ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
वर्तनी : भ्रम व्याप्ति
01-Aug-2018 05:54 PM 641     

कहावत तो बहुत पुरानी है- "अपनी-अपनी ढफली, अपना-अपना राग", जो आज के समय में बड़ी ही सटीक और उपयुक्त है। आज जब सब मनुष्य केवल अपनी-अपनी कहना चाहते हैं, सुनने में किसी की रुचि बची ही नहीं। ऐसे में किसी की त्रुटियों को इंगित करना सबसे बड़ा जोखिम का काम है। अपना घनिष्ठ मित्र, संबंधी आदि खोने का खतरा तो है ही साथ में प्रतिष्ठा को आघात पहुँचने का अंदेशा भी है। जो यह खतरा मोल लेगा, वही किसी प्रियजन की भाषा-वर्तनी संबंधी गलती पर उसका ध्यान दिलाएगा।
"निंदक" के लिए "आँगन कुटि छवाए" के दिन तो बहुत पहले ही लद गए; किंतु कुछ सीखने की इच्छा लेकर आए शिक्षार्थी को अवश्य कुछ सामान्य दोषों से अवगत कराया जाना चाहिए।
जिस प्रकार भाषा-वर्तनीगत दोष बहुविध हैं, उसी प्रकार उनके कारण भी। अज्ञान, अल्पज्ञान, असतर्कता, असावधानी, लापरवाही, हठ, आत्ममुग्धता, अपर्याप्त मार्गदर्शन, तकनीकी घालमेल के अतिरिक्त टंकणगत दोष भी वर्तनी की अशुद्धि के कारणों में से है।
भाषा; जो कि सुनकर, बोलकर, पढ़कर, लिखकर सीखी जाती है, तकनीक के प्रयोग ने वहाँ हस्तक्षेप कर उसकी शुद्धता को विकृत किया है। कक्षा में अध्यापिका से सुनकर लिखकर सीखने की बजाय अब ऑनलाइन ट्यूटोरियल्स का चलन है तो अशुद्ध उच्चारण और अशुद्ध लेखन को शुद्ध कौन कराए?
गर्मी, सर्दी, भर्ती, बर्तन, नर्मी, दर्शन, गर्दन, निर्मल, कुर्ता, चर्खा आदि की त्रुटिपूर्ण वर्तनी (जैसे : गरमी, सरदी, भरती, बरतन, नरमी, दरशन, गरदन, निरमल, कुरता, चरखा) का लेखन जोर-शोर से हो रहा है। कदाचित अस्पष्ट उच्चारण के चलते इस प्रकार की गलतियाँ आरंभ हुई हैं जहाँ "रेफ़" को "र" समझकर लिखने का प्रयास किया गया। यहाँ हमारी भाषा के लिखित रूप को क्षति पहुँची है।
विशुद्ध उच्चारण पर बल देने के साथ-साथ सुनकर लिखना सीखने की प्रक्रिया भी महती आवश्यक है। आप देखेंगे कि बोलते समय सभी "आशीर्वाद" सही उच्चारण के साथ बोलते हैं, परंतु प्रबुद्ध हिंदी विज्ञ भी बहुधा लिखते समय "आर्शीवाद" लिख जाते हैं। यह तकनीकी प्रयोग बढ़ने से लेखन के प्रति बढ़ती अरुचि की परिणति है। अभ्यास न होने के कारण हाथ से लिखते समय "रेफ़" का उपयुक्त स्थान स्मृति से निकल जाता है।
"रेफ़" की गड़बड़ी के चलते अथर्व, पूर्वार्ध, धर्मार्थ, वर्षर्तु, उपर्युक्त आदि शब्दों के लेखन में वर्तनी दोष के साथ-साथ उच्चारण की अशुद्धि भी दृष्टिगत होती है। "उपरिअउक्त" (यण संधि) तथा "वर्षाअऋतु" (गुण संधि) के कारण शब्द के मूल रूप में विकार आ जाता है।
"पुनरभ्यास" शब्द अपने आपमें बेमिसाल है क्योंकि इसमें अज्ञानतावश अनुचित "रेफ़" का प्रयोग कर दिया जाता है। "पुनभ्र्यास"; केवल इतना ही रहे तो भी सहनीय है, परंतु आप विभिन्न लोगों को इसे भिन्न-भिन्न प्रकार से लिखते हुए पाएँगे, जैसे- पुर्नभ्यास, पुनर्भयास आदि-आदि। "पुनरावास" को "पुनर्आवास" लिखे जाने की त्रुटि भी इसी श्रेणी में आती है। "अंतरात्मा" का "अंतर्आत्मा" लिख जाने के दोष का कारण भी यही है।
यदि हम संधियुक्त शब्दों की उत्पत्ति पर तनिक विचार कर देखें तो संधि विशुद्ध गणित है, 2अ2उ4 ही होंगे, 5 अथवा 3 कदापि नहीं। उपसर्ग-प्रत्यय तथा समास के समान इसमें ऊँच-नीच का कोई स्थान नहीं। "पुनरभ्यास" विसर्ग संधि से जोड़ा गया शब्द है। इसे समझने हेतु कुछ उदाहरणों का निरीक्षण करें :
पुन:अआवृत्तिउपुनरावृत्ति (विसर्ग का "र" में बदलकर "आ" से जुड़कर "रा" बन जाना) पुन:अईक्षणउपुनरीक्षण (विसर्ग का र् िमें बदलकर "ई" से जुड़कर "री" बन जाना)
पुन:अउत्थानउपुनरुत्थान (विसर्ग का "र" में बदलकर "उ" से जुड़कर "रु" बन जाना)
पुन:अनिर्माणउपुनर्निर्माण (विसर्ग का "र" में बदलकर आगे कोई स्वर न होने से अगले व्यंजन "नि" के ऊपर स्थित हो जाना)
पुन:अजन्मउपुनर्जन्म (विसर्ग का "र" में बदलकर आगे कोई स्वर न होने से अगले व्यंजन "ज" के ऊपर स्थित हो जाना)
पुन:अगमनउपुनर्गमन (विसर्ग का "र" में बदलकर आगे कोई स्वर न होने से अगले व्यंजन "ग" के ऊपर स्थित हो जाना)
पुन:अउक्तिउपुनरुक्ति (विसर्ग का "र" में बदलकर "उ" से जुड़कर "रु" बन जाना)
पुन:अअवलोकनउपुनरवलोकन (विसर्ग का "र" में बदलकर "अ" से जुड़कर "र" बन जाना)
पुन:अअभ्यासउपुनरभ्यास (विसर्ग का "र" में बदलकर "अ" से जुड़कर "र" बन जाना)
विसर्ग संधि बहुत व्यापक है तथा उदाहरणों की भरमार है। भाषा के प्रति एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने हेतु यहाँ केवल इतना उल्लेख ही पर्याप्त रहेगा।
ऐसा नहीं कि "रेफ़" पर ही विपदा आन पड़ी है, "पदेन" भी कुछ ऐसे ही संकट की स्थिति में है। सबसे बड़ी भ्रामक स्थिति तो तब उत्पन्न होती है जब पदेन "र" को आधा "र" यानि "र्" समझ लिया जाता है। "र" बेचारा तो प्रत्येक स्वररहित (आधे) अक्षर को सहारा देते-देते स्वयं असहाय-सा प्रतीत होता है।
ग्राम, विग्रह, अग्र (ग्अर) स्वरयुक्त "र" स्वरहीन "ग्" की खड़ी पाई हटने की स्थिति में उसके पैर बनकर उसे खड़े रहने योग्य बनाता है। "र" के इस विलक्षण परित्याग की, "पदेन" वाले शब्दों में बहुत दुर्गति होती है जब उस सहारा देने वाले को ही बेसहारा समझ लिया जाता है।
चक्र, विक्रय, क्रंदन में आधे "क्" के साथ पूरा "र" जुड़ा है।
आम्र, नम्रता, उम्र में आधे "म्" के साथ पूरा "र" जुड़ा है।
प्रदान, विप्र, सुप्रदा में आधे "प्" के साथ पूरा "र" जुड़ा है।
संभ्रांत, भ्रम, अभ्र में आधे "भ्" के साथ पूरा "र" जुड़ा है।
ट्रक, ड्रम, राष्ट्र, पेट्रोल, ड्राइवर, ड्रैकुला आदि शब्द लिखते समय यह ध्यान रहे कि बिना खड़ी पाई वाले अक्षर जैसे- ट्, ठ्, ड्, ढ् आदि के हल्ंत चिह्न से "र" पदेन रूप में जुड़ जाता है।
"रेफ़" अथवा "पदेन" का क्षीण-सा अंतर शब्द के अर्थ में भारी भिन्नता लाता है। कर्म/क्रम, हर्ष/हश्र के अर्थ में विशाल अंतर है।
सबसे बड़ी दुविधा आज "स्र" झेल रहा है। जहाँ कहीं भी "स्अर्अअउस्र" का प्रयोग दृष्टिगत होता है। उसे "स्त्र" (स्अत्अर्अअ) पढ़ने और लिखने की भारी भूल की जाती है। तनिक निरीक्षण कीजिए और आप "स्रोत" (अर्थ- झरना, उद्गम स्थल) को स्त्रोत लिखा हुआ पाएँगे, जबकि स्त्रोत का पृथक कुछ अर्थ नहीं। हाँ, "स्तोत्र" शब्द का अर्थ है स्तुति। "स्तोत्र" और "स्रोत" दोनों को "स्त्रोत" लिखना सर्वथा अनुचित है। "सहस्र" (अर्थ-हज़ार) को "सहस्त्र" बोलते-लिखते खूब पाया जा सकता है। इस भ्रम के व्याप्त होने का कारण है "स्त्री" शब्द, जिसमें "स्" के पश्चात "त्अर्अईउत्री" हुआ है तो हर जगह "स्र" देखते ही "स्त्र" बना देने की कुछ विचित्र-सी प्रथा चल निकली है। अजस्र (अर्थ-लगातार), स्राव (अर्थ-बहाव), स्रष्टा (अर्थ-ब्रह्मा) का वर्ण संयोजन अस्त्र, शस्त्र, मिस्त्री, इस्त्री आदि से भिन्न है। इस भिन्नता का हमें सतर्क प्रयोग करना होगा।
"रेफ़", "पदेन" के अतिरिक्त "ऋ" स्वर पर भी आघात कम नहीं हुआ है। "ऋ" पर अत्याचार के चलते "ग्रह/गृह" का उच्चारण एक ही प्रकार से (ढ़द्धठ्ठण्) बिना जाने-बूझे कर दिया जाता है। "मात्र/मातृृ में किस स्थान पर "मात्र" (केवल) और किस स्थान पर "मातृृ" (माता) का प्रयोग किया जाना चाहिए, इसकी भरपूर अनदेखी की जा रही है। "ऋतुु", "ऋषि", "ऋण", "ऋचा" व "ऋतिक" आदि को क्रमश: रितु, रिषि, रिण, रिचा व रितिक लिखने का विकारी रूप चल पड़ा है।
"ऋ" स्वर की मात्रा वाले शब्दों का अस्तित्व भी शंका के घेरे से बाहर नहीं है। वृक्ष, मृग, दृग, वृत्त, घृत, दृढ़, अमृत, पृष्ठ, वृषभ, संस्कृत, तृषा, वृथा, कृपा, घृणा, कृपाण, पितृ, कृति, कृषि, भृगु आदि की शुद्ध वर्तनी प्रयोग करने वाले शनै:-शनै: कम होते जा रहे हैं।
सर्वाधिक भ्रम की स्थिति "श्" वर्ण में "ऋ" मात्रा को लेकर है। उदाहरण के तौर पर "शृंगार" शब्द को ही ले लें। पिछले कुछ दिनों में इसकी वर्तनी को लेकर सोशल मीडिया पर, व्यक्तिगत और सामूहिक तौर पर काफ़ी विचार-विमर्श हुआ। बहुत से विद्वान-मनीषी इसे "श्रृंगार" लिखने के पक्षधर पाए गए। "शृ" से सम्बंधित कुछ उल्लेखनीय तथ्य इस प्रकार हैं :
"शृंगार", "शृंग", "शृंखला" के मूल वर्ण "श्रम", "श्रीमान", "श्रावण", "श्रेणी", "श्रद्धा" आदि के वर्णों से भिन्न नियम के अंतर्गत आते हैं।
"श्रम", "श्रीमान", "श्रावण" में जहाँ "श् (हलयुक्त श) के साथ "र" व्यंजन का सम्मिश्रण है वहीं "शृंगार", "शृंग", "शृंखला" में "श् (हलयुक्त श) का ऋ" स्वर के साथ मेल है। सरल भाषा में कहें तो "श् पर ऋ" की मात्रा लगी है। जैसे कि अन्य स्वरों के मेल से श, शा, शि, शी, शो, शू, शे, शै, शो, शौ आदि बना है वैसे ही शृ।
श्रृृ जैसा कुछ नहीं होता क्योंकि "रि" पर "ऋ" की मात्रा वर्जित है। इसका कोई अपवाद भी अस्तित्व में नहीं है।
"ऋ" की मात्रा के संबंध में कई भ्रम व्याप्त हैं। पहला यह कि "ऋ" स्वर है भी कि नहीं? "ऋ" को स्वर न मानने वालों का तर्क है कि बारहखड़ी में "ऋ" स्वर को सम्मिलित नहीं किया गया था। पहले समय में अं, अ: के पश्चात जहाँ बालपन में सीखी बारहखड़ी रोक दी जाती थी, उसके बाद के चार स्वरों में से एक है हृस्व "ऋ"। (ऋ, ॠ) हृस्व "ऋ", दीर्घ "ॠ", (लृ, लॄ) हृस्व "लृृ", दीर्घ "लृृ" में से अब मात्र हृस्व "ऋ" स्वर ही प्रयोग में हैं। संस्कृत से हिंदी में आते-आते अंत के तीन स्वरों का लोप हो चुका है। "ऋ" की गिनती अब "उ", "ऊ" के बाद होती है, जिससे देवनागरी लिपि में सातवें स्वर पर आसीन किया गया है।
"ब्रज" को "बृज", "व्रत" को "वृत" तथा "हृदय" को "ह्रदय", "कृत" को "क्रत" लिखा जाना भी उचित नहीं है। "रेफ़", "पदेन" और "ऋ" के प्रयोग में भीना सा अंतर है। प्रकार्य, प्रार्थना, प्रादुर्भाव आदि में पृथक वर्ण पर "रेफ़, पदेन" दोनों हैं तो पुनप्र्रद, आद्र्र में "रेफ़, पदेन" दोनों एक ही वर्ण के साथ।
"उज्ज्वल" का "उज्जवल", "मदद" का "मद्द" लिखा हुआ दिख जाता है तो "कत्र्ता" का "कर्ता" और "वृत्ति" का "वृति"। आधे अक्षरों के प्रयोग में भी स्पष्टता का अभाव है। उत्अज्वल (व्यंजन संधि) से उज्ज्वल बनता है। "लक्षण" को "लक्ष्ण" और "विषय" को "विष्य" लिखना त्रुटिपूर्ण है।
शुद्ध, वृद्ध, बुद्ध आदि की अशुद्ध वर्तनी इस प्रकार पाई जाती है- शुध्द, वृध्द, बुध्द। यह जानना आवश्यक है कि शुद्ध, वृद्ध, बुद्ध में द्अध्अअ का संयोजन है न कि ध्अद्अअ का।
गया/खाया/रोया आदि क्रियाओं का लिंग व वचन बदलने पर गयी/खायी/रोयी और गये/खाये/रोये बोलने में होने वाली उच्चारण की असुविधा के कारण, मुखसुख को ध्यान में रखते हुए इनके अब (स्त्रीलिंग में) गई/खाई/रोई तथा (बहुवचन में) गए/खाए/रोए मान्य हैं।
"यही", "वही", "कहीं" में निपात "ही" का समायोजन है। "यह ही", "वह ही", "कहाँ ही" समयांतर के साथ "ह" के पतन से यही/वही/कहीं बने हैं। इनके साथ पुन: "ही" का प्रयोग अनावश्यक है जैसे- मुझे यही ही खिलौना चाहिए।
"कभी", "अभी", "तभी" शब्दों के मूल में अल्पप्राण से महाप्राण में उत्थान का नियम लागू होता है। "कब ही", "अब ही", "तब ही" में "बअहउभ" (महाप्राण) की ध्वनि देता है अत: "ही" निपात के साथ "कब/अब/तब" "कभी/अभी/तभी" बन जाते हैं।
शुद्ध लेखन के लिए भाषा के शब्दों की मूलोत्पत्ति को जान-समझ लेने से अशुद्धि तथा त्रुटि की संभावना कम हो जाती है।

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