ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
वो शबो-रोज़ो-माहो-साल कहां कुछ यादें, रेडियो के बीते दिनों की
01-Feb-2019 02:35 PM 1112     

कुछ नाते होते हैं, जिनकी स्मृतियां समय के अंतराल से हार नही मानतीं। आकाशवाणी से विदा हुए दशकों हो गए, लेकिन वहां बिताए हुए बरस जैसे कल की बात हों। यह नहीं कि काफ़ी कुछ स्मृति से उतर न गया हो, पर बहुत कुछ ऐसा है, जो अभी-अभी देखी किसी अच्छी फ़िल्म के दृश्यों की तरह ताज़ा है। ऐसे दृश्य, जो जा चुके होते हैं, फिर भी कभी अतीत नहीं होते - जो फ़्लैशबैक की तरह कौंध से जाते हैं सामने। जैसे वो घड़ियां, जब मैंने आकाशवाणी की इमारत में पहली बार क़दम रखा था। आकाशवाणी या ऑल इंडिया रेडियो की यह भव्य पुरानी इमारत बग़ल वाली आकाशवाणी भवन कहलाने वाली इमारत से अलग है।
ऑडिशन का दिन था। बादलों से घिरी दोपहर। बारिश थी, लेकिन बस, जब-तब गिरने वाली हल्की-हल्की बूंदें, जिनका बदन को छूना सुखद लगता था। इमारत के पूरे अग्रभाग को घेरते और हवा से लिपटी बूंदाबांदी पर खुले बरामदे में खड़े, एनाउंसर के पद के प्रत्याशियों के कुछ छोटे-छोटे इकट्ठ जुट आए थे, ऑडिशन के लिए बुलाए जाने की प्रतीक्षा कर रहे जिन चार-पांच लोगों के झुण्ड में मैं शामिल था, उन सभी से यह मेरी बिलकुल पहली मुलाक़ात थी। बातचीत से स्पष्ट हुआ कि उस छोटे से समूह में एक दृष्टि से मैं अपनी तरह का अकेला उम्मीदवार था - जिसके लिए आकाशवाणी की इमारत में क़दम रखने का वह पहला अवसर था।
यह अनुभवहीनता अकेला कारण नहीं थी कि मैं घबराहट महसूस कर रहा था। एक प्रत्याशी ने जानकारी में यह इज़ाफ़ा भी किया कि डेढ़ सौ रुपए माहवार की उस अनुबंध-नौकरी के लिए ऑडिशन देने वालों में कुछ लोग ऐसे भी थे, जो अपनी या अपने परिवार की कैडिलैक और शैवरले जैसी गाड़ियों में आकाशवाणी पहुंचे थे। एनाउंसर की नौकरी की अपनी ही चकाचौंध थी, अपना ही एक ग्लैमर। यह वह समय था, जब आकाशवाणी रेडियो-प्रसारण की एकमात्र भारतीय संस्था थी। हां, रेडियो सीलोन और अमीन सयानी अपने लिए एक अलग तरह का मक़ाम अवश्य बना चुके थे। टेलीविज़न पर होने वाला समुचित प्रसारण तो अभी वर्षों दूर था और रेडियो और टेलीविज़न प्रसारण का अपना मौजूदा व्यावसायिक रूप लेना दशकों परे। ग्लैमर व्यवसायों में फ़िल्म के बाद रेडियो का ही दर्जा शुमार होता था।
ज़ाहिर है, स्थिति कोई बहुत उत्साहवर्धक नहीं थी, पर ऑडिशन तो अब देना ही था। बहरहाल, ऑडिशन हुआ। महसूस हुआ, ठीक ही हो गया है, पर धुकधुकी तो फिर भी लगी ही हुई थी। परिणाम कुछ समय बाद डाक द्वारा प्रेषित किया जाना था। पर जब दो सप्ताह से अधिक समय निकल गया, तो मन से यह बात निकाल ही दी कि कुछ सकारात्मक होगा। लगभग भूल ही गया। लेकिन जब - शायद कोई एक महीने बाद - नियुक्तिपत्र मिला, तो अपने भाग्य पर और निर्णय देने वाले परीक्षकों और अधिकारियों की निष्ठा पर संदेह करने का कोई कारण न रहा। मुझे ठीक-ठीक संख्या तो याद नहीं, लेकिन जिन छः-आठ लोगों का चयन हुआ था, उनमें से दो को दिल्ली केंद्र के लिए चुना गया था, जिनमें मैं एक था। शेष लोगों की नियुक्ति आकाशवाणी के अन्य केंद्रों पर हुई।
आकाशवाणी, दिल्ली की उसी इमारत में काम करते हुए सत्रह वर्ष से अधिक समय बीता। यादों का एक सिलसिला है, आकाशवाणी की प्रसारण की दुनिया से जुड़ा हुआ। ऐसे दिन, महीने और साल, जो जीने के अनुभव का बेहद अहम् हिस्सा बन गए। ऐसे कुछ लोग, जिनके स्नेह, दोस्ती और फ़राख़दिली की मिसालें भुलाए नहीं भूलतीं। इस सीमित लेख में कुछ छिटपुट झलकियां ही दी जा सकती हैं उन दिनों की।
शुरू-शुरू में जिन सहकर्मियों से मुलाक़ात हुई, उनमें एक नाम प्रोग्राम इग्ज़ेक्यटिव मधु मालती का है। एनाउंसर उनकी देखरेख में थे। स्थायी स्टाफ़ की एक अधिकारी होने के साथ-साथ वह रेडियो नाटकों की एक उत्कृष्ट और लोकप्रिय कलाकार भी थीं। शायद स्वयं एक कलाकार होने के नाते ही मुझ जैसे नौसिखिए उद्घोषक के साथ भी उनका व्यवहार एक अधिकारी की तरह का नहीं, बल्कि बराबर के सहकर्मी जैसा था। बाद में उनके साथ जब-तब रेडियो-नाटकों में हिस्सा लेने का भी अवसर आता रहा।
एनाउंसर सहकर्मियों में जिन लोगों से अधिक निकट संपर्क हुआ, उनमें एक नाम हरिवल्लभ पांडे का है। हरिवल्लभ जब तक आकाशवाणी में रहे, उनके साथ सम्बन्ध एक अंतरंग मित्र का रहा। यह बात हमेशा चुभती रही कि यह साथ बहुत कम रहा। बाद में हरिवल्लभ समाचार एजेंसी यूएनआई में चले गए थे।
रेडियो पर बोलते हुए माइक्रोफ़ोन से दूरी, टर्नटेबल का संचालन, रिकार्ड को सही ढंग से क्यू करना जैसे बेहद महत्वपूर्ण गुर शुरू में, अन्य वरिष्ठों के अलावा हरि से ही सीखे। हम लोग एक-दूसरे को पहले नाम से ही पुकारने लगे थे। यहां यह बता देना ज़रूरी है कि "आपकी पसंद" नाम के जिस कार्यक्रम से मैं बाद में जाना जाने लगा, उसकी शुरुआत हरिवल्लभ ने ही की थी। कार्यक्रम के असंख्य प्रशंसकों में मैं भी एक था। गानों का चयन, उन्हें शेरों और नज़्मों की सतरों से सजाया जाना और प्रस्तुतीकरण का अंदाज़ - सब कुछ में हरिवल्लभ के संवेदनशील और परपिक्व व्यक्तित्व की झलक थी। बाद में कुछ सीमा तक वही शैली मेरी भी थी।
कार्यक्रम का उत्तरदायित्व पूरी तरह मुझे सौंपे जाने से पहले उसे कुछ अरसे के लिए एक और वरिष्ठ उद्घोषक राजहंस के हवाले किया गया था, जिनका उसे पेश करने का अपना ही अलग अंदाज़ था। आकाशवाणी के तब तक के बंधे-बंधाए मुहावरे से अलग होने के कारण कुछ लोग राजहंस के बोलने के अंदाज़ की नुक्ताचीनी करते थे, लेकिन मुझे श्रोता से बात करने का उनका तौर पसंद था।
अपने दो अन्य साप्ताहिक कार्यक्रमों की तरह "आपकी पसंद" के साथ मेरा जुड़ाव निरंतर लगभग चौदह वर्षों तक बना रहा। पेशकश की अपनी अलग शैली के कारण यह कार्यक्रम ऐसी रुचि वाले श्रोताओं में बहुत लोकप्रिय था, जो फ़रमाइशी प्रोग्राम कहे जाने वाले फ़िल्मी गीतों के अन्य कार्यक्रमों से कुछ अलग की अपेक्षा करते थे। शायद यह "कुछ अलग" ही वह कारण है कि श्रोता आज भी उस कार्यक्रम को चाव से याद करते हैं। ऐसे कई श्रोताओं से आज भी और यहां अमरीका में भी मिलना हो जाता है। ज़ाहिर है कि एक सुखद आश्चर्य की तरह। याद आता है कि उन बीते दिनों के दौरान रेडियो के एक वरिष्ठ अधिकारी ने मुझसे हंसी-हंसी में कहा था - जानते हो गुलशन, तुम इस प्रोग्राम में क्या कर रहे होते हो? दरअस्ल तुम इन गानों को "फ़ेसलिफ़्ट" कर रहे होते हो। शायद यह बात एक हद तक सच थी, हालांकि यह भी एक सच है कि उस दौर के कई फ़िल्मी गीत, स्तर की दृष्टि से बाक़ायदा एक साहित्यिक दर्जे के आसपास पहुंचते थे।
बहरहाल, कार्यक्रम को श्रोताओं का बेपनाह प्यार मिला। साथ ही उसका प्रस्तुतीकरण और उसके लिए तैयारी मेरे लिए व्यक्तिगत रूप से सुख-संतोष का कारण थी। अनेकों अनेकों यादगार क्षण इस कार्यक्रम से जुड़े हैं। उर्दू के प्रसिद्ध शायर साग़र निज़ामी का, जो उर्दू कार्यक्रमों के अध्यक्ष थे, शुरू-शुरू के एक कार्यक्रम को सुनकर यह पूछते हुए ड्यूटी रूम में आना कि भई, यह गुलशन मधुर साहब कौन हैं! साथ ही वह मेरी अनुपस्थिति में मेरी बहुत सारी तारीफ़ पीछे छोड़ गए...। शास्त्रीय संगीत के प्रसिद्ध गायक दिनकर कायकिणी का, जो आकाशवाणी के एक वरिष्ठ अधिकारी भी थे, समूह गीतों पर आधारित एक विशेष कार्यक्रम पर इसलिए बधाई देने आना कि एक के बाद एक पेश किए गए गीतों में, जैसाकि स्वयं उनका कहना था, एक कब ख़त्म होता रहा, दूसरा कब शुरू - उन्हें पता ही नहीं चला। रेडियो की भाषा में इसे सफल "क्रॉसफेड" कहा जाता है।
हम प्रसारकों के लिए ये छोटी-छोटी उपलब्धियां बहुत मायने रखती थीं। वह 78 चक्कर प्रति मिनट की गति वाले रिकॉर्डों का ज़माना था। माइक्रोफ़ोन पर श्रोता को सम्बोधित करने से लेकर रिकॉर्ड "क्यूू" और "फ़ेड आउट" करने तक का सारा काम उस "लाइव" प्रसारण में एनाउंसर को भरपूर तवज्जो के साथ स्वयं ही अंजाम देना होता था। डिजिटल दौर तो अभी बहुत दूर था और इस तरह के प्रोग्रामों को पहले से रिकॉर्ड कर लेने की व्यवस्था नहीं थी।
कई श्रोता संगीतकार रोशन के निधन पर उन्हें श्रद्धांजलि स्वरूप प्रस्तुत किए गए "आपकी पसंद" कार्यक्रम को आज भी याद करते हैं। तब प्रस्तुतीकरण के लिए उसकी बहुत सराहना हुई थी। कार्यक्रम से जुड़ा एक और अवसर हम रेडियोकर्मियों के लिए निजी क्षति का था। यह दुखद घटना थी राजहंस की असमय मृत्यु। "आपकी पसंद" का एक कार्यक्रम उन्हें श्रद्धांजलि के रूप में पेश किया गया था। घटना से भावनात्मक जुड़ाव के कारण कार्यक्रम राजहंस के सहकर्मियों को जो मेरे भी निकट सहकर्मी थे और श्रोताओं को याद रहा।
हरिवल्लभ और राजहंस के अतिरिक्त दिल्ली केंद्र के उस समय के अन्य सहकर्मियों में जगदीश पांडे भी थे, जो सुख्यात समाचारवाचक देवकीनंदन पांडे के छोटे भाई थे। जगदीश पांडे जब अपने धीमे स्वर में श्रोता को सम्बोधित करते थे, तो ऐसा लगता था कि अपने किसी अंतरंग मित्र से बात कर रहे हैं। सच तो यह है कि हर एनाउंसर की अपनी एक निजी शैली थी, जिससे वह पहचाना और याद किया जाता था। आरम्भ के दिनों में मुझे मेरे काम की बारीक़ियों से परिचित कराने में उन्होंने भी बहुत सहायता की थी।
एनाउंसर साथियों के अतिरिक्त दिल्ली केंद्र के जिन अन्य सहकर्मियों की याद हमेशा ताज़ा रही है, उनमें एक विशिष्ट नाम है बी.आर. (बालक राम) नागर का, जिन्हें हम सभी "नागर भाई" के नाम से जानते हैं। एक दिन अचानक ही जब उन्होंने मुझसे "बच्चों का कार्यक्रम" प्रस्तुत करने का प्रस्ताव किया, तो मुझे जितना आश्चर्य हुआ, उतनी ही ख़ुशी भी हुई। उससे पहले उनसे मेरा परिचय "नमस्कार" तक ही सीमित था। मैंने उन्हें हमेशा व्यस्त देखा था। उनके सुदर्शन चेहरे पर किसी से भी बात करते समय एक मोहक मुस्कान रहती थी। बाद के अनेक वर्षों के उनके संग-साथ में मैंने जाना कि नागर भाई अपने काम के बारे में कितने गंभीर हैं और कितने अधिक कर्मठ। उन्हें जितना जाना, उतना ही अधिक स्नेह और आदर के योग्य पाया। "भाई" मेरे लिए एक घनिष्ठ मित्र भी हैं, और सचमुच बड़े भाई भी। उनके बारे में इतना कुछ कहने को है कि पन्ने पर पन्ने भरे जा सकते हैं, जो, ज़ाहिर है, इस लेख में नहीं किया जा सकता।
"बच्चों के कार्यक्रम" का मेरा प्रस्तुतीकरण भी चौदह वर्ष तक जारी रहा और इसी तरह दिल्ली स्टेशन के एक अन्य महत्वपूर्ण कार्यक्रम "आपकी चिट्ठी मिली" का भी। मुझसे पहले इस कार्यक्रम को राजहंस (मूल नाम: सिब्ते हसन) और रमा लंगर प्रस्तुत किया करते थे। राजहंस के असामयिक निधन के बाद उनकी ज़िम्मेदारी मुझे सौंपी गई, जो सिलसिला लगभग डेढ़ दशक तक जारी रहा। सहयोगी के रूप में रमा लंगर कार्यक्रम में बनी रहीं। उनके आकाशवाणी से विदा लेने के बाद कार्यक्रम में मेरा साथ दिया सुभाषिनी ने, जो मेरे आकाशवाणी से वॉयस ऑव अमेरिका आने तक जारी रहा। रमा और सुभाषिनी, दोनों ही ग़ज़ब सहयोगी और बहुत अच्छी मित्र थीं। ऐसे कई अवसर याद हैं, जब उन्हें प्रसारण के समय से पहले लगभग अंतिम क्षण पर कार्यक्रम का मेरे हाथ का लिखा आलेख मिला। ऐसे मौक़ों पर मुझे न रमा के, न ही सुभाषिनी के चेहरे पर कभी कोई शिकन दिखी।
"आपकी चिट्ठी मिली" को लेकर भी बहुत-सी यादें हैं, लेकिन यहां एक-दो बातें ही कर पाने की गुंजाइश है। कार्यक्रम को लेकर किसी की एक टिप्पणी यह सुनने को मिली कि "आपकी चिट्ठी मिली" पढ़े-लिखों का कार्यक्रम लगता है। बहुत सराहनात्मक शब्द हैं, लेकिन यह जानकर ख़ासा लुत्फ़ महसूस हुआ कि ये शब्द कार्यक्रम की आलोचना में कहे गए थे...। एक घटना यह कि एक श्रोता का कोई दस फ़ुलस्केप पृष्ठों का पत्र पढ़ने को मिला। यों तो यह ऐसी कोई अनहोनी बात नहीं थी, सिवाय पत्र की इस अंतिम पंक्ति के - "थोड़े लिखे को बहुत समझिएगा"।
इस थोड़े लिखे को भी फ़िलहाल बहुत समझिएगा। आकाशवाणी के और बाद में "वॉयस ऑव अमेरिका" के बारे में भी बहुत कुछ है, जो कहने को है, पर वह सब फिर कभी। हां, आपसे यहां विदा लेने से पहले एक बात बताना बहुत प्रसंगोचित है। वह यह कि दो मित्र ऐसे हैं, जिनका साथ इन दोनों संस्थाओं में लगभग निरंतर मिला। प्रसिद्ध प्रसारक और कहानीकार उमेश अग्निहोत्री उसी दौर में आकाशवाणी में कार्यरत थे, लेकिन दिल्ली केंद्र पर नहीं, बल्कि विविध भारती में और उनकी जीवनसंगिनी पुष्पा अग्निहोत्री ने कार्यक्रम अधिकारी के रूप में पहले विविध भारती में और फिर दिल्ली केंद्र पर काम किया। बाद में दोनों "वॉयस ऑव अमेरिका" में मेरे निकट सहकर्मी थे। अब मेरे ये दोनों चिरकालिक सहकर्मी और पुराने मित्र मेरी ही तरह अवकाश प्राप्त हैं। ज़ाहिर है, हमारे पीछे इतना साझा इतिहास है कि जब मिल बैठते हैं, तो बात करने के लिए विषय ढूंढने की कोई लाचार आवश्यकता नहीं होती।

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