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सम्पादकीय Next
अप्प दीपो भव
बुद्ध ने अपने शिष्यों से कहा- अप्प दीपो भव। अपना मार्ग चुनने के योग्य बनो। अपने विवेक के प्रकाश में अपना मार्ग स्वयं तय करो। गुरु का काम एक वैचारिक दिशा देना होता है, लेकिन उस ज्ञान का परिस्थिति के अनुसार उपयोग करना शिष्य के अपने विवेक पर निर्भर क...
सब काहू का लीजिये साँचा शब्द निहार
इस सम्पादकीय का शीर्षक महात्मा कबीरदास की यह पंक्ति दुनिया के सभी लोगों को उस भाव की गहराई में डूबने के लिये प्रेरित करती है कि दुनिया की कोई भी भाषा-बोली में जहां-जहां शब्दों में सच्चाई बसी हुई है उसे इस पृथ्वी पर रहने वाले प्रत्येक मनुष्य को खोजते...
गाँधी : जो किया वही कहा, जो कहा वही किया
हिंदी के आधुनिक कवि और कामायनी के रचयिता जयशंकर प्रसाद ने अपनी कविता में कहा - ज्ञान अलग पर क्रिया भिन्न है। पूरी दुनिया 15वीं शताब्दी से इसी परेशानी का शिकार है कि ज्ञान कोई और रास्ता दिखाता आया है और क्रिया किसी और रास्ते पर जा रही है। ज्ञ...
चुनौती ये है कि जैसे कोई चुनौती नहीं
बहुत कम लोगों में गौर से देखने की सामथ्र्य होती है। दिखाई तो सबको देता है पर सब देख पा रहे हैं इस बात पर विश्वास करना कठिन है। पिछले पांच सौ सालों में योरुप ने पूरी पृथ्वी पर बसी दुनिया को इस तरह गढ़ने की कोशिश की है कि पृथ्वी के निवासी चुनौती की प...
बोली, राष्ट्र-भाषा और विश्व-भाषा
दुनिया के सारे समाजशास्त्री और भाषा वैज्ञानिक यह भलीभांति जानते हैं कि पृथ्वी पर जीवन की अभिव्यक्ति सबसे पहले बोली में हुई। बोली प्रकृति और मनुष्य के गहरे अनुभूतिमूलक सम्बन्ध से पैदा होती है। उसकी शुरुआत वनवासीजनों से हुई है जो अपने स्वभाव के अनुर...
हम क्यों करते हैं भाषा की चिंता
केवल भारत में ही नहीं दुनिया के किसी भी देश में किसी के भी घर में कोई बेटा या बेटी पैदा हो और वह एक वर्ष के भीतर अगर बोलना शुरू न करे तो मां-बाप चिंतित हो उठते हैं कि बच्चा क्यों नहीं बोल रहा है। दुनिया के किसी भी घर में पहली चिंता यह नहीं होती कि...
परंपरा और आधुनिकता की समझ
बीसवीं सदी में आधुनिकता की बात खूब हो चुकीं, जिसका यह पैमाना बनाया गया था कि दुनिया के जो विकसित देश हैं उनकी तुलना में दुनिया के अविकसित देश किस तरह उनकी बराबरी करेंगे। यानि परिवहन, तकनीक, बिजली के उत्पादन और सुखोपभोग में दुनिया के अविकसित देश कब...
साहित्य, राजनीति और समाज
उन्नीस सौ छत्तीस ईसवी से पहले भारत के हिंदी साहित्य के परिदृश्य को राजनीति से संचालित नहीं माना जाता था। 1883 ईसवी से जब भारतेंदु हरिश्चंद्र आदि कवियों के नेतृत्व में हिंदी खड़ी बोली ने नयी चाल में ढलना शुरू किया तब से खड़ी बोली और उसमें रचा जा रहा ...
भाषा और देश
भारतीय संस्कृति और साहित्य की लोक और शास्त्रीय परम्परा का प्रतिनिधित्व करने वाले आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की याद आती है। उन्होंने अपने ललित निबंधों के अलावा भी भारत की भाषा, साहित्य, संस्कृति, समाज और जीवन से जुड़ी बहुआयामी ध्वनियों को अपने विच...
इंसानी बिरादरी का ख़्वाब
जब भी दुनिया में छोटे-बड़े संघर्ष और जंग होती है तब एक सुर सुनाई देता है कि लड़ने से पहले बातचीत कर लो। संवाद से ही रास्ता निकलेगा। क्योंकि यह दुनिया ही ऐसी है कि इसमें बहुत दिनों तक दुश्मनी स्थायी रह ही नहीं सकती। दोस्ती की तरफ हाथ बढ़ाये बिना ये दु...
ये आकाशवाणी है...
सुना है कि पिछले बत्तीस सालों से संध्याकाल छह बजे से प्रातःकाल छह बजे तक चलाया जा रहा ऑल इंडिया रेडियो का कार्यक्रम अब बंद किया जा रहा है। इस रेडियो चैनल पर उर्दू, हिंदी और अंग्रेजी में भी जो नाटक, कविता और वार्ताओं के रोचक कार्यक्रम प्रसारित किये...
निवासिनी हिंदी, प्रवासिनी हिंदी
पिछली एक शताब्दी से हिंदी की व्यथा-कथा कही जाती रही है और आज लगता है कि शायद हम न तो हिंदी की व्यथा जान पाये हैं और न ही पूरी तरह उसकी कथा कह पाये हैं। भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में आखिर महात्मा गांधी से लेकर भारतेंदु हरिश्चंद्र तक ने यह...
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