ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
मजबूत होता लोकतंत्र
01-Jun-2019 12:43 AM 154     

यूँ तो भारत स्वतंत्रता के बाद से ही एक लोकतांत्रिक देश है और हर स्तर पर सरकार का चयन जनता के द्वारा होता है। इस लोकतंत्र की खातिर ही तो लाखों स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने बहुत लम्बी लड़ाई लड़ी, कठिन यातनायें सहीं और हजारों ने अपने प्राणों को आहुति दी थी, पर शुरुआत के दिनों से ही लोकतंत्र, राजतंत्र की परछाई बनकर रह गया। इसका सबसे बड़ा कारण भारत में हजारों साल पुरानी राजतंत्रीय व्यवस्था की गहरी जड़ें होना और लम्बे समय तक विदेशी हुकूमत का होना हो सकता है। हमारा संविधान जनमत और लोकत्रांतिक व्यवस्था की तो बात करता है पर उससे जुड़े हुए कुछ अहम् सवालों को अनछुआ छोड़ दिया गया है, जैसे राजनैतिक दल और उनके वित्तीय व्यवस्थाओं के बारे में कोई जिक्र नहीं है और शायद यही हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था की चुनौतियों की जड़ है। इसी के चलते राजनैतिक दल राजघरानों और व्यवसायिक घरानों के ऊपरअपने आर्थिक मामलों के लिए निर्भर हो गये। शुरुआती दौर से ही राजनैतिक दलों ने अंग्रेजों की "फूट डालो और राज करो" की नीति को आगे बढ़ाते हुये अपने राजनैतिक फायदों के लिए मतदाताओं को जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र के हिसाब बांटना शुरू कर दिया और शायद यहीं से लोकतंत्र का स्वरूप बिगड़ना शुरू हो गया।
राजनैतिक दलों ने अपनी सूझबूझ और सुविधानुसार राजनैतिक फायदों के लिए देश को बाँटने के लिये तरह-तरह के हथकंडे अपनाये। साठ के दशक का दक्षिण भारत में हिंदी भाषा के विरुद्ध संघर्ष हो या समय-समय पर महाराष्ट्र में गैरमराठी लोगों के खिलाफ हिंसा और प्रदर्शन, पूरी तरह राजनैतिक कारणों से प्रेरित थे। नेताओं की राजनीति विरासत वंश की पैतृक धरोहर समझी जाने लगी और इस विरासत को अगली पीढ़ी के हाथों में हस्तांतरण करना तो जैसे पारिवारिक जिम्मेदारी-सी बन गयी। राजनीति को धन और बल का पर्याय समझा जाने लगा। राजनीति तो धीरे-धीरे व्यवसाय-सी बन गयी, चुनाव में बेतहाशा पैसा खर्च करना और जीतने के बाद उसे वसूल करने के लिए पद और सत्ता का उपयोग तो जैसे मान्य-सा समझा जाने लगा। अधिकारियों और कर्मचारियों की नियुक्तियाँ और स्थानांतरण तो राजनेताओं को पैसा कमाने का एक अच्छा तरीका बन गया और साथ ही साथ सरकारी तंत्र को खुलेआम भ्रष्टाचार करने का रास्ता बन गया। कुछ राजनैतिक दल और राजनेता अपने निजी राजनैतिक हितों के लिए आपराधिक तत्वों का सहयोग भी लेने लगे और बाद में जो अपराधी पहले दूसरे नेताओं को चुनाव के दौरान मदद करते थे, वह स्वयं ही राजनीति में हाथ आजमाने लगे और राजनीति में "बाहुवली" नाम की एक प्रजाति का प्रादुर्भाव हुआ। आपराधिक मामले तो जैसे इन बाहुबली नेताओं के लिए आभूषण हों और सत्ता का दुरुपयोग करना तो जैसे इनका पूर्ण अधिकार हो।
धीरे-धीरे सभ्य लोग राजनीति से दूर होने लगे और इस पर आपराधिक तत्वों का एक छत्र राज्य-सा हो गया। चुनाव के दौरान हिंसा और उपद्रव तो जैसे राजनीति का हिस्सा बन गये। सत्ताधारी दल के लिए सरकारी तंत्र का अपने राजनैतिक फायदों के लिए उपयोग करना तो जैसे आम बात हो। राजनैतिक हित और सत्ता की लोलुपता इतनी बढ़ गयी कि इतिहास में एक ऐसा मौका भी आया कि जब भारत में लोकतंत्र का गला घोंटकर आपातकाल लगाया गया। एक बार तो ऐसा लगा कि देश लोकतंत्र खोकर तानाशाही के रास्ते पर चल पड़ा है, पर लोकनायक जयप्रकाश नारायण और हजारों अन्य प्रदर्शनकारियों के अथक प्रयासों के कारण भारत में लोकतंत्र पुनः स्थापित हुआ और ऐसा लगा कि अब भारतीय राजनीति का शुद्धिकरण हो गया है।
उस समय के सभी विपक्षी दलों ने मिलकर जनता पार्टी नाम का नया दल बनाया और जनता ने भी अपना मत और सहयोग देकर केंद्र में पहली गैर काँग्रेसी सरकार बनायी, पर कुछ समय में ही आपस में लड़ झगड़कर फिर से भारतीय लोकतंत्र एक दल के हाथ में फंस गया। लगा तो यह था कि आपातकाल से निकले हुये नेता ईमानदारी और सुचिता की राजनीति करेंगे और लोकतंत्र को मजबूत बनायेंगे, पर अधिकाँश राजनेता राजनीति के उसी दल-दल के रंग में रंग गये और उनमें से कुछ तो आज भ्रष्टाचार के आरोपों में जेलों में सजा काट रहे हैं। गरीबी हटाओ और भ्रष्टाचार मिटाओ तो जैसे हर चुनाव के स्थायी मुद्दे से बन गये।
अस्सी के दशक की शुरुआत में ही जनता पार्टी कई घटकों में बँट गई और साथ ही साथ कई नये दलों का जन्म भी हुआ जिनमें से कुछ समाज के किसी वर्ग विशेष पर आधारित थे। लोकतंत्र में कई राजनैतिक पार्टियों की उपस्थिति बहुत ही अच्छी बात है, पर ऐसे राजनैतिक दल जो किसी वर्ग, क्षेत्र या किसी दायरे में संकुचित हों, वह समृद्ध लोकतंत्र के लिये गतिरोध हो सकत है। 1989 के चुनाव का बोफोर्स भ्रष्टाचार एक मुख्य मुद्दा था और भ्रष्टाचार के आरोप और कोई नहीं बल्कि एक पूर्व प्रधानमंत्री पर लगे थे। हमारे लोकतंत्र के लिए यह एक अच्छा संकेत नहीं था। नब्बे के दशक के आते-आते राजनीति में गठबंधनों का दौर राजनीति की मुख्यधारा में आ गया और इसके चलते कई राज्यों और केंद्र में सरकारें गठबंधन के तहत बनी पर बहुत सफल नहीं हुई और इसका खामियाजा देश और जनता को ही भुगतना पड़ा। गठबंधनों की सरकारों में भ्रष्टाचार इतना खुलकर सामने आ गया कि देश को लोकतांत्रिक प्रकिया के बारे में सोचने के लिए मजबूर कर दिया। उसी के चलते देश के एक आम नागरिक और समाजसेवी "अन्ना हजारे" ने देश में आंदोलन के द्वारा एक राजनैतिक चेतना जगाई। यह एक असाधारण घटना थी। इससे पहले देश का सभ्य समाज खासकर युवाओं की राजनीति में कुछ खास दिलचस्पी नहीं होती थी। वह तो बस क्रिकेट और फ़िल्मी दुनिया की चर्चाओं में ही व्यस्त रहते थे, पर अन्ना हजारे ने युवाओं को लाकर लोकतांत्रिक प्रकिया के मध्य खड़ा कर दिया। यह भारतीय लोकतंत्र के लिए बहुत ही शुभ संकेत था।
अन्ना हजारे आंदोलन के बाद कुछ नये राजनैतिक दलों का जन्म हुआ जो पूरी तरह से लोकतांत्रिक प्रकिया सुधारने के लिए प्रतिबद्ध थे। उसमें वह कितने सफल या विफल हुए, इसका निर्णय समय तय करेगा, पर इतना अवश्य हुआ कि सभी अन्य दलों को इस घटना ने सोचने पर मजबूर कर दिया। 2013 में दिल्ली राज्य के चुनाव ने भारतीय लोकतंत्र को एक नई दिशा दी। यह एक ऐतिहासिक चुनाव था, जिसमें बड़ी संख्या में देश विदेश से स्वयंसेवकों ने हिस्सा लिया और जिससे लोकतांत्रिक प्रकिया को बल मिला। 2014 के राष्ट्रीय चुनाव में मोदी के समर्थन में जो युवा वर्ग खड़ा हुआ उसका काफी कुछ श्रेय अन्ना हजारे के आंदोलन को जाता है। इसके बाद के चुनावों के परिणाम, जागरूक मतदाता की ओर इशारा करते हैं और यह समृद्ध लोकतंत्र के लिए बहुत ही अच्छा संकेत है। इस अभूतपूर्व बदलाव के बाद भले ही राजनैतिक दल समझते हों कि वह चुनाव अपने कौशल और राजनैतिक सूझबूझ से जीतते हैं, पर हकीकत में जनता अब चुनाव हराती और जिताती है। अब वह राजनैतिक दलों के द्वारा छले नहीं जा सकते। जो राजनैतिक दल इसको समझ चुके हैं वह सफल हैं और जो नहीं समझे हैं, वह अभी भी भ्रमित है।
लगभग पच्चीस वर्ष अमेरिका में रहने बाद हाल में ही संपन्न हुए 2019 के राष्ट्रीय चुनावों में मुझे एक माह तक भारत की लोकतांत्रिक प्रकिया को नजदीकी से समझने का अवसर मिला। इस दौरान मैंने पाँच संसदीय क्षेत्रों के शहरों, गाँवों, कस्बों में चुनाव प्रकिया का हिस्सा बनकर सघन भ्रमण, जनसम्पर्क किया, सभाओं में शामिल हुआ और कुछ को सम्बोधित भी किया और पाया कि मतदाता जागरूक है, वह दूरदर्शी है, उसे अब ख़रीदा नहीं जा सकता। बड़ी संख्या में स्वयंसेवक देश-विदेश से आकर देशहित की खातिर बढ़-चढ़ कर चुनाव प्रचार में भाग ले रहे थे। समाज के हर वर्ग में एक राष्ट्रीयता की भावना थी। गरीब, अमीर, पढ़ा लिखा व अनपढ़ वर्ग, किसान, मजदूर, बुजुर्ग, महिलाएं और युवा सभी उत्साहित थे और यहाँ तक कि छोटे-छोटे बच्चे भी प्रकिया में हिस्सा लेना चाहते थे। मतदाताओं को पता था कि उन्हें - किसको हराना है और किसको जितना है, कौन गुमराह कर रहा है और किसने काम किया है।
हालाँकि राजनैतिक दल अभी भी पार्टी फंडिंग की पारदर्शिता की बात करने से कतराते हैं, जो कि भ्रष्टाचार की एक मुख्य वजह है, पर जागरूक मतदाता एक न एक दिन दलों को पार्टी फंडिंग की पारदर्शिता के लिए मजबूर कर देंगे और शायद वो दिन लोकतंत्र को मजबूत करने की दिशा में एक अहम् मील का पत्थर साबित होगा।

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