ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
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भाषा और देश
भारतीय संस्कृति और साहित्य की लोक और शास्त्रीय परम्परा का प्रतिनिधित्व करने वाले आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की याद आती है। उन्होंने अपने ललित निबंधों के अलावा भी भारत की भाषा, साहित्य, संस्कृति, समाज और जीवन से जुड़ी बहुआयामी ध्वनियों को अपने विच...
इंसानी बिरादरी का ख़्वाब
जब भी दुनिया में छोटे-बड़े संघर्ष और जंग होती है तब एक सुर सुनाई देता है कि लड़ने से पहले बातचीत कर लो। संवाद से ही रास्ता निकलेगा। क्योंकि यह दुनिया ही ऐसी है कि इसमें बहुत दिनों तक दुश्मनी स्थायी रह ही नहीं सकती। दोस्ती की तरफ हाथ बढ़ाये बिना ये दु...
ये आकाशवाणी है...
सुना है कि पिछले बत्तीस सालों से संध्याकाल छह बजे से प्रातःकाल छह बजे तक चलाया जा रहा ऑल इंडिया रेडियो का कार्यक्रम अब बंद किया जा रहा है। इस रेडियो चैनल पर उर्दू, हिंदी और अंग्रेजी में भी जो नाटक, कविता और वार्ताओं के रोचक कार्यक्रम प्रसारित किये...
निवासिनी हिंदी, प्रवासिनी हिंदी
पिछली एक शताब्दी से हिंदी की व्यथा-कथा कही जाती रही है और आज लगता है कि शायद हम न तो हिंदी की व्यथा जान पाये हैं और न ही पूरी तरह उसकी कथा कह पाये हैं। भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में आखिर महात्मा गांधी से लेकर भारतेंदु हरिश्चंद्र तक ने यह...
यायावर शिल्पी - पण्डित बनारसीदास चतुर्वेदी
पण्डित बनारसी दास चतुर्वेदी 20वीं सदी की शुरूआत में भारत के उन लोगों में से एक हैं जो स्वतंत्रता संग्राम को प्रारंभ होता देख रहे थे और उसके समानांतर स्वतंत्र हिंदी पत्रकारिता की चिंता भी उन्हें थी। वे अकेले पत्रकार नहीं थे, उन्हें पत्रकारिता को सा...
सात सामाजिक पाप
दु निया में धर्मों का कुछ ऐसा सिलसिला चल निकला कि व्यक्ति पापी करार दिया गया। अगर वह यूरोप का है तो चर्च की खिड़की पर जाकर कन्फेस (स्वीकार) करता है। पर अगर भारतीय सभ्यता पर नजर दौड़ायें तो यहाँ व्यक्ति अपने पाप किसी धर्माचार्य के सामने स्वीकार नहीं ...
भाषा की दुनिया में आदमी
दुनिया का अर्थ ही यह है कि वह जब बनी होगी तो उसकी पहली इच्छा बोलने की रही होगी। क्योंकि दुनिया अगर है तो किसी से बोले बतियाये बिना आखिर चलेगी कैसे। जब शुरू-शुरू में आदमी पृथ्वी पर आया होगा, निश्चय ही उसने भोजन की तलाश की होगी, क्योंकि भूख अपने आप ...
भाषा, समाज और राज्य
यह एक तथ्य है कि भाषा पहले आती है और तरह-तरह के रूपाकारों में बहते हुए स्वरों में और पक्षियों के कलरव में बस जाती है। सदियों तक उसके निराकार शब्द वृक्षों पर लगी पत्तियों की तरह हवा में डोलते रहते हैं क्योंकि उन्हें कोई बोलने वाला नहीं होता। आदमी ब...
शब्द, रंग और जीवन
पिछले दिनों सुप्रतिष्ठित चित्रकार, लेखक श्री अमृतलाल बेगड़ का दीर्घायु प्राप्त करने के बाद मध्यप्रदेश के जबलपुर शहर में निधन हो गया। बंगाल स्कूल से दीक्षित बेगड़ जी ने अपनी चित्रकला में लोकरंगी जीवन और उसकी संस्कृति को कई-कई बार उकेरा और उसके रेखाचि...
मूल्यबोध और जीवन
क्या इस तरह भी विचार कर सकते हैं कि पुरानी पीढ़ी अब लगभग समाप्त हो रही है और कोई बिलकुल नयी तरह की संतति पूरी दुनिया में जन्म ले रही है जिसका मूल्यबोध पहले की पीढ़ी से कुछ अलग है। कभी-कभी ऐसा लगता होगा कि अब पुराने दादा-नानी नहीं रहे, वे पुराने शिक्...
जीवन एक अनुवाद है
हमने यह कह तो दिया कि जीवन एक अनुवाद है और अनुभव में भी यही आता है कि जीवन एक अनुवाद से ज्यादा कुछ नहीं। एक सहज प्रश्न उठेगा कि जीवन किसका अनुवाद है। आमतौर पर संसार के जो तीन-चार प्रमुख धर्म हैं वे तो यही कहेंगे कि जीवन ईश्वर का अनुवाद है। तब फिर ...
ऊबे हुए सुखी
ऊबे हुए सुखी - यह पद आधुनिक हिंदी के अत्यंत महत्वपूर्ण कवि रघुवीर सहाय का गढ़ा हुआ है। यह उनके अनेक लेखों में से एक लेख का शीर्षक है। इसी नाम से उनके निबंधों की एक किताब 1983 में प्रकाशित हो चुकी है। रघुवीर सहाय सिर्फ कवि ही नहीं पत्रकार भी थे। वे ...
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