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सिआटेल में उदासीन मन-मयूर
01-Jul-2016 12:00 AM 2604     

सिआटेल आने के पहले इस नगर के सौन्दर्य के विषय में सुन रखा था। सिआटेल में पहुंचते ही यहाँ की हरीतिमा ने मुग्ध कर दिया। मेरी कल्पना से भी अधिक सुन्दर है यह नगर। ऐसा लगता है मानो विधाता ने हरे रंग की कूची से पूरे नगर को हरे रंग में रंग दिया है। यहाँ आने के पूर्व मेरे बेटे ने कहा था, इस नगर में सब कुछ बहुत अच्छा है, पर यहाँ की लंबे समय तक चलती रहने वाली बरसात परेशान करती है। मेरी प्रिय ऋतु वर्षा भी भला किसी की परेशानी का कारण बन सकती है? इस बात की वास्तविकता तो यहाँ रहने पर ही पता लग सकेगी।
सिआटेल को हिम आच्छादित पर्वत, नीला सागर और यहाँ की अनुपम हरीतिमा इसे दर्शनीय बना देती है। गर्व से सिर उठाए ऊंचे खड़े सदाबहार देवदार के वृक्ष, हरी तराशी हुई घास से ढंके स्थलीय भाग का श्रेय सियाटेल की वर्षा को जाता है। यहाँ की हरियाली इस कहावत को चरितार्थ करने में समर्थ है कि सावन के अंधे को हरा-हरा ही सूझता है। यहाँ मानो हमेशा ही सावन का मौसम रहता है, पर क्या यहाँ की वर्षा ऋतु भारत जैसी ही सुहानी होती है?
सिआटेल में शीत ऋतु वर्षा का मौसम होता है। वर्ष के लगभग आठ-नौ माह तक लगभग प्रतिदिन या एकाध दिन छोड़ कर वर्षा होती रहती है। शीतकालीन मौसम में जब तापक्रम बहुत कम होता है, उस सिहरा देने वाली ठंडक में बरसती बूंदों में भींगना दुस्साहस ही कहा जाएगा। इस वर्षा में भीगने से तो बीमार होने का ही भय होता है। यहाँ की लंबे समय तक होते रहने वाली वर्षा के कारण जैकेट में हुड या छाता साथ रखना आवशयक हो जाता है। अपनी यादों में भारत की मनभावन वर्षा ऋतु जिसकी चाहत हमेशा बनी रहती थी, उसके स्थान पर यहाँ की लंबी चलने वाली वर्षा के विषय में सोचने को विवश हो जाती हूँ, काश इतनी वर्षा न होती तो अच्छा होता। यहां गरमी का मौसम बहुत छोटा होता है, उसमें भी कुछेक दिनों में ही साधारण उच्च तापक्रम होता है। अन्यथा यहाँ सही अर्थों में गरमी का मौसम नहीं आता। दो-चार दिनों की धूप के बाद वर्षा हो जाती है, पर इस वर्षा में भीगने की कल्पना ही सपना है।
याद आता है कि भारत में सावन के आते ही वर्षा की रिमझिम बरसती बूंदों में भीग कर मन-मयूर नाच उठता था, पर यहाँ मुझे सावन के गीत याद नहीं आते, ना वन में मोर नाचता है, ना ही मेरा मन-मयूर। वैसे यहाँ घर के भीतर बैठ कर खिड़की से बाहर हो रही वर्षा का सौन्दर्य देखना अच्छा लग सकता है, पर बूंदों में तन-मन भिगोने में अंतर होना तो स्वाभाविक ही है। अपनी टीचर के कथन की सत्यता यहाँ स्पष्ट है। एक बार बचपन में उनसे पूछा था-
"हम सबको वर्षा ऋतु इतनी प्यारी लगती है तो वर्षा पूरे साल तक क्यों नहीं होती रहती?' उन्होंने प्यार से कहा था, "एकरसता में आनंद नही होता, परिवर्तन हमेशा आनंददायी होता है। अगर पूरे वर्ष वर्षा होती रहे तो वो आनद कहाँ से मिलेगा जो कड़ी गरमी के बाद रिमझिम बरसती बूंदों में भीगने से मिलता है?'
सिआटेल की लंबी ठंडी वर्षा ऋतु की एकरसता से मेरा मन उदासीन-सा हो गया है। वर्षा में कोई नवीनता नहीं दिखती, यह तो रोज़ की बात है। इसके बावजूद यह सत्य है कि यहाँ की प्रकृति वर्षा के प्रति अवशय आभारी है, जिसने सिआटेल को इतना सुन्दर हरीतिमा का उपहार दिया है, पर मुझे तो वो वर्षा याद आती है, जो अचानक प्रकृति में परिवर्तन ले आती थी। वर्षा में नहाई सूखी माटी सोंधी सुगंध बिखराती थी। निशचय ही परिवर्तन ही जीवन को आनादित करता है, एकरसता नही।
टेलीविजन पर किसी फिल्म का गीत चल रहा था- "रिमझिम के तराने ले कर आई बरसात।' गीत की यह पंक्ति मुझे यहाँ से सहस्त्रों मील दूर भारत बहा ले गई। भारत की वर्षा ऋतु के साथ न जाने कितनी मीठी यादें जुड़ी हुई हैं। जेठ की असह्र गरमी के बाद जब काले कजरारे मेघ अपने साथ जीवन दायिनी वरखा रानी को लाते तो जैसे अचानक सब कुछ बदल जाता। बारिश से धुली धरती, पेड़-पौधे और सारी प्रकृति ही धानी चूनर ओढ़ दर्प से मुस्कुरा उठती। वन में पंख खोले मयूर नृत्य कर उठता और किसान को तो जैसे जीवन मिल जाता। पक्षिओं के कलरव में मीठी तान सुनाई पड़ती- "आई बरखा-बहार, मुरला करत पुकार, झूमे डार-डार पात ओढ़े धानी चुनरी।'
भारत में जुलाई माह या श्रावण से शुरू होकर वर्षा ऋतु सितम्बर तक चलती है। काले मेघों के बीच चमकती विद्युत् लड़ियों का भी अपना अनोखा सौन्दर्य होता है। इस ऋतु में बच्चे ही नहीं वृद्ध तक आनंदित हो उठते हैं। रिमझिम बरसती बूँदें जैसे धरती का ही नहीं मन का भी ताप हर लेती हैं। मल्हार की तानों में वर्षा साकार हो उठती है। वर्षा ऋतु में अनेकों मन भावन पर्व आते हैं, तीज, रक्षा बंधन, जन्माष्टमी, गणेश चतुर्थी इस ऋतु के सौन्दर्य और महत्त्व की अभिवृद्धि करते हैं। बड़ी धूमधाम से मनाए गए ये पर्व जन मानस में संचित हो कर आगामी वर्ष की प्रतीक्षा करने लगते हैं। ये सभी पर्व बहुत महत्वपूर्ण हैं, पर मेरी स्मृति में सावन की तीज आज तक सजीव है।
तीज तो लड़कियों का प्रिय त्योहार होता है, जब नए कपड़े पहिन, वे अपने भाग्य पर इतराती हैं। सावन की तीज पर तो बस उनका ही अधिकार होता है। उस दिन उनके महत्त्व के आगे लड़के फीके पड़ जाते हैं। उनके लिए ही तो पेड़ों पर झूले सजाए जाते, इन झूलों की अलग ही छटा होती थी। हथेलियों पर सुर्ख लाल मेंहंदी, कलाइयों में हरे कांच की चूड़ियाँ पहिने लड़कियां और युवतियां झूले की ऊंची पेंग बढ़ा कर आकाश छूने की होड़ लगातीं थी। मीठे गीतों से वातावरण गुंजरित हो उठता। रिमझिम बरसती बूँदें उनके तन-मन भिगो जातीं- घिर आई पुरवैया की कारी बदरी, डाले डाल पर हिंडोला, / झूलें गोरियाँ सब झूला, बाजे ढोल और मंजीरा जब गाएं कजरी।
सावन को मीठे गीतों, पर्वों और प्रेमियों के मिलन की ऋतु कहना अतिशयोक्ति नहीं है। प्रेमी युगल सावन के रंग में रंग कर एक-दूसरे में खो जाने को व्यग्र हो जाते हैं। वर्षा ऋतु में राधा और कृष्ण को याद किया जाना स्वाभाविक ही है। ये दोनों प्रेम के प्रतीक हैं। झूले पर सारी सखियाँ झूल रही हैं, पर मानिनी राधा अपने कन्हैया से नाराज़ हैं।
सब सखियाँ मिल झूला झूलें, रुत सावन की आई,
झूलें राधा गोरी ना, कान्हा झुलाने काहे आए ना?
वर्षा ऋतु में प्रेमी-प्रेमिका का अलगाव विरहाग्नि को और भी तेज़ कर देता है। विरहिणी नायिका के कन्त परदेस गए हुए हैं, उनकी याद में नायिका रातों में सो नहीं पाती, काश कोई उसका संदेसा उन तक पहुंचा देता-
कन्त धाए परदेस, कोई कह दे संदेस,
सूनी सेज ना सुहाए निस आए याद री।
काले मेघ घिरे हुए हैं, वर्षा होने वाली है, इस मौसम में भी कन्हैया के विरह में व्याकुल गोपी अपने कान्हा से मिलने जा रही है। अकेली जा रही ननद को उसकी भाभी रोकती है-
कैसे खेलन जैहो सावन में कजरिया,
बदरिया घेरी आई ननदी,
तुम तो जात हो अकेली कोई संग ना सहेली,
कान्हा छेक लैहैं तुम्हरी डगरियाा बदरिया...
पर भला ननदी रुकने वाली है? उसे तो अपने कान्हा के पास जाना ही है। ऐसे मीठे गीत वर्षा ऋतु को और अधिक मनमोहक बना जाते हैं।
सावन के स्वागत में नदियों में भी जैसे प्यार का उफान आ जाता है। खुशी में अपनी सीमा तोड़ देने के दुष्परिणाम भले ही जन-धन की हानि कर देते हैं, पर मुझे लगता है, सावन उन्हें भी दीवाना बना देता है। पानी से भरे तालाब और गढों को भी नवजीवन मिल जाता है। कागज़ की नावें तैराते बच्चों की खुशी देखने लायक होती है। बारिश में नहाते बच्चों को पानी में ना भीगने के लिए माँ की डांट की चिंता कहाँ रहती है? वर्षा ऋतु के ये सारे दृशय आज भी मानस में कल की तरह से सजीव हैं।
मुझे याद है, बचपन में सोचती थी, वर्षा ऋतु बस वर्ष में कुछ ही महीनों को क्यों आती है, कितना अच्छा होता अगर यह हमेशा रहती। इसका उत्तर मेरी टीचर ने सरल शब्दों में समझाया था। उन्होंने बताया था कि भारत में वर्षा का वितरण असमान होता है। कुछ भागों में घनी वर्षा होती है और कुछ भागों में वर्षा कम या शून्यप्राय होती है। स्थल की अपेक्षा सागर देर में गर्म और देर में ठंडा होता है, इस लिए जब भारत के उत्तर पशिचम में अधिक तापक्रम होने के कारण हवा का दबाव निम्न हो जाता है, तो इस निम्न दबाव की जगह लेने के लिए सागर से वाष्प भरी हवाएं स्थल की ऑर आती हैं। पहाड़ों से टकरा कर या बहुत ऊंचाई पर जा कर ठंडी होने पर हवा में वर्तमान आद्र्रता वर्षा के रूप में धरती पर बरसती हैं। भारत में अरब सागर तथा बंगाल की खाड़ी से आने वाली मानसून हवाओं से वर्षा होती है।
अचानक खिड़की पर गिरती बूंदें मुझे मेरी यादों के भारत से खींच कर सिआटेल ले आर्इं। खिड़की को धो रही, ये नन्हीं बूँदें भी तो जीवन दायिनी हैं। नहीं, मुझे एकरसता में भी सौन्दर्य खोज निकालना है। अपनी सोच पर मैं मुस्कुरा उठी।

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