ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
सुधा दीक्षित
सुधा दीक्षित
मथुरा में जन्म। अंग्रेजी साहित्य में एम.ए.। लखनऊ वि·ाविद्यालय से स्नातकोत्तर एवं बनारस हिन्दू वि·ाविद्यालय से एल.एल.बी. की उपाधि प्राप्त की। कविता एवं सृजनात्मक लेखन में विशेष रुचि। सम्प्रति - बंगलुरू में रहती हैं।

क्या भूलूँ क्या याद करूँ मैं

बड़ा मुश्क़िल सवाल है साहब! याद करना - मतलब सबक़ याद करना तो मुश्किल था ही, अब पता चला है कि भूलना उससे भी कठिन काम है। याद की बात पर आपको बता दें कि बचपन में पाठ याद ना करने पर मास्टरनी जी मुर्गा बना

लोक की कथाएँ और व्यथाएँ

एक बार की बात है... सुनते ही कान खड़े हो जाते हैं। भाइयों और बहनों! इस असार संसार में सर्वाधिक सारगर्भित बात वह होती है जो एकदम सस्ती सुन्दर और टिकाऊ होती है। हम या आप में से कितने लोग शोध ग्रन्थ पढ़

मेरा गाँव मेरा देश

संपादक का फ़रमान था "कुछ भारत के देहातों पर लिखो।" धत्तेरे की, हमें देहाती समझा है क्या जो हम देहात के बारे में लिखें? जनाब! हम शहर में रहते हैं -- वह भी बड़े शहर में जिसे अंग्रेज़ीदाँ लोग मेट्रोपोलिस

चलचित्र और चरित्र

राज कपूर साहब तो हर हीरोइन के साथ इश्क़ फ़रमाते थे। उनके
कथनानुसार असली इश्क़ से अभिनय में वास्तविकता आ जाती है। खूब!
तो भैया कोई हमें यह बतलाये कि मरने के दृश्य में असलियत का प्रभाव


गुजरते समय में पत्रकारिता

सुना है कि जब से इंडिया टीवी का मालिक बदल गया है, उसका लहज़ा भी
बदल गया। ज़ाहिर है वे कार्यकर्ता हैं और अपने अन्नदाता की ही भाषा बोलेंगे -
his master's voice!

बाज़ार से गुज़रा हूँ

जी सरकार, हमारे जैसे बिंदास बशर दुनिया में रहते तो हैं लेकिन उसके तलबगार नहीं होते। अकबर इलाहाबादी की तरह हम भी बाज़ार से गुज़रते हैं, मगर ख़रीदार भी हों ये ज़रूरी नहीं। अब भले ही हम असली ख़रीदार ना हों

चलो विलायत

आख़िर लोग यात्रा क्यों करते हैं? आराम से घर क्यों नहीं बैठते? लो यह भी कोई पूछने की बात है! यह तो इंसानी  फ़ितरत है साहब। सुना है ना कि खाली दिमाग़ शैतान का घर होता है। जब तक काम काज में मसरूफ़ रह

प्रवासी दिवस के बहाने

गये ज़माने में जब जनसंख्या कम थी तो लोग मिलजुल कर रहते थे। रिश्तों की क़दर करते थे। अब जनसंख्या विस्फ़ोट के कारण धरती पर भीड़ बढ़ गयी है। संयुक्त परिवार न्यूक्लियर फॅमिलियों में बंट गये हैं। रिश्ते घट ग


राजनीतिक रंगमंच

शेक्सपियर ने कहा था कि सारी दुनिया एक रंगमंच है और सभी लोग सिर्फ किरदार हैं। खैर, शेक्सपियर के अनुसार तो हम सब पैदाइशी अभिनेता हैं जिनका सूत्रधार भगवान है। जाने दीजिये। हम उन लोगों की बात कर रहे है

त्रिशंकु

विदेश में बसे भारतवंशियों के लिए रह रहकर एक ही शब्द ज़हन में आकर टकराता है; और वह है - त्रिशंकु। त्रिशंकु महाराज सशरीर स्वर्ग जाना चाहते थे। महान मुनि श्री विश्वामित्र  ने उन्हें पहुँचा भी दिया

हिंदी की चिंदी

काले बालों वाली के आते ही तू मुझे भूल जायेगा, हिंदुस्तानी मायें अक्सर यह विलाप करती हैं। सही करती हैं। बहू के आते ही माँ पिछली सीट (डठ्ठड़त्त् डद्वद्धदड्ढद्ध) पर भेज दी जाती है। हमेशा ऐसा नहीं होता

हमारा पुस्तक प्रेम

पुनर्जन्म को मद्देनज़र रखते हुये रसखान बाबा की यह रचना हमें बड़ी पसन्द है। अब हम गांव में के ग्वालों के बीच में तो नहीं रह सकते, मिज़ाज से थोड़ा शहरी जो हैं; परन्तु "पंछी बनूँ, उड़ती फिरूँ मस्त गगन में"


आज़ाद हूँ दुनिया के चमन म

आह! यह बेरोकटोक जीने का अहसास मन को मुदित कर देता है। यूँ भी क़ैद में कौन रहना चाहता है हुज़ूर? लोग बाग़ तो धरती की सीमाओं को तोड़कर आकाश में उड़ना चाहते हैं। पर क्या यह सम्भव है? रूसो के अमर शब्दों में

हरियाला सावन ढोल बजाता आया

इस साल की भयानक गर्मी के बाद -- "सावन आया – धिन तक तक मन के मोर नचाता आया।' वर्षा और मोर का चोली दामन का साथ है। दोनों ही का संबंध नृत्य से भी है और नृत्य तो हर भारतीय की रग-रग में बसा है। मय

कहत कबीर सुनो भई साधो

कबीरदास बड़े ही विलक्षण व्यक्ति थे। एकदम बिंदास, बिलकुल हमारी तरह। उन्हीं की तरह हमारी भी ना किसी से दोस्ती है (अरे, दोस्त तो बहुत हैं हमारे - मगर चमचागिरी वाला रि¶ता किसी से नहीं है।) और ना ही

मुग़ालतों का दौर

जैसे उम्मीद पर दुनिया क़ायम है उसी तरह गलत-फहमियों में क़ायनात टिकी है। आख़िर ¶ाराफ़त भी कोई चीज़ है। अक्सर महफ़िलों में बेसुरे-बेताले मुतरिब (गायक) के लिए भी "बहुत अच्छा', "बहुत बढ़िया' कहना पड़ता है


चलो मन गंगा-जमुना के तीर

मन की शांति के लिए दरिया के किनारे से अच्छा स्थल और कोई नहीं हो सकता। रसखान के "कालिंदी कूल' में जितना आनंद है, उतना ही मथुरा के लोक गीतों में जमुना को लेकर है - आज ठाड़ो री बिहारी जमुना तट पे, मत ज

चल सन्यासी मंदिर में

साहबान! सन्यासी या तो मंदिर में जायेगा या जंगल में। ग़लत! डार्विन के अनुसार जब बन्दर ड्ढध्दृथ्ध्ड्ढ होकर इंसान बन सकता है तो साधु व्यापारी क्यों नहीं बन सकता? बन सकता नहीं हुज़ूर बन चुका है। सुना नही

ए बी सी डी या त्रिशंकु

    जीहाँ एबीसीडी सीखते ही हर भारतवासी अपने आप को "गोरा साहब' समझने लगता है। गलत-    सलत अंग्रेज़ी में गिट-पिट करते ही उसमें एक सुपीरियर कॉम्पलेक्स जन्म ले लेता है और उ

कुछ रूमानी हो जाएँ

लफ़्फ़ाज़ी और तक़रीर बहुत हो गयी, आज मन है कि कुछ क़िस्सागोई हो। यानि आज हम अफ़साना-        निगार होना चाहते हैं। ऐसा है साहिबान, भाषण, प्रवचन, तक़रीर, लेक्चर वगैहरा कोई नहीं

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