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सच्चे मित्र हैं पुस्तकालय
01-Oct-2016 12:00 AM 3861     

विदेश पहुंचने के पश्चात अक्सर प्रवासियों को अपने देश की याद सताती है। मुझे भी अमेरिका पहुंचने के बाद भारत की बहुत याद आती थी, लेकिन एक चीज़ जिसने उदास होने से बचाये रखा वे थे अमेरिका के पुस्तकालय। वहां पहुंचकर मैंने नोट किया कि अगर शहर में स्कूल, गिरजाघर, बाज़ार आदि हैं तो पुस्तकालय भी अलग शान से जमे हुए हैं। दूर से दिखाई दे जाते हैं, और उनके द्वार सभी के लिये खुले हैं। बैठने के लिये पर्याप्त मेज़-कुर्सियां हैं, अध्ययन कक्ष हैं, ग्रुपों में अध्ययन करना हो, तो उसके लिये अलग कमरे हैं, बच्चों का प्रभाग अलग है और छोटे-बड़े आकारों के संगोष्ठी कक्ष हैं। इसके अलावा मदद करने के लिये लायब्रेरियनों का पूरा अमला तो है ही, जिनमें कुछ नियमित कर्मचारी हैं तो कई वालंटियर भी।
जब मैं लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस में, जो संसार की सबसे विशाल लायब्रेरी है, प्रवेश करता था तो मैं भारत को सचमुच भूल जाता था। कहा भी जाता है लायब्रेरी एक ऐसी जगह है जहां मित्रों की कमी नहीं होती। मुझे भी लगता कि मैं अपने मित्रों के बीच हूं। मुझे याद आता है वह दिन जब मैंने अपने एक अभिन्न मित्र गौरीशंकर कपूर की एक रचना लायब्रेरी में देखी थी। मैं आत्मविभोर हो उठा था और उसके बाद एक के बाद अपनी लेखक मित्र मंडली के सदस्यों को तलाश करता चला गया था।
 दुनियाभर की किताबें, हिंदी सहित भारत की अन्य भाषाओं की दुर्लभतम् पुस्तकें मैंने वहां देखीं। सिर्फ पुस्तकें ही नहीं, पुराने समाचारों की माइक्रोफिल्म्स -- दुनियाभर की भाषाओं की - उसके अलावा रिकॉर्ड, फिल्म-क्लासिक्स सभी कुछ वहां था। मुझे अपनी भी कुछ रचनाऐं और कतरने वहां मिलीं, जो भारत की पत्र-पत्रिकाओं में कभी छपी थीं। एक बार मनोहर श्याम जोशी वहां आये तो साप्ताहिक हिंदोस्तान में कभी प्रकाशित हुए उनके कुछ यात्रा संस्मरण मैंने उन्हें वहां से निकलवा कर दिये। वह अपने एक उपन्यास के लिये एक मुकदमे का पूरा विवरण चाहते थे, वह उन्हें वहां से मिला। वह अपने एक उपन्यास कपीश जी के लिये कुछ शोध करना चाहते थे। उसके लिये उन्होंने वर्जीनिया का एक इलाका चुना था जिसका घटना समय शायद सन् 1930-40 का था। वह जानना चाहते थे कि उस समय का वर्जीनिया कैसा था। मैं उन्हें एक ऐसे पुस्तकालय में ले गया जो केवल उसी राज्य के इतिहास पर केंद्रित था, वहां राज्य की सड़कों तक का, उन पर चलने वाले यातायात के साधनों का, शहर की इमारतों तक का इतिहास जाना जा सकता था।
अमरीकी जीवन शैली का यह एक ऐसा पक्ष है जिसकी कमी मैं भारत में आकर भी महसूस करता हूं। दूर-दूर तक जब मुझे भारत में कहीं कोई लायब्रेरी का बोर्ड दिखायी नहीं देता तो मन में सवाल उठता है, यहां लायब्रेरियां क्यों नहीं हैं। तब मुझे कीनियाई लेखक नगूगी की बात याद आती है कि शहरों और गांवों के गरीबों के लिये किताबें लक्ज़री हैं। वे गरीब हैं और उनमें से बेशतर अनपढ़ भी, न तो वे पुस्तकें खरीद सकते हैं और न ही पढ़ सकते हैं, इसलिये उनके लिये किताबों की दुकानों और लायब्रेरियों की ज़रूरत भी क्यों हो।
नगूगी कहते हैं कि इस तरह वह उस जानकारी और ज्ञान से वंचित रह जाते हैं जो उन्हें गरीबी और निरक्षरता के कुचक्र से बाहर निकाल सकते हैं । इसका दोष किस को दें? स्वतंत्रता से पहले जब समाज का असमान विकास होता रहा हो, मतलब कुछ इलाके अधिक विकसित और कुछ कम विकसित रहते चले गये हों और फिर स्वतंत्रता के बाद उसी असमान ज़मीन पर विकास की सारी इमारत खड़ी की जाती रही हो, तो देश के बहुत से क्षेत्रों का पिछड़ते चले जाना कोई बहुत अचम्भे की बात नहीं होनी चाहिये।
अमेरिका में बहुत हद तक ऐसा नहीं हुआ। अगर कालों की बस्तियों में ऐसा हुआ भी, तो नागरिक अधिकार आंदोलन के बाद उस ग़लती में धीरे-धीरे सुधार किया गया। और देशभर में लायब्रेरियों का जाल बिछाया जाने लगा। एक-एक काउंटी यानी स्थानीय प्रशासन क्षेत्र में सात-आठ लायब्रेरियां तो होंगी ही। यह स्कूलों-कॉलेजों की लायब्रेरियों के अलावा हैं। यह सभी के लिये हैं। आप चाहें तो अपनी काउंटी की किसी भी लायब्रेरी से कोई भी पुस्तक सामग्री निकलवा कर किसी भी लायब्रेरी में लौटा सकते हैं। अगर आपके घर के पास वाली लायब्रेरी के पास वह पुस्तक नहीं है तो वह जहां भी है, वहां से मंगवाकर आपको उपलब्ध करायी जाती है।
एक बार मुझे एक पुस्तक चाहिये थी, जो लायब्रेरी में नहीं थी। वह एक कॉलेज की लायब्रेरी में थी। मैं उसे कॉलेज की लायब्रेरी से ले आया और पढ़ने के बाद मैंने उसे अपनी लायब्रेरी में लौटा दिया। मेरे पास मेरी लायब्रेरी का कार्ड है, लेकिन वह न भी हो तो ड्राइविंग लायसेंस दिखा कर भी पुस्तक ईशू करायी जा सकती है।
पुस्तकें तो ले ही सकते हैं, ऑडियो बुक्स, संगीत सुनने से लेकर सीखने तक के टैप लायब्रेरी में उपलब्ध थे, तो आज डीवीडी में मिल जायेंगे। नाटकों की रिकार्डिंग्स, साउंड-इफैक्टस आदि भी सदस्य इशू करा सकते हैं। टैक्स रिटर्न के फॉर्म चाहिये तो लायब्रेरी से मिलेंगे। किसी चीज़ को खरीदने से पहले रिसर्च करना चाहें तो लायब्रेरी चले जाईये।
लायब्रेरी में रोज़ एक न एक कार्यक्रम आयोजित होता है। और स्कूल की छुट्टियों के दिनों में तो किसी दिन बच्चों की आयु को ध्यान में रखते हुए उनको कहानियां या लोकगीत सुनाने के लिये कोई कलाकार आमंत्रित रहता है, तो किसी दिन कोई जादूगर अपने करतब दिखाने आता है। किसी दिन बच्चों को गत्ते के, टुथ-पिक के, चबाई Ïच्वगम आदि के उपयोग से कुछ खेल-तमाशे सिखाये जा रहे हैं, तो महीने में किसी एक शाम उस इलाके के नये-पुराने लेखक अपनी-अपनी रचनाएं एक-दूसरे को सुना कर एक-दूसरे की राय ले रहे होते हैं और किसी शनिवार-इतवार एक न एक आप्रवासी समुदाय अपनी कोई प्रस्तुति कर रहा होता है और कभी कोई प्रदर्शनी लगी होती है। और ये यह सब मुफ्त।
जब से कम्प्यूटर और इंटरनेट आये हैं, लायब्रेरियां उन्हें अधिक से अधिक इस्तेमाल कर रही हैं। लायब्रेरी में इंटरनेट सुविधा मुफ्त है। हालांकि यह अभी सभी लायब्रेरियों में नहीं है। पुस्तकों को "लोकेट" करना आसान हो गया है और अगर कोई पुस्तक रिन्यूू करानी है तो इंटरनेट पर ही रिन्यू करायी जा सकती है। पुस्तकों का डाटा बेस घर में इंटरनेट द्वारा अपने कम्प्यूटर पर ही देखा जा सकता है। इंटरनेट की मदद से पुस्तकें खरीदना भी आसान हो गया है।
मेरे विचार में अमेरिका में शायद ही कोई घर ऐसा हो जिसका एक या एक से अधिक सदस्य लायब्रेरी का सदस्य न हो। बच्चों को छुटपन से ही लायब्रेरी में जाने की आदत डाली जाती है। वह इस तरह कि अमेरिका की शिक्षा प्रणाली में शोध करने पर बहुत ज़ोर दिया जाता है। स्कूलों के बच्चों को प्रोजैक्ट दिये जाते हैं और कहा जाता है कि उसके लिये शोध करें। बच्चे शोध करने के लिये लायब्रेरी में जाते हैं और लायब्रेरी में जाने की आदत पड़ जाने पर वह आजीवन बनी रहती है।
 उपरोक्त बातों के आधार पर कहा जा सकता है कि लायब्रेरी अमेरिका के किसी भी शहर-गांव-बस्ती का धर्मनिरपेक्ष मंदिर है। जब सभी धर्मों के लोग लायब्रेरी में साथ-साथ बैठ कर साझे महत्व के विषयों पर चर्चा करते हैं तो वे एक-दूसरे के करीब आते हैं और धर्मनिरपेक्ष संस्कृति की जड़ें मज़बूत करते हैं।
यहां मिशीगन विश्वविद्यालय के प्रोफैसर रोनाल्ड इंगलहार्ट की बात याद रखने योग्य है। वह अपने एक लेख में कहते हैं अगर हम किसी भी देश में लोकतंत्र को जिंदा रखना चाहते हैं तो हमें चाहिये जागरूक और प्रबुद्ध मतदाता। इसके लिये ज़रूरी है कि मतदाता केवल साक्षर न हो, बल्कि उनकी शिक्षा का स्तर भी अच्छा हो। वह कहते हैं कि साक्षरता मतदाताओं की संख्या में तो वृद्धि कर सकती है और सरकारों को उलट-पलट भी सकती है और अपना फैसला भी सुना सकती है, लेकिन नीति निर्धारण जैसे मामलों में एक प्रबुद्ध नागरिक की तरह बहुत योगदान या सक्रिय भूमिका नहीं निभा सकती। यह इसलिये कि साक्षर मतदाता जब परिस्थितियों से बहुत निराश हो जाते हैं और उनमें असुरक्षा और हताशा की भावना जब बहुत बढ़ जाती है, तो वह फॉसिस्ट ताकतों तक को भी सत्ता में लाने के लिये मतदान कर डालती है जैसे जर्मनी में कभी निर्बाध और मुक्त चुनावों में जर्मन नागरिकों ने हिटलर को ही देश की बागडोर सौप दी थी। लोकतंत्र की मज़बूती के लिये इंटरनेट और कम्प्यूटरों से भी पहले ज़रूरत है पुस्तकालयों के जाल की।
 भारत मेंं मैंने जब कभी अपने कुछ मित्रों का ध्यान भारत में पुस्तकालयों की कमी की ओर खींचा तो अक्सर उनका कहना था कि अब लायब्रेरियों का ज़माना खत्म हो गया है, यह कम्प्यूटर-युग है, सभी कुछ कम्प्यूटर पर उपलब्ध है। अब लोग लायब्रेरियों में कम ही जाते हैं। उनसे सवाल करना चाहिये कि क्या भारत टेक्नालॉजी के क्षेत्र में अमरीका, ब्रिटेन और अन्य पश्चिमी देशों से भी आगे है। अगर उन देशों में आज भी लायब्रेरियां खुल रही हैं, उनको बढ़ाया और नया से नया बनाया जा रहा है, तो भारत में वैसा क्यों नहीं किया जा सकता। लायब्रेरियों में वार्ता कार्यक्रम, सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित  किये जा रहे हैं, डीवीडी उपलब्ध कराये जा रहे हैं, बच्चों के लिये तरह-तरह के कार्यक्रम और वर्कशॉप इत्यादि आयोजित किये जाते हैं। और उनका निरंतर विस्तार हो रहा है। भारत की जनसंख्या तो उनकी जनसंख्या की तुलना में कई गुना अधिक है, इसलिये सारी जनता तक पहुंचने के लिये भारत को तो लायब्रेरियों की कहीं अधिक ज़रूरत है।

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