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रचना से साक्षात्कार का साझा प्रयास
01-Oct-2019 11:50 AM 360     

हिंदी भाषा और साहित्य य देश के भीतर ही नहीं, देश के बाहर भी चिंतन, मनन, अध्ययन और आस्वाद की भूमि हैं - इस आशा, अपेक्षा और विश्वास की पुष्टि हुई हंगरी के "मान्फा" गांव में आयोजित दस दिवसीय कार्यशाला में भाग लेने पर। यूरोप के विभिन्न देशों में हर दो वर्षों के अंतराल में आयोजित इस कार्यशाला की प्रकृति ही अनूठी है। विभिन्न देशों और भाषाओं के प्रतिनिधि अपनी-अपनी रुचि और क्षमता के अनुसार आधुनिक हिंदी साहित्य की विभिन्न विधाओं से कुछ पाठ चुनकर ले आते हैं। उन पाठों पर अलग-अलग सत्रों में चर्चा होती है। चर्चा का क्रम होता है चुनिन्दा पाठ का वाचन, गहन पाठ (क्लोज़ रीडिंग), व्याख्या और अनुवाद। इस बार की आयोजिका थीं - डॉ. मारियो नेज्यैशी - बुदापैश्ट के ओत्वोश लोनान्द विश्वविद्यालय के भारतीय अध्ययन विभाग की इसी वर्ष सेवानिवृत्त प्रोफेसर। जिनके लिए कहा गया है कि उनका नाम हंगरी में हिंदी का पर्याय बन चुका है, क्योंकि हंगरी में हिंदी-अध्यापन को व्यवस्थित ढंग से शुरू करने और बढ़ाते रहने का श्रेय उन्हीं को जाता है। 25 जुलाई से 4 अगस्त तक चलने वाले इस कार्यक्रम में सत्रह प्रतिभागी थे, इनमें शामिल थे- स्वयं मारिया नेज्यैशी, उनकी छात्रा जूलिया शीवाक, जो अभी बर्मिंघम सिटी यूनिवर्सिटी से पीएचडी कर रही हैं, लेकिन इस कार्यशाला के आयोजन में सहयोग देने के लिए हंगरी आई हुई हैं, पांच छात्र, बेन्स फुस्तोस (हंगरी), साख़ (चीन), द्यान चार्मी (स्विट्ज़रलैण्ड), वेलेन्तीना बार्नाबैई (इटली) और सबरीना कोसेल्का (वियना)। दूर-दूर से आए हुए अध्यापक-आलोचक, ग्यूज़ेल स्त्रेलकोवा (मास्को), तेरेसा म्यांज़ेक, यूस्तीना विश्न्येव्स्का, मोनिका ब्रोवार्चक (पोलैण्ड), मारिया स्काकुईपुरी (पोलैण्ड-भारत), शशि मुदीराज (भारत), हेंज़ वेर्नर वेसलर (स्वीडन), निकोला पोज्ज़ा (स्विट्ज़रलैंड) और अलेस्सान्द्रा कन्सोलारो (इटली)। हिंदी की प्रतिष्ठित और सर्वप्रिय लेखिका ममता कालिया आई हुई हैं।
हर बार की तरह इस बार भी इस कार्यशाला की अपनी विशिष्ट कार्यशैली थी। प्रतिदिन तीन सत्र होते और हर सत्र में किसी चुनिन्दा पाठ (टेक्सट) का वाचन, गहन पठन (क्लोज़ रीडिंग), व्याख्या और अनुवाद। अनुवाद वैसे तो अंग्रेज़ी में किया जाता है लेकिन प्रतिभागियों द्वारा फ्रेंच, जर्मन, इतालवी, पोलिश, हंगेरियन आदि भाषाओं में अनूदित अंश देकर पाठ को बहुआयामी बनाया जाता। मानक हिंदी से लेकर बोलचाल की हिंदी तक विभिन्न प्रयोगों, अभिव्यक्तियों और मुहावरों को समझने-समझाने की कोशिश की जाती, शब्दकोश खँगाले जाते, संदर्भ-ग्रंथ उलटे जाते, नक्शे देखे जाते, हर प्रकार की सांस्कृतिक शब्दावली, रीति-रिवाज़, कर्मकाण्ड, वेशभूषा, हावभाव और सामाजिक-भौगोलिक विशेषताओं के सहारे हिंदी और उसमें झलकते भारतीय मानस को पहचानने का यत्न किया जाता। सत्रों की निर्धारित समयावधि के अलावा भी लोग देर रात तक काम करते ताकि अगले दिन की प्रस्तुति यथासंभव संतोषदायक हो सके।
कार्यशाला का आरंभ हुआ ममता कालिया के वक्तव्य से। ममता जी लिखने में जितनी सहज हैं, बोलने में भी उतनी ही सच्ची और खरी। उन्होंने अपनी रचना-प्रक्रिया, लिखने के कारण, लेखन में अपनी पसन्द-नापसन्द और आज के माहौल पर बेबाक बातचीत की। लेखक की सजीव उपस्थिति उसकी रचना के पाठ को कितना सरस और प्रामाणिक बना देती है यह सिद्ध हुआ ममता कालिया की कहानियों "बीमारी" और "आपकी छोटी लड़की" के पाठ से। अन्य दिनों के सत्रों में भी ममता जी बराबर वक्ता, श्रोता और अनुवादक की भूमिका निभाती रहीं। असगर वजाहत ने स्काइप-वात्र्ता में अपने नये नाटक "महाबली" (जो तुलसीदास के जीवन पर आधारित है) पर चर्चा की। इस कार्यशाला में प्रस्तुत पाठ आधुनिक हिंदी साहित्य की विभिन्न विधाओं मुख्यत: कविता, कहानी, उपन्यास और आत्मकथा से लिये गये थे।
विषयवस्तु विस्तृत और विविध थी लेकिन फोकस रहा हाशिए के समूहों- विशेषकर स्त्री और आदिवासी - पर। स्त्री की विभिन्न भूमिकाओं और स्त्री-जीवन के विभिन्न पहलुओं पर कविता, कहानी और आत्मकथा के सहारे चर्चा की गई। "सरला : एक विधवा की आत्म-जीवनी" का पाठ और अनुवाद किया मोनिका ब्रोवार्चक ने तो मारिया स्काकुइपुरी ने कृष्णा सोबती की कहानी "आजादी शम्मोजान की" प्रस्तुत की। कविता में श्रमिक स्त्री को लेकर निराला की "तोड़ती पत्थर" और केदारनाथ सिंह की "टमाटर बेचने वाली बुढ़िया" में कवि की दृष्टि और यथार्थ के बदलते परिप्रेक्ष्य का शशि मुदीराज द्वारा किया गया तुलनात्मक विवेचन कई जिज्ञासाओं को जन्म दे गया। आदिवासी कवयित्री जेसिन्ता केरकट्टा की कविताओं की व्याख्या और अनुवाद में कई छिपे हुए सामाजिक-राजनीतिक संदर्भ उद्घाटित हुए। आदिवासी मनुष्य की प्रकृति के साथ अभिन्नता को व्यक्त करने वाली इन कविताओं का जर्मन, इतालवी और अंग्रेज़ी में अनुवाद प्रस्तुत कर अलेस्सान्द्रा कन्सोलारो ने एक पाठ को संप्रेषित करने के विभिन्न भाषिक माध्यमों के बहाने संवेदना के विविध धरातल भी उद्घाटित किये। बहुभाषिक अनुवादों के द्वारा एक पाठ तक पहुँचने की इस प्रक्रिया में मारिया स्काकुईपुरी ने अरुन्धती रॉय के अंग्रेज़ी उपन्यास "द मिनिस्ट्री ऑफ अटमोस्ट हैप्पीनेस" के हिंदी, उर्दू और पोलिश पाठ सामने रखे और इस चर्चा के पूरक पक्ष के तौर पर इसी उपन्यास का हंगेरियन में अनुवाद करने वाले आन्द्रेइ ग्राश्कोविच को आमंत्रित कर उनसे अनुवाद में उठने वाली समस्याओं, अनुवादक के दृष्टिकोण और लक्ष्य भाषा में अनूदित पाठ के अभिग्रहण पर प्रश्नोत्तर हुए। आदिवासी जीवन को लेकर विशेष परिचय के अंतर्गत अलेस्सान्द्रा कन्सोलारो ने उनकी भौगोलिक-सामाजिक-राजनीतिक स्थितियों और कठिनाइयों का ज़िक्र किया। हेंज़ वेर्नर वेसलर ने विनोद कुमार और मंजु ज्योत्सना की कहानियों के द्वारा आदिवासी लेखन में "स्वानुभूति और सहानुभूति" के सैद्धांतिक सवाल उठाए। उपन्यासों में मनोहर श्याम जोशी द्वारा लिखित "हरिया हक्र्युलिस की हैरानी" निकोला पोज्ज़ा की प्रस्तुति थी। इस उपन्यास की जटिल और अनेकार्थी संरचना प्रतिभागियों के कौतूहल और गहरी समझदारी का विषय थी। निकोला ने अगले सत्र में कुँवर नारायण की कविताओं पर अनुवाद और चर्चा को आमंत्रित किया। इन कविताओं में व्यक्त संवेदना भाषा की सरलता के बावजूद अनुवाद के लिए चुनौती साबित हुई। हिन्दी कहानियों में व्यक्त मध्यवर्गीय जीवन पर भी नज़र डाली गई। शशि मुदीराज द्वारा प्रस्तुत अमरकांत की "डिप्टी कलेक्टरी" और उसकी "उत्तरकथा" (संतोष दीक्षित) के पाठ से एक नई बात सामने आई कि एक बड़े लेखक की रचना को आगे बढ़ाना नया और रोचक प्रयोग तो है लेकिन इस रास्ते में फिसलन भी कम नहीं। इन कार्यशालाओं में किए गए काम से एक बात तो स्वत:सिद्ध हो जाती है कि "पाठ" को समझने के लिए और लेखक के दिलोदिमाग से तालमेल बैठाने के लिए गहन पाठ, अनुवाद और बहुआयामी व्याख्या ज़रूरी है। अनुवाद की प्रक्रिया ऐकान्तिक और वैयक्तिक तो होती ही है, मगर इस तरह का सामूहिक प्रयास रचना तक पहुँचने का सर्वथा नया रास्ता है जिसमें व्यक्ति की विशिष्टता और समूह का "कोरस" साहित्यिक परिदृश्य को नये रंगों से सराबोर और नई ध्वनियों से गुंजायमान कर देते हैं। रचना से साक्षात्कार का यह क्रम अनवरत चलता रहेगा। इसकी सम्पुष्टि करते हुए सूचित किया गया कि दो वर्षों बाद अगली कार्यशाला पोलैण्ड में आयोजित की जाएगी।

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