ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
छाँटा हुआ पेड़
01-Feb-2019 02:57 PM 1867     

भारत में दो तरह के पेड़ आमतौर पर दिखलाई पड़ते हैं - हरा-भरा अथवा ठूँठ पेड़, बिल्कुल कम्पूटर के द्विआधारी गणित की तरह। मुझे अति प्रसन्नता हुई होती जब कोई भारतीय वैज्ञानिक दशमलव प्रणाली की तरह इन पेड़ों को परखकर द्विआधारी गणित की आधारशिला भूत में कभी रखा होता। परन्तु सभी जगदीश चन्द्र बसु की तरह सूक्ष्मदर्शी नहीं होते। एक हरा-भरा पेड़ अपने नाम को चरितार्थ करता हुआ जाड़ा, गर्मी, बरसात हर मौसम में प्रसन्नचित्त रहता है। हवा के मन्द झोंको से हिलती पत्तियाँ इस भाव की चतुराई से अभिव्यक्ति देती हैं। सुबह शाम उछल-कूदकर चहचहाते पक्षियों का झुण्ड उनकी खुशी को आम व्यक्तियों में बाँटता है। पेड़ की छाया दिन में पथिक को आकर्षित कर सुस्ताने का निमन्त्रण देकर पास बुलाती है। रात में, वही पेड़, विहगों का बसेरा बनता है जिसके आश्रय में वे अपना सम्पूर्ण जीवन खुशी-खुशी व्यतीत कर देते हैं। लगता है, सज्जनों की भाँति, परकाज हेतु ही यह पेड़ धरती पर आये हैं।
इसके विपरीत ठूँठ पेड़ दु:ख का प्रतीक माना गया है। वह भयोत्पादक है। कहते हैं जब हरे पेड़ को आकाशीय अथवा मानव-निर्मित बिजली छू जाती है तब वह आपाद-मस्तक जल उठता है। कभी-कभी धरती की निष्ठुरता भी कारण बन जाती है। तब तरुवर के पत्ते और सारी हरीतिमा धीरे-धीरे उसका साथ छोड़ देते हैं। साठ के दशक में, हमारे गाँव में एक ठूँठ पाकड़ था। इसके ठूँठ बनने के बारे में अनेक दन्त-कथाएँ प्रचलित थीं। कुछ लोग इसमें गाँव के जमींदार का हाथ मानते थे। भारत में जबसे जमींदारी प्रथा समाप्त हुयी अनेक पेड़ ठूँठ होने लगे या कटने लगे। पीड़ा पीड़ा ही जनती है। बड़े लोगोें की पीड़ा प्रकृति भुगतती है तो छोटे लोगों की पीड़ा जनसमुदाय (इसे ही आम भाषा में क्रान्ति कहते हैं)। दूसरी दन्तकथा पीरबाबा के श्राप से जुड़ी है। कहते हैं पाकड़ की डाल पर बैठे किसी बगुले ने वृक्ष की जड़ में बिराजे पीर-बाबा की मिट्टी की मूरत पर गन्दा फैला दिया था। नासमझ पक्षी था। आदमी होता तो दीया जलाता, बतासे रखता। अदृश्य रहने वाला बाबा नाराज हो गया। आँख उठाकर उस अधम का दीदार किया। भक्तों ने उस बगुले को उसके चरणों में मरा पाया। यह पक्षी का प्रायश्चित था। वृक्ष संग-दोष के कारण घुन-सा पिसा। "महिमा घटी समुद्र की, रावण बसा पड़ोस" यह कहते हुये तुलसी दास पहले ही जतला गये हैं कि संगत का परिणाम सदा भयावह होता है।
बात कुछ भी हो हम बच्चे तो पाकड़ पर भूतों का अड्डा मानकर उसके करीब जाने से झिझकते थे। एकाध उल्लू को छोड़कर मुझे याद नहीं कि अन्य कोई बिहग भटककर भी उस पर आश्रय लिया हो। पीरबाबा के साथ कुछ कम अन्याय नहीं हुआ। बच्चों और औरतों के उधर न जाने से वह भी दीया तथा बतासे के लिये सतत तरसते रहे। कहते हैं न कि जलाने वाला स्वयं जलता है। मानव मन शंकालु होता है। अब आप भी इस शंका में होंगे जब हम बच्चे उधर जाते नहीं थे तब यह निरीक्षण कैसे संभव हुआ? समाधान सरल है। मनुष्य जीवन में बचपन एक ऐसा समय होता है जब बड़ों की कही बात अपना अमिट छाप छोड़ जाती है। उसके बाद जीवन में निरीक्षण-परीक्षण का काल शुरू होता है। लेकिन जैसे विज्ञान की बहस धर्म का अवसान करा देती है वैसे ही परीक्षण की शुरुआत के आने से बचपन के विश्वास का भोलापन जाता रहता है। कहते हैं, भगवान भी इसीलिये बचपन के बाद बुढ़ापे तक याद नहीं आते क्योंकि इस "बीच वाली आयु में सहजता" के लोप के कारण मस्तक में अज्ञान का फितूर भरता रहता है।
बात पेड़ों की है। यहाँ अमेरिका में उपर्युक्त वर्गीकरण के अतिरिक्त दो और तरह के पेड़ दिखलायी पड़ते हैं। पतझड़ में ढ़ेर सारे वृक्ष, पत्तों को त्यागकर, अपने हरे-भरे रूप से श्रृंगार-विहीन हो ठूँठ जैसा बन जाते हैं। सब कुछ स्वेच्छा से होता है अथवा प्रकृति-प्रकोप से, यह बात मुझे कभी समझ में नहीं आयी। कई बात साफ तौर पर दिखायी पड़ते हुये भी वह नहीं होती जो दृष्टिगोचर होता है। तभी तो शब्द-शक्तियाँ बनी हैं। अभिधा, लक्षणा, व्यंजना सभी शक्तियाँ मिलकर अर्थ से अनर्थ निकलवाते रहते हैं। वैयाकरण गुरुओं ने अष्टाध्यायी दिया ताकि भाषा की शुद्धता पर पकड़ बने, मीमांसा शास्त्रियों ने "अक्षर ब्रह्म है" कहते हुये वाक्यपदीय् दिया ताकि वाक्यार्थ सम्बन्धी सूक्ष्म तथा विशद चर्चाएँ समझने में आसानी हो, परन्तु पुरुष-प्रकृति के संयोग द्वारा विरचित इस सृष्टि की भाव चतुराई को परखने के बारे में कुछ नहीं कहा गया है। उम्मीद है, जिज्ञासु पाठक अपने धर्म का पालन करते हुये इस विषय पर अवश्य शोध करेंगे। हाँ, मैंने देखा है समय की प्रतीक्षा में अपने पत्ते विसर्जित कर ठूँठ बने वृक्षों पर प्रकृति की उमड़ती दया को। हरी-भरी कोंपले और लहलहाते पत्ते देखकर लगता है वृक्ष फिर खुश हैं। पर वास्तव में प्रसन्न दिखना और प्रसन्न रहना दो अलग चीजें हैं क्योंकि दिखना बाह्यवृत्ति है और रहना स्वभूत अन्त:वृत्ति। यहाँ मेरे मुहल्ले के वृक्षों पर, न जाने क्यों, विहगों के चहचहाने अथवा पेड़ की डाल पर फुदकने का स्वर नि:शब्द रहता है। लगता है वृक्ष खुश नहीं हैं। परमुखावलम्बी खुश रह भी कैसे सकता है? अंतरंग सुख के लिये स्वाधीन होना अहम विषय है। पर पेड़ के पुन: लहलहाने में एक सीख छिपी है। वह यह कि इन्तज़ार का फल मीठा होता है।
चौथे तरह का वृक्ष, जो इस लेख का शीर्षक बनने का श्रेय पा गया है, छाँटा हुआ शाखा-विहीन पेड़ है। इसे ठूँठा नहीं कह सकते। इसको किसी बिजली ने नहीं छुआ होता है और न ही प्रकृति-नटी ने इसका पुन: श्रृंगार करने के लिये पत्ते उतारने का आदेश देकर इन्तज़ार करने को कहा होता है। मेरा मानना है कि इसमें, हर मौसम में, तकरीबन आधी जान बची रहती है। ऐसे शाखा-विहीन तरुवर कम दिखलायी पड़ते हैं क्योंकि इन्हें मानव अपने हाथों से गढ़ता है। अपनी कला की नुमाईश करते हुये वह पेड़ को इस कदर छाँटता है कि वह ठूँठ-सा लगने लगता है। मेरे घर के पास ऐसा एक वृक्ष है जिसका सिर्फ धड़ बचा है। मैं रोज़ घूमते हुये इसके पास पल-दो-पल रुककर इससे बातें करता हूँ। वह, अपने शब्दों में, अपनी लाचार असहायता नि:शब्द कहता है, जिसे मैं अपने आँसुओं में अनुभव करता हूँ। अपनी आत्मकथा सुनाकर शायद उसे शान्ति मिलती है, पर मुझे उसकी दीन बातों में दुनिया के कमजोरों की बदनसीबी का अहसास होता है ।
अपनी महत्ता की छाँव में निर्भीक खड़ा यह दो-पाया मनुष्य प्राय: ऐसी हरकत करता रहता है। अपनी इच्छा दूसरे पर जबर्दस्ती चलाना उसका पुराना खेल है - यह चाहे अपने सहधर्मियों पर हो अथवा अन्य धर्मियों पर। यहाँ वह एक स्वनिर्मित सुन्दर शब्द "सँवारना" के नाम पर हरे-भरे पेड़ की भुजाओं (शाखाओं) को काटकर गिरा देता है अथवा गमले में रखकर वृक्ष की जड़ तथा तना को इस तरह छाँटता है कि पेड़ अपना स्वाभाविक विकास भूलकर "बान्साई" बन जाता है। क्या यही श्रृंगार की परिभाषा है? अथवा यह अव्यक्त को व्यक्त की देन है! इस तरह का कार्य या तो वह निर्दय पुरुष (जीव) करता है जिसे भगवान कहते हैं या उसी की बनायी महानतम कला जिसे दुनिया वाले मनुष्य कहते हैं।
अमेरिका में पेड़ लगाने की स्वस्थ परम्परा है। किन्तु समझ में नहीं आता कि जो व्यक्ति पेड़ लगाता है वही किसी और के लगाये वृक्ष की टहनियों पर वज्र बनकर कैसे प्रहार करता है? अपने-पराये का इतना भेद। वाह री दुनिया! अगर मानव भगवान की सर्वश्रेष्ठ कृति है तो निर्मोही कत्र्ता से थोड़ी चूक कहीं अवश्य हुयी है। पर किससे शिकायत करें। यहाँ जो भगवान के ठेकेदार हैं वे स्वस्थ आलोचना सुनने को तैयार नहीं है। कड़ुआहट और बढ़ जाती है जब समालोचना किसी समर्थ की होती है। आलोचक को कड़ी-से-कड़ी सज़ा मिलती है। इतिहास के उदाहरण गवाह हैं कि सज़ा सदैव असहाय के पल्ले गयी है। पाण्डवों के गुरु द्रोणाचार्य अपने प्रिय शिष्य अर्जुन के धनुर्विद्या की श्रेष्ठता का वर्चस्व रखने के लिये एकलव्य से दक्षिणा में अँगूठा छीन लेते हैं। मैं जब भी किसी विशाल पेड़ की कटी टहनियों को देखता हूँ तब मुझे मूक एकलव्य का अँगूठा याद आता है। उस विशाल वृक्ष के आजू-बाजू मुझे गुरु-कृपा से सँवारे खुशनसीब, पर ठिगने, अर्जुन भी दृष्टिगोचर होते हैं। इस दुनिया में कृपा का दूसरा नाम ही है किसी और के कन्धे पर बैठकर ऊँचा उठाने की।
एक लेखक और शराबी में बहुत अन्तर नहीं होता है। दोनों नशे में रहते हैं। एक जाम के सहारे बहकता है और दूसरा बहकता है कलम छानकर। मैं पेड़ का प्रकार बतलाते-बतलाते एकलव्य का अँगूठा ले बैठा। महाभारत काल में उस अँगूठे से कोई हो-हल्ला नहीं मचा। हाँ, अगर वह छिना नहीं गया होता अथवा अर्जुन को अँगूठा देना पड़ा होता तो शायद भारत उस भयानक युद्ध की विनाश-लीला से बचा रहता। यह मेरी "बहक" है। मेरे पड़ौस का छाँटा हुआ पेड़ मुझे अपने मौन से यही कुछ समझाता है। अमेरिका में अनेक तना-विहीन वृक्ष हैं। छाँट-छाँटकर सँवारने की प्रक्रिया में उस बेचारे तरुवर से उसकी इच्छा के बारे में कोई नहीं पूछता। भारतीय वैज्ञानिक जगदीश चन्द्र बसु ने प्रयोग से यह सिद्ध किया था कि वृक्ष में भी जीवन है; परन्तु, हमारी मृतप्राय मानसिकता में जीवन कब आयेगा यह चिन्ता और चिन्तन का विषय है।

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