ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
सितंबर की हवा मेरा समय
01-Dec-2018 07:06 PM 1125     

सितंबर की हवा

सरसराती, फरफराती
अपने रेशमी परों में आसमान को समेटती
देर बाद मिलने वाली
सहेली की तरह मुझसे लिपटती
सितंबर की हवा।

कुछ भींनी, कुछ नम
कुछ शीतल, कुछ गरम
कुछ तेज, कुछ मध्यम
कुछ मीठी, कुछ नमकीन
कुछ खुशनुमा, कुछ गमगीन।
छलांगें लगाती, पेड़ों से लटकती
टहनियों से खेलती, लचकाती, मरोड़ती
पत्तियाँ ललकारती, मैदान में पटकती
भटकती, भटकाती
हठीली हवा।

दरवाजे खटखटाती
खिड़कियाँ थपथपाती
परदे उड़ाती
शीशे तड़तड़ाती
हल्ला मचाती और
रातों को जगाती
शैतान बच्चे सी
यह तूफानी हवा।

ऐसी ही थी हवा उस सितंबर ग्यारह की
कुछ भीनी, कुछ मीठी
दुलारती, सहलाती इस शहर को
जब नफरत का
प्रलयंकारी भस्मासुर
झुलसा गया था सारी अलकापुरी।


मेरा समय 

अंधेरा एक जंगली खूंखार जानवर की तरह
चढ़ बैठा है मेरी पीठ पर
खुरदरे पंजों से दबोच रहा है मेरी गर्दन
नुकीले औजारों से तेज नाखून
मेरी कनपटियों में ठोक रहे हैं कीलें।

मैं समुद्री पक्षी-सा
तेल के चीकट से लथपथ समुद्र में
फड़फड़ाता हूँ अपने पंख
जहरीली हवाएँ नोच लेती हैं मेरी उड़ान
किसी अँधेरे कुएँ-सी सूखी
मेरी आद्र्रता की अदम्य प्यास
मृत वनस्पतियों के इर्द-गिर्द भटकती
ठोकर खा बार-बार लौट आती है।

इस काले समुद्र में हाथ पैर मारता
हाँफता, छटपटा रहा हूँ मैं
उस सूरज की किरन के परस को तरसता
जिसे निगल गया है
यह खूँखार अँधेरा।

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