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शब्दों की सत्ता अनमोल
01-Aug-2016 12:00 AM 3207     

उन्नीस सौ अट्ठाईस। चांद का फाँसी अंक बाज़ार में आया। दो सौ साल की गोरी हुक़ूमत के ज़ुल्मों का दस्तावेज़। रामप्रसाद बिस्मिल, सरदार भगतसिंह और माखनलाल चतुर्वेदी जैसे देशभक्तों ने उसमें लेख और कविताएँ लिखीं थीं। आचार्य चतुरसेन इसके संपादक थे। दस हज़ार प्रतियाँ छापीं गईं। जैसे ही छपकर बाज़ार में आया, हड़कंप मच गया। आज़ादी का जुनून एक बार फिर लोगों पर सवार। अँगरेज़ घबरा गए। फाँसी अंक पर बन्दिश लगा दी गई। जहाँ भी मिलता, जला दिया जाता। जिसके पास भी मिलता, उसे जेल में ठूँस दिया जाता। इस अंक की भूमिका में आचार्य चतुरसेन ने लिखा था, "फाँसी अंक को दीवाली की अमावस्या समझिए... दीवाली के इस शुभ दिन पर वीर गंभीर मृत्यु बाणों से क्रीड़ा करो। जिन्हें साहस हो, वे अभ्यास करें, जिन्हें नहीं, वे देखें। उदीयमान जातियाँ विशेष अवसरों पर विनोद नहीं करतीं, वेदना स्थलों की जाँच किया करती हैं। भारत के विनोद और उल्लास के दिन नहीं, मृत्युवाद का अध्ययन करने के हैं। भारत को निकट भविष्य में उसकी परीक्षा में उत्तीर्ण होना है। हर बहन-भाई को मृत्युंजय की उपाधि प्राप्त करना है। चांद इस अंक के रूप में उस परीक्षा की प्रथम पुस्तक अपनी बहनों और भाइयों के हाथ में भेंट करता है।" याद दिलाने की ज़रूरत नहीं कि चांद के इस अंक ने ही बरतानवी सत्ता के ताबूत में आख़िरी कील ठोकी थी और आज क़रीब नब्बे साल बाद भी यह शब्द-मशाल हर हिंदुस्तानी के लिए किसी पवित्र धार्मिक ग्रन्थ से कम नहीं है।
एक दूसरा उदाहरण। फाँसी अंक के क़रीब पचास साल बाद। आपातकाल में देश ने देखा पहली बार शब्दों पर पहरा। इंदौर से प्रकाशित नईदुनिया ने संपादकीय के स्थान को ख़ाली छोड़कर जो शब्द-सन्देश दिया, वो चालीस साल बाद भी ज़ेहन में ताज़ा है। इस शताब्दी के श्रेष्ठतम संपादक राजेन्द्र माथुर ने आपातकाल के बाद मुद्दों की श्रृंखला लिखी तो लोगों ने पहली बार महसूस किया कि उनके दिलो दिमाग़ पर शब्दों की हुक़ूमत कैसे चलती है। इन्हीं मुद्दों से एक अंश, "उन्नीस सौ पचास में जो संविधान हमारे पितामहों ने देश को दिया, वह छप्पर फाड़कर मिला एक वरदान था। यह हमारे पराक्रम से अर्जित अधिकार पत्र नहीं था। यह अनुभव तथा आज़माइश से जन्मी आचार संहिता भी नहीं थी। कई आज़ादियों को हम हवा की तरह स्वाभाविक मानते थे और हवा का महत्त्व तब तक पता नहीं चलता, जब तक कोई नाक बन्द करके हमारी साँस न रोक दे।" ग़ैर ज़िम्मेदार पत्रकारिता के बारे में उन्होंने लिखा, "जीवन से ज़्यादा चरित्र महत्वपूर्ण माना जाता है। ज़िन्दगी क्या है। आदमी मर जाना पसन्द करेगा, लेकिन अपने यश का ख़त्म हो जाना कोई पसन्द नहीं करेगा और कई बार तो यश का मर जाना मर जाने से ज़्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है। किसी की यश हत्या इतनी आसानी से आप कैसे कर सकते हैं?"
इसका आशय यही है कि जिस समाज को शब्दों की आज़ादी या बोलने की स्वतन्त्रता नहीं होती, वह एक मुर्दा क़ौम ही होती है। धड़कता हुआ समाज एक सेहतमंद लोकतंत्र का सुबूत है। जिस जम्हूरियत में अपने आपको प्रकट करने का हक़ होता है, वो किसी बाहरी ताक़त की मोहताज़ नहीं होती। उसके अंदर से निकली हुई हर आवाज़ सामूहिक होती है और उसे दबाना मुल्क़ के साथ द्रोह से कम नहीं है। गोरी सत्ता के ख़िलाफ़ शब्द सत्ता ने मोर्चा सँभाला तो उसका अंजाम सबके सामने था। सरदार भगतसिंह को फाँसी इसलिए नहीं चढ़ाया गया था कि वो कोई खूनी क्रांति करना चाहते थे। सचाई तो यही थी कि अँगरेज़ उनके शब्दबज्र से बिखर रहे थे। प्रमाण के तौर पर उस पर्चे की कुछ पंक्तियाँ देखिए जो असेम्बली में फेंका गया था - "बहरों को सुनाने के लिए बहुत ऊंची आवाज़ की आवश्यकता होती है... जन प्रतिनिधियों से हमारा आग्रह है कि वे इस पार्लियामेंट का पाखंड छोड़कर अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों में लौट जाएं और जनता को विदेशी दमन और शोषण के खिलाफ क्रांति के लिए तैयार करें... हम अपने विश्वास को दोहराना चाहते हैं कि व्यक्तियों की हत्या करना सरल है, लेकिन विचारों की हत्या नहीं की जा सकती।"
उस दौर के हिंदुस्तान में शब्दों के ज़रिए भगतसिंह कौन-सी क्रांति की अपील कर रहे थे? ज़रा देखिए, "प्रत्येक जाति के भाग्य विधाता युवक ही होते हैं... सच्चा देशभक्त युवक बिना झिझक मौत का आलिंगन करता है, संगीनों के सामने छाती खोलकर डट जाता है, तोप के मुँह पर बैठकर मुस्कुराता है, बेड़ियों की झनकार पर राष्ट्रीय गान गाता है और फाँसी के तख्ते पर हँसते-हँसते चढ़ जाता है। अमेरिकी युवा पैट्रिक हेनरी ने कहा था, जेल की दीवारों के बाहर ज़िंदगी बड़ी महँगी है। पर, जेल की काल कोठरियों की ज़िंदगी और भी महँगी है क्योंकि वहाँ यह स्वतंत्रता संग्राम के मूल्य रूप में चुकाई जाती है। ऐ भारतीय युवक! तू क्यों गफ़लत की नींद में पड़ा बेखबर सो रहा है। उठ! अब मत सो। सोना हो तो अनंत निद्रा की गोद में जाकर सो... धिक्कार है तेरी निर्जीवता पर। तेरे पूर्वज भी नतमस्तक हैं इस नपुंसत्व पर। यदि अब भी तेरे किसी अंग में कुछ हया बाकी हो तो उठकर माँ के दूध की लाज रख, उसके उद्धार का बीड़ा उठा, उसके आंसुओं की एक-एक बूंद की सौगंध ले, उसका बेड़ा पार कर और मुक्त कंठ से बोल- वंदे मातरम!" शब्दों की ललकार क्या देह में हरारत पैदा नहीं करती?
एक बार फिर लौटिए आज़ाद हिंदुस्तान में। आपातकाल से पहले का भारत। ग़रीबी, भुखमरी, भ्रष्टाचार, मँहगाई, काला बाज़ारी और सरकारी दफ्तरों की जड़ता से हर नागरिक बेहाल था। ऐसे में लोगों का आक्रोश अदम गोंडवी के शब्दों से निकला। हमारे राजनीतिक तन्त्र में घुलती सड़ांध पर उन्होंने लिखा, काजू भुने हुए, व्हिस्की गिलास में / उतरा है रामराज्य विधायक निवास में / पक्के समाजवादी हैं तस्कर हों या डकैत / इतना असर है खादी के उजले लिबास में / जनता के सामने एक ही चारा है बग़ावत / ये बात कह रहा हूँ मैं होशोहवास में। और एक जगह उन्होंने लिखा, सौ में सत्तर आदमी जिस मुल्क़ में नाशाद हैं / दिल पे रखकर हाथ कहिए, मुल्क़ क्या आज़ाद है? भ्रष्टाचार पर एक शब्दबाण, हज़ारों रास्ते हैं बड़े साहब की कमाई के / महज़ तनख्वाह से नखरे निपटेंगे क्या लुगाई के / बीवी जी के हाथों में जो बेमौसम खनकते हैं।/ पिछली बाढ़ के तोहफ़े हैं कंगन ये कलाई के / सूखे की नई निशानी उनके ड्राइंग रूम में देखो / टीवी का नया सेट है ऊपर उस तिपाई के।
जब ये कविताएँ मुक्ति प्रकाशन के बैनर तले धरती की सतह पर नाम से छप कर आईं तो आज़ाद भारत में एक बार फिर वही सुलूक़ हुआ। बन्दिश लगा दी गई। लेकिन इन कविताओं का जादू लोगों के सर चढ़ कर बोला। कह सकते हैं कि सेहतमंद लोकतंत्र के लिए समाज की यह शब्द सत्ता हमेशा हुक़ूमत से ऊपर होती है। दुष्यंत कुमार का एक शेर तो अवाम की आवाज़ बन गया था, मत कहो आकाश में कोहरा घना है/ये किसी की व्यक्तिगत आलोचना है / पक्ष औ प्रतिपक्ष संसद में मुखर हैं / बात ये है कि कोई पुल बना है / रक़्त वर्षों से नसों में ख़ौलता है / आप कहते हैं क्षणिक उत्तेजना है।
लेकिन अपनी बात का समापन मैं इन सवालों से करूंगा कि आख़िर आज़ादी ने हमें कोई वादा किया था कि वो आपको अमुक-अमुक चीज़ देगी या हम चाह रहे थे कि हमें चीखने-पुकारने की आज़ादी चाहिए, निर्वाचित प्रतिनिधियों के लिए सदनों को नक़्क़ारख़ाने में बदलने की आज़ादी चाहिए, सोशल मीडिया पर नफरतों के तीर चलाने की आज़ादी चाहिए, अपने शब्दों से समुदायों के बीच ज़हर फैलाने की आज़ादी चाहिए या फिर राजनीतिक व्यंग्यबाणों से घृणा फैलाने की आज़ादी चाहिए? भारत के जिस सामाजिक ढाँचे पर समूची दुनिया ताज़्ज़ुब करती है उसमें हर जाति, धर्म, समुदाय को एक-दूसरे की बहन बेटियों के बहाने गरियाने की आज़ादी चाहिए या फिर देशभक्ति का ठेका लेकर एक-दूसरे पर ज़ुबानी कीचड़ उछालने की आज़ादी चाहिए? माफ़ कीजिए अगर ऐसी आज़ादी चाहिए तो मैं कहूँगा - इससे गूँगा चौपाया होना बेहतर है। मुझे ऐसी शब्दों की सत्ता नहीं चाहिए।

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