ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
स्मृतियों और बिंबों का अनोखा कोलाज
01-Oct-2018 08:48 PM 360     

मोहन राणा की कविताओं से मेरा पहला साक्षात्कार 1997 में किसी संकलन में छपी उनकी कविताओं से हुआ था। कविताओं के शीर्षक आज भी मुझे याद हैं- "पुरानी खिड़की" और "रीजेंट पार्क"। मोहन की इन कविताओं में शब्दों और बिंबों का ऐसा अद्भुत सौंदर्य था कि पढ़ने के बाद देर तक मैं अचंभित, अभिभूत-सी रही। जैसे दिवास्वप्न में कोई धुंधलके गलियारों में रोशनी पाने के लिए भटकने के बाद स्वयं से साक्षात्कार कर रहा हो। मोहन राणा को और-और अधिक पढ़ने और उनकी कविताओं द्वारा उनकी रचनाओं की अंतरधारा को समझने की चाह मन में कुलबुलाती रही।
मोहन राणा एक अनुभवी और परिपक्व कवि हैं और उनके अब तक आठ काव्य-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी चार पुस्तकें - "जगह", "जैसे जनम कोई दरवाज़ा", "इस छोर पर" और "शेष अनेक" मेरे अध्ययन कक्ष में संग्रहीत हैं। अपनी अन्तःलय और कथन भंगिमा के कारण मोहन राणा की कविताएँ विशिष्ट एवं उत्कृष्ट हैं। आज की हिन्दी कविता के मुहावरे से हट कर भी बड़े सलीके और विलक्षण ढंग से मोहन राणा कविता रचते हैं। उनकी शब्दावली अनोखी, रंग-बिरंगी और समृद्ध है। अंग्रेज़ी, हिन्दी, उर्दू जहाँ जो सटीक बैठता है उसका बेधड़क प्रयोग करते हैं। प्राचीन और अर्वाचीन शब्दों का नक्काशीदार प्रयोग उनकी कविताओं को अनोखा, प्रभावशाली, खोजपूर्ण और पठनीय बनाता है। महत्पूर्ण बात तो यह है कि अप्रचलित, पुराने शब्दों, ध्वनियों और बिंबों आदि का प्रयोग वे जिस संदर्भ में करते है वह उनकी रचनाओं में अपना पूरा अर्थ व्यक्त करने में पूर्णरूप से सक्षम है। सही बात तो यह है कि मोहन राणा के अनेक प्राचीन-अर्वाचीन शब्द, अनोखे वाक्य विन्यास और कुछ अनजाने से मुहावरे दंतकथा-सी लगती बहुत सी स्मृतियाँ ऐसे लगते हैं मानों कई युग पास सरक कर आपस में बतिया रहे हों कभी निर्जन सरोवर के किनारे तो कभी घने वृक्षों के छाँव में।
काव्य-संग्रह "शेष अनेक" 2016 में कॉपर क्वाइन पब्लिशिंग प्राइवेट लिमिटेड, एल-5/905 गुलमोहर गार्डेन, राजनगर एक्सटेन्शन, गाज़ियाबाद-201003, दिल्ली- एनसीआर ने प्रकाशित किया है। पुस्तक का कलात्मक आवरण स्वयं मोहन राणा ने बनाया है।
मोहन राणा की कविताओं में एक रहस्यमयी जादुई परंतु वास्तविक दुनिया बसती है जो पहले तो आम पाठक को शब्दों के प्रिज़्म और अजब-ग़ज़ब प्रयोगों और उनकी लयात्मकता से अभिभूत करती है। फिर जब धीरे-धीरे पाठक उनके काव्य संसार में प्रवेश करने लगता है तो अतीत के राग के साथ उसे बदलते परिवेश की उठा-पटक में आधुनिक और कभी कभी उत्तर आधुनिक स्वर भी सुनाई पड़ने लगता है। पाठक इस और उस दुनिया की सच्चाइयों से कलात्मक ढंग से रू-ब-रू होता, अनुभूतियों के सागर में डुबकियाँ लगाने लगता है। जैसे- "किसी अवांतर में कभी शायद मैं लिख पाऊँ सच/ फिलहाल कार्बन पेपर पर लिखता हूँ हमेशा की तरह / कुछ पंक्तियाँ जो ना कभी खबर है /ना वे किसी वंचित वक्तव्य का अंतिम ड्राफ्ट/वे हमेशा संभावना होती है छूट जाती हैं किसी विराम के बाद /बहुत कुछ रुका रहा आस पास की मेरी नज़दीकियों में /एक दिन के किसी पहर परागमन करते /उनकी सीमाओं को मैं जानूँगा /जो रह गया था करीब पर फिर भी इतना/ आधी रात में फिर छोड़ने वाला हूँ अधूरा अपने आप को, अनकहा" (पृष्ठ 42)।
वस्तुतः मोहन राणा की कविताओं में आए ऑक्सीडाइज़्ड शब्दों की मीनाकारी पाठक के ज़ेहन में बस जाती हैं और वह किसी जादुई सघन वन में स्मृतियों के अद्भुत खोह में भटकते हुए, अंधेरों, झरोखों, इमारतों, एकन्नी, बाजूबंद, ढेंकुल, डेहरी, तालाबंद, तहखानों, दिनों, उड़ानों, नदी, रेत, खेत-खलिहान, पहाड़, पेड़, हवा, पुल, मेट्रो, रेलगाड़ी, गूगल के नक्शे, अंतरिक्ष, रॉकेट, स्मृतियों के डीएनए को दूरबीन से दूर और पास की घुंडी घुमाता हुआ नए-नए प्रकार की रचनात्मकता का आस्वादन करता है और फिर जब वह गहराई में उतरता है तो वह रू-ब-रू होता है मोहन के दुखती रगों से, संवेदनाओं से जैसे- "उन जड़ों में कभी पेड़ होता था/उन दीवारों में घर का दरवाज़ा/अब खचाखच मैट्रो की परछाईं भागती है दैनंदिन/ उस जगह दो स्टेशनों के बीच कहीं/अदृश्य हो गया एक दिन /याद करने के लिए भूलना पड़ता है जैसे/जो जिया था उसे..।" इतना ही नहीं कविता की आगे की पंक्तियाँ पाठक के रग-रग में तीव्र झंझनाहट के साथ असीम पीड़ा की चुभन भर देती है। "झूमते हैं पेड़ तेज़ हवा में लंबी सांस खींच/नाचते अपनी ही जड़ों के चारों ओर /एकाएक वे सहम जाते कुछ देख कर / कुछ याद कर फिर झूमते दम साध/ रुक जाती कविता दुनिया को सीने से लगाए दुनिया से भागते/कहीं शब्दों में अपने को पहचान कर रकहीं शब्दों में" (पृष्ठ 22)। या "प्रेम से निर्वासन जरूरी है प्रेम को जीने के लिए/पलट कर खुद को जैसे देखना उम्मीद से अपने ही लिखे वाक्य में, मैं देखता असीम आकाश को..." बहीखाता (पृष्ठ 31-32)
मोहन की कविताओं में रची-बसी मोहक, आकर्षक शब्दावली अतीत और वर्तमान को एकाकार करती मानो ऐतिहासिक प्रासादों के परकोटों, जालीदार दरवाज़ों, झरोखों खिड़कियों, पीली पड़ गई छतों और सीलन भरी गलियारों में से होते हुए मनुष्य की निर्दयी स्वार्थपरता, संवेदनहीनता, आपाधापी और धन-लोलुपता को आख्यायित करती है। उनकी कैडिलिसकोपिक खूबसरत कविताएँ पाठक को लुभाती है आकर्षित करती हैं। मोहन की कविताएँ लालटेन की रोशनी में पहेलियाँ बुझाती हैं जिन्हें पाठक बूझना (सुलझाना) चाहता है, समझना चाहता है। अतः कविताओं का रसास्वादन करते हुए, धीरे-धीरे वह एक अनोखे, खूबसूरत स्मृतियों के दरवाज़े से सरकता हुआ अतीत और वर्तमान की चहलक़दमी में कई बार भविष्य में आने वाले ख़तरों और बरबादी की आहटें भी सुनता है। जैसे- "और खो जाती जैसे सांस/सबसे ख़तरनाक यह क्षण/एक धड़कन जो कभी जन्म नहीं लेती फिर/उस पर रुकना मुझे स्वीकार नहीं/अतीत और भविष्य को थामे/कठिन रहना स्थिर" आगे वे अपने स्वभाव के विपरीत समाज के ख़ैरख़्वाहों और कानून बनाने वालों पर मारक व्यंग्य करते हुए नज़र आ जाते हैं "मुझे विश्वास नही रहा मुनीमों पर/मेरी कल्पनाओं का तकिया बना/लंबी नींद वे लेते हैं भोजन के बाद/नियम मुझे शंकित करने लगे हैं/दौड़ते रहना मेरी मजबूरी..." अकारण (पृष्ठ 55)।
मोहन राणा की नज़र पैनी है। वे दूरबीन लिए बैठे हैं क्या मज़ाल, कोई घटना, कोई दुर्घटना, कोई नियम, कोई कानून, कोई राजनीति, कोई षड़यंत्र उनकी नज़र से चूक जाए और वे उसे अपनी कविताओं में अपने ढंग से दर्ज़ ना करें। मोहन राणा शब्दों के चित्रकार है। वे मूर्त को अमूर्त और अमूर्त को मूर्त बना देते है। दूर गूँजती हुई आवाज़ को पास लाकर सुनाते हैं और पास की आवाज़ को दूर ले जाकर सुनाते हैं। मोहन जी एक ऐसे दृष्टि संपन्न कवि है जिनके शब्दों के छुअन भर से वस्तु का रूप, रंग और आकार बदल जाता है, किसी प्रिज़्म के विभिन्न फलिकाओं की तरह - "तुम अकेली हो उस पार /पूरा उस पार तुम्हारे साथ है और /अपने पलटून पुल के साथ मेरा अगोचर अतीत भी वहाँ चुपचाप / अपनी परछाई पर झुका/ जिसे अभी घटना बाक़ी है/ रेत हो गई नदी में पानी की वापसी तक" कहानियाँ कई इसकी (पृष्ठ 10)।
ऐसा खूबसूरत शब्द-चित्र, फिल्म की तरह सिर्फ़ मोहन राणा जैसा कवि ही कागज़ पर आपको पेश कर सकता है, "मेरा अगोचर अतीत भी वहाँ चुपचाप /अपनी परछाई पर झुका/ जिसे अभी घटना बाक़ी है" किस खूबसूरती के साथ उन्होंने अतीत का मानवीयकरण किया है। वाह! लाजवाब कोलाज़- चुप पर बोलता हुआ, के अतिरिक्त पाठक और कुछ नहीं कह पाता है और वह उनकी रचना संसार में फिर से गोते लगाते हुअ सच्चे मोती खोजता है। जैसे- "ऊब नहीं होती/न खीज कर बाहर चला जाता हूँ टहलने/मैं पेड़ को देखते..." थेगली (पृष्ठ 56)।
मोहन की रचनाएँ अपनी गहनता में मानो खामोशी को दूर और पास से आवाज़ देती है। सच, ऐसे सहज धीर गंभीर इंसान और उसकी कविता का इस संवेदनहीन, खोखले और दरकी हुई ज़मीन पर हमारे समय में होना और बने रहना अर्थपूर्ण है, इसलिए कि "जाने कब कोई भी तारीख लिख दे/थोड़ी आशा जता कल कहें उसे /पृथ्वी पर वैसे कितने सीमांकन बचे होंगे 2054 में " - परिशयन (पृष्ठ 51)।
मोहन राणा प्रतिभा के धनी द्रष्टा कवि हैं। उनके पास एक व्यापक दृष्टि और विशेष उन्मुक्त विचारधारा है। कविता संग्रह "शेष अनेक" की कविताएँ रोचक और प्रभावशाली होने के साथ-साथ बौद्धिक भी हैं। उनकी गिनती आज के चोटी के कवियों में है।

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