ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
लौटती चेतना अमानुष
02-Jul-2019 11:23 AM 212     

लौटती चेतना

उड़ जाएगा पुतलियों से निषाद
निराशा प्रभाव न छोड़ पाएगी
बोझल हृदय की ये स्थिति
भला कब तक ठहर पाएगी?

पलकों को मूँद कल्पना सजा
हाथों में सिमटा जादू जागा
यदि पल भी बीते आशा-छाँव में
तो यथार्थ में स्पंदन जगेगा!

थी व्यथित, निरुद्देश्य व घायल
निमग्न होना था सरल
चेतना लौटी तो भई जीवंत
अब न हो सकूँ विह्वल।

दुखवाद पनपता तनाव में
तर्कसंगति के समक्ष अकड़ता
अस्थायी किन्तु ये मेघ श्यामल
खिलखिलाती धूप में
एक ही क्षण में बिखरता।

 

अमानुष

उड़ जाएगा पुतलियों से निषाद
निराशा प्रभाव न छोड़ पाएगी
बोझल हृदय की ये स्थिति
भला कब तक ठहर पाएगी?

पलकों को मूँद कल्पना सजा
हाथों में सिमटा जादू जागा
यदि पल भी बीते आशा-छाँव में
तो यथार्थ में स्पंदन जगेगा!

थी व्यथित, निरुद्देश्य व घायल
निमग्न होना था सरल
चेतना लौटी तो भई जीवंत
अब न हो सकूँ विह्वल।

दुखवाद पनपता तनाव में
तर्कसंगति के समक्ष अकड़ता
अस्थायी किन्तु ये मेघ श्यामल
खिलखिलाती धूप में
एक ही क्षण में बिखरता।

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