ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
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कहीं बोलना बेकार तो नहीं हो गया...
कहीं बोलना बेकार तो नहीं हो गया...

अगर गहराई से विचार करें तो मनुष्य का एक अद्भुत आविष्कार भाषा है। पृथ्वी पर रहने वाले अनेक मनुष्यों ने अपने-अपने भूदृश्यों और आकाश के अनुरूप अपनी-अपनी ध्वनियाँ सुनी हैं, अक्षर बनाये हैं, शब्द गढ़े है ...

01-Jan-2018 01:24 PM 180
भारतीय समाज में रवीश की आवाज़
भारतीय समाज में रवीश की आवाज़

इस समय भारत में रवीश कुमार की आवाज़ घर-घर में गूँज रही है। वे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े हुए एक प्रसिद्ध रिपोर्टर हैं। एक ऐसे समय में जब मीडिया राजनेताओं की भक्ति करने में लगा हुआ है रवीश कुमार भार ...

01-Dec-2017 10:50 AM 179
कवि, समय और भाषा
कवि, समय और भाषा

हिंदी के साहित्य प्रेमियों के लिये यह एक सुखद अनुभूति होनी चाहिये कि इस भाषा के अप्रतिम कवि श्री कुँवर नारायण नब्बे वर्ष की आयु पार कर रहे हैं। पर इसी के साथ एक दु:खद स्थिति भी बनी हुई है कि वे पिछ ...

01-Nov-2017 12:39 PM 278
भाषा का विश्वरूप और हमारा सॉफ्टवेयर
भाषा का विश्वरूप और हमारा सॉफ्टवेयर

भारत में एक दार्शनिक पद्धति यह भी है कि पूरा विश्व शब्द रूप है। हमारे ज्ञानियों और भक्तिकाल के कवियों ने सदियों तक शब्द साधना की है तथा शब्द को पूरी सृष्टि के केन्द्र में जगह दी है। वे अपने अंतज्र् ...

01-Oct-2017 12:26 PM 441
वास्तविक हिंदी सेवी कौन?
वास्तविक हिंदी सेवी कौन?

भारत में हिंदी कभी सत्ता की भाषा नहीं रही। वह सत्ता के विरुद्ध संग्राम की भाषा रही है। इसीलिये अगर वो राजभाषा ना भी बन पाये तो उसमें उसका कोई अपमान नहीं है।
हिंदी का विकास दूसरी भारतीय भाषाओं ...

01-Sep-2017 10:01 AM 440
स्मृति के द्वार पर दस्तक
स्मृति के द्वार पर दस्तक

भाव तो सभी के मन में उठते हैं, अनुभूति बनते हैं और फिर कुछ कहने की इच्छा होती है। पर लेखक के जीवन में निरंतर एक ऐसा स्मृति संचय होता रहता है जो लेखक से खुद अपना साक्षात्कार तो करवाती ही है वह उसे द ...

01-Aug-2017 10:56 PM 596
कथामय विश्व
कथामय विश्व

सं    सार की काल और गति को जानने के लिये मनुष्य ने
    जो पहले दो प्रयत्न किये होंगे उनमें पहला एक-दूसरे
    से सम्वाद और दूसरा सम्वाद करते हु ...

08-Jul-2017 07:26 PM 736
गाँव बसाये नहीं जाते
गाँव बसाये नहीं जाते

जिस तरह शहर बसाये जाते हैं गांव के बसने का ऐसा कोई प्रमाण पृथ्वी पर नहीं मिलता। गांव बसाये नहीं जाते - वे अपने आप बस जाते हैं।
आदिकाल से मानव जीवन हमेशा उस स्थानीयता को पहचानने की कोशिश करता ...

02-Jun-2017 01:20 AM 806
फिल्म : एक प्लास्टिक आर्ट
फिल्म : एक प्लास्टिक आर्ट

हम आज भी सिनेमा घरों में जाते हैं। बहुत रंगबिरंगी और भारत के गांवों-देहातों से दूर,
बल्कि भारत के स्मॉर्ट शहरों से भी दूर लंदन, हांककांग, न्यूयार्क, सिंगापुर में फिल्माई
गई फिल्में देखत ...

01-May-2017 01:20 PM 1323
पत्रकारिता : स्वतंत्र या स्वच्छंद
पत्रकारिता : स्वतंत्र या स्वच्छंद

समाचार-पत्र आधुनिक मनुष्य के ऊपर एक बहुत बड़ा अत्याचार है। साथ ही, वह हमारी संवैधानिक आज़ादी का माध्यम भी है। ...मनुष्य की आजादी एक टेढ़ी खीर है। किसी भी व्यवस्थित समाज में अभिव्यक्ति की पगडंडियां बनत ...

01-Apr-2017 11:42 PM 937
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