ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
शून्य : विश्व को भारतवर्ष की सौगात
01-Jan-2019 01:55 PM 152     

आंग्ल नववर्ष आ पहुँचा। सांस्कृतिक विविधता वाले इस देश में अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी-अपनी परम्पराओं, मान्यताओं और सुविधाओं के अनुसार अलग-अलग समय पर अपना-अपना नववर्ष मनाने का रिवाज़ है; तथापि वैश्विक एकरूपता और मकर संक्रांति के आगमन के कारण जनवरी माह से शुरू होने वाले नववर्ष का अपना महत्व है। वर्ष शब्द का सम्बन्ध वर्षा ऋतु की शुरुआत से है, किन्तु ऋतुचक्र की आवर्ती गति के कारण समयचक्र के किसी भी विन्दु से वर्ष की शुरुआत माना जा सकता है और यही कारण है कि इस देश में कतिपय वर्ष या संवत् प्रचलित हैं। अपने देश का एक नाम भारतवर्ष है। यहाँ वर्ष का तात्पर्य "वर्षा क्षेत्र" से है।
नववर्ष पर इष्ट-मित्रों को उपहार देने की परम्परा रही है। नववर्ष और भारतवर्ष के स्मरण से ध्यान आता है कि हमने विश्व को क्या सौगात दी, जो अविस्मरणीय है। उत्तर मिलता है - शून्य। जी हाँ, हमने विश्व को शून्य का अंक दिया, आप इसे शून्य (कुछ भी नहीं) नहीं समझें। दरअसल शून्य शब्द "श्वि" धातु के क्त प्रत्ययांत रूप "शून" की भाववाचक संज्ञा है। "श्वि" धातु का अर्थ - सूजना या बढ़ना है। "श्वि" से ही क्रियाअर्थक संज्ञा "श्वयन" और उसका अपभ्रंश "सूजना" बने। इस तरह शून का अर्थ सूजा हुआ हो जाता है। ऋग्वेद में शून "बढ़ा हुआ" और "समृद्ध" के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। सृष्टि के प्रारम्भ में ब्रह्मांड या हिरण्यगर्भ शून होता अर्थात् बढ़ता चला गया, जिससे आकाश (स्पेस) उत्पन्न हुआ। इस प्रकार शून्य आकाश या खालीपन का वाचक हुआ। भारतीय गणितज्ञ महावीराचार्य ने शून्य के पर्याय को बताते हुए कहा - आकाशं गगनं शून्यमम्बरं खं नभो वियत्। अनंतमन्तरिक्षम् च विष्णुपादं दिविस्मरेत्।। (आकाश, गगन, अम्बर, ख, नभः वियत् ,अनन्त, अंतरिक्ष, विष्णुपाद और दिव शब्द शून्य के पर्यायवाची हैं।) ज्योतिष शास्त्र में शून्य को ही पूर्ण माना गया। अमरकोश में शून्य को खालीपन के अर्थ में लिया गया और इसके चार पर्यायवाची - शून्य, वशिक, तुच्छ और रिक्त कहे गए - "शून्यं तु वशिकं तुच्छरिक्तके"। शून्यार्थक तुच्छय और रिक्त शब्दों का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है, जबकि वशी शब्द का शून्य अर्थ में प्रयोग कात्यायन कृत श्रौत सूत्र में सर्वप्रथम मिलता है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में शून्यमूल शब्द का अर्थ खाली या अरक्षित लिया गया है। ग्रीक भाषा में शून्य से मिलता-जुलता शब्द केनोस या केन्योस है। इसी तरह लैटिन का वकुअस वशिक के निकट लिथुनियन का तुश्चियस तथा स्लैविक का तुश्ती तुच्छ के निकट है। पोलिश भाषा का रोज़्नी रिक्त अर्थ को बताता है। अरबी का सिफ़र या सिफ्र वस्तुतः संस्कृत शून्य का ही अनुवाद है। इसका प्रमाण यह है कि अरब में अंकों को हिन्दसा कहा जाता था। अलबरूनी ने इन्हें अलअरकाम अलहिंद यानि हिंदुस्तान का अंक कहा। अंग्रेजी का साइफर शून्य से सिफ्र का विकास क्रम है, जबकि यही सफ्रि लैटिन में जैफ्रम होता हुआ अंग्रेजी में ज़ीरो हो गया।
कालक्रम में हिंदी की कई बोलियों में शून्य का विकृत रूप "सुन्ना" व्यवहृत होने लगा। शून्य होना अशुभ या अपूर्ण होना है या यह निर्वाण या पूर्णता का द्योतक है; यह दार्शनिक विवाद का विषय रहा है। एक ओर शून्य रिक्ति या खालीपन है, तो दूसरी ओर दशमलव अंक पद्धति की पूर्णता शून्य से ही होती है। प्राकृतिक संख्याओं में शून्य को शामिल करने पर ही पूर्ण संख्याएँ बनती हैं। इतना ही नहीं पूर्ण ग्रहण के लिए प्रयुक्त शब्द खग्रास में भी शून्य का पर्यायवाची "ख" है।
शून्य आणविक अवस्था से ब्रह्मांड के सूजने अथवा फूलने का प्रतीक है, अतएव इसका चिह्न भी बिंदु (.) से लेकर गोलाकार वृत्त (0) रहा है। वर्णमाला के शुद्ध स्वरों के विसर्ग यानि अः होने से पहले अं की अवस्था नादविंदु की अवस्था कही गई और इसी से आनंद स्वरूप द्वैत जगत का विसर्ग या विसर्जन (अः) कहा गया। फिर इन्हीं शुद्ध स्वरों से अशुद्ध जगत व्यञ्जित या प्रकट हुआ, जिसे व्यञ्जन कहा गया। स्त्रियों के माथे पर बिंदी उसी पूर्णब्रह्म या नादब्रह्म का प्रतीक है और वे स्वयं ब्रह्म की प्रकृति हैं। इस तरह ब्रह्म और प्रकृति अथवा शिव और शक्ति अलग-अलग नहीं हैं। रीतिकालीन कवि बिहारी ने भी वैंदी (बिंदी) को शून्य के अर्थ में लिया, "कहत सबै वैंदी दिये अंक दसगुनो होत। तिय लिलार वैंदी दिये अगनित बढ़त उदोत।।" बिंदु शब्द को परिभाषित नहीं किया जा सकता है, अतएव ब्रह्म अपरिभाषित है। बिंदु का सापेक्षिक ज्ञान ब्रह्मांड में चन्द्रमा सदृश होना है, अतएव चन्द्रमा इंदु विंदु है और जल विंदुओं का स्यंदन (प्रवाह) सिंधु है। अपना देश इंदु से इंडिया और सिंधु से अरबी में हिंदू होते हुए हिंदुस्तान है। उर्दू में भी शून्य का चिह्न बिंदी (.) ही है। अंग्रेजी में विंदु (.) पूर्णविराम है, अतएव उन्होंने 0 को शून्य का चिह्न बनाया। यहाँ यह बात विचारणीय है कि पूर्णविराम आदि या अंत का सत्य है, जबकि गोल की सममिति इस बात का द्योतक है कि ब्रह्मांड का विकास या विस्तार सभी दिशाओं में समान है।
भारतीय गणित शास्त्रों में आर्यभट के बाद से ही शून्य परिकर्म (जोड़, घटाव, गुणा और भाग) का उल्लेख मिलता है। ब्रह्मगुप्त (628 ई.) ने इस विषय में कहा, "शून्यविहीनमृणमृणम् धनमधनम् भवतिशून्यमाकाशम्। शोध्यम् यदा धनमृणाद् ऋणं धनाद्वा तदा क्षेप्यम्।।" अर्थात् शून्य को किसी धन या ऋण राशि से घटाने से राशि धन या ऋण ही रहती है और शून्य में शून्य घटाने से शून्य राशि ही मिलती है। किंतु यदि ऋण से धन राशि घटायी जाये तो फल ऋण और धन से ऋण राशि घटायी जाये तो धन शेष बचता है।
भास्कर द्वितीय (1150 ई.) को कोई संख्या शून्य बताने का श्रेय मिलता है। उन्होंने सर्वप्रथम खहर अर्थात् हर (डिनोमिनेटर) में शून्य होने का अर्थ अनंत बताया - अयमनन्तो राशि: खहर इत्युच्चते। उन्होंने खहर की तुलना परब्रह्म से करते हुए लिखा, "अस्मिन् विकारः खहरे न राशीवपि प्रविष्टेष्वपि निःसृतेषु। बहुष्वपि स्याल्लयसृष्टिकाले अनन्ते अच्युते भूतगणेषु तद्वत्।।" अर्थात् जिस तरह सृष्टि और प्रलय काल में ब्रह्म में से अनंत जीव क्रमशः आते और जाते हैं, उसी तरह यह अनंत संख्या भी है। इसमें कितनी भी बड़ी संख्या क्यों न जोड़ें या घटाएं, कुछ अंतर नहीं पड़ता है।
अनन्त की अवधारणा पर ईशोपनिषद् में कहा गया, "ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्चते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।।" यहाँ पूर्ण अनन्त का द्योतक है। इस प्रकार पूर्ण में शून्यता और अनंतता - दोनों का भाव निहित है।
अंततः आंग्ल नववर्ष की शुरुआत भारतीय पौष माह से होती है। पौष पूषन, पुष्पन और पुष्टि का महीना है। अतएव आप अपने अपने क्षेत्रों में शून्य से फूलकर अनन्त समृद्धि प्राप्त करें। नववर्ष की शुभकामना!

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