ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
लिपि रक्षा अभियान गर्भनाल-न्यास की "इनस्क्रिप्ट की-बोर्ड सीखो" कार्यशाला सम्पन्न
01-Feb-2019 03:19 PM 3680     

विगत 19 जनवरी 2019 को भोपाल में हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं की लिपियों की रक्षा और संरक्षण के अभियान में संलग्न गर्भनाल-न्यास की "इनस्क्रिप्ट की-बोर्ड सीखो" कार्यशाला, हिंदी भवन के महादेवी कक्ष में सम्पन्न हुई। कार्यशाला में केंद्रीय सरकार तथा बैंकों के राजभाषा अधिकारी, महाविद्यालयों के व्याख्याता, आईटी के विशेषज्ञ तथा बड़ी संख्या में उपस्थित हिंदी प्रेमियों को आईटी के विशेषज्ञों द्वारा "इनस्क्रिप्ट की-बोर्ड" के संचालन तथा इंस्टालेशन संबंधी तमाम पद्धतियों से अवगत कराया गया। कार्यशाला के मंतव्यों पर प्रकाश डालते हुए गर्भनाल न्यास के सचिव आत्माराम शर्मा ने कहा कि रोमन लिपि का जिस गति से प्रचलन बढ़ा है उससे भारतीय भाषाओं के समक्ष विस्मरण का खतरा मंडरा रहा है। उन्होंने आगे कहा कि सन् 2050 में भारत में बोल-चाल की भाषा कौन-सी होगी, इस पर आज ही विचार करना होगा। हमारे कम्प्यूटरों में इंस्क्रिप्ट की-बोर्ड पहले से ही मौजूद है, इसका इस्तेमाल करके हम अपनी भाषाओं को बचाने का सच्चा प्रयास कर सकेंगे। आयोजन के विशिष्ट वक्ता कवि-कथाकार ध्रुव शुक्ल ने इस मुहिम को शब्द-ब्रह्म को बचाने की मुहिम बताया। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे यूनियन बैंक आफ इंडिया के अंचल प्रमुख तथा भाषाप्रेमी विनायक व्ही. टेंभुर्णे ने कहा कि यूनियन बैंक ने अपने कामकाज में राजभाषा का प्रयोग बढ़कर-चढ़कर किया है। इंस्क्रिप्ट की-बोर्ड के बारे में तकनीकि प्रजेंटेशन माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में कम्प्यूटर प्राध्यापक डॉ. अनुराग सीठा ने दिया वहीं मोबाइल पर इसके इस्तेमाल की उपयोगी जानकारी आईटी विशेषज्ञ रविशंकर श्रीवास्तव ने दी। कार्यशाला में कम्प्यूटर पर ऑफलाइन इनस्क्रिप्ट की-बोर्ड एक्टिव करने का प्रदर्शन भी किया गया।

हमनी के बलिआ दुआबा के रहनिहार
रैयत हजूर के कदम तर बानी जा
हमनी के सोझे सोझे बात बतिआई ना त
हिनुई, ना फारसी ना अंगरेजी जानी जा।
जइसे सरकार उपकार करे हमनी का
तइसने हजूर के हमनियो के मानी जा
हमनी के मामला मे ऐसन निसाफ होखे
जौना से साहबो के नेकिये बखानी जा।
जब सरकार सब उपकार करते बा
तब अब हमनी के कवन अरज बा
हमनी के साहब से उतरिनि ना होइबि
हमनी के माथे सरकार के करज बा।
आगा अब अवरु कहा ले अब कही मालिक से
अइसे त साहबे से सगरे गरज बा
उरदू बदलि देवनागरी अछर चले
इहे एगो साहेब से ए घरी अरज बा।

भारतेंदु हरिश्च्रंद्र जी की लिखी भोजपुरी रचना हिन्दी भाषा नामक किताब से जो पटना के खडगविलास प्रेस में 19वीं सदी में कभी छपी थी। इसमें हिन्दी को हिनुई नाम देते हुए उसे भोजपुरी इलाके में खारिज करने कि बात भारतेंदू जी करते हैं साथ में देवनागरी को अपनाने की बात भी करते हैं।
संभवतः भारतेंदू की घर-घर हिन्दी पहुंचाने वाली सोच आपकी हो भारतेंदू कि कदापि नही थी। भारतेंदू राष्ट्र को एकसूत्र में रखने के लिये एक सम्पर्क भाषा की बात करते थे लेकिन वह कभी भी मातृभाषाओं की चिता या अर्थी पर हिन्दी को सजाने की बात नही करते थे। गांधी जी की बात ही लीजिये, क्या आपको नहीं लगा कि गांधी जी की उस बात, उस कथ्य का जिक्र भी हो जिसमें उन्होने कहा है कि प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में होनी चाहिये।
अब इन दो महापुरुषों के लेख और रचनाओं के आधार पर, यदि ये दोनों आपको मान्य हैं तो क्या भोजपुरी इलाके में हिन्दी को मातृभाषा कहा जाना उचित है? क्या आपको लगता है कि भोजपुरी इलाके में भोजपुरी में शिक्षा गैरवाजिब गैरज़रूरी है? गांधी और भारतेंदु को कोट करते हुए उनके समग्र भाषाई सोच के सारांश को लिखा जाना चाहिये।
श्रीराम जी, क्षमा कीजिये आपका लेख मुझे न तीर-घाट, न मीर-घाट लगा। सर, विनम्र निवेदन है भाषा-बोली विषय पर थोड़ा सरल सहज व्यवहारपरक शोध करें फिर सब पकेगा और आप उसे सलीके से पका भी सकेंगे। सादर निवेदन है सर। प्रमोद तिवारी जी का लेख खुशबूदार होते-होते रह गया। मुझे उम्मीद थी कि भाषा-बोली-भोजपुरी-हिन्दी-अंग्रेजी आदि को लेकर थोड़ा चोख धारदार लेख लिखा जाना चाहिये ज्यादा विस्तार से। उम्मीद करता हूँ कि इस कमी की भरपाई अगले अंक में हो जायेगी। इस लेख पर व्यापक बहस कि आवश्यकता है। एक ज़रूरी प्रश्न यह भी कि क्या केवल हिन्दी या बहुभाषी? मुझे तो ऐसा लग रहा है कि गर्भनाल के लेखकों पर ही प्रमोद जी ने सटीक प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। बताइये आखिर गर्भनाल के लेखकों ने तो अपने आपको बड़ा कोष्ठक में लॉक ही तो कर लिया है? शायद प्रमोद जी उन्हें खोल पायें।
खैर, गर्भनाल जब तक गहिर में उतर के खांता में उतर के बात नहीं करेगा तब तक अधूरे रिसर्च से पाठकों को कंफ्यूज करता रहेगा। गर्भनाल को अपने नाम की सार्थकता को सिद्ध करने कि ज़रूरत है। प्रमोद जी के अगले लेख और ऐसे ही भाषा पर सारगर्भित लेख के इंतेजार में गर्भनाल का एक पुराना पाठक।
नबीन कुमार

गर्भनाल के जनवरी 2019 अंक को आपने महात्मा गांधी का चेहरा दिया है, जो बिल्कुल उपयुक्त है, क्योंकि भाषा के विद्यार्थियों के लिए यह अत्यधिक महत्व का और संग्रहणीय अंक है। राष्ट्रभाषा और लिपि शीर्षक से महात्मा गांधी के भड़ौच भाषण को पुन: प्रकाशित करके आपने हम विद्यार्थियों पर विशेष अनुग्रह किया है। नितांत सरल शब्दों में जिस गैरउलझाऊ तरीके से गांधी जी ने भारत की भाषा समस्या को सुलझाने के उपायों पर अपनी स्पष्ट राय रखी थी, वह वाग्जालिमों को लजा सकती है, यदि वे इसे धैर्यपूर्वक पढ़ने की जहमत उठाएं। गांधी जी के लिए यह महज एक और भाषण नहीं, उनका संकल्प था, क्योंकि अक्तूबर 1917 में दिए गए इस भाषण के तुरंत बाद 1918 में उन्होंने देवदास गांधी को तमिलनाडु भेजकर हिंदी प्रचार की शुरुआत कराई थी।
गर्भनाल न्यास के इन्स्क्रिप्ट यूनिकोड हिंदी टंकण प्रशिक्षण अभियान को उसी हिंदी प्रचार के एक नये संस्करण की तरह मैं देख पा रहा हूं। इसकी जानकारी मैं कम से कम एक हजार हिंदी कार्यकर्ताओं तक पहुंचाने के प्रयास में हूं। प्रसन्नता हुई यह देखकर कि ऐसे गरिमामय भाषा चिंतन के साथ आपने जिन अन्य आलेखों को स्थान दिया, वे भी गंभीर चिंतन के साथ श्रमपूर्वक लिखे गए हैं।
डॉ. ओम निश्चल, डॉ. प्रमोद कुमार तिवारी और रमेश जोशी के आलेख भारत की भाषा समस्या के अलग-अलग पहलुओं पर गहराई से विचार करते हैं और भाषा के विद्यार्थियों की भाषायी दृष्टि को संतुलित बनाने में सक्षम हैं। मेरे विचार से हिंदी के कार्यकर्ताओं के अति-उत्साह रूपी छिलके को छीलना उतना ही जरूरी है, जितना भाषायी पंडितों की दृष्टि से अंग्रेजी साम्राज्यवाद समर्थित भाषायी चिंतनजन्य रंगीन चश्मे को उतारना। लेकिन जबतक वे खुद न चाहें, यह चश्मा नहीं उतर सकता। छिलका छीलने का काम तो गर्भनाल के जरिये आप बखूबी कर रहे हैं।
आपको अच्छे लेखकों-चिंतकों का साथ मिला है। भाषायी यथार्थ जीवन के यथार्थ से अलग नहीं है, सो उसकी समस्याएं भी जीवन से ही जुड़ी हैं। भाषा की नदी पंडितों की बताई राह पर नहीं चलती, लेकिन षडयंत्रपूर्वक उस नदी पर जो कृत्रिम बांध बना दिए गए हैं, उन्हें तोड़ना सामूहिक प्रयासों से ही संभव है। भाषायी समस्याओं के औचित्यपूर्ण समाधान का कोई भी प्रयास भारतीय जनजीवन को और अधिक जीने योग्य बनाएगा, इसमें कोई संदेह नहीं। इसलिए गर्भनाल न्यास का प्रयास स्तुत्य है। ऐसे और अनेक प्रयास प्रारंभ हों, यही कामना है। कौ ईन से आपकी बातचीत में आपके सवाल और ईन के जवाब, दोनों हैरत में डालते हैं। भारत के हम विद्यार्थियों में भी सोच की इतनी गहराई, इतना संतुलन आ पाए, तो और क्या चाहिए?
सुधीर साहु, नई दिल्ली

गर्भनाल का जनवरी 2019 विशेषांक "निवासिनी हिंदी - प्रवासिनी हिंदी" आपकी समर्पित और विचारोत्तेजक पहल है। श्री रमेश जोशी ने अपने लेख "तुम ही जरा पहल कर देखो" में हिंदी में शोध, शिक्षा, लेखन और अकादमियों, आदि पर वस्तुगत और तीखे प्रश्न उठाए हैं। अक्षम सरकारी अध्यादेश हिंदी को सशक्त संपर्क भाषा नहीं बना सकते। पहला दायित्व हिंदी के रचनाकारों का है कि वे शैक्षणिक स्तर के अनुसार सम्बंधित विषयों पर हिंदी में श्रेष्ठ साहित्य रचें।
डॉ. ओम निश्चल का आलेख "हिंदी पर अंग्रेज़ी की प्रेत छाया" सरकारी मनोदशा को बयान करता है। आधे-अधूरे मन के साथ हिंदी में राजकाज करने की इच्छा के कारण आज देश में अल्पमत वाली अंग्रेज़ी बहुमत वाली हिंदी पर हुकुम चला रही है।
धर्मपाल महेंद्र जैन, टोरंटो

ताजा अंक मिला। गर्भनाल न्यास ने जो आयोजन कुंडेश्वर में किया वह अत्यंत प्रशंसनीय है। रिपोर्टिंग थोड़ी बड़ी होती तो बेहतर रहता। "उन्होंने कहा" वाक्य के पुनरावर्तन ने मूल वक्ता की खोज को रोचक बना दिया बना दिया। आपने बहुत यथार्थ बातें कहीं।
ब्रजेन्द्र श्रीवास्तव, बंगलुरू

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