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सिनेमा की मेरी की दुनिया
01-May-2017 02:02 PM 2220     

एक बार मैं ऑफिस में अपने हमवतन से "मोगाम्बो खुश हुआ" संवाद पर कुछ बात कर रही थी। तभी मेरे नैरोबी में रहने वाले दोस्त ने मिस्टर इंडिया का नाम लिया। मुझे आश्चर्यचकित देख कर उन्होंने बताया कि अफ्रीका में हिंदुस्तानी सिनेमा इतना प्रचलित है कि हर हिंदी फिल्म व उनके गाने वहाँ की भाषा में अनूदित किए जाते हैं। यही हाल मलेशिया में भी है।
सिनेमा का शौक किसे नहीं होता? भारत में और किसी चीज़ के लिए वक़्त मिले या न मिले, सिनेमा के लिए हर एक को समय मिल ही जाता है। पहले हर शुक्रवार नयी फिल्म के पोस्टर चौराहे के एक कोने में लग जाते थे। फिर हर इतवार टीवी पर फिल्म आने पर शाम के पाँच बजे से पूर्व खाना बनाने का चलन शुरू हो गया। बीच में सिनेमा जाना कम हो गया था। लेकिन मल्टीप्लेक्स के नए दौर में कम बजट की फिल्मों को भी अपनी जगह बनाने का मौका मिल गया।
जहाँ हिन्दुस्तान में फिल्मों को देखने के हज़ारों तरीके हैं, विदेश पहुंचकर  इसी सिनेमा की कमी खलने लगाती है। 2004 में मुझे अमेरिका जाने का मौका मिला। वहाँ जल्दी ही अंग्रेज़ियत से बोरियत होने लगी और हिंदी शब्द सुनने को तरस गयी। टीवी पर हर इतवार हिंदी का एक घंटे का कार्यक्रम आता था जिसका मुझे बेताबी से इंतज़ार रहता था। तीन इतवार निकलते समझ आया की दस में से आठ गाने शाहरुख खान के ही होते हैं। पुराने संगीत से कोई मतलब नहीं। हताश होकर इंटरनेट पर गाने डाउनलोड करके काम चलाया। कुछ साल बाद हम ऑस्ट्रेलिया आ गए। हिंदुस्तानी दुकानों पर अक्सर ही 50 डॉलर का सामान लेने पर एक पायरेटेड डीवीडी मिल जाती। यहां भी खान भाइयों का पलड़ा भरी रहता। आखिर हमें ग्लोबल सिनेमा की ओर अग्रसर होना ही पड़ा। अब हमारे सामने मानो सोने की खान खुल गयी। बाहर की फिल्मों को देखने से दो चीज़ें सामने आयी।
पहली यह कि हम सिर्फ हिंदुस्तानी नहीं एशियाई हैं। याने की हिन्दुस्तान, पाकिस्तान, श्रीलंका, फिजी, मॉरिशस, भूटान इत्यादि के बीच में कोई फ़र्क़ नहीं है। दूसरी बात यह कि देश कोई भी हो परेशानियां सभी की एक जैसी हैं।
अगर आप ओमपुरी की "ईस्ट इज़ ईस्ट" देखें तो आपको मेरी बात समझ में आएगी। फिल्म का नायक पाकिस्तानी है जिसने अंग्रेज औरत से शादी की है। हिंदुस्तान को गाली देने का कोई भी मौका वो नहीं छोड़ता, लेकिन सिनेमा में "चौदहवीं का चाँद" देखता है और कार में "पाकीज़ा" के गाने बजाता है। विदेश में पैदा हुए और पले-बढ़े बच्चों को वो पाकिस्तानी बनाने की नाकामयाब कोशिश में लगा रहता है।
"ईस्ट इज़ ईस्ट" की सफलता के बाद एक और फिल्म आयी "100 फुट जर्नी" जिसमें ओमपुरी एक बार फिर नज़र आये हेलेन मिर्रिन के साथ। ख़ास बात यह थी कि इस फिल्म के संवाद हिंदी, अँग्रेज़ी और फ्रेंच में थे। कहीं पर भी संवादों को अनुवाद नहीं किया गया। जब हीरो हिंदी में बड़बड़ाया तो हॉल में चंद हिंदी समझने वाले ज़ोर ज़ोर से हँसे। फ्रेंच संवादों पे फ़्रांसिसी हँसे। और अँग्रेज़ी संवादों पर सभी हँसे। गौर करने वाली बात ये है के सभी ने एक अच्छे सिनेमा को सराहा।
एसबीएस चैनल पर दूसरे देशों का सिनेमा दिखाया जाता है। यहाँ मुझे एक पाकिस्तान-नॉर्वेजियन फिल्म मिली जिसका नाम है "इज़्ज़त"। ये नॉर्वे में बसे पाकिस्तानियों की कहानी है, जिसमें पाकिस्तानी परिवार के बच्चे अपनी गरीबी से उठने के लिए गलत राह पर चल पड़ते हैं। लेकिन अपने वतन में न रहकर भी अपने संस्कार भूल नहीं पाते। फिल्म भले ही पाकिस्तान के निवासियों पर है लेकिन उसके विचार हम सब पर लागू होते हैं।
एक इसरायली फिल्म देखी "दि मैचमेकर"। फिल्म इजराइल में बसे लोगों के हालात पर थी लेकिन उसमें एक दृश्य था जहाँ हीरो एक फिल्म देखने जाता है। वो फिल्म है- दिल देके देखो और हीरो उसके हिंदी गानों पर झूम रहा है।
कहने का मतलब यह है कि हिंदी सिनेमा कि पहुँच केवल हिन्दुस्तानियों तक सीमित नहीं है। आज कल लोग किसी भी अच्छे सिनेमा को सराहते हैं। भाषा अब कोई रुकावट नहीं है। न ही सिनेमा में कोई राजनीति है।
यहाँ हर साल एक फिल्म फेस्टिवल पर्थ इंटरनेशनल आर्ट फेस्टिवल होता है जिसमें देश विदेश के सिनेमा व् कलाकारों को एक मंच प्रदान किया जाता है। यहां हमने मांगणियार बच्चों का गाना सुना, ईरान की ऑस्कर अवार्ड से पुरुस्कृत "ए सेपरेशन", नेपाली डाक्यूमेंट्री "शेरपा" और फ्रेंच फिल्म "धीपन" जो एल.टी.टी.ई. के एक सदस्य के ऊपर है, देखी। हर फिल्म में स्थानीय ऑस्ट्रेलियाई लोग भरे थे। देसी दर्शक मुट्ठी भर भी नहीं थे। हमें अपना सिनेमा बहुत प्रिय है, लेकिन नज़र उठा कर देखें तो बहुत कुछ है सिनेमा जगत में जिसे हमने जाना ही नहीं है। हम अगर रुचि लें तो ईरान, एशियाई, ब्रितानी और अमरीकी सिनेमा में बहुत कुछ है देखने के लिए।
हिंदुस्तान से जुड़ी हुयी नयी फिल्म आयी है "लायन"। यह वास्तविक घटनाओं पर बनी फिल्म है। आधी फिल्म हिंदी में है। पहले मुझे लगा था कि एक और फिल्म हिन्दुस्तान की गरीबी को दर्शाएगी। लेकिन सिनेमा हॉल में लोगों को रोते देख कर समझ आया कि उस बच्चे का दर्द हर एक की समझ में आया था। देव पटेल आजकल सभी का हीरो है।
देव पटेल से याद आया। दो साल पहले मेरी ऑस्ट्रेलियाई दोस्तों ने गश खाकर मुझे "मोस्ट एक्सोटिक मेरीगोल्ड होटल" (ग्दृद्मद्य कन्दृद्यत्ड़ ग्ठ्ठद्धन्र्ढ़दृथ्ड्ड क्तदृद्यड्ढथ्) फिल्म को देखने को कहा। मुझे अंग्रेज़ों द्वारा हिंदुस्तानी फिल्मों से बहुत खीज उठती है। पहले तो सितार बजता रहता है। भाई हिंदुस्तान में सितार के अलावा हारमोनियम, तबला, सारंगी इत्यादि और भी वाद्ययन्त्र हैं। पंडित रविशंकर के बाद और भी संगीतज्ञ आये हैं। लेकिन अंग्रेजी फिल्मों में हिंदुस्तान दिखाएंगे तो सितार बजा कर। साथ में दिखाएंगे, आपने सही फ़रमाया, सड़क पे बैठी गाय, गाड़ियों का शोर, नंगे साधु, इत्यादि। मुझे मेरीगोल्ड फिल्म शायद इसी वजह से उतनी पसंद नहीं आयी। लेकिन मेरे दोस्तों को इतनी अच्छी लगी कि उन्होंने हिंदुस्तान के टिकट कटा लिए जयपुर, जोधपुर घूमने के लिए। फिल्म भले ही ठीक-ठाक हो, लेकिन भारतीय पर्यटन का ज़रूर भला कर गयी।
जो लोग अच्छी फिल्म देखने के शौक़ीन होते हैं वो बढ़िया फिल्म ढून्ढ ही निकाल लेते हैं। मुझे अच्छे सिनेमा का बहुत शौक है। मैं उपशीर्षक (द्मद्वडद्यत्द्यथ्ड्ढद्म) के जरिये हर भाषा की फिल्म देखती हूँ। अब आदत ऐसी हो गयी है कि उपशीर्षक फिल्म में कोई विघ्न पैदा नहीं करते। इनके सहारे मैंने तमिल, कन्नड़, मलयालम व् बंगाली सिनेमा भी देखें हैं। इनके अलावा मैं चीनी, ईरानी, इसरायली और किसी भी भाषा की फिल्मों में भी रुचि रखती हूँ।
इजराइल कि फिल्म "दि बैंड विजिट" बहुत ही सादगी से बनी, एक मिस्र बैंड का किस्सा है जो कि इजराइल में गलत शहर में पहुँच जाता है। दोनों देशों के तनाव को देखते हुए यह एक तनाव भरी स्थिति है। लेकिन राजनीति से ऊपर उठकर एक मानवता का उदाहरण देने वाली ये बहुत ही आरामदेह और दिल को छू देने वाली फिल्म है।
इजराइल से ही एक और फिल्म है "नूडल्स"। यह कहानी है एक इसरायली एयर होस्टेस की जिसके पास एक चीनी अवैध प्रवासी का बच्चा रह जाता है। भाषा की बाधा की वजह से कैसे सब लोग बच्चे के माँ-बाप का पता लगाते हैं और कैसे उसे अपने परिवार से मिलाते हैं। ये बहुत ही मर्मस्पर्शी कहानी है। बच्चा चीनी है इसीलिए उसे नूडल्स कह कर बुलाते हैं।
कुछ फिल्मे होती हैं जो दिल को छू जाती हैं और आँख में आंसू आ जाते हैं। कुछ फिल्में ऐसी भी होती हैं जो बहुत ही सहजता से, हँसी-मज़ाक के बीच में आपको ज़िन्दगी का एक सबक सिखा जाती हैं। मैं ऐसी फिल्मों की तलाश में रहती हूँ और कोशिश करती हूँ कि उनके बारे में लोगों को बताऊँ। फेसबुक पर मैंने एक पृष्ठ बनाया है "फॉर दा लव ऑफ़ सिनेमा" (क़दृद्ध द्यण्ड्ढ थ्दृध्ड्ढ दृढ क्त्दड्ढथ्र्ठ्ठ)। इसमें मैंने ख़ास सिनेमा के बारे में लिखा है। अगर आप को रुचि हो तो ज़रूर देखिएगा।

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