ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
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लोक-बोली के निहितार्थ
01-Mar-2017 07:58 PM 478
लोक-बोली के निहितार्थ

भारत में लोक शब्द बहुअर्थी है। यहां की पुराण कथाओं में चौदह लोकों की परिकल्पना की गई है। जिनमें पृथ्वी, आकाश और पाताल लोक भी शामिल हैं। लोक का एक अर्थ उस व्यापक बहुरंगी जीवन से भी है जिसकी सदियों प

अरे यायावर रहेगा याद
01-Feb-2017 12:00 AM 2429
अरे यायावर रहेगा याद

आज यात्राएं होती हैं पर वे पूंजी निवेश के लिये जितनी हैं उतनी शब्द निवेश के लिये नहीं। शब्द निवेश के बिना पूंजी की अर्थहीनता विश्व को ही डुबो देगी। क्योंकि विश्व पूंजी में नहीं शब्द में बसता है। इस

वासी, प्रवासी, अप्रवासी
01-Jan-2017 12:00 AM 1254
वासी, प्रवासी, अप्रवासी

लगभग आधी सदी पहले राजकपूर अभिनीत एक फिल्म - जिस देश में गंगा बहती है बनी थी और उसका शैलेन्द्र का लिखा हुआ एक गीत बहुत प्रसिद्ध हुआ - होठों पे सचाई रहती है, जहाँ दिल में सफाई रहती है, हम उस देश के व


तुम निरखो, हम नाट्य करें...
01-Dec-2016 12:00 AM 1246
तुम निरखो, हम नाट्य करें...

भारत की नाट्य परम्परा पूरे संसार में अपने विशिष्ट रंग प्रयोजनों के लिये विख्यात है। भारत के रंगमंच की जड़ें आदिम और पौराणिक समय से ही बहुत गहरी होती आयी हैं। पिछले दो ढाई हजार सालों में इनमें अनेक प

छोड़ अइली हिंदुस्तनवा बबुआ पेटवा के खातिर
01-Nov-2016 12:00 AM 2046
छोड़ अइली हिंदुस्तनवा बबुआ  पेटवा के खातिर

भारत की हुनरमंद जातियां अपनी कारीगरी और कला कौशल के लिये पूरे संसार में पहचानी गयी हैं। भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के आने तक यही जातियां भारत को समृद्ध बनाने में सदियों से अपना योगदान दे रही थीं। व

निबंध गद्य की कसौटी है...
01-Oct-2016 12:00 AM 2435
निबंध गद्य की कसौटी है...

हिंदी में निबंध उन्नीसवीं सदी के उदारतावादी युग में उपजा है। क्योंकि उस समय वैचारिक स्वाधीनता ही मनुष्य की पहली प्रतिज्ञा थी। स्वाधीनता के साथ वैचारिक सहिष्णुता भी अपने आप आती है। विचार प्रतिपादन क


हिंदी नयी चाल में ढले...
01-Sep-2016 12:00 AM 2432
हिंदी नयी चाल में ढले...

इस बदलते विश्व में केवल अंग्रेजी को कोसने से काम नहीं चलेगा, बल्कि अपनी
भाषाओं को पोसने से ही हम पूरे संसार के साथ कदम मिलाकर चल सकेंगे।
हिंदी के लिये हिंदी

आज़ादी की कीमत
01-Aug-2016 12:00 AM 150
आज़ादी की कीमत

देश केवल लोगों के रहने की जगह का नाम नहीं है, वह तो सहकार भावना से जीवन को आपस में सँवारने की जगह है। किसी भी देश के लोग कभी भी अकेले-अकेले जीवन नहीं जी सकते, उन्हें तो साथ रहकर ही जीवन की सुन्दर क

वर्षा-मंगल
01-Jul-2016 12:00 AM 1189
वर्षा-मंगल

ऋग्वेद के पाँचवे मंडल के 83वें सूक्त की इस प्रथम ऋचा में उस वैदिक महा¶ाक्ति¶ााली, दानवीर और भीम गर्जना करने वाले पर्जन्य देवता की स्तुति की गई है, जो वृषभ के समान निर्भीक है और पृथ्वीतल क


चल हंसा वा देस
01-Jun-2016 12:00 AM 1153
चल हंसा वा देस

अपना देश, खासकर मध्यकालीन भारत फ़क़ीरों का देश रहा है। अरबी का एक मूल है -फ़-क़-र, जिसका अर्थ है - निर्धनता। इसी मूल से फ़क़ीर शब्द की निष्पत्ति हुई है। फ़क़ीर परंपरा को मध्यकाल में देश पर बाह्र आक्रमणों क

जल-जागृति
01-May-2016 12:00 AM 227
जल-जागृति

जल ही जीवन है। इस ¶ाा·ात सत्य से कौन इनकार करेगा? लेकिन इस सत्य के पक्ष में बोलना एक बात है और रोजमर्रा के आचरण में उतारना बिलकुल दूसरी बात। जल की महिमा सनातनकाल गायी जाती रही है। रहिमन

अवधूता, गगन घटा गहरानी
01-Apr-2016 12:00 AM 235
अवधूता, गगन घटा गहरानी

अदिम मनुष्य बादल, आसमान, सागर, तूफान, नदी, पहाड़, विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधों, जीव-    जन्तुओं के बीच अपने आपको असुरक्षित, असहाय और असमर्थ महसूस करता था। वह भय, कौतूहल और जिज्ञासा से


स्मृति चारण
01-Mar-2016 12:00 AM 123
स्मृति चारण

जीवन के कुछ अनुभव ऐसे होते हैं जिनकी हम व्याख्या नहीं कर पाते। मैं मात्र बीस महीनों के लिए ईशान भारत के असम राज्य के सिलचर में रहा था। यह बात करीब छप्पन साल पहले की है। वहाँ के लोगों से अप्रत्याशित

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