ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
सम्पादकीय Next
सात सामाजिक पाप

दु निया में धर्मों का कुछ ऐसा सिलसिला चल निकला कि व्यक्ति पापी करार दिया गया। अगर वह यूरोप का है तो चर्च की खिड़की पर जाकर कन्फेस (स्वीकार) करता है। पर अगर भारतीय सभ्यता पर नजर दौड़ायें तो यहाँ व्यक्

भाषा की दुनिया में आदमी

दुनिया का अर्थ ही यह है कि वह जब बनी होगी तो उसकी पहली इच्छा बोलने की रही होगी। क्योंकि दुनिया अगर है तो किसी से बोले बतियाये बिना आखिर चलेगी कैसे। जब शुरू-शुरू में आदमी पृथ्वी पर आया होगा, निश्चय

भाषा, समाज और राज्य

यह एक तथ्य है कि भाषा पहले आती है और तरह-तरह के रूपाकारों में बहते हुए स्वरों में और पक्षियों के कलरव में बस जाती है। सदियों तक उसके निराकार शब्द वृक्षों पर लगी पत्तियों की तरह हवा में डोलते रहते ह

शब्द, रंग और जीवन

पिछले दिनों सुप्रतिष्ठित चित्रकार, लेखक श्री अमृतलाल बेगड़ का दीर्घायु प्राप्त करने के बाद मध्यप्रदेश के जबलपुर शहर में निधन हो गया। बंगाल स्कूल से दीक्षित बेगड़ जी ने अपनी चित्रकला में लोकरंगी जीवन

मूल्यबोध और जीवन

क्या इस तरह भी विचार कर सकते हैं कि पुरानी पीढ़ी अब लगभग समाप्त हो रही है और कोई बिलकुल नयी तरह की संतति पूरी दुनिया में जन्म ले रही है जिसका मूल्यबोध पहले की पीढ़ी से कुछ अलग है। कभी-कभी ऐसा लगता हो

जीवन एक अनुवाद है

हमने यह कह तो दिया कि जीवन एक अनुवाद है और अनुभव में भी यही आता है कि जीवन एक अनुवाद से ज्यादा कुछ नहीं। एक सहज प्रश्न उठेगा कि जीवन किसका अनुवाद है। आमतौर पर संसार के जो तीन-चार प्रमुख धर्म हैं वे

ऊबे हुए सुखी

ऊबे हुए सुखी - यह पद आधुनिक हिंदी के अत्यंत महत्वपूर्ण कवि रघुवीर सहाय का गढ़ा हुआ है। यह उनके अनेक लेखों में से एक लेख का शीर्षक है। इसी नाम से उनके निबंधों की एक किताब 1983 में प्रकाशित हो चुकी है

प्रकृति, भाषा और हम

आमतौर पर "प्रकृति" शब्द का अर्थ पर्यावरण मान लिया जाता है। पर अगर हम भारतीय दर्शन पर एक सामान्य दृष्टि डाल सकें तो यह भलीभाँति प्रतीत होता है कि प्रकृति का एक गहन अर्थ समूची सृष्टि का स्वभाव भी है।

ख़ुद से पहले हो, ख़ुद के बाद भी हो

जब आदमी पर संसार की द्वंद्वमयी विविधता का भार नहीं आया था और वह अत्यंत प्राचीनकाल में अपने आपको उस प्रकृति के बीच देखता था जो उसकी पहुँच से बाहर थी और जिसके रहस्यों में वह प्रवेश करना चाहता था - हम

हुनर की अभिव्यक्ति

दुनिया के इतिहास में हुनर हमेशा परम्परा सम्मत ही रहे हैं। यह ज़रूर है कि समय के अनुरूप उपकरण गढ़ने वाली दुनिया में उनकी नयी-नयी अभिव्यक्तियाँ होती रही हैं। आदमी अदिकाल में भी घड़ा बनाता था और उसे आज भ

कहीं बोलना बेकार तो नहीं हो गया...

अगर गहराई से विचार करें तो मनुष्य का एक अद्भुत आविष्कार भाषा है। पृथ्वी पर रहने वाले अनेक मनुष्यों ने अपने-अपने भूदृश्यों और आकाश के अनुरूप अपनी-अपनी ध्वनियाँ सुनी हैं, अक्षर बनाये हैं, शब्द गढ़े है

भारतीय समाज में रवीश की आवाज़

इस समय भारत में रवीश कुमार की आवाज़ घर-घर में गूँज रही है। वे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े हुए एक प्रसिद्ध रिपोर्टर हैं। एक ऐसे समय में जब मीडिया राजनेताओं की भक्ति करने में लगा हुआ है रवीश कुमार भार

QUICKENQUIRY
Related & Similar Links
Copyright © 2016 - All Rights Reserved - Garbhanal - Version 12.00 Yellow Loop SysNano Infotech Structured Data Test ^