजा से भी ज़्याद शक्तिशाली हुआ करता था। इतना ज़्यादा कि 1936 में एडवर्ड आठ को अपनी पसंद की लड़की (वालिस सिम्पसन) से शादी करने के लिये ताज-ओ-तख्त छोड़ना पड़ा। हाँ साहेब, हमारी खाप पंचायत से भी अधिक ख़तरनाक था चर्च।
नारायण! नारायण!!
एक हाथ में तानपूरा, दूसरे में या तो खड़ताल या कमंडल (ज़रूरत पर निर्भर करता है)। अधखुली आँखों में ज्ञान की रौशनी और ज़ुबान पर भगवान का नाम। कौन से भगवान का - यह निर्भर करता है उनकी आस्था पर - हे भगवान, अल्लाह हो अकबर, सत श्री अकाल, राधे-राधे — व
दवा दी न गयी, दर्द बढ़ा दिया
कोई भी दिवस बना कर मना लो, माँ-दिवस, बाप-    दिवस, भाई, बहन, दोस्ती, वेलेन्टाइन, आई लव यू दिवस! भैये ये रिश्ते नाते और प्यार के उद्गार, यानि भांति -भांति के दिवस कोई होली, दिवाली, क्रिसमस या ईद थोड़े ही है कि साल में एक बार मना लिया
क्या भूलूँ क्या याद करूँ मैं
बड़ा मुश्क़िल सवाल है साहब! याद करना - मतलब सबक़ याद करना तो मुश्किल था ही, अब पता चला है कि भूलना उससे भी कठिन काम है। याद की बात पर आपको बता दें कि बचपन में पाठ याद ना करने पर मास्टरनी जी मुर्गा बना दिया करती थीं। मगर जैसे जैसे बड़े होते गये यह मुसी

लोक की कथाएँ और व्यथाएँ
एक बार की बात है... सुनते ही कान खड़े हो जाते हैं। भाइयों और बहनों! इस असार संसार में सर्वाधिक सारगर्भित बात वह होती है जो एकदम सस्ती सुन्दर और टिकाऊ होती है। हम या आप में से कितने लोग शोध ग्रन्थ पढ़ते हैं? अजी शोध ग्रन्थ तो बहुत दूर की चीज़ है (निहा
मेरा गाँव मेरा देश
संपादक का फ़रमान था "कुछ भारत के देहातों पर लिखो।" धत्तेरे की, हमें देहाती समझा है क्या जो हम देहात के बारे में लिखें? जनाब! हम शहर में रहते हैं -- वह भी बड़े शहर में जिसे अंग्रेज़ीदाँ लोग मेट्रोपोलिस कहते हैं। भाषा भी हम हिंदी में खड़ी बोली बोलते हैं
चलचित्र और चरित्र
राज कपूर साहब तो हर हीरोइन के साथ इश्क़ फ़रमाते थे। उनके कथनानुसार असली इश्क़ से अभिनय में वास्तविकता आ जाती है। खूब! तो भैया कोई हमें यह बतलाये कि मरने के दृश्य में असलियत का प्रभाव लाने के लिये, क्या कलाकार को सचमुच मार देना चाहिय
गुजरते समय में पत्रकारिता
सुना है कि जब से इंडिया टीवी का मालिक बदल गया है, उसका लहज़ा भी बदल गया। ज़ाहिर है वे कार्यकर्ता हैं और अपने अन्नदाता की ही भाषा बोलेंगे - his master's voice! साहबान, बदल जाये अगर माली चमन होता नहीं खाली

बाज़ार से गुज़रा हूँ
जी सरकार, हमारे जैसे बिंदास बशर दुनिया में रहते तो हैं लेकिन उसके तलबगार नहीं होते। अकबर इलाहाबादी की तरह हम भी बाज़ार से गुज़रते हैं, मगर ख़रीदार भी हों ये ज़रूरी नहीं। अब भले ही हम असली ख़रीदार ना हों लेकिन खिड़की - ख़रीदार (ध्र्त्दड्डदृध्र्-द्मण्दृद्र
चलो विलायत
आख़िर लोग यात्रा क्यों करते हैं? आराम से घर क्यों नहीं बैठते? लो यह भी कोई पूछने की बात है! यह तो इंसानी  फ़ितरत है साहब। सुना है ना कि खाली दिमाग़ शैतान का घर होता है। जब तक काम काज में मसरूफ़ रहे -- भलमनसाहत से घर में बैठे रहे; पर ज्यों ही फ़ुरस
प्रवासी दिवस के बहाने
गये ज़माने में जब जनसंख्या कम थी तो लोग मिलजुल कर रहते थे। रिश्तों की क़दर करते थे। अब जनसंख्या विस्फ़ोट के कारण धरती पर भीड़ बढ़ गयी है। संयुक्त परिवार न्यूक्लियर फॅमिलियों में बंट गये हैं। रिश्ते घट गये हैं। अंदरखाने कहीं डार से बिछुड़े लोगों में अपरा
राजनीतिक रंगमंच
शेक्सपियर ने कहा था कि सारी दुनिया एक रंगमंच है और सभी लोग सिर्फ किरदार हैं। खैर, शेक्सपियर के अनुसार तो हम सब पैदाइशी अभिनेता हैं जिनका सूत्रधार भगवान है। जाने दीजिये। हम उन लोगों की बात कर रहे हैं जो पैदाइशी नहीं बल्कि मुखौटा पहन कर अभिनय करते ह

त्रिशंकु
विदेश में बसे भारतवंशियों के लिए रह रहकर एक ही शब्द ज़हन में आकर टकराता है; और वह है - त्रिशंकु। त्रिशंकु महाराज सशरीर स्वर्ग जाना चाहते थे। महान मुनि श्री विश्वामित्र  ने उन्हें पहुँचा भी दिया। (पता नहीं ये महान ऋषि-मुनि अपनी अथक प्रयत्नों से
हिंदी की चिंदी
काले बालों वाली के आते ही तू मुझे भूल जायेगा, हिंदुस्तानी मायें अक्सर यह विलाप करती हैं। सही करती हैं। बहू के आते ही माँ पिछली सीट (डठ्ठड़त्त् डद्वद्धदड्ढद्ध) पर भेज दी जाती है। हमेशा ऐसा नहीं होता है लेकिन जब होता है बहुत दुखदायी होता है। औरत की त
हमारा पुस्तक प्रेम
पुनर्जन्म को मद्देनज़र रखते हुये रसखान बाबा की यह रचना हमें बड़ी पसन्द है। अब हम गांव में के ग्वालों के बीच में तो नहीं रह सकते, मिज़ाज से थोड़ा शहरी जो हैं; परन्तु "पंछी बनूँ, उड़ती फिरूँ मस्त गगन में" वाला आइडिया हमें भा गया। पंछी बन के यमुना किनारे
आज़ाद हूँ दुनिया के चमन म
आह! यह बेरोकटोक जीने का अहसास मन को मुदित कर देता है। यूँ भी क़ैद में कौन रहना चाहता है हुज़ूर? लोग बाग़ तो धरती की सीमाओं को तोड़कर आकाश में उड़ना चाहते हैं। पर क्या यह सम्भव है? रूसो के अमर शब्दों में "आदमी आज़ाद पैदा होता, मगर हर तरफ हम उसे ज़ंजीरों म

हरियाला सावन ढोल बजाता आया
इस साल की भयानक गर्मी के बाद -- "सावन आया – धिन तक तक मन के मोर नचाता आया।' वर्षा और मोर का चोली दामन का साथ है। दोनों ही का संबंध नृत्य से भी है और नृत्य तो हर भारतीय की रग-रग में बसा है। मयूर यूँ ही तो नहीं राष्ट्रीय पक्षी घोषित कर दिया गय
कहत कबीर सुनो भई साधो
कबीरदास बड़े ही विलक्षण व्यक्ति थे। एकदम बिंदास, बिलकुल हमारी तरह। उन्हीं की तरह हमारी भी ना किसी से दोस्ती है (अरे, दोस्त तो बहुत हैं हमारे - मगर चमचागिरी वाला रि¶ता किसी से नहीं है।) और ना ही बेकार की दु¶मनी। यूँ भी हम दु¶मन बनाने
मुग़ालतों का दौर
जैसे उम्मीद पर दुनिया क़ायम है उसी तरह गलत-फहमियों में क़ायनात टिकी है। आख़िर ¶ाराफ़त भी कोई चीज़ है। अक्सर महफ़िलों में बेसुरे-बेताले मुतरिब (गायक) के लिए भी "बहुत अच्छा', "बहुत बढ़िया' कहना पड़ता है। मु¶ाायरों, कवि-सम्मेलनों में ऐसे-ऐसे ¶
चलो मन गंगा-जमुना के तीर
मन की शांति के लिए दरिया के किनारे से अच्छा स्थल और कोई नहीं हो सकता। रसखान के "कालिंदी कूल' में जितना आनंद है, उतना ही मथुरा के लोक गीतों में जमुना को लेकर है - आज ठाड़ो री बिहारी जमुना तट पे, मत जइयो री अकेली पनघट पे।प्रयाग में तो गंगा और ज

चल सन्यासी मंदिर में
साहबान! सन्यासी या तो मंदिर में जायेगा या जंगल में। ग़लत! डार्विन के अनुसार जब बन्दर ड्ढध्दृथ्ध्ड्ढ होकर इंसान बन सकता है तो साधु व्यापारी क्यों नहीं बन सकता? बन सकता नहीं हुज़ूर बन चुका है। सुना नहीं -- नीचे पान की दुकान, ऊपर गोरी का मकान और बिचली
ए बी सी डी या त्रिशंकु
    जीहाँ एबीसीडी सीखते ही हर भारतवासी अपने आप को "गोरा साहब' समझने लगता है। गलत-    सलत अंग्रेज़ी में गिट-पिट करते ही उसमें एक सुपीरियर कॉम्पलेक्स जन्म ले लेता है और उसकी नज़रें हिंदी तथा अन्य वर्नाकुलर भाषा- भाषियों (
कुछ रूमानी हो जाएँ
लफ़्फ़ाज़ी और तक़रीर बहुत हो गयी, आज मन है कि कुछ क़िस्सागोई हो। यानि आज हम अफ़साना-        निगार होना चाहते हैं। ऐसा है साहिबान, भाषण, प्रवचन, तक़रीर, लेक्चर वगैहरा कोई नहीं सुनता। सभा में बैठे लोग भी मुंडी हिलाते रहते हैं,
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