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सरोकारों से दूर होता सिनेमा
01-May-2017 02:10 PM 1875     

भरत मुनि ने नाटक को काव्य अर्थात साहित्य की सभी विधाओं में सर्वश्रेष्ठ माना है क्योंकि इसमें नृत्य, संगीत, अभिनय, संवाद, दृश्य आदि चेतना को प्रभावित करने वाले सभी उपादानों का समावेश होता है। उसी की तर्ज़ पर आज सिनेमा संचार, संवाद और सम्प्रेषण की सभी विधाओं को सम्मिलित रूप तो है ही, साथ ही अत्याधुनिक तकनीकी का सहयोग भी। ऐसे में सिनेमा अत्यंत प्रभाव पैदा करने वाला एक मध्यम हो गया है, लेकिन जैसा कि होता है - हर तकनीक और मानव के भले के लिए आविष्कृत विज्ञान अंततः साधन संपन्न वर्ग के पास पहुँच कर उनके लिए धन कमाने का साधन बन जाता है और सत्ताओं के लिए अपने स्वार्थ हित वैचारिक साम्राज्य फ़ैलाने का।  आज यदि समस्त संसार में  सिनेमा भी उसी दुर्गति की राह पर चलता हुआ  चाट-पकौड़ी, फ़ास्ट फ़ूड और झुनझुने में बदल गया है तो कोई आश्चर्य की बात नहीं।
साहित्य, धर्म, समाजसेवा, शिक्षा, चिकित्सा आदि ही जब धंधे बन गए हैं तो फिर सिनेमा से ही यह आशा नहीं की जा सकती कि वह एक मिशन बना रहे, समाज को दिशा दिखाए और मानव विकास के आयाम विकसित करे।
इस धंधे में संख्या के हिसाब से भारत सबसे अधिक फ़िल्में बनाता है और धंधे की आर्थिक क्षमता के हिसाब से अमरीकी सिनेमा का बाज़ार सबसे बड़ा है। चूँकि अमरीकी सिनेमा हॉलीवुड कहलाता है तो उसकी नक़ल पर बंबई में भारतीय सिनेमा को बॉलीवुड होना ही था। अब उसी तर्ज़ पर देस में और भी कई वुड चल पड़े हैं लेकिन हैं सब धंधे के मामले में एक जैसे ही।
धंधे का मिशन केवल पैसा होता है। ग्राहक को दुकान पर बुलाने और दो पैसे कमाने से अधिक कोई मकसद नहीं होता। कम से कम और सस्ते से सस्ता माल देकर अधिक से अधिक कमाना। ऐसे में कंटेंट नहीं कमाई अधिक महत्त्वपूर्ण है। जैसे कि फोब्र्स की सूची। काम कैसा भी मगर धंधा गज़ब और अधिकाधिक कमाई का हो। ऐसे में अच्छे काम और मिशन को पिछड़ना ही है। वैसे ही जैसे ख़राब मुद्रा अच्छी मुद्रा को बाज़ार से बाहर कर देती है या कि लम्पटों ने सच्चे सेवकों को राजनीति से बाहर कर दिया है।
फिर भी समय-समय पर ऐसे व्यक्ति आते हैं जो अपने मिशन से अपने कालखंड को प्रकाशित और चमत्कृत कर देते हैं। सिनेमा के इतिहास में अन्य देशों की तरह अमरीका में भी ऐसी फ़िल्में और सीरियल बने हैं जिन्होंने जन मानस को प्रभावित किया है जैसे- अंकल टॉम्स केबिन, रूट्स और इसके बरक्स नस्ल भेदी "द बर्थ ऑफ़ अ नेशन" जैसी फ़िल्में भी बनीं जिन्होंने समाज के एक अन्य पक्ष को भी उजागर किया।
विश्व युद्धों ने भी दुनिया विशेषकर अमरीका के फिल्म उद्योग को बहुत प्रभावित किया। जर्मनी के विरुद्ध फिल्मों में एक ज़बरदस्त अभियान चल पड़ा। हमारे यहाँ भी यदि देशभक्ति की कोई फिल्म बनेगी तो वह पाकिस्तान या चीन के प्रति घृणा के बिना संभव नहीं है।   वही हाल जर्मनी को लेकर अमरीका में बनी फिल्मों का है।
अमरीकी फिल्मों की यह विशेषता है कि वे हर दृश्य और एक्शन में पूर्णता लाने की कोशिश करते हैं। उनकी कहानी मसाला मिलाने के चक्कर में भटकती नहीं और न ही गीतों से उसकी गति में बाधा आती है। कहानी सही अर्थों में कहानी लगती है और अपनी गति से अपनी नियताप्ति को प्राप्त होती है। भारतीय फिल्मों की तरह जबरदस्ती उसे सुखद बनाने का प्रयत्न भी नहीं किया जाता।
फीचर फिल्मों के साथ-साथ बहुत सी डॉक्यूमेंट्री भी बनाई जाती हैं जो वास्तव में बहुत मेहनत से बनाई जाती हैं और उनमें हद दर्जे की पूर्णता लाने की कोशिश की जाती है। ऐसी फ़िल्में अपना अद्भुत प्रभाव भी छोड़ती हैं। इस दृष्टि से "मार्च ऑफ़ पेंगुइन्स" सब के लिए एक दर्शनीय है। भारत में शायद ही ऐसी कोई फिल्म बनी हो क्योंकि हम सोचते हैं जब बिना कुछ खास किए ही धंधा चल रहा है तो काहे की माथाफोड़ी। ऐसी लगन ही नहीं दिखती।
आजकल स्टूडियो में ही कम से कम खर्चे में कार्टून फ़िल्में बन जाती हैं और अच्छी कमाई कर लेती हैं। हालाँकि आज भी डिज्नीलैंड की कार्टून फिल्मों का कोई ज़वाब नहीं है जिन्हें बहुत मेहनत से कुशल कलाकारों ने बनाया था। उनमें तकनीक कम और कला अधिक थी। वे अपनी कहानियों और अभिव्यक्ति के कारण आज भी बच्चों ही नहीं, बड़ों को भी मज़ा देती हैं। नई कार्टून फिल्मों के पात्र डिस्नी कार्टूनों की तरह सुन्दर नहीं होते। भारत में कार्टून फिल्मों में न तो वह मौलिकता दिखती और न ही मेहनत।
बेनहर, स्पार्टकस, टेन कमांडमेंट्स जैसी भव्यता अमरीकी फिल्मकारों के वश की ही बात है। गोन विथ द विंड और सिंडलर्सलिस्ट में कथानक की एकनिष्ठता बनाए रखना भी आसान काम नहीं रहा होगा।
अब तो सिनेमा और अन्य कलाएँ कोई वैचारिक या उद्देश्यपूर्ण चीजें नहीं रह गई हैं। मॉल में रखे सामान की तरह वह भी एक सामान है बिना व्यक्तित्त्व वाला। मशीनों में बना मशीन की तरह भावहीन। अब तो कथानक, संगीत, पात्रों के रंगरूप सभी कुछ कम्प्यूटर तय कर देगा। संवेदनाओं को गैर ज़रूरी बना दिया गया है। एक ऐसा रहस्य और रोमांच गढ़ा जा रहा है जिसका जीवन से कोई लेना-देना नहीं है।
विदेशों, विशेषकर अमरीका में भी जो भारतीय फ़िल्में चलती हैं वे अजीब सा फार्मूला और अज़ीब सा मसाला होता है जिसका सामान्य भारत से कोई संबंध नहीं है।  सभी फ़िल्में एक बेचेहरा तमाशा हैं जिसे दिमाग के बिना ही देखा और बर्दाश्त किया जा सकता है। और फिर उन्हें वहाँ भारत के नाम पर यही परोसा जाता है और उन्हें भारत के प्रति प्रेम प्रदर्शित करने का कुरते-पायजामे और उनके लिए तिलक की तरह यही एक तरीका उपलब्ध है।
सिनेमा के नायक दर्शकों को पागलपन की हद तक उत्तेजित करते हैं। इस जूनून ने ही दक्षिण भारत में अभिनेताओं को राजनीति में स्थापित किया है। हिंदी फिल्मों के नायकों के लिए भी कुछ क्रेज है और कुछ मीडिया-मैनेजमेंट के द्वारा खड़ा किया गया है। वे भले ही ट्विटर पर तरह-तरह के कमेंट देकर अपने आप को जागरूक सिद्ध करते हैं लेकिन वास्तविक जीवन में वैचारिकता, प्रगतिशीलता और आदर्श के स्तर पर वे खरे नहीं उतरते। वे अपने हितों के प्रति बहुत सतर्क है और हर मुद्दे पर सत्ता के साथ खड़े नज़र आते हैं। जबकि अमरीका में आज भी हैती के राहत शिविरों में अभिनेता सिन पेन बोझा ढोते दिख जाते हैं और हैती में अमरीकी भूमिका के लिए उसकी खुली आलोचना करते हैं। प्रसिद्ध अभिनेता जार्ज क्लूनी सूडान में मानवीय त्रासदी और भुखमरी के विरुद्ध प्रदर्शन में भाग लेकर गिरफ्तार हो सकते हैं और हमारे महानायक मंगल-दोष निवारण के नाटक का प्रचार करके पता नहीं कौन-सा सुधारवादी सन्देश देते हैं।

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