ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
श्रेष्ठता सिद्ध करनी होती है
01-Jul-2018 05:53 AM 521     

कुत्ते की दुम को बारह वर्ष तक एक नली में रख तत्पश्चात सीधा हुआ देखने की लालसा रखने वाले गुमनाम वैज्ञानिक की शोध कुत्तों की अपेक्षा मनुष्यों पर अधिक प्रभावी सिद्ध हुई। अनपढ़ व सर्वोच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी नैसर्गिक स्वभाव किसी भी व्यक्ति का कभी नहीं बदला करता क्योंकि यह जेनेटिक कैरेक्टर होता है और ज्योतिषी भी कुंडली देखते ही व्यक्ति का स्वभाव बता देते हैं। चरित्र व्यक्ति का संस्कार आधारित होता है जिसकी नींव माता-पिता रखते हैं और इसका पोषण शिक्षक एवं आध्यात्म ज्ञान करता है अतः यह एक निर्माण प्रक्रिया है जबकि आचरण व्यक्ति के स्वभाव और चरित्र का मिश्रण प्रदर्शन है। यानि जो दिखता है वह आचरण होता है और व्यक्ति धारण करता है वह चरित्र होता है। जिसका आचरण वंदनीय होता है उसका चरित्र भी वंदनीय हो जाता है।
अगर देश के सवा सौ करोड़ लोग प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष दोनों ही प्रकार के टैक्स की चोरी में लिप्त हैं तो इनसे वसूले गये टैक्सों से देश पर शासन करने वालों को मुफ्त में नाना प्रकार की आलीशान लक्जरी सुख-सुविधा भोगने का भी कोई अधिकार नहीं बनता है। लहरी प्रहरी सेवक रक्षक कोई भी संज्ञा देकर अपने को सम्मानित करें लेकिन किसी भी नामधारी कामधारी का स्वभाव चरित्र एवं आचरण इन उपनामों के साथ न्याय नहीं करता है। जनता के दिये टैक्स का एक नया पैसा भी अपने निजी स्वार्थ में बर्बाद करने वाला शासक ईमानदार कैसे कहा जा सकता है? म्यान का रंग हरा हो या भगवा और तलवार की हत्थी चन्दन की हो यह स्वर्ण की लेकिन तलवार अपने स्वभाव से ही जानी जाती है लेकिन जीभ तो तलवार से अधिक बलवान होती है, क्योंकि इसके पास ईश्वर भजन करने और गाली देने दोनों का ही विकल्प हर समय रहता है। एक नागरिक के किये गये कर्म का केवल उसके परिवार, कुल, गोत्र पर ही असर नहीं पड़ता है, बल्कि किसी न किसी अंश तक पूरा देश प्रभावित होता है और अगर नागरिक शासक की भूमिका में हो तो उसको एक मानक, एक आदर्श, एक मूल्य स्थापित करना होता है। केवल दूसरों को गाली देने से कोई श्रेष्ठ सिद्ध नहीं हो जाता।
धर्म विषय भी अब राजनीतिक अखाड़े की भेंट चढ़ चुका है। अब विशुद्ध कर्मकांड ही पूर्ण धर्म है या फिर धर्म का मात्र एक अंग। बड़े-बड़े कथाकथित धर्मात्मा कर्मात्मा पुण्यात्मा रात दिन लगातार नॉनस्टॉप मनोरंजन न्यूज और धार्मिक टीवी चैनलों पर धर्म की व्याख्या करते देखे जाते हैं और धर्म को धारण करने का विषय बताते हैं लेकिन धर्म क्या है, इसका उनके पास भी कोई उत्तर नहीं। गीता, भागवत, रामायण, शिवपुराण और भी ना जाने कितने धर्मग्रन्थ साप्ताहिक प्रवचन श्रंखलायें टीवी पर प्रसारित होती रहती हैं और लोग साक्षात् सुनने में भी जाते हैं और कथायोजन पर लाखों-करोड़ों का चंदा धर्म के नाम पर इकठ्ठा होता है और धर्म की व्याख्या करने वाला कलियुग का व्यासवतार बना बाबाजी भी बाकायदा अपना पूरा पारिश्रमिक वसूलता है और लोगों के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है, लेकिन उसके स्वयं का कल्याण का मार्ग धर्मार्थ कथावाचन ही है, वह जो कहता है उसे स्वयं नहीं करेगा, बल्कि जनता से अपेक्षा करेगा।
पूर्णमासी को लोग सत्यनारायण की कथा कराते हैं और पुरोहित एक घंटा कथा सुनाता है और डरायेगा कि अमुक व्यक्ति ने कथा नहीं कराई तो उसका अमुक-अमुक नुकसान हुआ और जिसने कथा कराई उसका इतना फायदा हुआ। लेकिन कथा क्या है, यह न वक्ता को पता चलता है और न श्रोता को ही। अब विषय फिर गंभीर होता है कि आखिरकार कथा है क्या? धर्म है क्या? अगर साधारण एक शब्द में धर्म की व्याख्या करने को कहा जाय तो बाबाओं के चश्मे उतर जायेंगे। क्योंकि धर्म की व्याख्या करते ही उनको आत्मग्लानि होगी, कारण कि उनका आचरण धर्म विरुद्ध सापेक्ष स्पष्ट दिखता है। किस वस्तु को धारण क्या करना है और ऐसी कौन-सी वस्तु है जो हमारे पास नहीं है और हमें बाहर से लाकर धारण करनी है। एक शब्द में धर्म की परिभाषा केवल "सत्य" से पूर्ण से हो जाती है यानि केवल एकमात्र शब्द "सत्य" धर्म और कर्म है। नवजात शिशु जन्म से ही धर्म को धारण किये पैदा होता है यानि वह सत्य के अतिरिक्त और कुछ जानता ही नहीं और जैसे जैसे बड़ा होता जाता है संसार के संपर्क में आता जाता है उसका धर्म अधर्म से विस्थापित होता जाता है। झूठ बोलना वह जानता नहीं बल्कि उसको सिखाया जाता है यानि असत्य ही अधर्म है जो अब वह धारण करने लगता है। शांति की खोज में लगे लोग स्वयं को साधु-सन्यासी बाबा-संत होने का दावा करने लगते हैं लेकिन सबसे अधिक झूठ यही बोलते हैं। अपने को श्रेष्ठ कहते हैं जबकि यही सबसे निम्न कोटि के होते हैं। कारण कि श्रोताओं को शांति का मार्ग बताने वाले स्वयं दिनोंदिन अशांति की दलदल में धंसते जा रहे हैं। इतना झूठ बोलते हैं कि झूठ भी शर्मिंदा हो जाय, क्योंकि इन्होंने अगर "सत्य" को जीवन में धारण किया होता तो प्रवचन का धंधा कब का बंद कर दिया होता। छोटा परिवार त्यागकर सन्यासी बाबा साधु हुआ धर्मात्मा पुण्यात्मा आश्रम मठ मंदिर न्यास बनाकर एक बड़ा परिवार बना लेता है और इस बड़ी संस्था को चलाने हेतु नैसर्गिक आवश्यकताएं पूर्ति हेतु वह असत्य अधर्म पाप का सहारा लेता है क्योंकि वह इस संस्था का मठाधीश महंत है मुखिया है, बिजली पानी अन्न पूजा सामग्री की व्यवस्था संसार के दिये दान पर निर्भर रहती है और दान की मुख्यता महानता आवश्यकता की आड़ में ठगने का धंधा चलता है। उस संत सन्यासी को स्वयं धर्म यानि सत्य यानि भगवान् पर विश्वास ही नहीं और अगर हुआ होता तो छोटा परिवार त्यागकर बड़ा संसार बड़ा परिवार बड़ा कुटुंब न रचता।
सत्य ही धर्म है और इसे ही धारण करना होता है और इस सत्य को धारण करने के बाद व्यक्ति का व्यवहार आचरण के रूप में प्रदर्शित होता है जिसको संसार देखता है। मैंने पहले ही लिखा कि शिशु नैसर्गिक स्वरूप से ही सत्य को धारण किये पैदा होता है और शनैः शनैः असत्य को व्यव्हार में लाकर धर्म को त्यागता जाता है और इसी सत्य को बाद में बार-बार धारण करने के लिए धर्म की स्थापना करनी होती है। यह क्रमशः प्रक्रिया है और अभ्यास से ही सफल होगी। श्रेष्ठ वही जो सत्य को निरंतर धारण करे और उसके व्यवहार यानि आचरण में भी सत्य ही प्रदर्शित होवे तब ही जाकर वह संसार के कल्याण की बात कर सकता है अन्यथा धोखे में खड़ा वह वक्ता श्रोताओं को भी धोखे के गर्त में डुबोने के लिये सक्षम है। श्रेष्ठ वक्ता वही होता है जो स्वयं उस विषय को अपने जीवन में धारण कर चुका होता है यानि अगर वह उपदेशक है तो उसको श्रेष्ठता सिद्ध करनी ही होगी। साधु, सन्यासी, संत कोई डिग्री या उपाधि नहीं जो किसी यूनिवर्सिटी या संस्था से खरीद ली जाय बल्कि संत वही जो सत्य को धारण कर हर समय अपने आचरण में भी सत्य का अनुपालन करे।
"सत्यं शिवम् सुन्दरं" अर्थात सत्य ही सुंदर और सत्य ही शिव है। "सत्य" एक ऐसा तराजू है जो मनुष्य को स्वयं को अपना वजन तोलने और अपनी वास्तविकता बताने में सक्षम एवं समर्थ है और देर है तो बस अपना आंकलन करने भर में। और जिस दिन आंकलन कर लिया तो अपने द्वारा किये गये सारे पाप और पुण्य का भी आंकलन हो जायेगा और तत्पश्चात किया गया उसका निर्णय उसका आचरण बता देगा यानि वह जान जायेगा कि वह धर्मगामी है या अधर्मगामी!

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