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स्मृति के द्वार पर दस्तक
01-Aug-2017 10:56 PM 2050     

भाव तो सभी के मन में उठते हैं, अनुभूति बनते हैं और फिर कुछ कहने की इच्छा होती है। पर लेखक के जीवन में निरंतर एक ऐसा स्मृति संचय होता रहता है जो लेखक से खुद अपना साक्षात्कार तो करवाती ही है वह उसे दूसरों के सामने भी खड़ा कर देती है। प्रत्येक लेखक अपनी स्मृति का द्वार खटखटाकर ही दूसरों के जीवन में झाँक पाता है।
हमारे समय के सुप्रतिष्ठित हिंदी कथाकार, चिंतक और यायावर निर्मल वर्मा अपनी प्रसिद्ध पुस्तक "शब्द और स्मृति" की भूमिका में लिखते हैं कि "हमारे सामान्य अनुभव समय की दुनिया में होते हैं, लेकिन स्मृति के क्षणों में दूसरी दुनिया की भी झलक मिल जाती है।"
यह दूसरी दुनिया की स्मृति आखिर क्या है? क्या वह दुनिया जो सांसारिक प्रश्नों से ऊपर उठकर अलौकिक दुनिया में अपनी खिड़की खोलती है या वह दुनिया जो अपनी दुनिया से दूसरों की दुनिया में झाँकती है। लेखक की समस्या दूसरों की दुनिया में झाँकने की ही है। वह उसी दुनिया से अपनी दुनिया रचता है और फिर अपनी दुनिया को रचकर दूसरी दुनिया को वापस लौटा देता है।
संस्मरण लेखन दुनिया के बीच से चुनी गई स्मृति जैसा है। प्रत्येक स्मृति संस्मरण नहीं होती। वह सूचना भी हो सकती है। जो दूसरों को यथासमय दे दी जाये। दो और दो चार की तरह। एक लेखक के लिये संस्मरण लिखना एक चुनाव है। वह इस अर्थ में कि एक लेखक किसी दूसरे लेखक, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति आदि से गुजरता है और वे उसकी स्मृति में वर्षों तक संचित रह सकते हैं। पर एक लेखक यह चुनने के लिये विवश है कि वह अपनी किस स्मृति को रचे जो सिर्फ उसके ही नहीं सबके काम की हो। अक्सर वहुत से संस्मरण रिपोर्टिंग बन कर रह जाते हैं। जो सबके काम नहीं आते।
संस्मरण को साहित्य की एक विधा के रूप में ही स्वीकार किया गया है, ठीक उसी तरह जैसे कविता, कहानी, उपन्यास, यात्रा वृत्तांत, निबंध और नाटक आदि होते हैं। संस्मरण एक विधा है। वह व्यंग्य और निबंध के रूप में भी हो सकती है। वे कथारूप और कवितारूप भी हो सकते हैं। अनेक कथाओं और कविताओं में संस्मरणात्मक विवरण पाये जाते हैं जो कथा और कविता को आगे बढ़ाते हैं।
एक लेखक के लिये यह कतई जरूरी नहीं कि वो सिर्फ अपने आसपास की दुनिया यानि लेखक समाज को ही अपनी स्मृति का हिस्सा बनाये। उसकी स्मृति में पर्वतों, नदियों, पक्षियों आदि के भी संस्मरण हो सकते हैं, अपने पड़ौसियों के भी।
बीसवीं सदी के अप्रतिम हिंदी व्यंग्य लेखक हरिशंकर परसाई ने अपनी एक संस्मरण लेखमाला चलाई थी जो "जाने पहचाने लोग" के नाम से 1991 में प्रकाशित हुई थी। हरिशंकर परसाई इस लेखमाला के शुरू में यह प्रश्न उठाते हैं कि - मेरे समकालीन कौन? क्या डॉक्टर के समकालीन डॉक्टर? इसी तरह क्या लेखक के समकालीन लेखक? नहीं। जिस पानवाले के ठेले पर मैं लगातार पच्चीस साल से पान खा रहा हूं वह भी तो मेरा समकालीन है। जिस नाई से मैं तीस साल से दाढ़ी बनवा रहा हूँ वह भी तो मेरा समकालीन है। मेरे घर में काम करने वाला ढीमर भी मेरे घर को सम्हालता है। मैं तो अपने घर की चाबी भी उसे देता हूँ, क्या वह मेरा समकालीन नहीं? परसाई कहते हैं कि मेरे लिये तो लेखकों और बुद्धिजीवी मित्रों के अलावा ये लोग भी समकालीन हैं क्योंकि इनके बिना मेरा काम ही नहीं चलता। मैं इन पर भी लिखूँगा और उन्होंने इस पुस्तक में लिखा।
आम तौर पर यही माना जाता है कि लेखक लेखक पर लिखेगा, डॉक्टर डॉक्टर पर लिखेगा, राजनेता राजनीति के अलावा और कुछ नहीं लिखेगा। क्या दुनिया में ऐसे लोग नहीं होने चाहिये कि वे अपने सारे आसपास को अपनी स्मृति में बसायें और जब उन्हें लगे कि संस्मरण लिखना है तो वे अपने धंधे के अलावा उस आसपास को भी याद कर सकें। वैसे भी जीवन की स्मृति में सब कुछ बसा होता है। दार्शनिक कहते हैं कि वह तो जन्मजात मिलता है जिसमें पुराने जन्मों की स्मृति भी बसी होती है। कुछ घटनाएँ तो ऐसी होती रहती हैं कि लोगों को अपने पिछले जन्म याद आ जाते हैं और वे अपने नये जन्म में उनके किस्से सुनाने लगते हैं।
कुल मिलाकर संस्मरणों में लोगों की स्मृति का इतिहास बसा होता है। अगर यह कहें तो गलत नहीं होगा कि संस्मरण सुनाये बिना जीवन चलता ही कहाँ। संस्मरणों में जीवन के ऐसे तथ्य उजागर होते हैं जो बाद में चलकर इतिहासकारों के भी काम आ जाते हैं। हमारा यह कहने का मन होता है कि अगर स्मृति न होती तो दुनिया का इतिहास न होता।
"गर्भनाल" के सम्पादकों के मन में संस्मरण को लेकर यही उथल-पुथल थी तो हमने सोचा कि क्यों न हिंदी के कुछ प्रतिष्ठित लेखकों के संस्मरण, कुछ प्रतिष्ठित लेखकों पर प्रकाशित किये जायें। इसमें हरिशंकर परसाई का संस्मरण भी है जो हिंदी के अप्रतिम कवि मुक्तिबोध पर है और अपने में अनूठा है।
इस अंक में हमने जो संस्मरण प्रकाशित किये हैं और किन्हीं लम्बे संस्मरणों को कुछ हद तक सम्पादित भी किया है इन्हें हमने "हिंदी समय" की वेबसाइट से साभार प्राप्त किया है और हम उनके प्रति हार्दिक कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं। दुनिया में सात अरब लोग रहते हैं। स्मृतियों की कमी नहीं है पर यह अंक कुछ मूल्यवान स्मृतियों का लेखा-जोखा है जो भारत ही नहीं दूसरे देशों के हिंदी पाठकों को कुछ प्रेरणा ज़रूर देगा

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