ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
शिक्षा के नतीजों का सवाल
CATEGORY : विमर्श 01-Feb-2018 09:33 AM 509
शिक्षा के नतीजों का सवाल

मैं शायद पहली कक्षा में थी जब स्कूल से एक छोटे गमले में एक पौधा लगा कर लाने का कहा गया था। उस समय प्लास्टिक के गमले चलन में नहीं थे। बड़ा गमला ले जाना संभव नहीं था इसलिए दादी ने एक गिलास में मिटटी भरकर उसमें एक पौधा लगवा कर दिया था। अपने हाथ से लगाए उस छोटे से पौधे से लगाव प्रकृति से मेरा पहला जुड़ाव था। स्कूल में दिखाने के बाद उसे घर लाकर एक गमले में रोप दिया गया था। रोज़ सुबह शाम उसमें पानी देना उसको बढ़ते हुए देखना उसकी एक-एक कोंपल को पत्ती में बदलते देखना बेहद सुखद था। यह सृजन संसार का मेरा पहला अनुभव था।
स्कूल की अपनी यादों को हम सहज खुशनुमा रूप में याद रखते हैं। उस समय की पढ़ाई, मास्टर जी की फटकार, दोस्तों के साथ मस्ती के किस्सों के अलावा आज जो बात याद करने की है वह है उस समय की पढ़ाई, उसकी सरलता और उसका आत्मसात होना और उस समय के बचपन का बचपना।
स्कूल में अक्षर ज्ञान के साथ ही वो जोर-जोर से बोलकर पहाड़े गिनती ककहरा याद करना, कहानियों के माध्यम से नैतिक शिक्षा मानवीय मूल्यों का विकास होना। हफ्ते में एक दिन शनिवार को बाल सभा का आयोजन मतलब बस्ते से मुक्ति। जिसमें बच्चे खुद कविता, कहानी, चुटकुले सुनाते थे, जिससे उनमें वक्तृत्व कला और आत्मविश्वास का विकास होता था। बचपन में कॉमिक बुक्स में हमारे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की कहानी पढ़ना, पौराणिक कथाएं सुन कर अपनी संस्कृति का ज्ञान प्राप्त करना सहज बात थी।
छोटे बच्चों का स्कूल भी बारह बजे से होता था जिससे वह सुबह का समय परिवार के साथ बिताकर छोटी-मोटी बातों को देखते हुए आत्मसात कर लेता था। सुबह स्नान पूजा, मम्मी का घर का काम, दादी का निर्देशन, पापा दादाजी की समय की पाबन्दी जो शीघ्र ही आदत में शुमार हो जाती थी और मिडिल स्कूल तक आते-आते बच्चा खुद ही एक नियमित दिनचर्या में बँध जाता था। आज के बच्चों को देखें तो सुबह उठते से उन्हें तैयार होकर स्कूल भागना होता है। घर में क्या कैसे होता है जानने का उनके पास समय ही कहाँ है? रीति-रिवाज क्या होते हैं, कैसे निभाए जाते हैं, कभी पढाई और एग्जाम के खौफ से निकले तो देखें। साल की तीन बड़ी परीक्षा और हर महीने दस नंबर के टेस्ट कितना सुकून था। पढ़ने का उसे गुनने का समय होता था। अब पढाई का मतलब सिर्फ परीक्षा उसमें अच्छे नंबर की होड़ हो गया है। अब वे अच्छे नंबर चाहे रट्टा लगा कर आएं। जाने क्यों ऐसा लगता है बच्चे नंबर प्राप्त करने की एक अंधी दौड़ में लगे हुए हैं जिसमें सुकून संस्कार अपनत्व पीछे छूटते जा रहे हैं।
तब कार्टून नहीं हुआ करते थे, पढ़ते हुए कल्पना शक्ति का उपयोग कर बच्चा दृश्य रचता था जो उसके दिमाग पर कहीं गहरे अंकित हो जाता था। अगर थोड़ा ध्यान देंगे तो पाएंगे राम-सीता स्वयंवर, कृष्ण की माखन चोरी, कालिया नाग मर्दन के कुछ दृश्य वे हैं जो बरसों पहले दादी-नानी से कहानी सुनते हुए कल्पना में उकेरे गए थे। उसके बाद चाहे कितने अलग-अलग रूप में सीता स्वयंवर देखे या माखन चोरी के डिजिटल दृश्य देखे, बचपन के उन दृश्यों को प्रतिस्थापित नहीं कर सके। अगर हम चितेरे होते तो बाबा भारती और उनके घोड़े, पंच परमेश्वर के अलगू चौधरी, ईदगाह के हमीद और उसकी दादी के अपनी कल्पना में उकेरे चित्र बनाते। अब हर चीज़ रेडीमेड परोसी जाती है। जिसमें दृश्य नज़रों के सामने चलता है, आँखें उन्हें देखती हैं, कान सुनते हैं, ना उनका अर्थ समझने का समय होता है ना किसी कल्पना का स्थान। क्योंकि तब तक तो किसी पहाड़ी नदी सी कहानी बहुत आगे निकल जाती है। कार्यक्रम ख़त्म होते ही वह पहाड़ी नदी सूख जाती है और पीछे रह जाती है सूखी ऊबड़खाबड़ बंजर सतह जिस पर न खेती हो सकती है ना नमी रहती है। ना बच्चों को कोई शिक्षा मिलती है ना संस्कार।
अब तो शायद ही दादी-नानी कहानी सुनाती हैं और ना बच्चों का अपना काल्पनिक घर गाँव या साथी ही है। उनके हीरो बैटमैन, स्पाइडर मैन, शिनचिन, छोटा भीम या गणेशा हैं जो सब एक जैसे हैं। एक सी शक्ल सूरत और कपडे क्योंकि वे उनकी कल्पना की उपज नहीं बाजार के रेडीमेड प्रोडक्ट हैं। अद्धा पौवा पौना के पहाड़े आज की पीढ़ी में क्या किसी को याद होंगें? आज तो पहाड़े याद करना गैरजरूरी हो गया है। बच्चों को पहाड़े बनाने की ट्रिक सिखा दी जाती है और फिर कैलकुलेटर तो है ही। यह सच है कि अब चूँकि करेंसी में चार आने, आठ आने या बारह आने बंद हो गए हैं लेकिन क्या इन पहाड़ों का मकसद सिर्फ पैसों का हिसाब करना ही था? जिस तरह गंगा यमुना और सरस्वती में से सरस्वती लुप्त जरूर हो गई हैं लेकिन उसका महत्त्व कम नहीं हुआ है, उसी तरह शिक्षा के कुछ महत्वपूर्ण अध्यायों को सिर्फ इसलिए मिटा देना कि अब उनका उपयोग नहीं है या कम है ठीक नहीं है। ये हमारी बौद्धिक विरासत हैं, जिन्हें पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाना जरूरी है।
व्यावहारिक गणित जैसा विषय अब रहा नहीं। बहुत कम बच्चे ऐसे होंगे जिन्हें दुकानदारों का बचा हुआ पैसा लौटाने का गणित समझ में आता होगा या सब्जी वाले का हिसाब ही कर पाते होंगे। आज के समय में गणित का मतलब "कितने कम समय में कितने ज्यादा सवाल हल किये" यह हो गया है। बिना कागज कलम के सत्रह रुपये का चालीस प्रतिशत निकलना, एक मीटर सेंटीमीटर या फुट को अंदाजे से बताना, हाथ से तौल कर वजन का अंदाजा करना या अलग-अलग आकार के बर्तनों में कितना द्रव्य समा सकता है इसका अंदाजा करना आज गैर जरूरी होता जा रहा है।
हिंदी में ककहरा अब लगभग ख़त्म कर दिया गया है। दो पैसे में आने वाली उस पहाड़ा पट्टी की याद अभी भी कई लोगों के जेहन में ताज़ा होगी और शायद किसी के बक्से की तली में पीले जर्जर पेज वाली कोई पहाड़ा पट्टी रखी भी होगी जिसे हाथ में लेते ही वो सुहाने दिन याद आ जाते हैं। वर्तनी के सही उच्चारण के लिए ककहरा से बेहतर कुछ ईजाद हुआ क्या? अब तो वर्तनी की शुद्धता ही खतरे में है। "छोटी इ है या बड़ी क्या फर्क पड़ता है" की भावना शिक्षकों में भी है और अब तो सीबीएसइ भी वर्तनी की गलतियों को नज़रअंदाज़ करने को कहती है। हिंदी भाषा के प्रति तो उपेक्षा का भाव है ही अब तो जब भारतीय बच्चे विदेशों में अंग्रेजी भाषा के अपने ज्ञान का परचम लहराने लगे हैं इंग्लिश के प्रति भी लापरवाही शुरू कर दी गई है। तुर्रा ये कि ऑटो सजेशन के दौर में स्पेलिंग रटवाने के लिए बच्चों पर जोर क्यों डाला जाये? संस्कृत लेना अब पिछड़ेपन की निशानी है। अब बच्चे फ्रेंच, जर्मन, इटालियन सीख रहे हैं लेकिन तीसरी भाषा के रूप में सिंधी, मलयालम, कश्मीरी सिखाने का शायद प्रावधान ही नहीं है।
निबंध के रूप में किसी विषय विशेष पर एक पूरी विचार प्रक्रिया विकसित की जाती थी। जिसमे आधारभूत कारण के साथ उसका विकास, उसकी उपयोगिता अनुपयोगिता और किसी विषय को किस तरह समेटा जाना चाहिए सब सिखाया जाता था। आज निबंध विधा ही समाप्ति के कगार पर है। इसका स्थान एक पैराग्राफ के अनुच्छेद ने ले लिया है। कारण यह कि बच्चों को इतने सारे विषयों में इतना लिखना होता है वे निबंध कैसे लिखेंगे? सच तो यह है कि बच्चों में वह विचार प्रक्रिया ही नहीं विकसित की गई है कि वे निबंध जैसी विधा के साथ न्याय कर सकें।
नदी बहुत सारी छोटी-छोटी सहायक नदियों को अपने में समाहित कर लेती है और इस तरह उसकी जलधारा अजस्त्र बहती रहती है। शिक्षा रूपी नदी ने भी बहुत सारे विविध विचारधारा के पाठ्यक्रमों को खुद को उन्नत करने के लिए खुद में शामिल किया। लेकिन हम ध्यान ही नहीं दे पा रहे हैं कि इन छोटी नदियों के साथ पैसा, दिखावा, अपनी विचारधारा को लादने जैसे कारख़ाने और गन्दगी के नाले भी इन नदियों में मिलते जा रहे हैं जिससे नदी का मूल स्वरूप ही लुप्त हुआ जा रहा है।
बुनियादी शिक्षा का एक बेहतर स्वरूप हमारे यहाँ था जिसमें बागवानी, सिलाई-कढ़ाई-बुनाई, कारपेंटरी जैसे विषय हुआ करते थे। यह सच है कि स्कूल में उतने गहन स्वरूप में इन विषयों की शिक्षा नहीं दी जा सकती थी, लेकिन इससे कम से कम बच्चों का रुझान तो बनता था। हर लड़की नौकरी नहीं कर पाती थी, लेकिन रुचि होने और जरूरत पड़ने पर सिलाई-कढ़ाई-बुनाई जैसे कार्यों से कमाई कर खुद की व परिवार की मदद तो कर पाती थी। बच्चे खुद का काम करने जितने आत्मनिर्भर तो होते थे। हॉबी क्लास में भी बहुत कुछ सिखाया जाता है लेकिन वह कितना व्यावहारिक और उपयोगी है यह विचारणीय है।
जो बात "विज्ञान आओ करके सीखें" में थी क्या अब वही बात स्मार्ट क्लास की स्क्रीन पर चलती फिल्म में है? कुछ मायनों में यह स्मार्ट क्लास वाकई बहुत अच्छी हैं। इनमें कई प्रयोगों को बेहतर तरीके से करके बताया गया है, कई जानकारियाँ प्रश्न उनके उत्तर दिए गए हैं लेकिन बस एक ही कमी है यह किनारे पर बैठ कर नदी में गोते लगाने जैसा है। जिसमें दृश्य हैं, जानकारी है लेकिन उनसे जुड़ाव नहीं है।
प्रोजेक्ट असाइनमेंट के नाम पर आज बच्चे सुन्दर शीट बनाते हैं। इंटरनेट से बेहतर जानकारियां जुटाते हैं, घंटों की मेहनत कर स्क्रैप बुक और मॉडल बनाते हैं। इस काम में माता-पिता भी जुटे रहते हैं, जो अच्छी बात है। पढ़ाई के बहाने बच्चे उनके माता-पिता के साथ अच्छा समय भी बिताते हैं। मैं आधुनिक शिक्षा प्रणाली के खिलाफ नहीं हूँ ना ही इसमें सभी चीज़ें ख़राब हैं। पहले की अपेक्षा विषय की समझ भी ज्यादा विकसित हुई है। कुछ प्रैक्टिकल एक्टिविटी के माध्यम से विषय को रोचक भी बनाया जा रहा है। हाँ सभी असाइनमेंट उतने ज्ञानवर्धक नहीं होते जितना समय और पैसा उनमें लगाया जाता है। एक शिक्षक होते हुए जो बात सबसे ज्यादा कचोटती रही है कि यह सब अभी भी महँगे सीबीएसई स्कूलों में उपलब्ध है। गाँव देहात के सरकारी स्कूलों में प्रशिक्षित शिक्षक का पहुँच जाना और ईमानदारी से बच्चों को पढ़ाना अभी भी दूर की कौड़ी है।
अब शिक्षा ज्यादा से ज्यादा नंबरों की होड़ हो गई है जिसका मकसद मौलिक सोच और विचार को विकसित करना ना होकर सिर्फ नौकर बनाने की शिक्षा देना हो गया। बाजारवाद शिक्षा क्षेत्र में बुरी तरह हावी है। पाठ्यपुस्तकों को चिकने खूबसूरत पृष्ठों पर रंग-बिरंगे चित्रों युक्त बनाया जा रहा है ताकि बच्चे की पढ़ने की रुचि जागे। लेकिन मोटे चमकीले पृष्ठों की वजह से एक किताब का वजन कितना बढ़ रहा है या उसमें निहित सामग्री का स्तर क्या है, यह कौन देखे? मुझे याद है एक प्राइवेट प्रकाशन का एजेंट अपनी पुस्तकें लेकर मेरे पास आया। पाँचवी की गणित की उस पुस्तक का वजन कम से कम डेढ़ किलो तो होगा और कीमत थी चार सौ रुपये। उस स्तर की सारी जानकारी उसमें समाहित थी गोया टीचर के लिए कुछ शेष ना छोड़ा था। जब मैंने कीमत और वजन पर आपत्ति की तो कहने लगा सब रईसों के बच्चे हैं मैडम, हजार की किताब होगी तो भी खरीद लेंगे। और वजन का क्या, उन्हें तो बस या कार से स्कूल आना है।
हमारी पीढ़ी के लोग आज भी बड़े भाई बहन की किताबों से पढ़ने के सुख को नहीं भूलते। तब घर के अलावा रिश्तेदारों, अडोसी-पडोसी के बच्चों से भी किताबें बदल ली जाती थीं।
अलग-अलग दिन की अलग-अलग यूनिफार्म, स्कूल के लोगो लगी स्वेटर ब्लेज़र, बेग किताब कॉपियों के कवर, यहाँ तक की यूनिफार्म भी यह सब पालकों को लूटने के तरीके हैं जिसमें पालक न चाहते हुए भी फंसे हुए हैं, अपने नौनिहालों के चमकीले भविष्य की खातिर।
सीमित संसाधनों में बच्चों को अच्छी शिक्षा देने का वह जज्बा अब लुप्त सा हो गया है। अब शिक्षा एक पलड़े में है और पैसा दूसरे में। कभी शिक्षा की नदियाँ सीमित साधनों के साथ कलकल छलछल करती बहती थीं, जिसमें बच्चे मन से डुबकी लगाते थे। ज्ञान से सराबोर होते थे और उस उल्लास को बरसों मन में सहेजे रहते थे। ज्यों-ज्यों इस ज्ञानगंगा में प्रयोगों की धारा जुड़ती जा रही है उसमें से उल्लास लुप्त होता जा रहा है। आज़ादी के इतने सालों बाद भी एक अनुकूल शिक्षा नीति नहीं बनाई जा सकी है। हर बदलती सरकार के साथ पाठ्यक्रम में बदलाव, अपने प्रिय नेताओं की जीवनी शामिल करने की होड़, विभिन्न वर्गों के तुष्टिकरण के लिए लगातार घटती बढ़ती जयंती छुट्टियों की संख्या, शिक्षकों को शिक्षण से इतर कामों में झोंक देने की सरकारी प्रवृत्ति, शिक्षकों की भर्ती में होते घोटाले और भ्रष्टाचार, सरकारी स्कूलों की बदहाली, सुविधा साधनों का अभाव निरंतर शिक्षा को रसातल में ले जा रहा है। सरकारी तंत्र अपनी इसी अक्षमता को छुपाने के लिए हर वर्ष विषयों का परीक्षाओं का बोझ बढ़ाता जा रहा है जो इस ज्ञान गंगा की धारा को अवरुद्ध कर रहा है।
मैकाले की शिक्षा पद्धति नौकर बनाने के लिए थी और आज हम भारतीय अपनी शिक्षा पद्धति से कितने आत्मनिर्भर लोग पैदा कर पा रहे हैं? हम भी तो परीक्षा, नंबरों की होड़, अच्छी नौकरी पाने के लिए ही कर रहे हैं।

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