ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
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गर्व ही नहीं, चिंतन का क्षण भी

भारत के एक दृढ़ निश्चयी नायक, स्वतंत्रता सेनानी, प्रथम उप प्रधानमंत्री और लौह-पुरुष के नाम से विख्यात सरदार पटेल की लगभग तीन हजार करोड़ रुपए की लागत से निर्मित, दुनिया की सबसे ऊँची प्रतिमा का उनके 14

जनता की आलोचना

नेताओं की आलोचना खूब होती है पर जनता की आलोचना कोई नहीं करता। आजकल नेता यह कहते हुए पाये जाते हैं कि देश की सवा सौ करोड़ जनता उनकी मालिक है और वे जनता के नौकर हैं। नौकरों की आलोचना करने वाले थक गये

सनक, सेल्फी और भेड़चाल

इंटरनेट आधारित मीडिया के असीमित विस्तार से मानवीय संचार को असीमित विस्तार मिला है। सोशल मीडिया ने वर्तमान में मुख्यधारा के मीडिया जितनी जगह बना ली है। हाल तो ये है कि जो भी कुछ हम सोशल मीडिया में द

मैं भी

ये सिर्फ मानव जाति पर लागू नहीं होता बल्कि संसार की हर वस्तु पर लागू होता है। ज़रा-सी हवायें अगर एक साथ मिलकर चलने लगें तो झंझावात पैदा कर दें। धरती के सीने से विनाशकारी लावा यूँ ही नहीं निकलता। सदि

अकबर प्रयाग से बड़ा नहीं हो सकता

प्रयाग का मूल शब्द है याग जो यज् अ घञ् के योग से बना है। यागः का अर्थ होता है उपहार, यज्ञ, वह अनुष्ठान जिसमें आहुति दी जाती है। याग से पहले प्र उपसर्ग लगा देने से प्रयाग बना है। प्रयाग अर्थात एक वि

स्त्री और आबादी

दुनिया की वर्तमान 7.6 अरब आबादी (वर्ष 2017), संयुक्त राष्ट्र संघ (यूनाइटेड नेशन्स) के अनुसार वर्ष 2030 में बढ़कर 8.6 अरब, वर्ष 2050 में 9.8 अरब, और वर्ष 2100 में 11.2 अरब हो जायेगी। जनसंख्या में सर्

पॉलिथीन और पाबंदी

बा जार से सब्जी लाना हो या पैक दूध या फिर
किराना या कपड़े, पॉलिथीन के प्रति लोभ ना तो
दुकानदार छोड़ पा रहे हैं, ना ही खरीदार। पॉलिथीन न केवल वर्तमान बल्कि भविष्य को भी नष्ट करने पर आमादा

भाषा की नाक पर रूमाल रखने का समय

बेला महका रे महका आधी रात को यह पंक्ति एक फिल्म गीत की है, जो एक मीठी-गंध का स्मरण कराती है। कदाचित लगभग आधी शताब्दी पूर्व, आकाशवाणी की "विविध भारती" सेवा ने, देर रात को प्रसारित होने वाले, मधुर फि

धर्म का मूल भाव

ऊँ सहनाववतु सहनौभुनक्तु सहवीर्यं करवावहै, तेजस्विना वधीतमस्तु मां विद्विषावहै। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।
अर्थ : हम सभी एक-दूसरे की रक्षा करें। हम साथ-साथ भोजन करें। हम साथ-साथ काम करें। हम सा

"संत" शब्द की पुनव्र्याख्या का समय

अगर संत भी सांसारिक दुखों से त्रस्त होकर आत्म-हत्याएं करने लगें, भौतिक स्वार्थों में डूबकर और महाभोगी बनकर जेल यात्राएं करने लगें, अध्यात्म, लालच और लंपटता का पर्याय बनने लगें, संत भी "सीकरी" का कृ

राजनीति के घाट पर संतन की भीड़

ये कैसा समय आ गया है कि राजनीति के घाट पर संत इकट्ठे हो रहे हैं। नाना प्रकार के संत। कोई लेपटॉप बाबा है तो कोई कम्प्युटर बाबा। कोई घड़ी वाला बाबा है तो कोई गृहस्थ बाबा। सबको भरम है कि उनके पीछे लोग

ज्ञान और शिक्षा की प्रकृति

विगत दिनों एक छोटा-सा समाचार था- अपंजीकृत मदरसों और वैदिक स्कूलों की पढाई अमान्य। आगे खुलासा था कि यह सलाह सेन्ट्रल एडवाइजरी बोर्ड ऑफ़ एज्यूकेशन की उपसमिति द्वारा सरकार को भेजी गई रिपोर्ट में शामिल

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