ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
स्मृतिगंधा
CATEGORY : स्मरण 01-Apr-2016 12:00 AM 287
स्मृतिगंधा

जैसे पूरा यथार्थ आमने-साने की पहाड़ियों के बीच फैला है। एक पहाड़ी उजाले की दूसरी अंधेरे की। उजाले में अंधेरे की पहाड़ी दिखाई देती है-- उजाले को अपने पास बुलाती, इतने पास कि उजाले की पहाड़ी अंधेरे में डूब जाती है। सब कुछ एक ही कौंध में चमकता है, एक ही कालिमा में डूब जाता है।
हम सुबह से शाम तक भटकते रहते हैं। हमें अक्सर यह मालूम नहीं होता कि हमारे रूप का अंधेरा हमारा पीछा कर रहा है। जब हम घर पहुँचकर एक टिमटिमाती लौ के पास बैठ जाते हैं तब यह अंधेरा हमारे चारों तरफ ठुमकने लगता है। हम कभी-कभी किसी और लोक में पहुँच जाते हैं और यह अंधेरा हमें इसी लोक में घेरे रहता है। अंधेरे में घिरे हुए रूप को देखने के लिए दर्पण चाहिए।
सामने की पहाड़ी पर घने अंधकार में एक लौ टिमटिमा रही है, जैसे देह में अटकी आत्मा हो। जब सब कुछ अंधेरे में डूब जाता है, यही लौ उन शब्दों को प्रकाशित करती है जो एक कृति में अंकित हैं। शब्दों से परावर्तित होकर इस लौ का प्रकाश अंधेरे में घिरे जीवन को भासमान करता है। कृति का उजाला- एक कृति के उजाले में बसकर पूरी रात काटी जा सकती है-- कृति ही मेरा घर है।
"लाल टीन की छत' जिसे निर्मल वर्मा ने पढ़ा अब उसी को मैं पढ़ रहा हूँ--
"मुझे लगता है वे सब कुछ देखते हैं। वे इस समय भी मुझे देख रहे हैं... जब मैं यहाँ से चली जाऊँगी, जब मैं यहाँ नहीं हूँगी, तब भी वे इस गिरजे को, इन फूलों को, खाली मैदान को देखते रहेंगे। मेरे न होने को देखेंगे। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि मैं यहाँ न रहकर भी कहीं बाहर से, कहीं पहाड़ों के पीछे से अपने न होने को देख सकूँ, जैसे एक तरफ के पहाड़ दूसरी तरफ के पहाड़ों को देखते हैं'।
पर्वतों के बीच एक पुकार गूँज रही है न जाने कबसे...
कायाऽऽऽऽऽ
काया, कौन-सी काया?
क्या काया सिर्फ एक नाम है या सिर्फ एक देह?
नहीं। काया स्मृति है। स्मृतियों की स्मृति।
हाड़-मांस से बनी उसकी देह के भीतर एक स्मृतिदेह है। वह अकेली नहीं, उसकी देह के वायुमण्डल में एक ऐसी गंध है जिसके सहारे उसकी देह, देह छोड़कर बाहर आ जाती है-- देह में देह से परे विचरती स्मृतिगंधा...
छज्जे पर बैठकर ताकती है खुबानी के पेड़ को।
कमरे में चुपचाप सुनती है टप-टप सर-सर।
कभी छत हिलती है कभी दिल हिलता है।
बहता पानी और चुप बर्फ।
सन्नाटा।
"इतना गहरा कि किसी का बुलावा अनसुना नहीं जाता।'
"यह मैं हूँ वह छोटी होती जाती। सिकुड़ती जाती- अपने अस्तित्व की अंतिम दीवार तक-- जहाँ उसका नाम लिखा होता, काया। यह मैं हूँ, काया! और उसका नाम सुनते ही सन्नाटा पीछे हट जाता...'
कोई उसे बुला रहा है...
कौन?
कहीं कोई नहीं। सिर्फ स्मृतियों की गंध है। धुँधला स्पर्श है।
पता नहीं, किस प्रतिध्वनि की प्रतिध्वनि एक पर्वत से दूसरे पर्वत तक आती है और न जाने किस पर्वत पर लौट जाती है- चारों दिशाओं में फैले पर्वत ही पर्वत। पर्वत के सामने पर्वत की देह, पर्वत से ही जनमती, पर्वत की ही होती जाती...
कौन? पार्वती
पूछ रही हैं पार्वती- तुम्हारे गले में यह मुण्डों की माला! चकित हैं पार्वती।
कह रहे हैं शिव- ये तुम्हारे ही सिर हैं पार्वती। जितने सिर हैं तुम्हारे उतने जन्म मेरे लिए हुए हैं।
पर्वत ही पिता है। पर्वत ही पति। पर्वत ही पुत्री।
वह हर है-- यहाँ लाने वाला, ग्रहण करने वाला और यहाँ से ले जाने वाला। उसमें समस्त पद एक साथ विराजते हैं। वह गौरी, शिव और पार्वती का अन्तरभाष है।
हरतालिका व्रत की याद आती है- भादों के उजयारे पाख में तीज के दिन यह व्रत सुहागवती स्त्रियाँ रखती हैं। अपने पति की अमरता की कामना करती हैं। ढलती उम्र में हर सुहागन अपना यह व्रत त्यागकर नव-वधुओं को दे देती है। इस तरह न·ार देह में अमरता की कामना फूलती-फलती है। फूलों की झालरों के बीच मिट्टी की गौरा-पार्वती आमने-सामने होती हैं और उनके बीच में जलेरी में स्थापित शिवलिंग। इस प्रतिमा के सामने सुहागिनें बिना अन्न-जल ग्रहण किए पूरा दिन पूरी रात काट लेती हैं।
गौरी, जो अभी रजस्वला नहीं हुई है, कुमारी कन्या है, योनि रूप अर्घा है। पार्वती, जो हिम की बेटी है, पहाड़ी नदी, सुगंधित मिट्टी। गौरा-पार्वती एक ही काया की दो छबियाँ हैं जिनके बीच में काल है।
"तुम?'
"हाँ- बाहर से मैंने तुम्हें देखा था। तुम खिड़की पर झुकी थीं।'
वह सीधी मुड़ गई। आधे चाँद की चमक लामा पर पड़ रही थी। वह भीतर नहीं आयी थी, कमरे और लायब्रेरी की धँुधली सीमा पर खड़ी थी।
"क्या कर रहीं थीं- अंधेरे में?'
"कुछ नहीं- रेल देख रही थी।'
वह पास आयी, फिर रुक गई- और तब उसे अपने और लामा के बीच अजीब-सी हलचल दिखाई दी, जैसे कोई चीज हिल रही हो- क्या यह आत्मा है- पीड़ा से सुख की तरफ जाती हुई, लामा जहाँ खड़ी है, उसके पैरों के आसपास घूमकर वापिस उसके गालों को छू रही है, जहाँ आँसू हैं, उसकी दोनों छातियों को रगड़ती हुई, जहाँ कुछ अटक गया है-- वैसे ही जैसे अर्सा पहले वह छज्जे पर नंगी बैठकर उन्हें नोचती थी, काली माँ को दिखाने के लिए, पागल, मदहोश, हवा में काँपती हुई।।।
"लामा?'
"क्या है काया- मैं यहाँ हूँ।'
"तुम इसे रोक नहीं सकतीं?'
उसने बढ़कर लामा का हाथ पकड़ लिया और वह सचमुच उसके पास चली आई-- "इधर देखो, इधर, तुम इसे रोक नहीं सकतीं'
लामा अपनी स्थिर आँखों से बीच फर्श की तरफ देखने लगी, जहाँ काया ने संकेत किया था।
वहाँ कुछ भी न था। कुछ भी नहीं हिल रहा था। सिर्फ चाँदनी का पीला, चौकोर धब्बा नंगे फर्श पर पड़ा था।
काया अपलक उसे देखती रही। फिर चारों तरफ देखा। कमरे में कोई नहीं था।
......
तप कर रही है काया।
ऋतुएँ अपने आपको निहारती हुई बीत रही हैं... बसन्त के आइने में बसन्त... पतझर के आइने में पतझर... अपर्णा के आइने में अपर्णा... शब्द के आइने में शब्द... काल के आइने में काल... बर्फ के आइने में बर्फ... काया के आइने में काया...
एक ही आँख है जो मिस जोसुआ के लेटर बॉक्स से घूर रही है। वहीं आँख पढ़ती है यह वाक्य--
"माँ को कुछ नहीं हो रहा, माँ के साथ कुछ हो रहा है।'
वही आँख देखती है:
"शायद ऐसा पहले कभी हुआ है, बहुत पहले, जब वह छोटी थी, जब स्मृति समय की डोर से नहीं बँधी थी- किसी पूर्वजन्म में- जब माँ पेड़ के नीचे लेटी होंगी, झरझराती खुबानियों की पत्तियों के नीचे, धूप सेकती हुई- और वह बहुत दूर से आई थी, दौड़ती हुई उनके पास चली आई थी, किसी अजीब अन्देशे से आतंकित और रोती हुई उनकी बाँहों में लिपट गई थी'
वही आँख देख रही है-
मौत के मुँह में जाती लामा को, नथवाली औरत को, बीरू को, छोटू को, भोलू को, पहाड़ी लड़के को, बड़ी होती माँ को। वही देख रही है बर्फ-सी सफेद, ठोस और ठंडी मिस जोसुआ की चादरें...
समूची ज्ञानेंद्रियाँ उसी एक आँख में स्थित हैं। समूचा कर्म उसी एक आँख में दीप्त है।
"मुझे लगता है मेरी स्मृति एक दूसरी स्मृति से ढँकी रह गयी है और जब मैं एक को छूती हूँ तो दूसरी अपने आप उठने लगती है'
"...दाढ़ू का रस? मुझे लगा, झाड़ियों के पीछे से कोई हँसते हुए फुसफुसा रहा है।'
पार्वती, तुम पूर्व जन्म में सती थीं। दक्ष के घर जन्मी थीं।
............
हम अपने पिछले जन्मों को भूल जाते हैं। एक धुँधली-सी रेखा थोड़ी दूर तक खिंचती है, फिर मिट जाती है, उस पहाड़ी नदी की तरह जो साथ चलते-चलते हमारे रास्ते से ओझल हो जाती है। जब खूब जोर की प्यास--- जीवन की प्यास--- लगती है तब नदी की स्मृति ही उसके किनारे तक पहुँचाती है।
अबाध गति से बहती नदी में प्यास बुझाते हुए अपने रूप की झलक नहीं मिल पाती। ताण्डव और लास्य की मिली-जुली ताल पर हिलोरे लेते जल का भाग उसे ढँक लेता है। रूप को निहारने के लिए चाहिए एक ठहरी हुई आन्तरिक लय-स्मृतिकुण्ड जिसमें नदी के स्रोत धरती में छिपे अनेक अदृश्य जल-स्रोतों के साथ छनकर दर्पण बन गये हैं।
कुण्डों का पानी कभी नहीं सड़ता, वे एक आंतरिक लय में डूबे होते हैं- मीठे, खारे, बेस्वाद- सतत वर्तमान में स्थित-गतिमान।
हम ही कुण्ड के पानी को हिला देते हैं। अनन्त गहराई में डूबा हुआ रूप सतह पर आकर डोलने लगता है। एक तड़पती हुई परिधि गहराई से ऊपर उठकर आती है सतह पर बिखरने लगती है। समय की सुरंग से निकलकर फुफकारता साँप चढ़ाइयों और ढलानों की भूलभुलैया में आँख मिचौनी खेलने लगता है। उसकी फुफकार बहुत दूर से सुनायी देती है। हमें भ्रम होता है जैसे वह चारों तरफ से आ रहा है पर आता नहीं । सामने आते ही एक सीधी या थोड़ी-सी लहरदार रेखा बनकर सरकने लगता है, किनारे पर एक चट्टान अकेली रह जाती है।
............
एक ही आँच है जो युगों से जमी हुई बर्फ की चट्टान को पिघला रही है...
हजारों वर्ष बीत गये पार्वती, तुम बूढ़ी नहीं हुर्इं! तुम्हारा यौवन युगों से बाट जोह रहा है...
निरन्तर वर्तमान से भरी हुई है काया। दूसरा कोई समय काया में नहीं। स्मृति ही वह जगह है जहाँ यह निरन्तर वर्तमान अनुभवगम्य है। बहती हुई नदी के किनारे एक ऐसा कुण्ड जहाँ अतीत और भविष्य एक साथ अपना चेहरा देख पा रहे हैं। वे जब भी इस वर्तमान से कटकर बहने लगते हैं, उनका जल सड़ने लगता है। जब बावड़ियों का जल सड़ जाता है तब उनमें चमगादड़ें फड़फड़ाती हैं, बूढ़ी मकड़ियों के जाले सीढ़ियों पर ही रास्ता रोक लेते हैं। उनमें कोई झिर नहीं फूटती।
चारों दिशाओं से उड़कर आती है सड़ाँध- स्मृति से निकाल बाहर कर दिये गये अतीत की सड़ाँध, जीवन का स्पर्श किए बिना गढ़े गये भविष्य की सडाँध...
जीवन से एक कदम पीछे की विस्मृति हमें बैचेन कर देती है और जीवन से एक कदम आगे का अर्थ रोज़ छलता है। जीवन से बाहर रहकर उसका अर्थ नहीं खोजा जा सकता। जो लोग अपनी स्मृतियाँ खोकर अपने जीवन से बाहर जीते हैं वे मरते भी जीवन से बाहर ही हैं। जीवन की कक्षा में उनका प्रवेश हो ही नहीं पाता। उनकी कोई स्मृति हमारे पास नहीं होती।
अपनी मृत्यु के कदम तक ही तो चला जा सकता है, जिस तरह मिस जोसुआ एक-एक कदम बढ़ाकर अपनी मृत्यु तक चलीं। काया जितने कदम उनके साथ चली, अब उतने कदम मिस जोसुआ उसके साथ चलती रहेंगी...
"मुझे वि·ाास नहीं हो सका कि ऐसे दिन, जब धूप फैली हो, आकाश इतना नीला हो कोई मर सकता है।'
............
जब हम दरवाजे बंद करके बिस्तर पर लेट जाते हैं, हमें उन देहरियों का बिलकुल ख्याल नहीं रहता, जिन पर खड़े होकर हमें कुछ याद आया था। वे हमेशा द्वार के बाहर ही रहती हैं। जब कभी हम बैचेन होकर दरवाजा खोलते हैं, अनजाने ही अपने आपको देहरी पर खड़ा हुआ पाते हैं। घर और बाहर के बीच देहरी ही वह टापू है जहाँ कभी कुछ नहीं बीतता। देहरी पर खड़े होते ही प्रगट हो जाता है-- स्मृति के रथ पर आरूढ़ निरन्तर वर्तमान...
.............
वह लड़का पहाड़ की सबसे ऊँची चोटी पर बैठा तुम्हें देख रहा है काया। और तुम उसे। वह धीरे-धीरे तुम्हारी ओर बढ़ रहा है। और तुम उसकी ओर। वह पहाड़ी चोटी से नीचे उतर रहा है। ढलानों में तुम्हारा पीछा कर रहा है। वही लड़का नथवाली औरत के कमरे में है। वही तुम्हारी माँ की ओट में छिप गया है। गिरजे में वही लड़का देख रहा है तुम्हें।
कौन? बीरू! भोलू!
कौन? शिव!
फर्श पर चाँदनी के पीले धब्बे-सा वही लड़का। वह बर्फ का सपना है जो तुम्हारी स्मृति में बह रहा है काया।
"काया, देख, तू कहीं नहीं जाएगी, देख, सारी बर्फ सपना थी!'
काया, एक चोटी पर तुम हो।
एक पर वह।
बीच में एक रेखा बह रही है...
काया, तुम्हें मालूम है शायद, तुम्हारे भाल पर भी एक रेखा है--
स्मृतिरेखा-- जो कभी नहीं मिटती...

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