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फिसल-फिसल जाता है रेशम
01-Mar-2019 03:14 PM 1735     

फिर अपनी ही एक पंक्ति से बात प्रारंभ करने की धृष्टता के लिए क्षमा। पंक्ति है :

फिसल-फिसल जाता है रेशम
तन-मन छूती खादी देना।

पता नहीं, मनुष्य ने जब पहले-पहल तन ढांपना शुरू किया था तब वह लज्जावश था या ठिठुरन के कारण लेकिन ऊन, रेशम और सूत ये तीनों वस्त्र बुनने के सबसे पुराने और प्राकृतिक सूत्र रहे हैं। लेकिन इन तीनों में भले ही सूती वस्त्र और उनमें भी खादी सबसे सामान्य और सस्ती मानी जाए लेकिन यह सत्य है कि खादी हमें अपने शरीर और अस्तित्त्व के सबसे निकट लगती है। लगता है जैसे वह हमारे शरीर के साथ ही जन्मी और पली-बढ़ी हमारे शरीर का ही एक अंग है। यदि यह खादी हमारे हाथ से कती-बुनी हो तो बात ही और है। और यदि उसका कपास भी हमारे द्वारा उगाया गया हो तो कहना ही क्या?
बचपन में अपनी दादी की माँ, दादी, नानी और माँ को गर्मियों की लम्बी दोपहरियों में चरखा कातते देखा है। खुद भी चरखे पर हाथ आजमाए हैं। किशोरावस्था में तो बाकायदा तकली और चरखा भी चलाए हैं। माँ द्वारा घर पर काते गए सूत से बुनी दरियाँ और लोई पिछली शताब्दी के अंत तक मेरे पास रही हैं। मैं इन वस्तुओं के साथ अपने संबंध को पूरी तरह स्पष्ट नहीं कर सकता लेकिन यदि किसी बच्चे ने अपने घर में कहीं एक दो फल या सब्जी के पेड़-पौधे रोप हों और उसके किसी फल को मिल-बाँटकर खाया हो तो वह इसे कुछ समझ सकता है। बस, समझ लीजिए कि मातृभाषा से मनुष्य का रिश्ता कुछ ऐसा ही हो सकता है।
यह सच है कि आज पेट और अर्थव्यवस्था के चक्कर में मनुष्य की स्थिति ट्रेन में भीख माँगते-माँगते जाने किस-किस रूट में घूमते-घूमते भिखारी जैसी हो गई है। वह चौक में तमाशा दिखने वाले बाजीगर के ज़मूरे की तरह हिन्दू को राम-राम, मुसलमान को सलाम, ईसाई को गुड मोर्निंग और सरदार जी को सतश्री अकाल कहते-कहते भूल जाता है कि उसका भी कोई धरम-ईमान है; अस्तित्त्व-औकात है।
यदि मनुष्य कोई बहुत बड़ा भौतिक ख्वाब न भी देखे तो भी सामान्य रूप से आज के मनुष्य का अपने देश में तो थोड़ा बहुत प्रवास हो ही जाता है। पहले की तरह यह संभव नहीं रहा कि एक छोटे से अंचल में ज़िन्दगी कट जाए और अपनी छोटी-सी दुनिया के हवा-पानी से ही बसर हो जाए। जाने किस-किस घाट का पानी पीना पड़ता है। ऐसे में एक ही बोली-भाषा से काम नहीं चलता लेकिन मात्र पेट के लिए ही किसी आदमी को अपने ही देश में अपनी भाषा छोड़ने को विवश होना पड़े यह कोई सुखद स्थिति नहीं है। पिंजरे में दाख-छुहारा खाने के लालची तोतों की बात और है। वे यहाँ हमारे विषय नहीं हैं। ज्ञान या मानवता के कल्याण के किसी और बड़े लक्ष्य के लिए जीने वाले विशिष्ट लोगों की बात भी यहाँ नहीं हो रही है।
स्वदेश और ग्राम स्वराज की कल्पना में यही था कि जीविकोपार्जन भी हो जाए और खादी की तरह हमारे अस्त्तित्व के साथ उगी-बढ़ी भाषा की खादी भी हमसे न बिछड़े। हमसे पादप बने रहने का अधिकार न छिने। तभी वृक्ष का एक पर्याय पादप भी है। पादप अर्थात अपने पैरों से पानी पीने वाला। वृक्ष की जड़ें धरती में से होकर पाताल से अपना जल ग्रहण करती हैं। पानी-पानी में भी अंतर होता है। कई पौधे पराए पानी में मर जाते हैं।
आज मनुष्य के भटकने के कारण, भिन्न हवा-पानी में घुटकर बहुत-सी भाषाएँ मर रही हैं। हो सकता है इस प्रकार युगों तक भटकते रहने वालों की आगामी पीढ़ियों को भाषाओं का मरना धीरे-धीरे सह्य हो जाए लेकिन जिस समय कोई खुद अपनी भाषा और संवेदना के साथ मर रहा होता है तो उसका दर्द उसके खुद के लिए ही अवर्णनीय होता है तो फिर किसी और द्वारा भिन्न परिस्थितियों में उसे समझ सकना कैसे संभव हो सकता है?
जब हम मुनाफा बढ़ाने के लिए रोबोटों में विकल्प तलाश रहे हैं तो मनुष्य की संवेदनाओं की बारी के इंतज़ार का कोई विशेष अर्थ नहीं रह जाता। इसलिए अब जब हम कतार में खड़े अंतिम आदमी की बात करते हैं तो हमारी चिंता राष्ट्र भाषा और विश्व भाषा की अपेक्षा मातृभाषा होनी चाहिए। क्या उसकी मौलिकता को सुरक्षित रखते हुए उसे जीने का अधिकार और अवसर नहीं मिल सकते? जब विभिन्न गणों को मिलकर कोई राष्ट्र बनता है तो उसमें सभी की भाषा और अस्मिता के लिए स्थान होना चाहिए अन्यथा धरती पर नहीं तो कहीं दिलों में तो पाकिस्तान और बांग्लादेश बने ही रहेंगे। इसलिए किसी समर्थ गणराज्यों वाले देश में राष्ट्रभाषा के साथ-साथ अन्य भाषाओं का भी समान महत्त्व होता है। संख्या और प्रसार के मामले में हिंदी की क्षमता से इनकार नहीं किया जा सकता लेकिन उसकी भूमिका संस्कृत जैसी ही हो सकती है अंग्रेजी जैसी नहीं क्योंकि अंग्रेजी की उपस्थिति में किसी भी राज्य को अपनी कमतरी का अहसास नहीं होता। और फिर जिस प्रकार पहले भी अंग्रेजी के साथ-साथ हम अपनी भाषाओं का विकास करते रहे और उनसे पोषण प्राप्त करते रहे तो अब भी कोई समस्या नहीं हो सकती। बशर्ते कि हम अंग्रेजी को एक कुंठा की तरह न पालें।
देश की सभी मातृभाषाएँ बचेंगी तो ही हिंदी भी बचेगी अन्यथा किसी भी भारतीय भाषा की खैर नहीं। देश की सभी भाषाओं और बोलियों से ही राष्ट्र भाषा बनती और पोषित होती है। और फिर यदि हम दुनिया के सबसे विविध और संस्कृति-समृद्ध देश होने का गौरव बनाए रखना चाहते हैं तो हमें अतिरिक्त श्रम और सहिष्णुता का परिचय देना चाहिए। हम योरप के किसी छोटे-मोटे देश की तरह व्यवहार नहीं कर सकते। हमें एक साथ ही आंचलिक, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सब बनना पड़ेगा लेकिन क्रम उलटकर नहीं। आंचलिक और राष्ट्रीय को छोड़कर सीधे अंतर्राष्ट्रीय बनने की जल्दी में तमाशा बनने के नतीजे हम देख चुके हैं।

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