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सच्चा स्वाभिमान
01-Jun-2018 01:48 AM 1564     

गरीबी, दरिंदगी, संत्रास को ओढ़े हुए
फ़टी हुई चादर को समेटे हुए
बीवी की लटें बिखरी हैं
क्योंकि आड़े में स्वाभिमान है
और उसका कुछ अलग ही नाम है

बड़े नादाँ हैं
पूर्णतया अनजान हैं
इससे अनभिज्ञ कि
उद्यमशीलता पाप नहीं
बल्कि एक छोटी उड़ान है
अपने आशियाने को
सजाने की
उलझी लटों को
सँवारने की
क्योंकि उन्हीं के कदमों में आसमान है
जो हरदम, हरवक्त
चलायमान है
सुबह से डटे हैं
अपनी ही धुन में रमे हैं
उनमें भी स्वाभिमान है
पर अनभिज्ञ नहीं
न ही नादाँ हैं
उनमें दर्प नहीं बल्कि
सच्चा स्वाभिमान है। 

उनमें ज्यादा ही
स्वाभिमान है
किसी काम को
छोटा समझने
का गुमान है
इस कशमकश
में खुद ही
गुमनाम है
बेचारा ही बनने का
अभिमान है,
उद्यमशीलता
उनका अपमान है।

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