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संकल्प जुर्रत
01-Sep-2019 09:55 PM 843     

संकल्प

पिता वो वृक्ष है
जो कड़ी धूप सहकर
घनी छाँव देता है

पिता वो तरु है जो रात-दिन
सींचता है प्रेम-जल से
अपनी शाखाएँ

पिता वो दरख़्त है जो कठिनाइयों के
आँधी-तूफ़ान झेलता है और
अपनों पर आँच नहीं आने देता

पिता वो पेड़ है जो हरसम्भव कोशिश कर
ख़ुशियों के मीठे फल जुटाने में
ख़पा देता है ज़िंदगी

पिता वो द्रुम है जो बगैर उम्मीद के
अपनों की ख़्वाहिशों पर
ख़ुद को करता है क़ुर्बान

एक संकल्प है ख़ुद से
बनना है बरगद की वह शाख
जो झुककर चूमती है ज़मीन
और वापस गड़ जाती है
ताकि वट-वृक्ष सहारा पा सके।


जुर्रत

मंज़िलें ख़ुद-ब-ख़ुद चलकर नहीं आतीं
लगे रहो तो राहें निकल ही आतीं हैं

होंसले और मेहनत का दम भरो
सफलता की कश्ती
किनारे पहुँच ही जाती है

ज़रूरत है बस
जुर्रत के पंख लगाने की
सपनों की उड़ान
आसमाँ चीर ही जाती है।

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