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समाधि-दर्शन : बिन्दु-बिन्दु विचार
01-Aug-2018 12:30 AM 2932     

हिन्दू-दर्शन में कपिल मुनि सांख्ययोग (ज्ञानयोग) के प्रवर्तक माने जाते हैं और पतंजलि योग-सूत्र (राजयोग) के। सांख्य-दर्शन के अनुसार (1) दैहिक, (2) भौतिक, तथा (3) दैविक दु:खों (क्लेशों) का निवारण किया जा सकता, परन्तु इसके लिये सही ज्ञान की प्राप्ति के साथ-साथ सही कर्म भी करना चाहिये। पतंजलि का योग-सूत्र दु:ख दूर करनेे के लिये एक उपयोगी अभ्यासिक (द्रद्धठ्ठड़द्यत्ड़ठ्ठथ्) ज्ञान है। संक्षेप में, राजयोग (त्) शरीर तथा मन को स्वस्थ्य रख दु:ख के हेतु चित्त-वृत्तियों (मन में जो भी विचार उठते हैं उसे वृत्ति कहते हैं।) के निरोध का उपाय बतलाता है तथा (त्त्) जीव-मुक्ति यानि समाधि के लिये उत्कृष्ट मार्ग भी दिखलाता है। ज्ञान और योग का सतत अभ्यास जीव को अन्तत: संसार में आवागमन, जन्म-मृत्यु के चक्कर, अथवा कारण-कार्य जंजाल से विमुक्त कराता है ।
इसी तरह, बौद्ध-दर्शन के मूल सिद्धांत "चत्वारि आर्यसत्यानि" के अनुसार संसार में (1) दुःख है, (2) दुःख का कारण है, (3) दुःख का निवारण है, तथा (4) दुःख निवारण के लिये अष्टांगिक सम्यक् मार्ग (दृष्टि, संकल्प, वाक्, कर्म, जीविका, प्रयास, स्मृति तथा समाधि) है। बौद्ध-दर्शन की माहायान शाखा के दो प्रमुख वादों में नागार्जुन का "माध्यमिक" सम्प्रदाय (शून्यवाद) तथा न्यायिक बन्धु-द्वय असंग एवं वसुबन्धु का "योगाचार" विचार है। अश्वघोष ने अपने ग्रन्थ "महायान-श्रद्धोपाद-शास्त्र" (च्र्ण्ड्ढ ॠध्र्ठ्ठत्त्ड्ढदत्दढ़ दृढ क़ठ्ठत्द्यण्) में इन दो दृष्टिकोणों को इस सरलता से समझाया है कि माध्यमिक एवं योगाचार की विचार-धाराओं तथा सांख्य और योग-सूत्र में एक साम्य-सा दिखलायी पड़ता है। इस लेख में हम सिर्फ सांख्य और योग दर्शनों की ही चर्चा करेंगे और वह भी समाधि (निर्वाण, मोक्ष, अथवा कैवल्य) के सन्दर्भ में। माध्यमिक, योगाचार तथा श्रद्धोपाद-शास्त्र विमुक्त चेतन को शून्य (ज्दृत्ड्ड), तथत् (च्द्वड़ण्दड्ढद्मद्म, च्र्ण्ड्ढ-दड्ढद्मद्म) अथवा तथागत-गर्भ कहता है। ध्यान रहे कि जीव/ब्रह्म (तथत्/शून्य (शून्य (ध्दृत्ड्ड) और ब्रह्म (द्वदत्ध्ड्ढद्धद्मठ्ठथ्) एक-दूसरे के पूरक (ड़दृथ्र्द्रथ्ड्ढथ्र्ड्ढदद्यठ्ठद्धन्र्) हैं। ग़्द्वथ्थ् तथा छदत्ध्ड्ढद्धद्मठ्ठथ् च्ड्ढद्य की पूरकता गणित का भी सिद्धान्त है ।)) की "मुक्त" अवस्था का नाम ही समाधि है।
साधारण अर्थ में समाधि का तात्पर्य है अच्छी तरह चारों ओर से सिमटकर एक में स्थिति या अचल हो जाना। समाधि का विषय स्थूल या सूक्ष्म हो सकता है, मन का विचार हो सकता है, बौद्धिक ज्ञान हो सकता है, अस्मिता (क्ष्-दड्ढद्मद्म) हो सकता है, अथवा आनन्द हो सकता है। इसमें साधक योग के सोपानों (यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा और ध्यान) से एक ऐसी अवस्था (डथ्त्द्मद्म) में पहुँचता है जहाँ समाधि-विषय के अवयव बिखर जाते हैं और दृष्य तथा द्रष्टा में भेद नहीं बचता है। उदाहरण के लिये गाय को लें। इसमें शब्द गाय है, गाय का परिचय (चौपाया, दूध देने वाला पशु) उसका अर्थ है, परन्तु गाय का शरीर जो पंच-महाभूतों या तन्मात्राओं यानि पदार्थ का विषय है उसका ज्ञान है। साधारणत: शब्द, अर्थ और ज्ञान इस तरह मिले होते हैं कि इनमें सहसा विभाग नहीं होता। परन्तु ध्यान-सिद्धि से यह तीनों भिन्न-भिन्न प्रतीत होने लगते हैं और तब विषय के सम्यक् ज्ञान का अंत:करण में अनुभव होता है। यही अनुभव "समाधि" है।
प्रश्नोत्तर
प्रश्न : मैं कौन हूँ? नाम, शरीर, या जीव?
उत्तर : अहं ब्रह्मास्मि, तत्त्चमसि, अथवा सोऽहं।
प्रश्न : वह (ब्रह्म) कौन है?
उत्तर : वह सनातन (ढद्धड्ढड्ढ दृढ द्यत्थ्र्ड्ढ), निराकार (ढद्धड्ढड्ढ दृढ ड्डत्थ्र्ड्ढदद्मत्दृदठ्ठथ्त्द्यन्र्), तथा कारण-कार्य-सिद्धान्त से परे है।
प्रश्न : अगर मैं वह हूँ तो मैं उस जैसा क्यों नहीं?
उत्तर : वास्तव में मैं पुरुष (ब्रह्म/जीव (कुछ विचारक जीव को ब्रह्म से अलग मानते हैं। उनके अनुसार चित्त में प्रतिबिम्बित ब्रह्म का ज्ञान "जीव" है । इस लेख में, मैंने इन दोनों को एक माना है।) और प्रकृति के संयोग से बना हूँ। प्रकृति विस्तार के त्रिआयामी (द्यण्द्धड्ढड्ढ द्मद्रठ्ठड़ड्ढ ड्डत्थ्र्ड्ढदद्मत्दृदद्म), काल-चक्र (समय) तथा कारण-कार्य सिद्धान्तों में बँधी तीन गुणों यथा सत्, रज तथा तम से युक्त पदार्थ (पदार्थ की यह व्यापक परिभाषा आधुनिक वैज्ञानिकों के पदार्थ (ग्ठ्ठद्यद्यड्ढद्ध) की संकुचित परिभाषा से थोड़ी अलग है।) है। अत: प्रकृति बन्धन है और इसने बन्धन-मुक्त ब्रह्म को "बीज" बना संसार का सृजन किया है। जब ज्ञान से अज्ञान मिटेगा तथा अज्ञान मिटने से अहंकार हटेगा तब जन्म-मृत्यु के आवागमन का चक्कर समाप्त होगा। यही मुक्ति का रहस्य माना गया है। मैं और वह की एकता से "जीव" (पुरुष) को "समाधि" मिलती है।
प्रश्न : आज हम विज्ञान के ऐसे ठोस धरातल पर आ पहुँचे हैं जहाँ मनुष्य छोटी-से-छोटी तथा बड़ी-से-बड़ी वस्तुओं की जाँच-परख कर देख रहा है फिर वह (ब्रह्म) हमारी समझ या पहुँच से अछूता कैसे बचा है?
उत्तर : इसका उत्तर लंबा है। विज्ञान के पथ पर चलते हुये एक तरफ भौतिकी ने पदार्थ की संरचना में छोटे से छोटे कणों को देखा और पहचाना है। पदार्थ को तोड़ते हुये कण (द्रठ्ठद्धद्यत्ड़थ्ड्ढ) और तरंग (ध्र्ठ्ठध्ड्ढ) के द्वैत धरातल पर पहुँच कर वह अपने ही सिद्धान्तों को लेकर ठिठक गया है। घ्र्द्वठ्ठदद्यद्वथ्र् च्र्ण्ड्ढदृद्धन्र् का यह द्वैतवाद जहाँँ प्रेक्षक से रहित (दृडद्मड्ढद्धध्ड्ढद्ध-त्दड्डड्ढद्रड्ढदड्डड्ढदद्य) सत्ता (द्रद्धदृद्रड्ढद्धद्यत्ड्ढद्म) का अभाव है शायद उस विज्ञान का द्योतक है जहाँ "चेतन" अपना नाटक खेल रहा है। अपरा (पदार्थ ज्ञान, थ्र्ठ्ठद्यड्ढद्धत्ठ्ठथ् त्त्ददृध्र्थ्ड्ढड्डढ़ड्ढ) से परा विद्या (ब्रह्म ज्ञान) की राह चेतन की अवधारणा चाहती है, जिसके लिये "प्रयोग की कसौटी से जाँचने वाला आज का विज्ञान" अभी तैयार नहीं है।
दूसरी तरफ, भौतिकी से अलग जीव-वैज्ञानिकों ने कोशिका (ड़ड्ढथ्थ्द्म) का विघटन करते हुये न्युक्लियस, प्रोटोप्लाज्म, क्रोमोजोन, जीन, क़्ग़्ॠ, तथा ङग़्ॠ को भलीभाँति समझा एवं जेनोटाइप/फेनोटाइप में अन्तर किया है, परन्तु अनुभव, कल्पना, इच्छा, अहंकार आदि विचारों को रसायन के सूत्रों में नहीं बाँट पाया है। उनके लिये मस्तिष्क का विचार तन्त्र पदार्थ का उपफल (ड्ढद्रत्द्रण्ड्ढददृथ्र्ड्ढददृद) है। इसके चलते "मनुष्य एवं पशु-पक्षी की सोच एक-सी होती है" ऐसी अवधारणा है। प्रजाति को बनाये रखने वाले मौलिक-विचारों (निद्रा, आहार, भय, मैथुन) में साम्य हो सकता है, परन्तु राग, द्वेष, मद, मोह, लोभ, ईष्र्या वाले भावों में स्पष्ट अन्तर है। यहाँ फिर अपरा और परा विद्या के भेद की आवश्यकता है।
वैदिक ऋषियों ने इस अन्तर को समझकर ज्ञान को विद्या (पुरुष तथा प्रकृति पर आधारित पूर्ण ज्ञान) तथा अविद्या (पदार्थ पर आधारित अपूर्ण ज्ञान) के रूपों में ग्रहण किया। उनके अनुसार अविद्या ही "संसार" के क्लेशों का मूल है तथा विद्या-बुद्धि का जागरण मोक्ष की तरफ बढ़ाया हुआ कदम है।
ज्ञान सुमन (सांख्ययोग का मार्ग संगत है)
कपिल के सांख्ययोग अर्थात् ज्ञानयोग की बातें निम्नलिखित हैं। इन्हें स्पष्ट करने के लिये दो चित्र भी दिये गये हैं।
- ब्रह्म एक है। वह मुक्त, शाश्वत तथा अनश्वर है। उसका निवास देव-लोक कहलाता है ।
- पुरुष (जीव) और प्रकृति अर्थात् दो के संयोग से संसार (सृष्टि) की उत्पत्ति होती है। जीवन-मृत्यु या संसार में आवागमन इस "संयोगी" शरीर का धर्म है क्योंकि यह "संयोग" बन्धन-युक्त है।
- प्रकृति का स्थूल (क्रद्धदृद्मद्म) तथा सूक्ष्म (च्द्वडद्यथ्ड्ढ) काया-रूप जब पुरुष के कारण (क्ठ्ठद्वद्मठ्ठथ्) शरीर से मिलता है तब यह तीन का संयोग व्यक्त रूप में रहता है। यह बन्धन नश्वर है और मत्र्य-लोक में निवास करता है। स्थूल काया अन्नमय (शरीर) तथा सूक्ष्म काया प्राणमय (प्राण), मनोमय (मन), एवं विज्ञानमय (बुद्धि) कोशों से बना है ।
स्थूल काया का अलग होना मृत्यु है और यह बन्धन का अव्यक्त रूप है। इसमें सूक्ष्म-काया के कुछ हिस्सों का कारण शरीर से "संयोग" बना रहता है। यह बन्धन भी नश्वर है। परन्तु, यह अव्यक्त रूप आत्मा-लोक में निवास करता है।
- पुरुष बन्धन-युक्त होकर मत्र्य-लोक तथा आत्मा-लोक के बीच भटकता रहता है जहाँ वह सतत दु:खों तथा कृत कर्मों के आधीन रहता है। योग नियमों का पालन ही उसे क्लेशों/कर्मों से दूर रख अन्तत: मुक्त करवाता है ।
- जड़ प्रकृति तीन गुणों यथा सत्व, रजस एवं तमस् की साम्यावस्था का नाम है। सांख्य दर्शन के अनुसार प्रकृति के 25 तत्त्व हैं : पाँच महाभूत (क्षिति, जल, पावक, वायु, आकाश), पाँच कर्मेन्दियाँ (हस्त, पाद, उपस्थ, पायु, वाक्), पाँच ज्ञानेन्दियाँ (आँख, कान, नाक, जिह्वा, तथा त्वचा) और उनकी पाँच तन्मात्रायें (रूप, शब्द/श्रव्य, गंध, रस/स्वाद, स्पर्श), चार अन्त:करण (मन, बुद्धि, अहंकार, चित्त), तथा एक महत्। प्रकृति से महत्, महत् से अहंकार, अहंकार से तन्मात्रायें, तन्मात्राओं से इन्द्रियाँ और इन्द्रियों से महाभूत की उत्पत्ति होती है। प्रकृति उसको कहते हैं जो सृजन करे। दो तत्वों पुरूष और प्रकृति का संयोग ही महत् की उत्पत्ति का कारण है ।
योग के तीन सूक्ष्म अंगों (धारणा, ध्यान तथा समाधि) को समझने के लिये अन्त:करण का विभाजन आवश्यक है। अन्त:करण के चारों अवयव यद्यपि एक ही हैं, पर कार्यभेद के कारण इनमें नामभेद माना गया है। मन मनन करता है, बुद्धि विवेचन और अहंकार में अस्मिता है जो चित्त में वृत्ति जगाती है। संक्षेप में, ज्ञानेन्द्रियाँ अपक्व तथ्य (अर्थात् तन्मात्रायें रूपी शब्द) बुद्धि को देती हैं। फिर बुद्धि इसे अर्थ प्रदान करता है। अस्मिता इस अर्थ को सम, प्रतिकूल तथा अनुकूल वृत्तियों में सजाकर (राग, द्वेष, विपर्यय आदि वृत्तियों में ढालकर) न केवल चित्त में संस्कार (अ-ज्ञान) इकट्ठा करती है बल्कि कर्मेन्द्रियों को कर्म की तरफ उन्मुख कर भविष्य के संस्कारों का बीजारोपण भी करती है। यह सारा कार्य पलक झपकने से पूर्व हो जाता है। इस तरह संस्कारों के बनने और एकत्रित होते रहने का क्रम सतत जारी है। यही संस्कार दु:ख का हेतु है तथा जीव को कारण-कार्य-सिद्धान्त के अनुसार बन्धन-युक्त किये रहता है ।
- एक और बात, इन्द्रियों तथा उनके नायक मन की चेतना (क्दृदद्मड़त्दृद्वद्मदड्ढद्मद्म) की चार अवस्थायें हैं: जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति, तथा तुरीय। जागृत अवस्था में इन्द्रियाँ और मन दोनों अशान्त रहते हैं। अवचेतन में शरीर (इन्द्रियाँ) निश्चेष्ट लेकिन मन अशान्त होता है। सुषुप्ति (निद्रा) अवस्था मे मन एवं इन्द्रियाँ दोनों शान्त रहते हैं, पर विचार फिर भी बनते बिगड़ते हैं। चेतना की चौथी "तुरीय" अवस्था में साधक मन एवं इन्द्रियों की शान्ति के साथ-साथ निर्विचार हो जाता है। जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति आदि चेतनाएं तुरीय के पर्दे पर ही घटित होती हैं और जैसी घटित होती हैं, तुरीय चेतना उन्हें समुचित हमारे अनुभव/संस्कार को प्रक्षेपित कर देती है।
कार्य प्रणाली (राजयोग एक साधन है)
ज्ञान के अतिरिक्त, समाधि पद के प्रयास के लिये साधक को अपने स्वभाव अनुसार पुरुषार्थ, हठयोग, क्रियायोग, भक्तियोग, कर्मयोग, राजयोग अथवा पतंजलि के अष्टांग योग का मनोयोग से अभ्यास करना चाहिये। रास्ते कई हैं, पर चुनाव अपना वैयक्तिक है। निम्न चित्र के माध्यम से योगों में वर्गीकरण को समझाने का प्रयास किया गया है ।
- यहाँ पुरुषार्थ के चार अंगों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष), कपिल के ज्ञानयोग, तथा पतंजलि के राजयोग को विशिष्ट रूप से दर्शाया गया है। अगर कोई व्यक्ति अपना पुरुषार्थ (कर्तव्य का पालन) धर्म, अर्थ, काम के दायरे में सही ढंग से करता है, तो ऐसा मानते हैं कि वह मोक्ष की राह पर अग्रसर है। हठयोग, क्रियायोग, भक्तियोग, तथा कर्मयोग भी साधक को समाधि के द्वार तक ले जाने में सक्षम हैं, परन्तु यहाँ हम सिर्फ राजयोग की ही विस्तृत चर्चा करेंगे।
- पतंजलि का अष्टांग-योग या राजयोग आठ-सोपानों यथा यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान तथा समाधि से बना है। इस चित्र में यम तथा नियम के प्राकारों के अतिरिक्त पाँच प्राणों को भी दिखाया गया है। प्राण ऊर्जा है। यह शरीर एवं मन की स्थिरता/अस्थिरता को प्रभावित करता है।
यम एवं नियम व्यक्तिपरक तथा सामाजिक व्रत हैं और इनके पालन से साधक का अपने संस्कारों में क्षय करने का मार्ग सरल तथा सुगम हो जाता है। ध्यान रहे - मनुष्य के अन्दर जैसा संस्कार होता है उसी के अनुसार उसकी वृत्तियाँ होती हैं तथा संस्कार ही पुनर्जन्म का हेतु है।
जीव, मन और इन्दियों का पाञ्चभौतिक शरीर से घनिष्ट सम्बन्ध है। व्यायाम के अन्य साधन शरीर को बल प्रदान करते हैं, पर मन को थका देते हैं। आसन के अभ्यास से शरीर तथा मन दोनों स्वस्थ्य रहते हैं। साधक को ऐसे आसन करना चाहिये जो रोग निवारक तथा चेतना जाग्रत करने वाले हैं। यद्यपि चेतना का जागरण प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा और ध्यान से होता है किन्तु उसमें आसन की स्थिरता और सहजता का सहयोग बहुत ही महत्तपूर्ण है।
प्राण, नाड़ियों के माध्यम से शरीर के कण-कण में व्याप्त होकर, ऊर्जा प्रदान करता है। जीवन का चलना/रुकना इसी ऊर्जा पर आधारित है। नासिका द्वारा श्वास-प्रश्वास की गति को लयबद्ध करना प्राणायाम है। इसमें इड़ा, पिगला तथा सुषुम्ना नाड़ियों द्वारा रेचक, पूरक तथा कुम्भक (अन्त: एवं बाह्य दोनों) का उपयोग कर प्राण को सशक्त बनाया जाता है। ऐसा कहा गया है कि प्राण की गति से मन की गति और मन की गति से प्राण की गति है। अत: प्राणायाम के अभ्यास से साधक अपने मन-बुद्धि को संयमित बनाये रखने में सहज रहता है ।
प्रत्याहार में साधक अपनी पाँच ज्ञानेन्दियों को उनके प्रिय विषयों से हटाकर या लौटाकर अन्तर्मुखी बनाने का अभ्यास करना सीखता है। पूर्व में दिये गये अन्त:करण के चित्र से स्पष्ट है कि इन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जिह्वा तथा त्वचा) बाह्य ज्ञान देती हैं। वे अपने-अपने विषयों (रूप, शब्द/श्रव्य, गंध, रस/स्वाद एवं स्पर्श) से मन में वासना उत्पन्न करती हैं, फिर इसे चंचलकर भटकाती हैं और अन्तत: अहंकार के साथ मिलकर राग एवं द्वेषरूपी विकार पैदा करती हैं। इसीलिये कहा गया है- जहाँ मन जाता है, वहाँ शरीर जाता है क्योंकि शरीर रूपी रथ में इन्द्रिय रूपी घोड़ों की लगाम मन ही है। प्रत्याहार-सिद्धि के लिये अजप-जप (जप में मन्त्र मुँह से उच्चरित कर बार-बार दुहराया जाता हैं, जबकि अजप-जप में मन्त्रोचारण मन-ही-मन दुहराया अथवा श्वास-प्रश्वास से संचालित होता है।), योग-निद्रा आदि उपाय बतलाये गये हैं। योग-निद्रा जाग्रत नींद है। इसमें साधक शरीर तथा मन को तनावों से मुक्त करने के लिये अवचेतन अवस्था में मन को (एकाग्र किये बिना) सजग रखने का अभ्यास करता है ।
इन्द्रियों को अन्दर लौटाकर एवं उन्हें विषयों से हटाने के बाद मन को एकाग्र रखना और इसमें संकल्प-विकल्प का अभाव पैदा करना ही धारणा (ड़दृदड़ड्ढदद्यद्धठ्ठद्यत्दृद) है। इस पायदान तक पहुँचकर रथ (शरीर), घोड़े (इन्द्रियाँ), तथा लगाम (मन) तीनों ही नियन्त्रित हो जाते हैं। काया-स्थैर्यम्, त्राटक, एवं अजप-जप आदि उपाय मन को स्थिर रखने के साधन हैं। धारणा-सिद्धि के लिये साधक को इनका अभ्यास करना चाहिये।
राजयोग का सातवाँ सोपान ध्यान (थ्र्ड्ढड्डत्द्यठ्ठद्यत्दृद) है। यह बुद्धि का विषय है। राग-द्वेष, काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि अज्ञान-जनित बन्धन हैं जो बुद्धि में विकार पैदा करते हैं। अत: ध्यान से बुद्धि में इनका अभाव पैदा करना श्रेय माना गया है। यह समझना आवश्यक है कि धारणा में चिन्तन नहीं होता, परन्तु ध्यान में चिन्तन बना रहता है। बौद्ध-मत में आत्मनिरीक्षण द्वारा आत्मशुद्धि के लिये विपश्यना की साधना-विधि का प्रयोग करते हैं। इस विधि के अनुसार अपनी श्वास को देखना और उसके प्रति सजग रहना होता है। देखने का अर्थ उसके आवागमन को महसूस करना है। कहते हैं विपश्यना प्राचीन ऋषियों की एक ध्यान विधि है जिसे भगवान बुद्ध ने पुनर्जीवित किया था।
- दर्शन और अनुभव में यह अन्तर है कि दर्शन बाह्यमुखी इन्द्रियों से होता है जबकि अनुभव अन्तर्मुखी बनकर स्वयं से स्वयं का करना पड़ता है। अनुभव की पराकाष्ठा समाधि है। धारणा द्वारा मन को, फिर ध्यान से बुद्धि को साधने के बाद चित्त में शब्द, अर्थ, ज्ञान का अभेद पैदा करना ही समाधि का ध्येय है। पतंजलि ने अपने योग-सूत्र के समाधिपाद तथा कैवल्यपाद जैसे अध्यायों में इस विषय की विस्तृत चर्चा की है।
उपसंहार : इस लेख की समाप्ति मैं यू.जी. कृष्णामूर्ति (यू.जी) तथा रमण महर्षि (र. म.) के बीच हुये निम्नलिखित प्रश्नोत्तर के उद्धरण से करना चाहूँगा। कहते हैं विवेकानन्द ने भी रामकृष्ण के सामने यही सवाल उठाया था। जर्मन लेखक हर्मन हेश ने अपने उपन्यास "सिद्धार्थ" में कुछ ऐसी ही संशयात्मक बात समाधि के सम्बन्ध में कथा-नायक के मुँह से कहलायी है। अत: यह ऊहापोह हमारी तथा आप की ही नहीं बल्कि सनातन है।
यू.जी. : क्या ब्रह्मानन्द (समाधि) जैसी कोई चीज है?
र.म. : हाँ, है।
यू.जी. : क्या इसका कोई स्तर होता है?
र.म. : नहीं। स्तर कतई संभव नहीं है। यह एक ही चीज है। या तो तुम वहाँ हो या वहाँ नहीं हो।
यू.जी. : क्या तुम ब्रह्मानन्द को मुझे दे सकते हो?
र. म. : हाँ। मैं तुम्हें दे सकता हूँ। लेकिन, क्या तुम इसे ले सकते हो?
महर्षि रमण द्वारा पूछा गया "पात्रता" का प्रतिप्रश्न अति महत्वपूर्ण है। दूसरे शब्दों में ब्रह्मानन्द की खोज शुरू करने के पूर्व साधक को, भीड़ की मानसिकता से अलग हटकर, अपनी जागृत चेतना की इच्छा के अनुरूप कदम उठाना चाहिये और समाधि की राह पर आत्मनिरीक्षण के बाद ही निकलना चाहिये। यह सच है कि साधक ध्यान, वैराग्य और अनुशासन के कठिन अभ्यास से ब्रह्मानन्द (समाधि) की अनुभूति अन्तत: पा जाता है। परन्तु, जिसका अन्त:करण स्वभाव से ही शुद्ध है ऐसे साधकों को यह अनुभव गुरु-कृपा और ईश्वर-प्रणिधान से सहज ही मिल जाता है।

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