ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
लखनऊ स्टेशन से दूसरी किस्त
01-Apr-2019 09:37 PM 158     

हमारी शादी तय होते ही मेरे ससुरजी ने गुरुवार के उपवास का व्रत लिया था कि मैं
चुनी जाऊँ। यह श्रद्धा भी समाज में बड़ी ऊर्जा और संबल भरती है। इधर मेरी माँ ने
भी शनिवार के उपवास का व्रत ले रखा था। सबके आशीर्वाद और मेरी मेहनत का
फल, जून में पता चला कि मेरा आईएएस में सिलेक्शन हो गया है।

लखनऊ स्टेशन की वह दोपहर मेरे मनःपटल पर अमिट भाव से उकेरी हुई है। दिन रहा होगा 11 जुलाई 1974। लम्बा सा प्लॅटफॉर्म, बेतहाशा भीड, दौडते भागते लोग। उन्हीं में से एक मैं भी। लखनऊ दिल्ली गाडी के आने का समय हो चला था। कुली से मैंने कहा था कि भैया, जनाना डिब्बे में बिठा देना। उसके सिर पर एक होल्डॉल, दो सूटकेस और एक कंधे से लटका थैला। मेरे पास भी एक सूटकेस, एक खानपान का थैला और एक पर्स। उसके पास रखे चार सामानों में मेरे अगले पूरे वर्ष तक मसूरी को रहने का इन्तजाम था- अर्थात्, कपडे, ओढने-बिछाने, पुस्तकें, जूते-वूते, गहने-साजशृंगार वगैरा सबकुछ।
गाड़ियाँ आती हैं - भीड़ उमडती है। कोई मुझे बताता है लखनऊ-दिल्ली गाड़ी दूसरे प्लॅटफॉर्म पर आ रही है। भीड़ के साथ मैं भी दौड़ती हुई, सीढ़ियाँ चढ़ती-उतरती हुई किसी तरह उस दूसरे प्लॅटफॉर्म पर पहुँचकर जनाना डिब्बा खोजकर उसमें एक खिड़की पकड़ लेती हूँ। पीछे बाकी भीड़ भी डिब्बे में घुस रही है। अब मुझे सुध आती है कि कुली किधर है यह तो मैंने देखा ही नहीं। अब क्या करूँ - उतरुँ या बैठूँ। उतरने के लिये रास्ता बनाते-बनाते भी देर लगने वाली है। बार-बार खिड़की से झाँककर देख रही थी। गाड़ी का सिग्नल पीला हो गया तो मेरी छटपटाहट बढ़ने लगी। तभी दूर से वह आता हुआ दिखा। उन दिनों खिड़कियों पर बार नहीं लगे होते थे और खिड़की से सिर निकालकर दूर तक देखा जा सकता था। वह दिखा तो जान में जान आई। वह भागा-भागा चला आ रहा था। खिड़की से ही उसने सामान थमाया।
कहा - उधर भी एक जनाना डिब्बा है, मैंने आपको कहा था कि मेरे पीछे आओ- लेकिन आप इधर आ गईं, वह अपनी बूढी आयु का पूरा फायदा उठा रहा था। मैंने उसे पैसे दिये - उतने ही जितने तय हुए थे और उसने भी ज्यादा नही माँगे। गाड़ी चल पड़ी।
अगले कई घण्टों तक मैं ईमानदारी नामक सामाजिक गुण के विषय में सोचती रही। वह मेरा सामान लेकर कहीं निकल जाता या गाड़ी के चलने तक मुझे खोज ही न पाता तो। लेकिन जब तक समाज में ईमानदारी है, तब तक मेरी इस प्रकार की छोटी-मोटी भूलों के लिये क्षमा है।
जब कुछ देर तक समाज परिशीलन हो गया तो पिछले दस दिनों के घटनाक्रम ने मेरे मन की बागडोर थामी और मन ने वही पन्ने पलटना आरंभ किया।
मई महिने में शादी होकर मैं नई नवेली दुल्हन बनकर कलकत्ता आई थी। यूपीएससी की मौखिक परीक्षा अप्रैल में ही हो गई थी और रिजल्ट का इन्तजार था। यदि सिलेक्शन हुआ तो जुलाई में ट्रेनिंग के लिये मसूरी जाना पड़ेगा। हमारी शादी तय होते ही मेरे ससुरजी ने गुरुवार के उपवास का व्रत लिया था कि मैं चुनी जाऊँ। यह श्रद्धा भी समाज में बड़ी ऊर्जा और संबल भरती है। इधर मेरी माँ ने भी शनिवार के उपवास का व्रत ले रखा था। सबके आशीर्वाद और मेरी मेहनत का फल, जून में पता चला कि मेरा आईएएस में सिलेक्शन हो गया है। सुदूर स्थित मेरे जन्म गाँव धरणगाँव के विधायक तथा महाराष्ट्र में तत्कालीन रेवेन्यू मंत्री श्री मधुकरराव चौधरी ने दरभंगा में मेरे पिताजी को अभिनंदन का तार भेजा था जो उन्होंने आगे कई वर्षों तक संभालकर रखा था।
अब मुझे फटाफट हजार काम करने थे। मैं पहले दरभंगा आई जहाँ माता-पिता, भाई-बहन और मेरा काफी सामान था और जहाँ मैंने बचपन के पंद्रह वर्ष गुजारे थे। फिर पटना के लेडीज होस्टेल में भी मेरा सामान पड़ा था। मगध महिला कॉलेज में, जहाँ मैं लेक्चरर थी - वहाँ औपचारिक पत्र देना था कि आगे से मैं नहीं आऊँगी। पटना युनिवर्सिटी से मेरा पीएचडी का रजिस्ट्रेशन था। उनसे पूर्वसम्मति मिल चुकी थी कि आईएएस में सिलेक्ट हुई तो एनओसी देंगे, वह लेना था। पटना होस्टेल से सारा सामान दरभंगा ले जाकर नये सिरे से अगले एक वर्ष के ट्रेनिंग के लिये सामान की पैकिंग करनी थी। थोड़े-बहुत पैसे की व्यवस्था करनी थी। और ढेर सारे मित्र-सहेलियाँ-गुरुजन-परिचितों से विदाई लेनी थी। दरभंगा के सीएम कॉलेज जाकर सबसे, और खासकर फिजिक्स डिपार्टमेंट के प्राध्यापकों से मिलना था। मेरे श्रेय में उनके अध्यापन व प्रोत्साहन का विशेष महत्व था। सीएम कॉलेज से पढ़कर आईएएस में आने वाली मैं पहली स्टूडेण्ट थी।
पर जो काम अनिवार्य था और नहीं हो रहा था, जिसके बिना सारा कुछ धरा रह जाने वाला था, वह था यूपीएससी का पत्र जो नहीं आ रहा था।
दरभंगा में पोस्टेड एक सीनियर आईएएस श्री अडिगे मेरे पिता के मित्र थे। मेरे आईएएस के लिये उन्होंने पिताजी को कई बार सलाह दी थी। उन्होंने कहा दिल्ली में यूपीएससी के कार्यालय में जाकर वह पत्र लेना होगा, वरना नियत दिनांक को ज्वाईन न करने पर मुश्किल होगी। सो मेरा छोटा भाई सतीश दिल्ली गया और फिर तार व टेलीफोन से उसने खबर भेजी - दीदी को तुरंत रवाना करो- 14 जुलाई तक ज्वाईन करना है। वह 9 जुलाई की दोपहर थी - समय बिलकुल नहीं था। रेल का रास्ता तय हुआ - 10 तारीख को दरभंगा से समस्तीपुर, वहाँ से लखनऊ में गाड़ी बदलकर दिल्ली और 12 को दिल्ली से देहरादून रवाना होना।
अगली सुबह पिताजी मुझे समस्तीपुर तक छोड़ने आये। अकेले रेलयात्रा का यह पहला मौका नहीं था। दरभंगा-पटना-मुगलसराय-इटारसी-जलगांव-धरणगांव मार्ग पर मैंने पहले कई बार अकेले यात्रा की थी। पिताजी को भी मेरे निभा लेने की क्षमता पर विश्वास था। फिर भी कई प्रकार से सूचनाएँ देकर मुझे लखनऊ की गाड़ी में बिठाया। वहाँ से बीसेक घंटे की यात्रा करके मैं लखनऊ पहुँची थी। वहीं प्लेटफॉर्म की सुविधाओं का उपयोग कर स्नान भी कर लिया था। उन दिनों हर स्टेशन पर रेल्वे के साफ-सुथरे प्रतीक्षालय हुआ करते थे जिनमें सामान्यजन भी सुविधा लेते हुए अपनी जरूरतें निपटा सकते थे। हर बड़े स्टेशन पर स्वादिष्ट पूरी-सब्जी, पीने का शुद्ध पानी आदि सुविधाएँ होती थीं। परेशानी थी तो बस ढेर सारे सामान के कारण। लेकिन चलो, अब तो गाड़ी पूरे वेग से दिल्ली को जा रही है।
अगले दिन दिल्ली स्टेशन पर सतीश मुझे लिवाने आया था। यूपीएससी से सारे ज़रूरी पत्र तथा कागजात ले लिये थे। उसके स्कूली मित्र धनंजय के बड़े भाई जिन्हें हम नारायण भैया कहते थे, उनके घर पर पहुँचे। वे भी केंद्र सरकार के राजभाषा विभाग में अधिकारी थे। वहाँ से दरभंगा, कोलकाता व मुंबई में समाचार भिजवाया कि अब तक सब कुछ ठीक ठाक है।
शाम को दिल्ली-देहरादून जाने के लिये मसूरी एक्सप्रेस में बर्थ की रिजर्वेशन कर रखी थी, वहाँ स्थानापन्न हुई। सतीश जाकर अखबार, पानी, कुछ फल ले आया। अब वह कुछ कहनेवाला ही था कि अचानक एक भूचाल-सा हुआ। मेरी ही तरह ढेर-सा सामान लिये तीन महिलाएँ अंदर आईं और मेरे सामने वाली सीट पर कब्जा किया। उनकी अनवरत बातें चल रही थीं। यात्रा हेतु दी जाने वाली हिदायतों का सैलाब आ गया। फिर ट्रेन के चल पड़ने की आशंका से एक युवती को छोड़ दूसरी युवती तथा एक प्रौढ महिला जो निश्चित उनकी माँ थी, दोनों उतर गईं। लेकिन हिदायतें चालू रही। किसी तरह उन्हें रोककर मैंने सहयात्री युवती से परिचय पूछा और लो, उसे भी मसूरी जाना था - उसी मसूरी अकादमी में आईएएस प्रशिक्षण के लिये। सतीश ने सबको सुनाते हुए मुझे कहा - हाँ तो दीदी, अब सारी आवश्यक हिदायतें तुमने सुन ही ली हैं, मेरे कहने लायक कोई अलग बात नही बची। सब हँस पड़े और ट्रेन रवाना हुई।
रास्ते में राजलक्ष्मी से बातें होती रही। वह दिल्ली के उच्च-मध्यमवर्ग के परिवार से थी, फर्राटेदार तमिल, हिंदी व इंगलिश बोलती थी। उसके पिताजी का देहान्त हो चुका था और माँ ने ही उसे बड़ा किया था और आईएएस का सपना भी दिखाया था। हम एक-दूसरे से अपने परिवार, पढ़ाई, शौक, मित्रमंडली आदि के संबंधसे बातें करते रहे।
अगली सुबह देहरादून से मसूरी के लिये टैक्सी पकड़ी। राजी का परिचित एक और प्रशिक्षणार्थी भी मिल गया जो पोस्टल सर्विस के लिये सिलेक्ट हुआ था। मसूरी अकादमी पहुँचकर ज्वाइनिंग रिपोर्ट दी। अकादमी के लोगों ने कुछ और भी कागजों पर हस्ताक्षर करवाये। उनमें किसी पर एक छोटी-सी तनख्वाह का विवरण था। फिर राजी ने समझाया कि इस बेसिक सैलरी में डीए आदि अन्य अलाउंस मिलाकर रकम बड़ी हो जाती है। अच्छा लगा कि कॉलेज में फिजिक्स के लेक्चरर की अपेक्षा यह तनख्वाह थोड़ी ज्यादा थी। लेकिन यह जानकारी मुझे नहीं, पर राजी को है यह क्योंकर। उसने कहा कि बड़े शहरों में ऐसी जानकारी सबको मिलता रहती है - आगे भी कोई व्यावहारिक मुद्दा हो तो मुझसे सीख लिया करना। यह सरल था क्योंकि संयोगवश मुझे और राजी को लेडीज होस्टेल में एक ही कमरा अलॉट हुआ था। मैंने फिर एक बार समाज की भलमानसाहत का आभार माना। इस प्रकार एक वर्ष के मसूरी ट्रेनिंग की पूर्वपीठिका तैयार हो गई।
(क्रमश:)

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