ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
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गाँव बसाये नहीं जाते
गाँव बसाये नहीं जाते

जिस तरह शहर बसाये जाते हैं गांव के बसने का ऐसा कोई प्रमाण पृथ्वी पर नहीं मिलता। गांव बसाये नहीं जाते - वे अपने आप बस जाते हैं।
आदिकाल से मानव जीवन हमेशा उस स्थानीयता को पहचानने की कोशिश करता ...

02-Jun-2017 01:20 AM 121
फिल्म : एक प्लास्टिक आर्ट
फिल्म : एक प्लास्टिक आर्ट

हम आज भी सिनेमा घरों में जाते हैं। बहुत रंगबिरंगी और भारत के गांवों-देहातों से दूर,
बल्कि भारत के स्मॉर्ट शहरों से भी दूर लंदन, हांककांग, न्यूयार्क, सिंगापुर में फिल्माई
गई फिल्में देखत ...

01-May-2017 01:20 PM 442
पत्रकारिता : स्वतंत्र या स्वच्छंद
पत्रकारिता : स्वतंत्र या स्वच्छंद

समाचार-पत्र आधुनिक मनुष्य के ऊपर एक बहुत बड़ा अत्याचार है। साथ ही, वह हमारी संवैधानिक आज़ादी का माध्यम भी है। ...मनुष्य की आजादी एक टेढ़ी खीर है। किसी भी व्यवस्थित समाज में अभिव्यक्ति की पगडंडियां बनत ...

01-Apr-2017 11:42 PM 207
लोक-बोली के निहितार्थ
लोक-बोली के निहितार्थ

भारत में लोक शब्द बहुअर्थी है। यहां की पुराण कथाओं में चौदह लोकों की परिकल्पना की गई है। जिनमें पृथ्वी, आकाश और पाताल लोक भी शामिल हैं। लोक का एक अर्थ उस व्यापक बहुरंगी जीवन से भी है जिसकी सदियों प ...

01-Mar-2017 07:58 PM 674
अरे यायावर रहेगा याद
अरे यायावर रहेगा याद

आज यात्राएं होती हैं पर वे पूंजी निवेश के लिये जितनी हैं उतनी शब्द निवेश के लिये नहीं। शब्द निवेश के बिना पूंजी की अर्थहीनता विश्व को ही डुबो देगी। क्योंकि विश्व पूंजी में नहीं शब्द में बसता है। इस ...

01-Feb-2017 12:00 AM 2632
वासी, प्रवासी, अप्रवासी
वासी, प्रवासी, अप्रवासी

लगभग आधी सदी पहले राजकपूर अभिनीत एक फिल्म - जिस देश में गंगा बहती है बनी थी और उसका शैलेन्द्र का लिखा हुआ एक गीत बहुत प्रसिद्ध हुआ - होठों पे सचाई रहती है, जहाँ दिल में सफाई रहती है, हम उस देश के व ...

01-Jan-2017 12:00 AM 1443
तुम निरखो, हम नाट्य करें...
तुम निरखो, हम नाट्य करें...

भारत की नाट्य परम्परा पूरे संसार में अपने विशिष्ट रंग प्रयोजनों के लिये विख्यात है। भारत के रंगमंच की जड़ें आदिम और पौराणिक समय से ही बहुत गहरी होती आयी हैं। पिछले दो ढाई हजार सालों में इनमें अनेक प ...

01-Dec-2016 12:00 AM 1434
छोड़ अइली हिंदुस्तनवा बबुआ पेटवा के खातिर
छोड़ अइली हिंदुस्तनवा बबुआ  पेटवा के खातिर

भारत की हुनरमंद जातियां अपनी कारीगरी और कला कौशल के लिये पूरे संसार में पहचानी गयी हैं। भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के आने तक यही जातियां भारत को समृद्ध बनाने में सदियों से अपना योगदान दे रही थीं। व ...

01-Nov-2016 12:00 AM 2224
निबंध गद्य की कसौटी है...
निबंध गद्य की कसौटी है...

हिंदी में निबंध उन्नीसवीं सदी के उदारतावादी युग में उपजा है। क्योंकि उस समय वैचारिक स्वाधीनता ही मनुष्य की पहली प्रतिज्ञा थी। स्वाधीनता के साथ वैचारिक सहिष्णुता भी अपने आप आती है। विचार प्रतिपादन क ...

01-Oct-2016 12:00 AM 2624
हिंदी नयी चाल में ढले...
हिंदी नयी चाल में ढले...

इस बदलते विश्व में केवल अंग्रेजी को कोसने से काम नहीं चलेगा, बल्कि अपनी
भाषाओं को पोसने से ही हम पूरे संसार के साथ कदम मिलाकर चल सकेंगे।
हिंदी के लिये हिंदी ...

01-Sep-2016 12:00 AM 2620
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