ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
शब्द, रंग और जीवन
CATEGORY : सम्पादकीय 01-Aug-2018 03:45 PM 134
शब्द, रंग और जीवन

पिछले दिनों सुप्रतिष्ठित चित्रकार, लेखक श्री अमृतलाल बेगड़ का दीर्घायु प्राप्त करने के बाद मध्यप्रदेश के जबलपुर शहर में निधन हो गया। बंगाल स्कूल से दीक्षित बेगड़ जी ने अपनी चित्रकला में लोकरंगी जीवन और उसकी संस्कृति को कई-कई बार उकेरा और उसके रेखाचित्र बनाये। जीवन के ढलते वर्षों में चित्रकार बेगड़ एक लेखक के रूप में विशेष रूप से प्रतिष्ठित हुए। वे नर्मदा नदी के उद्गम के पास ही जबलपुर शहर में रहते थे। अमरकंटक पर्वत जबलपुर से बहुत ज्यादा दूर नहीं है, जहां से नर्मदा निकलती है और गुजरात में कच्छ के रण तक जाती है। यह एकमात्र ऐसी नदी है जिसके उद्गम से शुरू होकर एक कूल से परिक्रमा करते हुए इसके दुकूल से गुजरते हुए फिर उद्गम तक पहुँचा जा सकता है। यह कोरी नदी की परिक्रमा भर नहीं है भारत के लोकजीवन की एक सांस्कृतिक परिक्रमा भी है जिसे नर्मदा अपने आँचल की ओट देकर अपने दोनों मीलों लम्बे पसरे किनारों पर पालती-पोसती है। भारत में इस नदी के बारे में एक पौराणिक आख्यान यह भी है कि यह कुँआरी नदी है, इसका किसी से ब्याह ही नहीं हुआ।
चित्रकार अमृतलाल बेगड़ अपने जीवन के चौथेपन में इसी अनब्याही नदी की परिक्रमा पर निकल पड़े और सिर्फ एक बार ही नहीं उन्होंने अपने जीवन में इस नदी की तीन बार परिक्रमा की। जब पहली बार गये तो एक यात्रा वृत्तांत लिखा - सौंदर्य की नदी नर्मदा। फिर दूसरी बार गये तो फिर एक यात्रा वृत्तांत लिखा - अमृतस्य नर्मदा। और बिलकुल अपने जीवन के ढलते बरसों में जब तीसरी बार गये तो फिर यात्रा वृत्तांत लिखा - तीरे तीरे नर्मदा। जिन पाठकों ने इन यात्रा वृत्तांतों को पढ़ा है वे भलीभांति जानते हैं कि चित्रकार अमृतलाल बेगड़ सिर्फ रंगों से ही नहीं शब्दों से भी जीवन को उकेरने वाले अप्रतिम चितेरे हैं। हिंदी के अनेक लेखकों में जिनमें, हिंदी के अप्रतिम कथाकार निर्मल वर्मा भी शामिल हैं, चित्रकार बेगड़ के गद्य के प्रशंसक रहे हैं।
हिंदी के पाठकों के लिये यह भी दुःखद है कि अभी पिछले दिनों हिंदी में गीत के मीत सुप्रसिद्ध कवि नीरज जी का देहावसान हो गया। 1960 के दशक से पचास बरसों से भी अधिक समय तक अपनी निरंतर उपस्थिति बनाये रखने वाले श्री गोपालदास नीरज भारत के कविप्रेमी समाज के बीच निरंतर समादृत रहे हैं। अगर हम हिंदी के इतिहास पर गौर करें तो इसमें हरिवंशराय बच्चन ने गीतों का जो विन्यास रचा उस परम्परा का निर्वाह करने वाले श्री गोपालदास नीरज हिंदी की गीत परम्परा के अंतिम कवि थे। वे हिंदी फिल्मों में भी गीत लिखने गये और उनने अपनी शर्तों पर ही गीत लिखे, जिनमें काव्यात्मकता का पुट ही अधिक रहा। वे फिल्मी दुनिया में - फूलों के रंग से, दिल की कलम से - पाती लिखने वाले गीतकार साबित हुए। उन्होंने शोखियों में थोड़ा-सा शबाब घोला, उसमें थोड़ी-सी शराब भी मिलायी और फिर एक ऐसा नशा तैयार किया, जिसको उन्होंने कहा - वो प्यार है।
विगत महीने ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले हिंदीप्रेमी दिनेश श्रीवास्तव जी भी नहीं रहे। वे बरसों पहले ऑस्ट्रेलिया चले गये थे। पेशे से गणित प्राध्यापक और भू-वैज्ञानिक श्रीवास्तव जी के मन में यह भावना बलबती थी कि संसार के दूसरे देशों की ही तरह ऑस्ट्रेलिया में भी हिंदी सीखी और सिखायी जाये। उनके रचनात्मक सम्पर्क और संकल्प निष्ठा के बलबूते आज ऑस्ट्रेलिया में अनेक स्कूलों में हिंदी भाषा पढ़ाये जाने का सरअंजाम जुटा लिया गया। हिंदी के प्रति उनकी संकल्प निष्ठा को याद किये बिना रहा नहीं जाता है। श्री अमृतलाल बेगड़, श्री गोपालदास नीरज तथा श्री दिनेश श्रीवास्तव जी को हमारी विनम्र शृद्धांजलि।
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जीवन ही है जो शब्दों और रंगों और स्वरों को पहचानता है। शास्त्र कहते हैं कि जब जीवन नहीं था तब शब्द, स्वर और रंग थे पर उन्हें कोई पहचानता नहीं था। कहने का मन होता है कि शब्द, स्वर और रंगों के अकेलेपन का ख्याल करते हुए ईश्वर ने जीवन पैदा किया और खासकर आदमी को जो शब्दों, रंगों और स्वरों को पहचान सके। आखिरकार सब कुछ जीवन ही है पर जीवन शब्दों के बिना नहीं चलता। शब्द जब पीछे छूटते चले जाते हैं तो जीवन रंगों के बिना नहीं चलता, क्योंकि रंग भी ढलती हुई शाम में जीवन से पीछे छूट जाते हैं। शायद जीवन रोज़ इसलिये बच जाता है कि वो कल फिर सूर्य के प्रकाश में अपने लिये शब्द और रंग चुन सके। जिस जीवन को शब्द, रंग और संगीत को चुनने की चाहत होती है वह बिना किसी भेदभाव के जी लेता होगा।
ज़रा सोचें दुनिया में कितनी भाषाएँ बोली जाती होंगी। उनमें कितने वर्णाक्षर हैं, कितने सारे स्वर हैं और अलग अलग देशों के भू-दृश्यों में तरह-तरह के रंग बसे हुए हैं। पर जरा गौर से देखें तो सबके ऊपर तना हुआ आकाश हर भाषा के शब्दों की स्याही सोख लेता है। यही आकाश हर देश में बिखरे हुए रंगों को अपने आप में डुबा देता है और यही आकाश दुनिया के हर कोने से उठने वाले स्वर को अपनी गहराई में समो लेता है। क्या आज हम इस प्रतीति से गुजर सकते हैं जो हमारी आकाश की भंगिमाओं से रोज प्रकट होती है। अगर सचमुच 21वीं सदी का मनुष्य आकाश की इस नीलिमा की गहराई को एक बार फिर पहचान सकें तो पूरी दुनिया में कोई रंगभेद, कोई नस्ल भेद, कोई जाति भेद, कोई भाषा भेद नहीं रह पायेगा और संसार के सारे मनुष्य - अगर हम प्रसिद्ध उपन्यासकार और सामाजिक कार्यकर्ता अरुंधती राय के शब्दों में कहें तो - इस पृथ्वी पर प्रकाशित ज्योति की तरह रह सकते हैं।
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संयोगवश इस अगस्त अंक के आगमन पर - कई बार की तरह इस बार, मॉरीशस में 11वां विश्व हिंदी सम्मेलन हो रहा है। जिसमें मॉरीशस का भ्रमण करने की सपरिवार इच्छा रखने वाले हिंदीसेवी जन अब तक अपनी यात्रा सुनिश्चित कर चुके होंगे। निश्चय ही इसमें कुछ लेखक और राजनेता तो शामिल होंगे ही, क्योंकि अब तक ऐसा कोई विश्व हिंदी सम्मेलन नहीं हुआ जिसे बिना किसी राजनेता के सहारे लेखकों ने सम्पन्न कर लिया हो। मेरे एक आत्मीय मित्र ने जो हिंदी के लेखक भी हैं, मॉरीशस से लौटने के बाद अपना अनुभव साझा करते हुए कहा कि - मॉरीशस और वे छोटे-छोटे अन्य द्वीप समूहों के देश दरअसल हिंदी के रुदाली द्वीप हैं। जहां कुछ मझोले स्तर के हिंदी कवि-लेखक, हिंदी के नाम पर लोहाखोहानी (छाती पीटना) के लिये जाया करते हैं और यह रोना रोते हैं कि हाय हिंदी का क्या होगा!
ये रुदाली लेखक या तो अपने अज्ञानवश या जानबूझकर यह भूल जाते हैं कि पिछले 135 वर्षों में हिंदी ने साहित्य में जो अर्जित किया है, उतना तो उससे भी प्राचीन भाषाएँ अर्जित नहीं कर पायी हैं। जिस हिंदी भाषा में जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, सुमित्रनंदन पंत, महादेवी वर्मा, अज्ञेय, शमशेर, मुक्तिबोध, नरेश मेहता, कुँअर नारायण, रघुवीर सहाय, विजय देव नारायण साही, श्रीकांत वर्मा आदि इतने आधुनिक लेखक बीसवीं सदी में उदित हो चुके हों, उसे हिंदी के इतिहास से कुछ अनभिज्ञ से इन मॉरीशस यात्री लेखकों के बारे में पता नहीं लोग क्या-क्या सोचते होंगे। और ये तो अभी हमने सिर्फ कवियों के नाम गिनाये हैं। ये मॉरीशस यात्री लेखक प्रेमचंद वगैरह का नाम ले लेते हैं, लेकिन इन्हें अक्सर पता नहीं होता कि प्रेमचंद के अलावा भी हिंदी में फणीश्वरनाथ रेणु, अज्ञेय, हजारीप्रसाद द्विवेदी, नरेश मेहता, कृष्णा सोबती, कृष्ण बल्देव वैद, निर्मल वर्मा, यशपाल, राही मासूम रजा, भीष्म साहनी, मोहन राकेश, राजेंद्र यादव, मन्नू भंडारी आदि - कहां तक नाम गिनायें, उपन्यासकार और कहानीकार भी हुए हैं। ये इन सब लेखकों को जाने-समझे बगैर इन द्वीपों पर हिंदी पर रुदन करने के लिये अपने बैंकों और अन्य शासकीय कार्यालयों के हिंदी अधिकारी के रूप में वहां जाकर साहित्य के धर्माधिकारी के रूप में विराजते हैं। मेरे उन लेखक मित्र का यह भी अनुभव था कि विश्व हिंदी सम्मेलनों का भले ही हिंदी से कोई सम्बन्ध हो और उनमें शामिल होने वाले हिंदी भवनों की राजनीति करने वाले लोगों की रोजीरोटी चलने से भी हो, पर दिनोंदिन इन हिंदी सम्मेलनों का संबंध, भारत के वास्तविक हिंदी साहित्य से कटता चला गया है। यह एक चिंतनीय प्रश्न है। हम आशा करते हैं कि सम्मेलन के कर्ता-धर्ता हिंदी साहित्य के प्रति हमारी इस प्रार्थना को विम्रतापूर्वक सुन सकेंगे कि - कृपा करो भर्ता।

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