ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
शुभ्रा ओझा
शुभ्रा ओझा
गोरखपुर में जन्म। जीव विज्ञान में परास्नातक की उपाधि प्राप्त की। हिंदी साहित्य में लगाव के अलावा साहित्य के विविध आयामों की खोज में संलग्न। कविताएँ लिखती हैं तथा रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित।

ज्ञान बरास्ते चाय-पकौड़े
मेरे पति के एक निहायत शरीफ दोस्त हैं। निहायत शरीफ मैंने इसलिए कहा क्योंकि ऐसा उन्हें स्वयं लगता है और दूसरों को भी यही लगता है कि जब भगवान उन्हें बना रहे थे तो शराफत का पूरा डिब्बा ही खाली हो गया था। उन्हें देखने से ही लगता है कि शराफत उनमें कूट-क
दूर तुझसे नहीं हूँ माँ
अमेरिका एक भागती दौड़ती दुनिया, अपने में मस्त, किसी के लिए ना रुकने वाली, नशे में धुत लोग, यहाँ की सड़कों पर अश्लीलता में लिप्त युवा, विशाल गगनचुंबी इमारतें और एक ऐसी जगह जहाँ पहुँचने के बाद आपको कुछ करने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती, एक सुनहरा भविष्य आ
फिल्में क्यों बनाई जाएँ
अपने शुरूआती दौर से ही सिनेमा आम आदमी को सपनों की दुनिया में ले जाने का सस्ता, सुलभ साधन रहा है। मनोरंजन के अन्य साधनों की तुलना में सिनेमा अधिक लोकप्रिय भी है। भारत में सिनेमा के आरम्भिक काल में धार्मिक कथा-चित्रों का अधिक निर्माण किया गया। भारती
कविता एक दो
एकदेख रहे है नींद का रास्ता एकटकचौखट पर नज़रें टिका करवो दबे पाँव चली गयीमुझसे नज़रें बचा करजब हम लगे खोजनेनींद को इधर-उधरवो बैठी थी आपके नयनों में छुपकर!दोवो खेतों के मुंडेर पर
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