ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
बुजुर्गों से कुछ बातें
01-Jan-2019 01:43 PM 998     

क्या विडम्बना है कि नितांत असहाय शिशु के रूप में जन्म लेने वाला मनुष्य पहले तो बढ़ते-बढ़ते, "वृद्धि" करते-करते उस स्थान तक पहुँच जाता है जहां केवल वह ही नहीं, उससे संबंधित लोग भी उसे शक्ति का पुंज समझने लगते हैं, पर बाद में इस "वृद्धि" की परिणति यह होती है कि वह फिर लगभग वैसी ही शिशु वाली असहाय अवस्था में पहुँच जाता है, पर अब उसे शिशु नहीं "वृद्ध" कहा जाता है। यह अवस्था एक दिन में नहीं आती, यह तो अनेक वर्षों में दबे पाँव घुसपैठ करती रहती है। और जब यह शरीर पर हावी हो जाती है तब महर्षि यास्क की निरुक्त में बताई "शरीर" की परिभाषा समझ में आती है "शृणाति शमनति वा" अर्थात् इसे शरीर इसीलिए कहते हैं क्योंकि यह क्षीण होता है, नष्ट होता है।
स्पष्ट है कि हमारे समग्र जीवन में "गति" बराबर हमारा साथ देती है। पर कभी तो हम उसे "प्रगति" कहकर उसका स्वागत करते हैं और कभी उसी गति को "अधोगति" कहकर दुत्कारते हैं। इसी गति के फलस्वरूप बुढ़ापा आता है जो एक बार आ जाने के बाद जाने का नाम नहीं लेता। वह अकेला आता भी नहीं, अपने साथ कई संगी-साथी भी लाता है जो विभिन्न रोगों के रूप में उत्पात मचाकर अपने अस्तित्व का अहसास बराबर कराते रहते हैं। प्रकृति की कैसी विडम्बना है कि जिस युवावस्था को पाने के लिए मानव जाति को लगभग 20-25 वर्ष प्रतीक्षा करनी पड़ती है, आज उस युवावस्था को 20-25 वर्ष बनाए रखना भी कठिन हो गया है। यों मनुष्य की आकांक्षा यही रहती है कि युवावस्था कभी जाने न पाए और बुढ़ापा कभी आने न पाए। मनुष्य ने अपनी इस आकांक्षा को पूरा करने के लिए ही विश्व के आदि ग्रंथ वेद में परमात्मा से प्रार्थना की "जीवेम शरदः शतं" (यजुर्वेद) अर्थात् हम सौ वर्ष तक जिएं, केवल जिएं नहीं, हमारी देखने, सुनने, बोलने की शक्ति भी ठीक रहे। इतने से भी जैसे मनुष्य को संतोष नहीं हुआ, तो इसी मंत्र में आगे कहा, "भूयश्च शरदः शतात्" अर्थात सौ वर्ष से भी अधिक समय तक सुखपूर्वक जिएं। साथ ही उसने कभी कल्प चिकित्सा, भस्म चिकित्सा, च्यवनप्राश जैसे रसायनों की खोज की, तो कभी बुढापे के लिए जिम्मेदार अवयव टीलोमेयर्स को नियंत्रित करने की कोशिश की।
आधुनिक वैज्ञानिकों ने इस दिशा में ज़रा देर से ध्यान दिया है। शायद पहले यह मान ही लिया था कि वृद्धावस्था मानव जीवन की अनिवार्य अवस्था है जिसका अंत मृत्यु में होता है, किन्तु अब आधुनिक वैज्ञानिक भी यह मानने लगे हैं कि यद्यपि वृद्धावस्था को आने से रोका नहीं जा सकता, पर उसके आने की गति और अवधि को विलंबित एवं उसके संगी-साथियों के उत्पातों को नियंत्रित किया जा सकता है। इस प्रकार वृद्धावस्था को भी सुखमय बनाया जा सकता है। चिकित्सा विज्ञान की जिस शाखा के अंतर्गत वृद्धावस्था के रोगों का विशेष अध्ययन किया जाता है उसे "जरा चिकित्सा" या अंग्रेजी में जेरिऐट्रिक्स (क्रड्ढद्धत्ठ्ठद्यद्धत्ड़द्म) कहते हैं। जेरिऐट्रिक्स शब्द यों तो ग्रीक भाषा के दो शब्दों से मिलकर बना है- ढ़ड्ढद्धठ्ठद्म - (अर्थात वृद्धावस्था) और त्ठ्ठद्यद्धत्त्त्दृद्म (अर्थात चिकित्सक), पर ग्रीक शब्द ढ़ड्ढद्धठ्ठद्म की व्युत्पत्ति संस्कृत शब्द "जरा" से ही हुई है। अंग्रेजी शब्द जेरिएट्रिक्स का पहली बार प्रयोग नाशेर (क्ष्ढ़दठ्ठद्यन्न् ख्र्ड्ढदृ ग़्ठ्ठद्मड़ण्ड्ढद्ध 1863-1944) ने 1909 में अपने एक लेख में किया था। उन्होंने बाद में इस विषय पर क्रड्ढद्धत्ठ्ठद्यद्धत्ड़द्म: च्र्ण्ड्ढ क़्त्द्मड्ढठ्ठद्मड्ढद्म दृढ ग्र्थ्ड्ड ॠढ़ड्ढ ठ्ठदड्ड च्र्ण्ड्ढत्द्ध च्र्द्धड्ढठ्ठद्यथ्र्ड्ढदद्य (1914) नाम से एक पुस्तक भी लिखी।
विज्ञान की दृष्टि से वृद्धावस्था का आगमन एक ऐसी बहु-आयामी प्रक्रिया है जो शरीर के हर भाग (कोशिका, कंकाल, आदि) और हर प्रणाली (रक्त निर्माण, उसका परिभ्रमण, पाचन तंत्र आदि) को प्रभावित करती है। हमारे शरीर की सूक्ष्मतम क्रियात्मक इकाई कोशिका होती है। जैसे-जैसे आयु बढ़ती जाती है, एक ओर कोशिकाओं की कुल संख्या में, और दूसरी ओर उनमें जो अंतर्कोशिकीय द्रव होता है, उसमें कमी आती जाती है। परिणामतः विभिन्न अंगों की कार्यक्षमता में भी कमी आ जाती है।
कोशिका का केन्द्रक भी अधिक क्रियाशील नहीं रह पाता और वह नई कोशिकाओं का निर्माण करने के स्थान पर मात्र नियंत्रक ही रह जाता है। आनुवंशिक पदार्थ (डीएनए, आरएनए) का संश्लेषण अब नहीं हो पाता। हमारी तमाम उपापचयी क्रियाएं मंद पड़ जाती हैं जिसके कारण हम न केवल ऑक्सीजन कम ले पाते हैं, अपितु जितना ऑक्सीजन शरीर में पहुंचता है, उसका उपयोग भी कम कर पाते हैं इससे शरीर का तापमान भी गिर जाता है। ऐसे परिवर्तनों का परिणाम यह होता है कि हमारे प्रत्यास्थ ऊतक (ड्ढथ्ठ्ठद्मद्यत्ड़ द्यत्द्मद्मद्वड्ढद्म) तंतुमय ऊतकों (ढत्डद्धड्ढ द्यत्द्मद्मद्वड्ढद्म) द्वारा प्रतिस्थापित होने लगते हैं जिससे शरीर के विभिन्न अंगों की नमनीयता कम होती जाती है।
वृद्धावस्था में हमारी ज्ञानेन्द्रियों (आँख, कान, नाक, जीभ और त्वचा) में भी भारी परिवर्तन आ जाता है। कुछ परिवर्तन बाहर भी दिखाई देने लगते हैं, जैसे आँखें अंदर को धंस जाना, कम दिखाई देना, कम सुनाई देना, स्वाद और घ्राण (सूंघने की) शक्ति कम हो जाना, माथे और हाथ पर झुर्रियां पड़ जाना, आदि। त्वचा में ऐसे परिवर्तन आने लगते हैं जिन्हें देखते ही उम्र बताई जा सकती है। त्वचा में कसाव रखने वाला हारमोन ओइस्ट्रोजन (ग्र्ड्ढद्मद्यद्धदृढ़ड्ढद) और उसमें लचीलापन रखने के लिए शरीर के अंदर ही बनने वाला प्रोटीन इलास्टीन (कथ्ठ्ठद्मद्यत्द) बनना ही बंद हो जाता है जिससे त्वचा ढीली पड़ जाती है तथा उसका लचीलापन कम हो जाता है। त्वचा हमारे शरीर के तापमान को बनाए रखने में सहायक होती है, किन्तु वृद्धावस्था में त्वचा में रुधिर संचरण की कमी होने से तापमान गिर जाता है। यही कारण है कि वृद्ध लोगों को ठण्ड ज्यादा लगती है। बालों को काला बनाए रखने वाले मेलानिन (ग्ड्ढथ्ठ्ठदत्द) नामक वर्णक (घ्त्ढ़थ्र्ड्ढदद्य) की कमी से बाल सफ़ेद हो जाते हैं। नाखून भी भंगुर हो जाते हैं। वृक्क (ख़्त्ड्डदड्ढन्र्) की कार्यक्षमता में कमी आ जाती है। सेक्स हारमोन की कमी से प्रजनन शक्ति कमजोर हो जाती है आदि। यहाँ तक कि हारमोन उत्पादन का नियंत्रण करने वाली पीयूष ग्रंथि (घ्त्द्यद्वत्द्यठ्ठद्धन्र् ढ़थ्ठ्ठदड्ड) भी असंतुलित होने लगती है।
यह प्रकृति का नियम है कि समय को हम बाँधकर नहीं रख सकते। अतः यह तो निश्चित है कि बढ़ती हुई उम्र को किसी तरह रोका नहीं जा सकता। जब बढ़ती उम्र को नहीं रोक सकते तो वृद्धावस्था को आने से कैसे रोक सकते हैं? हाँ, पुराणों की बात अलग है जहाँ देवता कभी बूढ़े होते ही नहीं, पर इस पृथ्वी पर जिस प्राणी ने जन्म लिया है, वह तो बूढ़ा होगा ही। अभी तक कोई भी ऐसी दवा या विधि ईजाद नहीं हो पाई है जो वृद्धावस्था को हमेशा के लिए रोक सके, हालांकि वैज्ञानिकों ने अभी हिम्मत हारी नहीं है और उनके प्रयोग जारी हैं।
सम्भावनाओं की आहट आशाओं का संचार अवश्य करती है, पर आशा की प्रतीक्षा में वर्तमान की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। वृद्धावस्था की गुणवत्ता बढ़ाकर हम वृद्धावस्था के आगमन को विलंबित भी कर सकते हैं और वृद्धावस्था के कष्टप्रद उपसर्गों को कम भी कर सकते हैं। इसके लिए सबसे अधिक आवश्यक है - उपयुक्त शारीरिक श्रम। वृद्धावस्था में टहलना सबसे अच्छा शारीरिक श्रम है, साथ ही हल्का व्यायाम और प्राणायाम बहुत उपयोगी है। जिन लोगों को मानसिक श्रम करना पड़ता है, उनके लिए तो योगासन और प्राणायाम आदि अमृत तुल्य हैं।
कहा जाता है कि कम खाने से भी उम्र बढ़ती है। हमारे प्राचीन इतिहास में अनेक दीर्घजीवी ऋषियों, योगियों आदि की चर्चा आई है जो मिताहारी थे। आधुनिक युग में न्यूयार्क की कार्नेल यूनिवर्सिटी में चूहों पर किए गए प्रयोगों से भी सिद्ध हुआ है कि कम खाने से उम्र बढ़ सकती है। बूढ़े लोगों की भूख वैसे भी कम हो जाती है, अतः वे कम ही खा पाते हैं, पर वे जो कुछ खाते हैं, वह ठीक से पचता नहीं। अतः यह आवश्यक है कि वे ऐसा भोजन करें जिसकी गुणवत्ता भी अच्छी हो और वह जल्दी पचने वाला भी हो। वृद्धावस्था में भोजन तत्वों का ठीक से अवशोषण नहीं हो पाता, इसलिए रसीले फल, हरी सब्जियां, पत्ती वाले साग, गाय का दूध, दही, मट्ठा जैसी चीजों का अधिक प्रयोग करना चाहिए। वृद्ध लोग अधिक चिकनाई वाले, तेज मिर्च-मसाले वाले गरिष्ठ पदार्थों से दूर रहें, यही उनके लिए हितकर है।
विश्व में वृद्धों की संख्या लगातार बढ़ रही है। हमारे देश में 2011 की जनगणना के अनुसार 60 वर्ष से अधिक आयु के लोगों की संख्या लगभग साढ़े दस करोड़ (10.4) थी। विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि 2026 तक भारत में इनकी संख्या 17.3 करोड़ हो जाएगी। प्राचीन भारत में तो वृद्ध लोगों को कभी समस्या नहीं माना गया, फिर चाहे वे समाज में घूम-फिर कर प्रचार करने वाले या आश्रम बनाकर शिक्षा देने वाले वानप्रस्थी/संन्यासी हों, या घर में रहने वाले वृद्ध हों, अनुभवी होने के कारण उनका विशेष सम्मान होता था, हर सभा में वृद्धों का होना आवश्यक था, (न स सभा यत्र न सन्ति वृद्धा:), पर अब विभिन्न कारणों से माहौल बदलता जा रहा है। अनेक लोग इसे पश्चिमी देशों का प्रभाव मानते हैं जहाँ भिन्न प्रकार की ऐसी सामाजिक व्यवस्था विकसित हुई जिसमें हर कोई स्वच्छंद रहना चाहता है। अतः वहां वृद्धों को परिवार में बोझ माना जाने लगा और उनके लिए अलग आवास की व्यवस्था की जाने लगी। सरकार भी उन्हें अनुदान देने लगी, उनके लिए नई-नई योजनाएं बनने लगी। फिर जब यह देखा कि इन आवासों में बूढ़े लोग बच्चों और युवाओं के दर्शन तक को तरसने लगे हैं, तब "होम मेकर" जैसे कार्यक्रम भी बनने लगे जिनमें बच्चों तथा युवाओं को बूढ़े लोगों के पास ले जाते हैं ताकि वे कुछ समय उनके साथ बिताएं, उनके साथ खाना खाएं, उनसे बातें करें और इस प्रकार कभी-कभी वहां पारिवारिक वातावरण बनाने का प्रयास करें। हमारे यहाँ परिवार में बूढ़े लोगों की उपेक्षा होने लगी है। कुछ मामले दुर्दशा तक के सामने आए हैं, फिर भी हम वृद्धाश्रमों की बात की खिल्ली उड़ाते हैं और वहां रहना अप्रतिष्ठा का विषय बताते हैं। इसके बावजूद जिस गति से हम भौतिकवाद की ओर दौड़ते हुए पश्चिम का अन्धानुकरण कर रहे हैं, उसे देखते हुए लगता है कि ये सब बातें बस कुछ ही वर्षों तक नई लगेंगी। वैसे, संभलने के लिए हमारे पास अभी भी वक्त है, क्योंकि याद रखिए कि हर व्यक्ति को एक दिन बूढ़ा तो होना ही है।

QUICKENQUIRY
Related & Similar Links
Copyright © 2016 - All Rights Reserved - Garbhanal - Version 15.00 Yellow Loop SysNano Infotech Structured Data Test ^