ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
रोजनदारी की बातें
01-Jan-2018 02:36 PM 1922     

मई 6, 2000
आज जीवन का एक नया अध्याय शुरू होने जा रहा है। दोनों छोटे बच्चों के साथ हम मिशीगन आ गये हैं। इनको यहाँ एक कम्पनी में काम मिल गया है और मैं अपनी नौकरी छोड़ कर, सब के उज्ज्वल भविष्य का सपना ले कर आयी हूँ। आठ साल के सुहास और चार साल के नीलेश के साथ नौकरी के कारण बिल्कुल समय नहीं मिल पाता था। नौ से पाँच की नौकरी और फिर आना-जाना, सब मिला कर खूब थक जाती थी। फिर घर पर आते ही घर के काम! कुछ देर भी बच्चों के साथ बैठना नहीं हो पाता था। बुरा भी लगता था कि सारा दिन मम्मी जी बच्चों को सँभाल कर थक जाती थीं पर क्या करो। अब यहाँ मैं पूरा दिन बच्चों को दे पाऊँगी। पार्कों में घुमाऊँगी, स्विमिंग ले जाऊँगी और सुहास को तो म्यूज़िक क्लास भी शुरू करवा दूँगी। यहाँ बच्चों के लिये इतनी सुविधायें देखकर तो मन झूम उठा है। साफ-सुथरे शहर, साफ़-सुथरे लोग! वहाँ कभी बच्चों को पार्क में ले भी जाओ तो झूले पर बिठाने के लिये ही बच्चे को दस मिनट इंतज़ार करना पड़ता था... अब बच्चों की खूब मस्ती रहेगी... और हमारी भी तो..!
जून 15, 2000
बस, एक ही बात बहुत बुरी है यहाँ, सारे काम... यानि सारे काम... टॉयलेट सफाई तक... खुद ही करने पड़ते हैं। अपनी कामवाली बाई और प्रेस वाला भइया बहुत याद आ रहे हैं।
सितम्बर 17, 2000
आज सुहास और नीलेश पहले दिन नये स्कूल गये। खूब अच्छे टीचर हैं उनके। यहाँ इतने अच्छे सरकारी स्कूल हैं कि प्राइवेट स्कूल में जाने की बात बहुत कम और बहुत ज़्यादा ही पैसे वाले लोग सोचते हैं वरना सब फ्री के सरकारी स्कूल, हाईस्कूल तक! भारत में लोग बेकार ही डरा रहे थे कि यहाँ रेसिज़्म है, मुझे तो ऐसा नहीं लगा! सब लोग बहुत अच्छे से, अपने से आगे बढ़कर ही बात करते हैं, वहाँ कौन ऐसा करता था? क्या वहाँ लोग ऊँच-नीच की बातें नहीं करते थे? अमीर-गरीब का अंतर कितना अधिक है वहाँ पर! कोई घायल हो जाये तो लोग उसे उठाकर अस्पताल तक न लेकर जायें वहाँ, यहाँ कम से कम मदद करने को लोग खड़े तो हो जाते हैं!
दिसम्बर 20, 2000
आजकल लोग कहीं नहीं दिखाई देते। सुबह कारें चली जाती हैं, शाम को आकर खड़ी हो जाती हैं, सड़कें, पार्क सब अकेले हो गये हैं। आपसी प्रेम भी कई बार ठंड में जमा लगता है। घर की याद खूब आ रही है। धूप में बैठ कर मूँगफली और तिल के लड्डू खाना! रज़ाई में घुस कर देर रात तक गपियाना। और आजकल तो शादियों का मौसम शुरू हो गया है। दो शादियाँ हैं इस साल, मैं मिस कर दूँगी। ये बहुत बिज़ी हैं सो जाना हो नहीं पायेगा। अमरीका को चिन्ता है कि सन् 2000 बदलते ही कहीं सारे सॉफ्टवेयर क्रैश न कर जायें... बहुत फिक्र है सबको, इसी से सारे आईटी वालों की पूछ-परख चल रही है। हम भी तो इसीलिये यहाँ आये हैं।
दिसम्बर 24, 2000
कल रात पहला स्नो-स्ट्राम (तूफान) आया। बर्फ से सब कुछ ढ़ँक गया है। पर बर्फ होने पर आज बच्चे निकल आये हैं और खूब मस्ती कर रहे हैं, "ह्वाइट क्रिसमस" की खुशी भी है। यहाँ के लोग सच में खुश होना, मस्ती करना जानते हैं, अपने यहाँ तो "सर्दी न लग जायेे, ज़ुकाम न हो जाये" का डर दिखा कर हमें घर में ही बिठा देते थे। यहाँ बर्फ के कारण न काम बंद होता है और न मस्ती करना। सुहास और नीलेश ने भी "स्नो-मैन" बनाया और खूब खुश हुये। साथ वाले घर की महिला ज़बरदस्ती बच्चों के लिए हॉट चॉकलेट और हम दोनों के लिये कॉफी बना लायीं। मुझे लगता है कि हम लोग ही पता नहीं किस कॉम्प्लैक्स में जीते हैं जो इन लोगों से घुलमिल नहीं पाते।
मार्च 10, 2001
आज पहली बार यहाँ मंदिर में होली खेली। जब से यहाँ आये थे, तरस ही गये थे। अपार्टमेंट में कार्पेट होने के कारण बच्चों को बाथरूम में ले जाकर गुलाल के टीके लगा देते थे... ऐसे भी कोई होली होती है? कितने सारे भारतीय आये! हम सब लोग स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस, दीपावली सब मनाते हैं पूरे मन और लगन से! हिन्दी, तबले और नृत्य की क्लासें होती हैं मंदिर में। आजकल सुहास तबला सीख रहा है और नीलेश ने पिआनो सीखना शुरू किया है! दोनों बच्चे हिन्दी के साथ, वेदमंत्र आदि भी सीख रहे हैं। बहुत खुशी होती है कि अपनी भाषा और संस्कृति को भूलेंगे तो नहीं।
दिसम्बर 21, 2001
सितम्बर नौ को वह भयानक कांड हुआ और अमरीका हिल गया। एक अविश्वास, असुरक्षा, डर बैठ गया है सबमें। नौकरियों की भी बहुत मुश्किल आ गयी है। पूरा जॉब-मार्किट फ्रीज़ हो गया है। कितनी ही कम्पनियों में से लोगों को निकाला जा रहा है। पिछले चार महीने में हमारे जान-पहचान के तीन लोग अपनी नौकरी खो चुके हैं। मिस्टर खुराना तो वापस भारत जाने का सोच रहे हैं! उनके बच्चे छठी और आठवीं में हैं, बहुत परेशान हैं कि भारत जाने पर स्कूल में एडमिशन कैसे होगा पर क्या करें लगभग तीन महीने से नौकरी ढूँढ रहे हैं। नौकरी के बिना यहाँ रहना बहुत मुश्किल है, पचीसों खर्चे और छोटी नौकरियाँ करना कि गैस स्टेशन पर खड़े हो जाओ या दुकानों में कैश रजिस्टर पर खड़े रहने की उनकी इच्छा नहीं है। पर कोई न कोई रास्ता तो निकलेगा ही... जिन्होंने हिम्मत कर के देश छोड़ा, हिम्मत छोड़ने का विकल्प उनके पास नहीं है! भारत में इस बात को कोई समझ सकता है क्या?
फरवरी 9, 2002
हर जगह शक और डर का वातावरण है। सुना किसी शहर में किसी सरदार जी की लंबी दाढ़ी देख कर उन पर शक किया गया और पीट-पीट कर अधमरा कर दिया गया। पहले अफ्रीकी लोगों के साथ का दुव्र्यवहार सुनते थे... अब तो वह बहुत कम हो गया है... पर इस घटना ने अब एक नये किस्म का डर पैदा कर दिया है। आगे बढ़ती सभ्यता और संस्कृति एक झटके से रुक गयी है... कितने ही साल जैसे पीछे को लौट गये हम। इस दुनिया को कभी कोई हिटलर, कभी कोई स्टालिन तो कभी कोई ओसामा पीछे के तरफ ही धकियाते रहते हैं, पर ज़िंदगी फिर चल पड़ती है... चाहे कुछ समय के लिये गिरते-पड़ते ही।
जून 7, 2002
आज एक बहुत बुरी खबर पता लगी, मन दुखी हो गया। वैडिंग एनीवर्सिरी है आज हमारी, पर ये खबर सुन कर बहुत बुरा लगा। नीता की शादी टूट गयी। आठ साल में मेहनत से बनाया गया एक घर और परिवार बिखर गया। दो बच्चे हैं उनके... पर समीर को यहाँ की ही कोई लड़की भा गयी है, नीता से कहा कि हमारे बीच कम्पैटिबिलिटी नहीं है, सो अलग होना ही अच्छा! "तुम चाहो तो यहाँ रहो या इंडिया चली जाओ, मैं महीने का खर्च दे दिया करूँगा।" इतने साल से कम्पैटिबिलिटी थी? नीता शॉक में है... क्या कहे और क्या करे? अपनी अच्छी-खासी जॉब छोड़ कर समीर के साथ यहाँ आयी थी, अभी तो उसका ग्रीन कार्ड भी नहीं हुआ तो नौकरी भी कैसे करे! देखो क्या होता है! मेरे साथ यह हुआ तो मैं क्या करूँगी! काम के सिलसिले में इतनी-इतनी देर जब घर से बाहर रहना पड़ता है तो पति-पत्नी, दोनों में ही दूरी आ जाती है। ऐसे में संबंध कितनी देर टिकेंगे, कौन जानता है?
सितम्बर 10, 2003
वहाँ नौकरी के छूटने का ऐसा हर समय का डर नहीं होता, यहाँ तो हर समय सिर पर तलवार लटकी रहती है... पर इस सच को कोई कैसे बताये। "इनकी भी नौकरी छूट गई थी।" दो महीने घर पर रहे... नौकरी ढूँढते बेहाल हो गये तब जाकर मिली पर कम वेतन पर... घर खर्च भी इतने हैं... भारत में भी किसी को क्या बताते! सच न बताने की भी कितनी पीड़ा होती है। और उधर वो उड़ीसा से आई हुई चेतना के माता-पिता हैं कि उसकी नौकरी चली गई है, जानकर भी उस से हर महीने पैसे मँगाते रहते हैं। पता नहीं भारत में लोगों को क्यों लगता है कि यहाँ पर लोग कल्पवृक्ष के नीचे बैठे हैं, पेड़ हिलाओ और रुपये बरसने लगेंगे। वो बहुत परेशान रहती है... जिस घर को सुखी करने के लिये वह यहाँ दुख झेल रही है, वे उसके अपने भी उसे दुखी बनाने में कसर नहीं छोड़ रहे।
अप्रैल 25, 2004
चार साल बाद भारत होकर आये। कितनी तैयारी की थी, सब के लिये ढेरों सामान लिया,.. टिकट और सब खर्चा करते-करते बचत भी आधी ही रह गई और उस पर भी ऐसा नहीं लगा कि सब बहुत खुश थे हमारी गिफ्ट से। एक और मज़े की बात, ये दोनों बच्चे तो हिन्दी में बोल रहे थे पर रिश्तेदारों और पास-पड़ौस के बच्चे ज़्यादातर अंग्रेज़ी ही बोलते सुनाई दिये। नीलेश और मैं 4-5 दिन को बीमार भी पड़ गये थे। बीमार होने पर भी यही सुनाया गया- "भई फॉरेन-रिटर्न हैं, अब यहाँ का हवा-पानी क्यों सही लगेगा।" बहुत बुरा लगा!
मई 17, 2006
आज मैंने यहाँ ह्यूमन रिसोर्सेज़ मैनेजमेंट का डिप्लोमा ले लिया। दो साल लग गये पर अब यहाँ कुछ काम तो कर सकूँगी। बच्चे भी बड़े हो ही गये हैं, दुनिया को देखते हुये सरल हैं, भारत के बच्चे तो इन्हें बेच खायें। मैं खुश हूँ कि आजकल दोनों कार्यक्रमों में स्टेज पर पियानो और तबला बजाने लगे हैं।
जुलाई 21, 2006
नौकरी मिल गई है। बहुत अच्छा लग रहा है, कोर्स करने में बहुत मेहनत की, दिनभर घर के काम और शाम को 6:30 से रात 9:30 की क्लासें... फिर होमवर्क, इम्तहान आदि! बहुत से लोग यहाँ नौकरी के साथ-साथ ऐसे कोर्स कर के या तो अपने को अपडेट करते हैं या कैरियर बदल लेते हैं। बहुत मेहनत करते हैं यहाँ के लोग...! पता नहीं अपने देश में अमरीका को भोग-विलास की छवि बनाकर ही क्यों पेश करते हैं? यही मेहनत करने का रवैया भारतीयों का हो जाता तो हमारा देश बहुत सुखी हो जाता। ये लोग जी तोड़ मेहनत करना जानते हैं तो मस्ती भी बुढ़ापे तक करते हैं! यह नहीं कि पचास के ऊपर हुये नहीं कि अब क्या करना हमका - का भाव लेकर बैठ गये! मुझे अच्छा लगता है इनका खुलकर यूँ जीना! काश! हम अपने अच्छे मूल्यों के साथ इनके अच्छे मूल्यों को अपना सकते!
दिसम्बर 5, 2006
हम लोग एक चैरिटी संस्था से जुड़ गये हैं जो भारत में बच्चों को पढ़ाने के लिये गाँवों और देहातों में अध्यापक भेजती है- "एकल"! यहाँ हर बच्चे को हाईस्कूल के पास करने का सर्टिफिकेट ही तब मिलता है जब वह कम से कम चालीस घंटे का "वालिंटियर" काम कर लेता है। शुरू से ही इस तरह के काम करने की आदत डाल दी जाती है और बच्चे पढ़ाई के साथ नौकरी भी सोलह साल की उम्र से करने लगते हैं। ज़िम्मेदारी सिखाने की प्रक्रिया बहुत पहले से शुरू कर दी जाती है। जो ज़िम्मेदारी सीखता है, वह निर्णय भी खुद लेना चाहता है, बस वहीं हम भारतीय डर जाते हैं कि बच्चे हाथ से बाहर जा रहे हैं... मैं भी तो कभी-कभी डर ही जाती हूँ!
सितम्बर 12, 2007
भारत से बहुत बुरी खबर मिली। मेरी सहेली के परिवार में एक लड़की को दिन दहाड़े सड़क से उठाने की कोशिश की गई, उसका भाई उसके साथ था, उसने जब गुंडों को रोकने की कोशिश की तो उन्होंने उसे चाकू मारा, लड़की ने भी बहुत संघर्ष किया और किसी तरह से अपने को उठवाये जाने से बचा लिया। दोनों भाई-बहन बहुत घायल हो गये। पुलिस में रिपोर्ट लिखाई है पर कार्यवाही की उम्मीद कम है क्योंकि पता चला है कि किसी एमएलए का हाथ है सिर पर! सुनकर मन दहल गया, विद्रोह करता है! मुसीबत की जड़ हमारी यही कानून व्यवस्था है। आम आदमी को न्याय नहीं! इस देश में भी भ्रष्टाचार है पर ऐसे निचले स्तर पर नहीं... बड़े-बड़े आदमी, अपने धन को लेकर घोटाले करते हैं पर आम आदमी के रोज़मर्रा के जीवन पर उसका असर नहीं पड़ता, पुलिस घूस नहीं खाती, तू-तड़ाक नहीं करती और इस तरह की लड़की उठाने जैसी घटनायें एक तो होती नहीं और अगर होती हैं तो पुलिस पूरी कोशिश करती है अपराधी को ढूँढने की। इंसान को क्या चाहिये... खाना, छत और सुरक्षा! पर सच में सोचो तो सुरक्षा कहाँ है?
जुलाई 15, 2008
आज मिसेज़ खन्ना के बेटे की शादी थी। लड़की अमेरिकन ही है। लँहगे में खूब प्यारी लग रही थी और शादी के बाद जब आकर उसने पंडित जी और बड़ों के पाँव छुये तो मन निहाल ही हो गया। मिसेज़ खन्ना बहुत खुश हैं... पिछले चार साल से नैंसी को देख-जान रही हैं। कह रही थीं कि उनकी बड़ी बहन तो भारत में अपनी बहू के गुरूर सँभालते-सँभालते ही परेशान हो गई हैं पर नैंसी बहुत सरल और सीधी है। भगवान करे, यह शादी चलेे... आजकल यहाँ-वहाँ सब जगह तलाक की सुन-सुन कर जी परेशान होता है। वैसे सच में, इंसान का अच्छा-बुरा होना उसकी नागरिकता नहीं, उसका व्यवहार तय करता है।
अक्टूबर 8, 2009
इतना बुलाने के बाद पहली बार इनके माता-पिता यहाँ आये हैं। बहुत अच्छा लग रहा है। तीन महीने को ही आये हैं पर चलो, आये तो सही! मेरे साथ काम करने वाली डॉना पूछ रही थी एक-दो हफ्ते तो ठीक पर तीन महीनेे? मैं उन्हें कहाँ, कौन से होटल में रखूँगी? नहीं तो इतने दिन हमारी प्राइवेसी कैसे रहेगी? खूब हँसी आई! हम लोग तो ऐसा सोच भी नहीं सकते... हमारे यहाँ ऐसी प्राइवेसी की ज़रूरत ही नहीं होती! हमें तो उनका साथ चाहिये! बच्चे दादा-दादी के साथ मगन हैं और हम लोग दीवाली के लिये घर सजाने और पकवान बनाने में!
दिसम्बर 30, 2011
पिछले साल हर दूसरे महीने कभी मेरा तो कभी इनका चक्कर भारत लगा। इनकी मम्मी जी जनवरी में बेहद बीमार हो गईं थीं... हम दोनों ही कई बार गये पर वो जनवरी में चली गईं। हम सब गये, पापाजी को अपने साथ लाने की कोशिश की पर वो तैयार नहीं हुए... मन बहुत परेशान रहता है, ऐसे समय पर ही दूर रहना बहुत खलता है। क्या करूँ, यहाँ बच्चे, नौकरी, फिर येे वहाँ बहुत दिनों तक रह भी नहीं सकती सो नम्बर लगा कर अब भी हम दोनों जा रहे हैं और वहाँ लोग पूछ रहे हैं कि हम सब छोड़ कर क्यों नहीं आ जाते? अकेले हो तो कर भी लो पर बच्चों की पढ़ाई, बीच मँझधार में है, कैसे करें? कोई किसी को अपनी स्थिति नहीं समझा सकता!
नवंबर 28, 2012
नवम्बर दो को मेरे पापा को हार्ट अटैक हुआ। मम्मी-पापा अकेले ही थे तब! मम्मी ही उन्हें हॉस्पिटल लेकर गयीं। मैं यहाँ से पहुँच गई दो दिन बाद पर पापा 12 तारीख को चले गये। भैया अपने कामों में पुणे ही में फँसे रहे, बाद में आये। तसल्ली थी कि पापा ने मुझे पहचान लिया था। बच्चे बहुत दुखी हैं अपनी दादी और नाना जी के जाने से।
जनवरी 6, 2013
दिमाग बहुत परेशान है। अभी पता लगा कि सुहास डिप्रैशन में चला गया है। कैसे हो गया यह! दिमाग सोच-सोच कर फटा जा रहा है। वो परेशान तो था, पर इतना, यह नहीं सोचा था। हम लोग एमर्जेंसी ले गये उसको तीन दिन पहले, क्राइसिस नर्स से मिले... अब इलाज चलेगा। सुना है बच्चे परेशानी में नासमझी कर जाते हैं और ड्ग्स लेने लगते हैं, भगवान का शुक्र है कि इसने ऐसा नहीं किया।
डेढ़ साल बचा है यूनिवर्सिटी का... कैसे होगा? ये समझा रहे हैं कि पढ़ाई की चिन्ता मत करो। एकाध सेमिस्टर छूट भी गया तो क्या? बात तो सही है पर पहले ही यहाँ के बच्चे छह साल से पहली में जाते हैं फिर चार साल बीए में लगाते हैं। भारत में तब तक बच्चे एमए भी कर लेते हैं। हर समय वहाँ से यही सुनती रहती हूँ कि मेरे बेटे ने यह पास कर लिया, इसके एक्ज़ाम दे रहा है। इतने का पैकेज मिला है... और फिर घूम फिर कर यह कि तुम्हारे बेटे का तो बीए हो गया होगा!
पर इसको डिप्रैशन हुआ क्यों? कुछ समझ नहीं आ रहा! पिछले कुछ समय से सब की बीमारी का सुन कर इसका मन परेशान था... ऊपर से हमारी भागदौड़ भी हमें समय नहीं दे रही थी कि हम बात कर सकें ज़्यादा। पढ़ाई भी तो बहुत है यहाँ यूनिवर्सिटी में। डॉक्टर कह रही है कि अभी कुछ समय न कुछ कहें और न पूछें। रात-रात भर नींद नहीं आती चिन्ता में। सुबह से फिर नार्मल होने की एÏक्टग करनी पड़ती है।
दिसम्बर 12, 2015
सुहास बहुत ठीक है अब! बहुत काउंसलिंग की और डॉक्टरों ने हमें भी सिखाया कि कैसे इस स्थिति का सामना करें। उसकी बीए समाप्त हो गई! इस बार क्रिसमस की छुट्टी में हम चारों यहीं कुछ समय साथ बितायेंगे। अब तक सब छुट्टियाँ भारत जाने के लिये ही बचाते थे, इनके पापा जी ठीक हैं, बहनें बीच-बीच में आती हैं और एक पूरे दिन की नर्स भी है। मेरी मम्मी, भैया के साथ पुणे चली गईं हैं। सब अपनी-अपनी जगह ज़िंदगी के चक्र में भाग रहे हैं, कभी अकेले तो कभी साथ में। पैसे की, नौकरी की भागदौड़, तनाव सब जगह है पर यही समझ में आता है कि घर में जो वातावरण बनाया जाता है, उससे ही बच्चे बनते हैं। यही बच्चे हमारे भविष्य की दुनिया बनायेंगे। अच्छे और बुरे, अपने और पराये लोग हर जगह हैं। बहुत से लोग वहाँ संयुक्त परिवार में होकर भी एक साथ नहीं हैं और यहाँ अमरीकी लोग अलग-अलग रहते हुये भी त्यौहारों में या ज़रूरत पर अपने माँ-बाप के लिये भाग-भाग कर जाते हैं। बाकी तो जो दुनिया है और हर देश की स्थिति है वो तो है ही। कहीं भी रहो, बदलाव सब जगह ही है... समय के इन भागते पलों में से कुछ पल साथ मिल कर हँस-बोल लें, वही अपने हैं, बस।
इससे पहले कि हमारे बच्चे भी बहुत अधिक व्यस्त हो जायें, हमें एक-दूसरे को समझने और साथ होने के एहसास को हर मौके पर और अधिक गहरा करना है।

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