ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
विद्रोह की गाथाओं के गायक हरबोले
CATEGORY : सन्दर्भ 01-Aug-2018 11:13 PM 398
विद्रोह की गाथाओं के गायक हरबोले

हरबोला कई स्रोतों और दिशाओं से उद्गमित और विकसित एक लोकगाथा गायक जाति है। किसी एक पहचान में बाँधकर इनका पूरा परिचय नहीं दिया जा सकता। ये लोग स्वयं को अहीर बताते हैं, क्योंकि गाथा गायन और भिक्षाटन के अलावा ये पशुपालन का काम भी करते हैं। किन्तु अहीर इन्हें अहीर नहीं मानते। हरबोले धर्म कथाओं के गायन करने के कारण अपने को वसुदेवा पंडित भी मानते हैं, पर ब्राह्मणों की दुनिया में इनका उल्लेख नहीं होता। "छिन्द" नामक खजूर प्रजाति के वृक्ष की पत्तियों से खूबसूरत टोकरियाँ बनाकर, मांग और बंसोड़ जाति का काम भी ये लोग कर लेते हैं। घर होकर भी साल के ज्यादातर दिन ये घुमक्कड़ी करते हैं। हरबोले भिखमंगों जैसे नियमहीन तो नहीं होते पर भिक्षावृत्ति ही इनकी आजीविका है। ये लोग धर्मकथाओं के अलावा ऐतिहासिक गाथाएँ भी गाते हैं। इस प्रकार चारण और भाट का काम भी किसी रूप में ये लोग कर लेते हैं। आशु कवित्व भी इनकी ही विशिष्टता है। अर्थात् संस्कृति और जीवन की ही भाँति इनका भी सब कुछ साझा है। हिन्दू तो खैर ये हैं ही पर बौद्धों और सूफियों का प्रभाव भी इन पर देखा जा सकता है। मोटे रूप से हरबोले भैक्षचर्या पर निर्वाह करती एक पारम्परिक लोक गायक जाति है।
हरबोला शब्द के विषय में प्राय: थिसारस और शब्दकोश मौन है। मानक हिन्दी शब्दकोश में कहा गया है कि यह शब्द मध्ययुग के हिन्दू योद्धा या सैनिक की संज्ञा था। "हर" का अर्थ शिव या महादेव है इस प्रकार शिव के बोल बोलने वाला "हरबोला" हुआ। किन्तु मजेदार बात यह है कि शैव परम्परा या शिव स्तुति से हरबोला का कोई रिश्ता नहीं है। ये तो अपना संबंध वसुदेव अर्थात कृष्ण के पिता से जोड़ते हैं। कृष्ण अहीर थे, हरबोला भी स्वयं को अहीर मानते हैं। कृष्ण गाथा, राजा हरिश्चंद्र, श्रवण कुमार, राजा मोरध्वज की गाथाओं और लीलाओं के गान, वैष्णवी बाने में करने के कारण हरबोला स्वयं को ब्राह्मण भी बताते हैं। हरबोले अपनी यात्राओं और पड़ावों पर एक-दूसरे का नाम लेकर नहीं पुकारते वरन एक-दूसरे को "वसुदेवा" कहकर पुकारते हैं।
भारतीय मनीषा दिन, तिथि, सनसंवत से ज्यादा सनातन समय में विश्वास करती है। जो चीज कभी दिन तिथि संवत में तथाकथित प्रामाणिकता को नहीं प्राप्त कर पाती वह जनश्रुतियों और वाचिक परम्पराओं में लोकरंजन करते हुए पूरी जीवित बची रह जाती है। इतिहासकार और साहित्यकार जिन चीजों को उपेक्षित कर गए उन कथानकों को हरबोलों और उनकी कथाओं ने बचा लिया है। हरबोले फुटकर गीतों और धार्मिक पौराणिक गाथाओं खासकर प्रजाहितैषी और फिरंगियों से लोहा लेने वाले राजाओं की विरुदावली पूरे सम्मान और ओज के साथ गाते हैं। इन गाथाओं में प्रजा की पीड़ा तथा उस समय की जनआकांक्षा और संघर्ष को भी अभिव्यक्ति मिलती है। जननायकों की वंदना इनका मुख्य कथानक होता है।
सिर्फ झाँसी की रानी ही नहीं नरसिंहगढ़ के राजा चैनसिंह, मालव नरेश यशवंतराव होलकर और नागपुर के राजा रघुजी भोंसले तथा जननायक टंटया भील की गाथा इसी तरह की गाथाएँ हैं। इन लंबी गाथाओं में इतिहास की प्रामाणिकता भी पर्याप्त होती है। ऐतिहासिक गाथाओं के अलावा हरबोले श्रीकृष्ण लीला, राजा हरिश्चंद्र की कथा, श्रवण गाथा आदि पौराणिक गाथाओं और फुटकर गीतों को भी गाते हैं। फुटकर गीत उनके आशु गीत होते हैं। इसीलिए इन्हें आशु कवि भी कहा जाता है। इन गीतों की विषयवस्तु प्राय व्यंग्यात्मक उलाहना देने वाली और अपसंस्कृति तथा मूल्यहीनता को रेखांकित करने वाली होती है। गायन के विषय की विविधता के समान ही इनके गायन के तौर तरीकों में भी विविधता होती है।
भारत में कई जातियाँ हैं जो भैक्षचर्या पर निर्भर है। भीख माँगना आज हीनकर्म और आपराधिक कृत्य माना जाता है। किसी भी व्यवस्था के प्रतिमान और निश्चित दर्शन तथा सिद्धांत समाप्त हो जाये तो उसका अंत यही होता है। प्राचीन ऋषि मुनियों और शिक्षकों की आजीविका भिक्षा पर ही निर्भर थी। उदर पोषण की समस्या से मुक्त होने के कारण ही भारत में धर्म, दर्शन, अध्यात्म, आयुर्वेद, खगोलशास्त्र में इतना कार्य हो सका होगा। यह कल्पना की जा सकती है कि एक स्थान, क्षेत्र और व्यक्ति से बँधे और व्यवस्था का वेतनभोगी कहने, लिखने, करने की वह आजादी प्राप्त नहीं कर सकता, जो आजादी एक सर्वथा मुक्त और बंधनहीन व्यक्ति को प्राप्त होती है। आज भी स्वतंत्र और पूर्णकालिक मसिजीवी लेखकों, दार्शनिकों को इसके प्रमाण स्वरूप देखा जा सकता है। भिखमंगा होना और भैक्षचर्या का माध्यम होना दोनों में जमीन आसमान का फर्क है। भिक्षा और भिक्षुकों के साक्ष्य रामायण, महाभारत, बौद्धकाल से प्राप्त होते हैं। इस रूप में भिक्षावृत्ति को आदिवृत्ति भी कहा जा सकता है। किन्तु उस काल में भिक्षुकों के निश्चित आदर्श और मानदंड भी थे। भिक्षा उनका व्यवसाय कतई नहीं था। न ही भिक्षा के लिए वे जीते थे। भिक्षा तो उनके उदर पोषण और नैमित्तिक रूप से शरीर को चलाने का माध्यम था। इस माध्यम से वे अपने मत के उदात्त सिद्धांतों का प्रचार प्रसार और शास्त्रार्थ प्राप्त करके लगातार अपने को प्रखर बनाते थे।
जाहिर है घूम-घूमकर नृत्य, संगीत और गीत के माध्यम से सांस्कृतिक आदान-प्रदान भैक्षचर्या के द्वारा ही संभव हुआ होगा। समूचा भक्तिकाल और सूफी मत इसका प्रमाण है। भक्तिकाल के जन को आंदोलित करने में यायावर संत कवि इसीलिए सफल हुए कि वे एक जगह, एक वेतन पर या खेती व्यापार से बंधे नहीं थे। समयान्तर में अपकर्ष और उत्कर्ष, संशोधन और समाहार की प्रक्रिया सनातन है। हरबोलों की भैक्षचर्या बौद्धयुगीन या वर्णाश्रम व्यवस्था के ऋषि मुनियों या सूफी फकीरों से करना तो बिलकुल ही ठीक नहीं है, पर इस तरह की भैक्षचर्या के प्रभाव हरबोलों में खोजे जा सकते हैं। घुमक्कड़ जातियाँ जात-जात, घाट-घाट और बाट-बाट से ग्रहण करके अपने को समृद्ध बनाती हैं। हरबोलों के जीवन और गायन में इसको पढ़ा जा सकता है। हरबोलों को हम भजन कीर्तन और गाथाओं का गायन करती भिक्षुक जाति कहें तो ज्यादा सही होगा। इस तरह की और भी जातियाँ हैं। मसलन नाथ, सपेरे, योगी, बैरागी, भोपा, जोशी आदि।
लोकरंजन, लोकोत्साह और लोककल्याण के साथ-साथ संस्कृति के उदात्त चरित्र को असाक्षर जनता में जीवित रखने का कार्य यही लोग करते हैं। वह जनता जो मंदिर नहीं जाती तथा पुराणों में नहीं बैठती, उन तक हमारे चरित नायकों को ले जाने का कार्य ये द्वार-द्वार और गाँव-गाँव बिना किसी भेदभाव के सब जगह जाकर करते हैं। चर्मकार और कोल जाति से भी भिक्षान्न स्वीकृत करने के कारण इनमें चरमरमंगता और कोलमंगन हरबोला की छाप पड़ गई।
हरबोला वसदेवा जाति का एक प्रकार है। मथुरा वृंदावन और उसके आस-पास इन्हें वसदेवा कहा जाता है। मध्यप्रदेश के बुंदेलखण्ड, मालवा, निमाड़, भुवाना में इन्हें हरबोला कहा जाता है। मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश ही नहीं छत्तीसगढ़ में भी यह जाति निवास करती है। निमाड़ भुवाना क्षेत्र के बडगाँव, माल, जलवां बुजुर्ग, मदनी, डोंगरी, कासीपुरा, भोमाडा इनके मुख्य गाँव हैं। लखनऊ जिले के पुकनाहर गाँव में भी इस जाति के लगभग अस्सी-सौ घर हैं। बैतूल जिले के राणा डोंगरी में भी इस जाति के लोग रहते हैं। झाँसी जिले के कुम्हर्रा गाँव, ललितपुर के बालाबेट, नरसिंगपुर में सिंगपुर मुरानी, सतना के मैहर और नागौद, कटनी भी हरबोलों के निवास स्थान हैं। भारत में कई अर्धघुमक्कड़ जातियाँ हैं। जो आजीविका के लिए घर से दूर जाती हैं, किन्तु जिनका स्थाई घर होता अवश्य है। हरबोला ऐसी ही जाति है।
हरबोलों के क्षेत्रनुसार भिक्षा माँगने और कथागायन के विषय भी बदलते जाते हैं। मालवा, निमाड़, भुवाना अंचल में जब ये जाते हैं तो गाँव के समीप किसी पेड़ के नीचे जमीन पर चादर बिछा देते हैं और पेड़ पर चढ़ जाते हैं। फिर पेड़ के ऊपर से लंबी तान छेड़ते हुए गीत गाते हैं। गीत की स्वर लहरियाँ सुनकर गाँववासी समझ जाते हैं कि गाँव में हरबोला आया है। फिर शुरू हो जाती है बच्चों और बड़ों की कौतूहलभरी भीड़। इसके बाद गाँव के लोग अपनी श्रद्धा अनुसार दान-दक्षिणा लाकर चादर पर डालते जाते हैं। इस दक्षिणा में प्राय: अनाज होता है। जब गाँव की स्त्री या पुरुष अपने घर से सूपड़े या थाली में दान सामग्री चादर पर डालते जाते हैं तो ऊपर से हरबोला उस परिवार के मुखिया का नाम पता कर उस नाम को अपनी राग में जोड़ते हुए सूचना सी देता है। और ...ओ अमुख भाई का घर सऽदान आयो। हरबोला फिर भी पेड़ पर से नहीं उतरता जब तक कि गाँव का प्रधान या बड़ा व्यक्ति आकर उसके मन का सवाल नहीं पूछ लेता। सवाल अर्थात उसकी वह लक्षित इच्छा जिसको लेकर वह पेड़ पर चढ़ा है। यह इच्छा आमतौर पर कुछ नगद राशि, अन्न और वस्त्र की होती है। अन्त में उतारने वाले व्यक्ति से कुछ बातचीत के बाद सौदा हो जाता है और हरबोला पेड़ से नीचे उतर जाता है। हरबोलों की इस परम्परा के पीछे लगता है फकीरों का प्रभाव है। गाँव में आज भी ऐसे फकीर मिल जाते है जो गाँव में लगातार चुपचाप चक्कर लगाते रहते हैं। जब तक कि कोई उनके मन में छुपे हुए सवाल को पूछ नहीं लेता और वह दान उसे प्रदान नहीं कर देता। वैसे ही हरबोले भी किसी समय जोर-जोर से नाम लेकर और उनकी विरुदावलि गाकर उन्हें उठाते थे। इन हरबोलों को "जगा" भी कहा जाता था।
हरबोलों में ऐसा माना जाता है कि सूर्योदय के पश्चात यदि वे भिक्षाटन करेंगे तो उन्हें पाप लगेगा। आज भी मथुरा वृंदावन क्षेत्र में ये लोग वासुदेव का बाना धारणकर लगभग आधी रात को उठकर स्नान करके पाँव में घुँघरू और सिर पर मोरमुकुट धारण करके हाथ में डोली लेकर कथा गायन करते हुए दो-दो लोगों के समूह में निकलते हैं। एक नाचता है एक कथा गायन करता है। गाँव के लोग इनकी आवाज सुनकर इन्हें सूप में रखकर सीधा समान भेंट करते हैं। यह कथा गायन मंजीरा करताल और तंबूरों के साथ होता है। भोर होते-होते यह कथा समाप्त हो जाती है। हरबोलों की कथा गायन और भिक्षा माँगने के तरीके क्षेत्र और अंचल के अनुसार बदलते हैं। राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश के गाँव में इसे देखा जा सकता है।
जब ये लोग महाराष्ट्र में जाते हैं तो पेड़ पर चढ़कर गीत नहीं गाते हैं। बल्कि तुमढ़ी करताल बजाते हुए मराठा गौरव से संबंधित होलकर महाराज की गाथा गाते हैं। मध्यप्रदेश के मालवांचल के इन्दौर, देवास, शाजापुर, सारंगपुर में भी इनकी कथा गायन का विषय यही होता है। किन्तु राजस्थान के चित्तौडगढ़, बूंदी, कोटा के गाँवों में जब हरबोला डेरा डालते हैं तो पहले से ही गाँव के मुखिया का नाम पता कर लेते हैं और सुबह लगभग चार बजे पेड़ पर चढ़ जाते हैं फिर वहाँ से गाँव के प्रमुख लोगों के नाम लेकर दोहे और साखिया जोर-जोर से गाते है। सुबह गाँव के लोग उसकी इच्छा पूछकर उसे पेड़ पर से उतार लेते हैं। राजस्थान में पेड़ के नीचे चादर नहीं बिछाई जाती। जब गुजरात के गाँवों में हरबोला लोग जाते हैं तो राजा हरिचंद्र की कथा गाते हैं। नरसिंहगढ़ क्षेत्र में उस क्षेत्र के प्रतापी राजा चैनसिंग की विरुदावली गाई जाती है।
वक्त के साथ हरबोलों के माँगने और गायन के तरीके भी बदले हैं। अब हरबोले रेलों में, बसों में, बाजारों में फिल्मी गीतों को जोड़कर गाते हुए मिल जाते हैं। नई उम्र के लड़कों को पुरानी गाथाओं का कोई इल्म नहीं है। वैश्वीकरण की रीतियों नीतियों के पश्चात ग्रामीण जनता के मनोरंजन और आस्था के केन्द्र बदल रहे हैं। गाँव में अब कई बार युवा हरबोलों को भिक्षाटन करते देखकर कई लोग इनसे दुव्र्यवहार भी कर देते हैं। हरबोलों के मन की यह पीड़ा अब ज्यादा सुनने को मिलती है।
हरबोले पिछड़ी जाति की सूची में शामिल हैं। उनमें शिक्षा की दर लगभग नहीं के समान है। महिला शिक्षा तो शून्य है ही। एक हरबोला लगभग दस-बारह वर्ष की उम्र से भिक्षाटन पर निकलता है और जब तक उसका स्वास्थ्य ठीक रहता है वह भिक्षाटन ही करता है। पढ़ने का उसे अवकाश ही नहीं होता। इतनी यात्राओं, इतने वैविध्यपूर्ण जीवन और शैली तथा क्षमताओं के बाद भी पीढ़ियों से यह जाति सिर्फ दो जून की रोटी ही जुटा पाती है। महल अटारी तो दूर सम्मान की जिन्दगी भी बसर नहीं कर पाती। लोकधर्मी कई जातियों की उत्तर आधुनिक भारत में यही दुर्गति है। हरबोला भी लगभग अस्वास्थ्यकर और लगभग अमानवीय स्थितियों में जी रही एक जाति है। आज इस जाति के लोगों के मन में भी आर्थिक उन्नति और सम्मानजनक जीवन जीने की लालसा उत्पन्न हो रही है। वे काम छोड़ना भी चाहते हैं पर आजीविका की चिन्ता उन्हें पुनः इसी ओर धकेलती है।

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