ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
साधो, सहज समाधि भली
01-Jun-2016 12:00 AM 3362     

प्रायः महापुरुषों के अनेक रूप होते हैं। कबीर के भी अनेक रूप हैं। किसी के लिए वे दैनिक जीवन के लिए उपयोगी सूत्र देने वाले कवि हैं, तो किसी के लिए एक वि¶ोष पंथ के प्रवर्तक। किसी के लिए वे वर्तमान हिंदू धर्म की मान्यताओं (मूर्तिपूजा, जप, माला, तिलक आदि) के आलोचक हैं तो किसी के लिए इस्लाम की रूढ़ियों (रोज़ा, मस्जिद आदि) के विरोधी। किसी के लिए वे ऐसे गुरु हैं जिसका स्थान भगवान से भी बड़ा है तो किसी के लिए एक संत त महात्मा। पर उनका एक रूप और भी है। इतिहास में ऐसे महापुरुष तो अनेक मिलते हैं जिन्होंने अपने धर्म के सुधार के या नया धर्म (पंथ) चलाने के प्रयास किए, पर कबीर पहले महापुरुष हैं जिन्होंने दो भिन्न धर्मानुयायियों (हिंदू-मुसलमानों) के बीच की वह दूरी पाटने की को¶िा¶ा की जिसे अब हम हिंदू-मुस्लिम एकता या सर्व-धर्म-समभाव की समस्या कहने लगे हैं। समस्या का महत्व इसी तथ्य से समझा जा सकता है कि इसका समुचित समाधान न हो पाने के कारण ही दे¶ा को विभाजन की त्रासदी तक झेलनी पड़ी, इसके बावजूद साम्प्रदायिक दंगों के नाग जब-तब फुफकारते रहते हैं। दे¶ा का सामाजिक इतिहास जब लिखा जाएगा तब उसमें इस समस्या के निराकरण के प्रयास करने के लिए सबसे पहला नाम स्वर्णाक्षरों में कबीर का होगा।
जब कबीर का जन्म हुआ, तब भारतीय समाज में उस सद्भाव, सहन¶ाीलता, समरसता के रुाोत सूखने लगे थे जिसके लिए कभी हमारी पूरे वि·ा में ख्याति थी। क्या विडम्बना है कि हजारों वर्ष पूर्व जिस दे¶ा के ऋषियों ने वि·ा को एक परिवार बताया (वसुधैव कुटुम्बकम्), हर प्राणी के प्रति मित्र भाव रखने की ¶िाक्षा दी (मित्रस्य चक्षुषा समीक्षामहे), सबको अपना मित्र बनाने की प्रेरणा दी (सर्वा आ¶ाा मम मित्रं भवन्तु), उनके अनुयायी आगे चलकर अपने ही समाज के लोगों से घृणा करने लगे। ज्यों-ज्यों वैदिक युग का पराभव हुआ, जैन/बौद्ध मतों का आविर्भाव हुआ, हिंदुओं के ¶ौव, ¶ााक्त, वैष्णव आदि विभिन्न वर्ग बनने लगे और उन्होंने अपना सुरक्षा कवच बनाने के लिए पुराणों की रचना कर डाली, त्यों-त्यों यह विषमता बढ़ती गई। विभिन्न पुराण अपने आराध्य को, अपनी परम्पराओं को, अपने सम्प्रदाय की मान्यताओं को सर्वोपरि सिद्ध करने के लिए सामाजिक भेदभाव किस प्रकार बढ़ाने लगे, इसके ढेरों उदाहरण दिए जा सकते हैं। यह बौद्ध-ब्रााहृण विवाद का ही परिणाम था कि ब्रााहृणों ने विदे¶ा यात्रा करने वाले बौद्धों को नीचा दिखाने के लिए अपने नए धर्म¶ाास्त्र बनाकर विदे¶ा जाना पाप की श्रेणी में रख दिया। विष्णु पुराण (रचनाकाल चौथी ¶ाताब्दी ई.) वैष्णव संप्रदाय से संबंधित है, अतः इसमें जहाँ वैष्णव सम्प्रदाय की परम्पराओं (तीर्थस्नान, व्रत, नामस्मरण आदि) की महत्ता बताई गई है, वहीं जैन/बौद्ध श्रमणों को "पाखंडी' और "नीच' कहा है और उनसे सम्पर्क रखना तो दूर, बात करने की भी मनाही की है।
इस मान्यता को पुष्ट करने के लिए एक राजा की कहानी भी दी है जो मरने के बाद ·ाान योनि में जन्मा; उसकी पूर्वजन्म की रानी ने उसे नए रूप में पहचान लिया। बोली, "महाराज! आप ·ाान योनि में जिस कारण से उत्पन्न हुए, वह आपको याद है या नहीं? हम लोगों ने तीर्थस्नान किया था, अतः हम मोक्ष के अधिकारी बन गए थे, पर आपसे एक भूल हो गई। आप तीर्थस्नान करने के बाद "पाखंडी' से बात करने लगे। इसी कारण आपको यह नीच योनि प्राप्त हुई।' (रामधारी सिंह दिनकर, संस्कृति के चार अध्याय, लोकभारती, इलाहाबाद, 1993; पृ. 259)
ऐसे संकीर्ण विचारों वाले समाज की संकीर्णता तब और बढ़ गई जब उसका सामना विदे¶ाों में जन्मे इस्लाम और ईसाई धर्म से हुआ। यद्यपि इन धर्मों के अनुयायी पहले व्यापारी के रूप में आए थे, पर बाद में लुटेरे और ¶ाासक बन गए। ¶ाासक होने के नाते वे जितने बल¶ााली, बुद्धि¶ााली और सम्मान के अधिकारी बनते गए, हिंदू धर्म का खोल उतना ही सिमटता गया। इन्हें "विधर्मी' कहा गया और अगर किसी विधर्मी के हाथ से छुए हुए पानी का छींटा भी पड़ गया, तो हिंदू का धर्म नष्ट होने लगा। जहाँ तक मुसलमानों के प्रति हिंदुओं की मानसिकता का संबंध है, वह एकदम अलग प्रकार की रही। इस संबंध में स्व. मानवेंद्रनाथ रॉय के ¶ाब्द याद आते हैं, "संसार की कोई भी सभ्य जाति इस्लाम के इतिहास से उतनी अपरिचित नहीं है जितने हिंदू हैं और संसार की कोई भी जाति इस्लाम को उतनी घृणा से नहीं देखती जितनी घृणा से हिंदू देखते हैं।'
श्री रॉय ने जो कुछ कहा है, वह सच तो है, पर एकपक्षीय है क्योंकि यही बात मुसलमानों पर भी लागू होती है। गर्भनाल के ही एक पुराने अंक में डॉ. रवीन्द्र अग्निहोत्री के लेख "हमारी पहचान - भारतवासी या ...' पढ़ा था जिसमें उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के नेता डॉ. सैयद महमूद (जो बाद में क्ष्दड्डत्ठ्ठद क़्त्द्रथ्दृथ्र्ठ्ठद्य त्द छच्ॠ रहे) के जीवन की उस घटना का ज़िक्र किया था जो डॉ. महमूद ने गाँधी जी को सुनाई तो गांधी जी ने तुरंत कहा कि इसे पूरे हिंदुस्तान में सुनाइए। डॉ. महमूद जब जर्मनी गए तो वहां के एक विद्वान प्रो. स्मिथ उनसे मिलने आए और वेद, गीता एवं हिंदू संस्कृति आदि से संबंधित कुछ प्र¶न पूछने लगे। डॉ. महमूद किसी भी प्र¶न का उत्तर नहीं दे सके, अतः सफाई देते हुए बोले कि मैं मुसलमान हूँ। प्रो. स्मिथ ने कहा, मैं अच्छी तरह जानता हूँ, पर क्या आप अभी हाल ही में अरब से जाकर हिंदुस्तान में बसे हैं? डॉ. महमूद बोले, नहीं, कई पीढ़ी पहले से हम हिंदुस्तान में रहते आए हैं और मेरा जन्म भी वहीं हुआ है। प्रो. स्मिथ ने हैरानी से कहा, पता नहीं आप अपवाद हैं, या सभी हिंदुस्तानियों का यही हाल है? डॉ. महमूद ने लज्जित होते हुए कहा कि हम सबका यही हाल है। हम एक-दूसरे के धर्म या लिटरेचर के बारे में कुछ नहीं जानते।
हिंदू-मुसलमानों की इस अनभिज्ञता का दुष्परिणाम यह हुआ कि बहु-धर्मीय समाज में समरसता बनाए रखने के लिए जिस अंतर-धर्मीय संवाद की आव¶यकता होती है, वह हमारे समाज से गायब रहा। ऐसे संवाद के लिए अनिवार्य है कि सभी लोग एक-दूसरे के धर्म के बारे में जानें और समरसता के लिए आव¶यक है कि हर धर्म के अनुयायी (किसी एक धर्म के नहीं) ईमानदारी से एवं स्पष्ट रूप से अपने धर्म की कमियों को स्वीकार करके उन्हें दूर करने का प्रयास करें।
कबीर (1440-1518) पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने हिंदू-मुसलमानों के बीच अंतर-धर्मीय संवाद स्थापित करने की को¶िा¶ा की। ऐसा लगता है जैसे उनका जन्म इसी काम के लिए हुआ था। तभी तो जिस माँ ने उन्हें जन्म दिया वह हिंदू (विधवा ब्रााहृणी) थी, पर जिन "माता-पिता' ने उनका पालन-पोषण किया, वे मुसलमान (जुलाहे) थे। विद्वान कहते हैं कि कबीर पढ़े-लिखे नहीं थे, जिसका अर्थ यही है कि उन्हें औपचारिक ¶िाक्षा नहीं मिली, पर "विवेक' की आँख यदि खुली हो तो जीवन से जो व्यावहारिक ¶िाक्षा मिलती है, वह उन्हें भरपूर मिली थी। उन्होंने हिंदू-मुसलमान का भेद मिटाकर हिंदू संतों और मुसलमान फकीरों का सत्संग किया। इस संगति और अपनी सहज बुद्धि के आधार पर वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि जब तक हिंदू और मुसलमान अपनी असंगत-तर्कहीन रूढ़ियों को नहीं छोड़ते, तब तक समाज में समरसता स्थापित नहीं हो सकती। इसीलिए उन्होंने हिंदुओं और मुसलमानों दोनों के कतिपय बहु-प्रचलित धार्मिक आडम्बरों की निस्सारता की ओर ध्यान आकर्षित किया (जैसे मूर्तिपूजा, बहु-देवतावाद, अवतारवाद, बलिप्रथा, जातिप्रथा, तीर्थयात्रा, वे¶यागमन, मांसाहार के लिए हलाल, झटका, रोजा, ईद, मसजिद, मन्दिर) और दोनों की रूढ़ियों का विरोध करके उनमें समभाव उत्पन्न करने का प्रयास किया।
यह केवल हिंदू या मुस्लिम समाज का नहीं, भारतीय समाज के सुधार का प्रयास था। कबीर के बाद अन्य महापुरुषों ने भी इस दि¶ाा में अपने-अपने ढंग से प्रयास किए। इनमें से तीन महापुरुषों के प्रयासों पर वि¶ोष ध्यान देने की आव¶यकता है। उनके प्रयासों की अलग-अलग वि¶ोषताएं हैं। ये महापुरुष हैं - मुग़ल सम्राट अकबर (1542-1605), स्वामी दयानंद सरस्वती (1824-1883) और महात्मा गांधी (1869-1948)।
सम्राट अकबर भी था तो निरक्षर, पर जिज्ञासु भी था। धार्मिक मतभेद दूर करने की दृष्टि से उसने धार्मिक चर्चाओं व वाद-विवाद कार्यक्रमों की अनोखी ¶ाृंखला आरंभ की जिसमें मुस्लिम विद्वान अन्य मतों के विद्वानों से (जैसे, जैन, सिख, हिंदू, चार्वाक, यहूदी, ईसाई से) धार्मिक चर्चाएं किया करते थे जिन्हें अकबर ध्यानपूर्वक सुनता था। इस प्रकार उसने अंतर-धर्मीय संवाद की परम्परा को पुष्ट किया और आगे चलकर एक नए धर्म "दीन-ए-इलाही' (ई·ारीय धर्म) की स्थापना की, जिसमें विभिन्न धर्मों की नीतियों व ¶िाक्षाओं का समावे¶ा करने का प्रयास किया।
स्वामी दयानंद सरस्वती (1824-1883) संस्कृत और वैदिक साहित्य के विद्वान थे। कबीर की भांति उनकी भी मान्यता थी कि धार्मिक मतभेद का मुख्य कारण है तरह-तरह के धार्मिक आडम्बर और विभिन्न धर्मों की अंधवि·ाासजन्य मान्यताएं, जिन्हें दूर करके ही धार्मिक एकता स्थापित की जा सकती है। अतः उन्होंने एक ओर तो उस समय प्रचलित सभी धर्मों की तर्कहीन मान्यताओं की, और इन मान्यताओं को जन्म देने वाले धर्मग्रंथों की समीक्षा की (इसमें कुरआन की भी डेढ़ सौ से अधिक आयतों की समीक्षा ¶ाामिल है) तथा दूसरी ओर, अन्तर-धर्मीय संवाद के लिए दे¶ा में अनेक स्थानों पर व्याख्यान दिए, ¶ाास्त्रार्थ किए, और दो बार "धर्म मेला' आयोजित करके विभिन्न धर्मों के विद्वानों को एक ऐसे मंच पर इकट्ठा करने का प्रयास किया जहाँ सब मिलकर अवैज्ञानिक, तर्कहीन, अंधवि·ाास पर आधारित, संकीर्णता फैलाने वाले, भेदभाव उत्पन्न करके समाज की समरसता को बिगाड़ने वाले साम्प्रदायिक सिद्धांतों को छोड़कर ऐसे सिद्धांत स्वीकार कर लें जो सर्वमान्य हों, और फिर सब धर्माचार्य केवल उन्हीं सिद्धांतों का प्रचार करें। उनके प्रेरक व्यवहार और सत्य के प्रति आग्रह का ही यह परिणाम था कि इन संगोष्ठियों में तत्कालीन सभी प्रमुख धार्मिक नेताओं ने जैसे, आचार्य के¶ाव चन्द्र सेन, डॉ. टी.जे. स्काट, पादरी नोबेल, दारुल उलूम, देवबंद के संस्थापक मौलवी मोहम्मद कासिम, सर सैयद अहमद खां आदि ने भाग लिया। इन प्रयासों से सभी धर्मों में सुधार की गति तेज हुई।
हमारे दे¶ा के पिछली ¶ाताब्दी के इतिहास में महात्मा गांधी (1869-1948) का वि¶ोष स्थान है। स्वतन्त्रता आंदोलन के वे निस्संदेह अग्रणी नेता थे। यह आंदोलन यद्यपि समाज के संपन्न वर्ग के कुछ लोग पहले से चला रहे थे, पर जब गांधी जी इस आंदोलन से जुड़े, तो उन्होंने इसका स्वरूप ही बदल दिया और इसे आम जनता का आंदोलन बना दिया। सभी धर्मावलंबियों को इससे जोड़ने के लिए गांधी जी ने जो योजना बनाई वह कबीर, अकबर और दयानंद की योजना से भिन्न थी। अंधवि·ाासजन्य विभिन्न मान्यताओं पर प्रहार करने के बजाय उन्होंने एक भिन्न ढंग से विभिन्न धर्मावलंबियों को निकट लाने का प्रयास किया। उन्होंने विभिन्न धर्मानुयायियों के धर्म ग्रंथों से कुछ अं¶ा लेकर उन्हें अपनी सार्वजनिक दैनिक प्रार्थना में ¶ाामिल किया ताकि सभी धर्मों को व्यापक स्तर पर स्वीकृति मिले और उनके अनुयायियों के "अहं' की संतुष्टि हो। हिंदू समाज के सुधार से संबंधित कतिपय कार्यों (वि¶ोषरूप से अस्पृ¶यता) को तो उन्होंने स्वतन्त्रता आंदोलन का अंग बनाया, पर इस्लाम (एवं अन्य धर्मों) के सुधार का विषय उन्होंने संबंधित धर्मानुयायियों पर ही छोड़ दिया; हाँ, उन्हें सहयोग अव¶य दिया। जैसे, जब तुर्की में खलीफा प्रथा (धर्म एवं राज्य का सर्वोच्च पद एक ही व्यक्ति के पास) समाप्त की गई और हिंदुस्तान के मुसलमानों ने उसके विरोध में आंदोलन ¶ाुरू किया, तो गांधी जी ने इसे भी स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ दिया।
हिंदू-मुस्लिम एकता स्थापित करने के लिए पिछले पांच सौ वर्षों में विकसित किए गए ये चार मॉडल हैं। चारों ने इस समस्या के समाधान में कुछ न कुछ सहयोग दिया है। यह नि¶चय हमें करना है कि आज हम इन्हीं में से किसी मॉडल को अपनाएं या अपना कोई नया मॉडल विकसित करें।
पर एक प्र¶न और है। पिछले पांच सौ वर्ष वि·ा के इतिहास में वि¶ोष महत्व रखते हैं, इन पांच सौ वर्षों में दुनिया जाने कहाँ से कहाँ पहुँच गई, पर हिंदू-मुसलमान दोनों ही इतिहास की इस दि¶ाा को नहीं पहचान सके और अपने-अपने खोल में बंद पड़े रहे। इसका परिणाम यह हुआ कि इन पांच सौ वर्षों में वि·ा में ज्ञान, विज्ञान, व्यापार, वाणिज्य आदि विभिन्न क्षेत्रों में जितनी भी प्रगति हुई, उसमें हिंदू-मुसलमान का कोई उल्लेखनीय योगदान नहीं। अतः अब आज के हिंदू-मुसलमानों को यह नि¶चय करना है कि वे प्रगति के अलमबरदारों के साथ कदम से कदम मिलाकर एक साथ चलना चाहेंगे या पांच सौ साल से जिस खोल में रहते आए हैं, उसी में रहना पसंद करेंगे?

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