ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
सात जन्मों का बंधन
01-Jan-2019 01:54 PM 138     

केवल सात ही क्यों आठ या नौ क्यों नहीं? सवाल टेढ़ा है। पर जाने दो। सवालों का कोई अंत थोड़े ही है। कोई और पूछने लगेगा ग्यारह क्यों नहीं? लेकिन ये बंधन न तो माँ-बाप के साथ होता है न ही भाई-बहनों के साथ। बाक़ी रिश्ते-नाते, अड़ौसी-पड़ौसी तो अल्ला-अल्ला खैरसल्ला हैं; तो फिर जहाँ न ख़ून का रिश्ता, न पानी का यानि मियाँ के साथ बीबी जानी का रिश्ता सात जन्मों का कैसे हो गया? साहबान! यहाँ एक जन्म में रिश्ता निभाना मुश्किल होता है, वहाँ ज़माने वालों ने पंडितों और मौलवियों के साथ मिलकर पूरे सात जन्मों का चक्कर डाल दिया। मर कर भी चैन ना पाया तो किधर जायेंगे! कहते हैं -
ये शादी का सफ़र भी किस क़दर दुश्वार होता है
न कश्ती डूबती है और न बेड़ा पार होता है।
उसके बावजूद भी इतना लम्बा एक्सटेंशन यानि सात सालों का, कमाल है साहब। आदमियों का तो पता नहीं मगर लड़कियों से हमेशा यही कहा जाता है कि बहुत अच्छा लड़का है, हाँ कर दो। अरे अच्छे तो बहुत सारे लड़के होते हैं तो क्या सबसे शादी कर लें? माँ-बाप आधुनिक बनते हुये लड़की को इजाज़त दे देते हैं कि वो लड़के से अकेले में गुफ़्तगू कर ले। ठीक है मगर निर्णय लेने का हक़ लड़की को नहीं होता; मिल लीं, चलो अब शादी कर लो। ज़रूरी नहीं कि लड़के में कुछ खराबी हो लेकिन जनाब हमारी फ़ितरत कुछ मुख़्तलिफ़ है। हम कहना चाहते हैं -
यूँ तो बहुत अच्छा है वो कुछ देर का साथी
पर साथ उसके उम्र बसर कौन करेगा।
ज़ाहिर है कि जब उम्र बसर करने का मसला सामने आता है तो सिर्फ़ एक शख़्स का चेहरा ज़हन में आता है। वो है आपका हमदम, हमक़दम, हमनफ़स, हमनवा, हमवतन और हमसफ़र वगैहरा वगैहरा। ख़याल तो खूबसूरत है लेकिन क्या सचमुच ऐसा होता है? कुछ खुशनसीबों को (अपवाद स्वरूप) छोड़ दीजिये वरना हर कोई शादी को वो लड्डू बताता है जिसे खाओ तो पछताओ, न खाओ तो पछताओ। औरतें बेचारी पति की सफलता की कामना करती हैं और पति रसोई के अलावा किसी भी और क्षेत्र में पत्नी को सफ़ल होते नहीं देख सकते। अपनी बीबी का मज़ाक़ उड़ाना ये जन्म जन्मांतर के साथी अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते हैं। औरतों को लेकर चुटकुले सुनाना, उन पर तंज़ करना, ख़ासकर बीबी के रिश्तेदारों का मज़ाक़ उड़ाना, वो भी चटकारे ले लेकर मर्दों का ख़ास शग़ल होता है। वही काम अगर बीबी कर दे तो भैया महाभारत हो जाये।
शादी से पहले जो लड़के किसी भी कन्या की निगाहें नाज़ के लिये तरसते नज़र आते हैं, वो चाहें कितने भी बेकार, बदसूरत, बदसीरत, निकम्मे, मोटे, नाटे, सींकिया यानि हर ऐब से भरपूर हों, अचानक सर्वशक्तिमान, बुद्धिमान, आलीशान, पहलवान, नाफ़रमान, अजीमुश्शान और अलौकिक प्राणी बन जाते हैं, जैसे ही उनकी शादी हो जाती है, जी हाँ ये जादू शादी होते ही हो जाता है।
अच्छे भले लड़के भी दिखाने लगे जौहर
जैसे ही मुकम्मल हुई शादी, बने शौहर
हाँ साहब यह सच है। अब एक आदमी तो हर तरह की कलाकारी में कुशल नहीं हो सकता इसलिये भिन्न- भिन्न प्रकार के शौहर होते है। प्रथम श्रेणी के पति वो होते हैं जो बड़े यानि परिपक्व होने का नाम नहीं लेते। ये शादीशुदा होने के बावजूद अपनी मम्मी के साथ अभी तक गर्भनाल से जुड़े रहते हैं।
ये हर बात में "मेरी माँ सबसे अच्छी" का राग अलापते रहते हैं। हमने माना कि माँ का सम्मान करना बड़ी अच्छी बात है परन्तु अपनी शरीक- ए-हयात को नीची निगाह से देखना क्या सही है? ज़रा सोचिये अगर बीबी भी अपने अब्बा की तारीफ़ में कसीदे गाने लगे और शौहर को नीचा दिखाने लगे तो मियाँ जी को कैसा लगेगा? इन मम्मी-मम्मी करने वाले पतियों को देखकर बचपन में सुना एक लोकगीत याद आता है - "छोटा सा बलमा मोरा आंगना में गिल्ली खेले।" गाना छोड़िये, एक वाक़या सुनिये - एक बीबी ने शौहर से पूछा "खाना कैसा है?" जवाब मिला "ठीक है, मम्मी ज़्यादा अच्छा बनाती थी।" दूसरा सवाल "कपड़े ठीक प्रेस हुये हैं?" "उम्म्म मम्मी बहुत बढ़िया प्रेस करती थीं।" जितने और सवाल किये उन सबके जवाब में "मम्मी ज़्यादा अच्छी थीं।" भले आदमी जो "थीं" वो थीं, अब जो "है" उसकी भी तारीफ़ कर दे, मगर नहीं, केवल वन्दे मातरम। झल्लायी हुई पत्नी ने उठकर एक झन्नाटेदार थप्पड़ मियाँ के गाल पर रसीद किया और पूछा "मियाँ जी ये अच्छा है या मम्मी वाला ज़्यादा अच्छा होता था?" पतिदेव एकदम किंकर्तव्यविमूढ़।
जनाब! टूटने की कगार पर पहुँच कर ही कोई लड़की इतनी हिम्मत जुटा पाती है - कि अब तो करो या मरो। लेकिन ये हिम्मत दूसरी श्रेणी के पति सामने जवाब दे जाती है। ये दूसरे क़िस्म के नमूने होते हैं- तानाशाह मार्का। अरे वो वाला तानाशाह नहीं जो हिटलर था (हाँलाकि ज़्यादा फ़र्क़ भी नहीं है) ये तो वो लोग हैं जो बिना ताना मारे मुँह ही नहीं खोलते (सिर्फ़ बीबी के सामने)। ये ख़ुद मोटे हों और बीबी पतली तो कहेंगे "मैके में खाना नहीं मिलता था।" ख़ुदा न ख़ास्ता कहीं मियाँ जी सींकिया पहलवान हुए और बीबी मोटी तब तो ख़ुदा ख़ैर करे, बेचारी का खाना-पीना मुहाल कर देंगे। रूप रंग को लेकर भी हालात वही रहते हैं। लुब्बे लुबाव ये कि बीबी की हर हरकत पर, उसके हर हुनर पर ये मोहतरम तंज़ करते हैं। काश इन्हें भी कोई अहलिया (पत्नी) बता सके -
आज ही आज है, मुमकिन है न हो कल मुझमें
इस तरह ऐब निकालो ना मुसल्सल मुझमें।
हमेशा ताने मारने शौहर बाहर वालों के सामने भी वार करने से बाज़ नहीं आते, सिर्फ़ उसे मज़ाक का रूप दे देते हैं। एक साहब अक्सर अपनी पत्नी का "ये मेरी दिल्ली वाली बीबी हैं" कह कर परिचय देते थे। यार दोस्त खूब हँसते थे। पतिदेव के मुखारविंद पर एक अहम भरी संतुष्टि दिखाई देती थी कि वे जाने कितनी बीबियाँ रखते हैं या रख सकते हैं (खुश होने में क्या जाता है)। ख़ैर, एक बार बीबी ने भी, हँसकर कह दिया "जी, ये मेरे मुंबई वाले पति हैं।" पूछिये मत कि क्या हश्र बरपा हुआ, बस कल्पना कीजिये - तसव्वुर में सोचिये किस डिग्री का विस्फ़ोट हुआ होगा।
तीसरी क़िस्म के शौहर थोड़े से परिपक्व होते हैं। लेकिन बस थोड़े से। दरअसल ये ख़ुद को "सर्वज्ञानी" यानि त्त्ददृध्र् ठ्ठथ्थ् समझने की ग़लतफ़हमी का शिकार होते हैं। हर बात में दखलअंदाज़ी, हर चीज़ पर भाषण। बात करने का तरीक़ा भी मास्टराना। बीबी को तो ये आखिरी बेंच पर बैठने वाले विद्यार्थी की तरह समझते हैं। ऐसे लोगों के लिये ही चचा ग़ालिब ने कहा है - "हरेक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है, तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़े गुफ्तगू क्या है।" मगर आप मास्टर जी पर सवाल कैसे उठा सकते हैं। इन लोगों से अन्योक्ति या मुहावरों में ही बात की जा सकती है। इन लोगों को ये मुग़ालता होता है कि ये हमेशा सही होते हैं। कुर्सी के पास ज़मीन पर रखा गिलास अगर इनकी ठोकर से टूट जाये तो चिल्लायेंगे कि किस बेवक़ूफ़ ने यहाँ गिलास रखा? और अगर बीबी से टूट जाये तो बोलेंगे की आँखें हैं या बटन? चित भी अपनी पट भी अपनी। ये कोई भी फरमान जारी कर दें उसकी तामील फ़ौरन होनी चाहिये, लेकिन इन्हें कोई काम दिया जाये तो वह इनकी मर्ज़ी से होगा। याद दिलाने पर निहायत शहंशाही अंदाज़ में बोलेंगे "जब मैंने कहा है कि मैं कर दूंगा तो कर दूंगा, हर छे महीने याद दिलाने की ज़रूरत नहीं है।" वाह -
आईने के सामने आजा पता चल जायेगा
ऐब मेरी ज़ात में है या तेरे किरदार में।
एक लोकोक्ति है - "मर्द के दिल की राह उसके पेट से होकर जाती है।" मतलब साफ़ है कि लड़की को पाक कला में दक्ष होना चाहिये। ठीक भी है। जीने के लिये खाना तो ज़रूरी है। मगर हुज़ूर उन महानुभावों का क्या जो खाने के लिये जीते हैं। ये घर में बेचारी इंतज़ार की मारी बीबी से प्यार के दो बोल बोलने की बजाये "मानस गंध - मानस गंध" यानि खाने में क्या है का राग अलापते हुए घर में प्रविष्ट होते हैं। इनकी बीबी कभी रसोई से पाँव बाहर नहीं निकाल पाती। पतियों की क़िस्मों की लिस्ट तो शैतान की आँत की तरह लम्बी है लेकिन हमने सिर्फ़ कुछ सैम्पल्स पेश किये हैं। वैसे भी कौन इस क़िस्म की थीसिस में दिलचस्पी लेगा? फिर भी, जाते-जाते एक आखिरी नमूना हम अवश्य पेश करेंगे। कारण! हर शौहर एक दिन अवकाश प्राप्त करता है- यानि रिटायर होता है। बस वहीं से शुरू हो जाता है पत्नी की "नाक में दम" का सिलसिला। मियाँ जी करेले तो थे ही, नीम चढ़ कर और भी कड़वे हो गये। घर में बैठ कर घर के बजट से लेकर रद्दी बेचने की कला तक पर उनकी महारत अवलोकित होने लगती है। चालीस साल से गृहस्थी चलाती गृहणी अचानक होम साइंस की विद्यार्थी बन जाती है। हर बात में दखल, हर चीज़ पे कटाक्ष। अख़बार पढ़ते हुए भी (कभी नाक पर से चश्मा उठा कर कभी गिरा कर) बीबी की हर गतिविधि पर नज़र। बस दोस्तो, मियाँ जैसे वैताल और बीबी राजा विक्रम बन जाती है; सवाल का उत्तर न दे तो "सर के सौ टुकड़े हो जायेंगे" और बोल दे तो "तेरा मौन टूट गया - हा हा हा" खैर अब जब मौन टूट ही गया और हैरान, परेशान बीबी के मुँह में जुबान आ ही गयी तो सुनिये -
अता किया है ये सामाने दुर्गति हमको
दर्दे सर, ख़ौफ़े नज़र और इक पति हमको।
साहबान! मज़ाक़ दरकिनार, ज़िन्दगी की हक़ीक़त पेश है -
जिसकी आँखों में शरारत थी वो महबूबा थी
ये जो मजबूर सी औरत है, ये घरवाली है।

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