ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
धरणगांव की स्मृति
01-Sep-2019 07:03 PM 289     

अपनी आईएएस की नौकरीकी बाबत कुछ कहूँ इससे पहले अपने जन्मगांव, बचपन, शिक्षादीक्षा आदिके विषयमें कुछ कहना आवश्यक है।
मेरा जन्म धरणगांव नामक एक छोटे गांवमें हुआ। यह महाराष्ट्रके उत्तरी छोरपर जलगांव जिलेमें पड़ता है। इसे गांव कहना ठीक न होगा क्योंकि मेरे जन्मके समय भी यह अगल-बगलके डेढ-दो सौ गांवोंके लिये बाजारका केंद्र था। साळी अर्थात् बुनकर समाज यहाँ बहुसंख्य था। वे दिनभर धागा रंगते और हाथकरघेपर दरियाँ साडियाँ बुनते। महाराष्ट्रकी टिपिकल नौ गजी साडी बुननेके लिये उनके मैदानमें 10-10 गज लम्बाईपर खूँटे गडे होते और उनपर साडियाँ बुनी जातीं, वह भी शोभिवंत किनारी व पल्लूके साथ। बचपनमें कई बार मैंने पिताजीके साथ जाकर उनके घरोंसे साडियाँ, दरियाँ खरीदी हैं।
धरणगांवमें छोटी म्युनिसिपालिटी थी, ब्रिटिशकालीन सीमेंटकी बनीं पक्कीं सडकें थीं और गिरणा नदीपर बना एक बांध भी था। मुख्य रास्तेपर एक हायस्कूल, आटा पिसाईकी चक्की और पोस्ट ऑफिस थे। उनके ठीक आगे सीमेंट सडक समाप्तिकी सूचना देता हुआ एक प्रवेश द्वार था, जिसका नाम सुभाष दरवाजा था। इसी कारण नेताजी सुभाषचंद्र बोस मेरे जीवनके पहले हीरो थे।
गांवकी सबसे मुख्य बात थी रेल्वेसे गमनागमन। भुसावलसे सूरत एक फास्ट और दो पॅसेंजर ट्रेनें, इस प्रकार दिनमें 6 बार रेलगाडियाँ आती-जाती थीं जिनकी सीटीकी आवाज सुनकर लोग समयका अंदाज लगाया करते। लेकिन अंगरेजोंने इसे तहसीलका गांव नहीं बनाया था क्योंकि पेयजलकी पर्याप्त व्यवस्था नहीं थी। सो पासका ही छोटा गांव एरंडोल तहसील स्थान बनाया। यह गांववालोंके लिये कचोटका विषय था जिसका परिमार्जन वर्ष 2000 में जाकर हुआ। तब मेरे पिताने मिठाइयाँ बाँटी थीं।
मेरे दादाजीका जन्म इसी गाँवमें हुआ। वे कुशाग्र बुद्धिके धनी थे। सातवीं कक्षा पासकर वे स्कूलमें ही गणित शिक्षककी नौकरी करने लगे। तब उनके पिताने कहा कि तुम नौकरी करोगे तो तुम्हारी पगार तुम्हारी रहेगी, इसलिये कोई ऐसा उद्योग करो जिसमें पूरा परिवार सहभागी हो, ताकि तुम्हारा छोटा भाई भी कुछ कमाई पा सके। तब दादाजीने नौकरी छोडकर छोटे भाईके साथ धरणगांवकी पहली लकडीकी दूकान खोली। अपने व्यापारके निमित्त वे अक्सर गुजरात और कभी कभी बनारस और कोलकाता भी जाते थे। उत्तम गुजराती बोलते थे। एक बार वे बनारससे राधा-कृष्णकी पीतलकी भव्य मूर्तियाँ ले आये जिनका आज भी हमारे परिवारमें पूजन होता है। गांवमें वे अपने एक साथी श्री बालाजीके साथ साळी समाजके मैदानमें भजन व कीर्तनका कार्यक्रम करते थे। अल्पवयसमें मेरी दादीजीका देहान्त होनेके बाद तो रोज ही भजन-कीर्तनका कार्यक्रम होता था। सो घुमक्कडीकी, वैष्णवधर्मकी तथा गणित-प्रेमकी विरासत मुझे दादाजीसे प्राप्त हुई।
धरणगांवके क्षेत्रीय इलाकेका नाम खान्देश है। बोलीभाषा अहिराणी और स्कूली भाषा मराठी। सातपुडा पर्वत श्रेणीमें बसा हुआ प्रदेश। काली माटी। कपास, मूंगफली, तूरदाल और केला यहाँके पारम्पारिक कॅशक्रॉप हैं। अन्यत्र ज्वार व बाजरा। मुख्य नदियाँ गिरणा, तापी और पांझरा। पूरे खान्देशमें शिक्षाकी सुविधाके केंद्र सीमित थे। धरणगांवमें हायस्कूल था सो अन्य गांवोंसे बच्चे पढाईके लिये यहाँ आते। वे माधुकरीसे निर्वाह चलाते थे। माधुकरीका अर्थ हुआ कि वे केवल 3 नियत घरोंमें पकाया गया अन्न सुबहकी भिक्षामें लेंगे और उसी अन्नपर पोषण करते हुए अपनी पढाई पूरी करेंगे। मेरे दादाजीके घरसे और उनके भाई अप्पाके घरसे दो-दो बच्चोंके माधुकरीकी व्यवस्था थी। यहाँ मेरी आयुके पहले सात वर्ष बीते। इस आयुतक आते-आते अकल और समझ दोनों इतने बढे होते हैं कि सही-गलतकी अपनी व्याख्या व्यक्ति स्वयं बनाने लगे। मैंने भी कई बातोंको मनकी गांठमें बांधना आरंभ किया या कि ये अच्छा है या ये अच्छा नही है।
अग्निहोत्री वाडा नामक एक छोटे मुहल्लेमें दादाजी और सगे भाई अप्पाका घर एक-दूसरेसे समकोण बनाते हुए थे। उससे परे उनकी चचेरी विधवा भौजाई छोटीमाईका घर। दादाजीने तीनों घरोंके लिये एक साझा कुआँ बनवाया था जिसपर तीन रहाट लगे थे। एक दादाजी व अप्पाका साझा, एक छोटीमाईका और तीसरा रहाट पूरे गाँवके पानी भरनेके लिये। अपनी युवावस्थामें गाँवके सभी परिवारोंमें दादाजी सर्वाधिक शिक्षित- अर्थात सातवीं पास। बादमें उनका बेटा अर्थात पिताजी डॉक्टरेट, उनकी बहू अर्थात मेरी माँ मॅट्रीक। इस प्रकार शिक्षाके कारण पूरे परिवारका रुतबा था। मेरी सगी बुआएँ ब्याहकर दूसरे गाँवोमें जा चुकी थीं। पर उनके बच्चे पढाईके लिये हमारे घरपर थे। उधर अप्पाके परिवार में छः पोता-पोती, मेरी चचेरी बुआएँ। ये सबके सब माँका अत्यधिक सम्मान करते थे। सबकी पढाईमें माँकी सहायता ली जाती- खासकर गणितके लिये और रंगोली बनानेके लिये। ऐसे परिवारमें मैंने भी कुछ सम्मान जोडा - गाँवसे और पूरे खान्देश इलाकेसे आईएएस में आनेवाली पहली व्यक्ति। छः वर्ष पश्चात् मेरा भाई ऐसा दूसरा व्यक्ति बना।
लेकिन धरणगांवको सही सम्मान दिलानेवाले व्यक्तित्वके धनी थे बालकवि ठोंबरे (1890-1918) जिनकी मधुर सरस कविताएँ पढकर मेरी पीढीके सारे बालक बड़े हुए हैं। मराठी पहलीसे ग्यारहवींतक हर कक्षामें उनकी कविता होती थी जो आजतक जनमानसमें प्रतिध्वनित होती हैं। संगीतकार वसंत देसाईने इनमेंसे कई रचनाएँ स्वरबद्ध कर उन्हें नया आयाम दिया है। ऐसी ही एक कविता गाँवकी नहरकिनारे खडे औदुंबर (गूलर) पेडके विषयमें है जिसने उस पेडको भी धरणगांव-भूषण बना दिया है।
दादाजीने एक गाय पाल रखी थी। खुद दूध दुहते थे और एक कप तभी पी जाते थे। गोमूत्रसे कईयोंका इलाज करते। जोडोंके दर्दवाले उनकी सलाहसे गायपर हाथ फेरने आते थे। दादाजी, अप्पा और उनके बेटे भाईसा दुकानमें बैठा करते थे और हम बच्चे उन्हें खाना पहुँचाने जाते। गर्मियोंमें जलती धूपमें नंगे पैर। सो सीमेंटका रास्ता छोड हमलोग काली मिट्टीवाले खेतोंके रास्ते जाते थे। अप्पाके घरमें फर्शी नहीं बिछी थी। मेरी बुआ या चचेरी बहनें बडे-बडे गोल-गोल दायरेमें गोबरसे लिपाई करती हुई सुंदरसे डिजाईन बनाया करतीं। वे डिजाइन और वह महक, काली मिट्टीपर चलना, कुएँके पानीसे मुँह अंधेरेमें स्नान करना इत्यादि मुझे आज भी प्रिय हैं, हालाँकि कई वर्षांसे इन बातोंके साथ रहना नहीं हुआ। न गायें, न कुआँ, न काली मिट्टी।
मेरे जन्मके समय पिताजी पुणेके पास लोनावालाकी प्रसिद्ध कैवल्यधाम योग संस्थामें वेदान्त पढानेकी नौकरी करते थे। और इसी विषयपर अपनी डॉक्टरेट भी पूरी कर रहे थे। साथ-साथ फलज्योतिष भी सीख ली थी जिसका आगे चलकर अच्छा लाभ होने वाला था।
लेकिन उन्हें डॉक्टरेट मिल गई तो संस्थाने कहा कि अब हम आपके लायक पगार नहीं दे पायेंगे। इस प्रकार पिताजीको धरणगांव आना पडा और उनके अगले छः वर्ष कठिनाईमें बीते। इस दौरान मुझे धरणगांवका, दादाजीका भरपूर साथ मिला। पिताजीको शिक्षककी अल्पकालीन नौकरियाँ व्यारा (गुजरात) और खांडवामें (मध्य प्रदेश) मिलीं। पर मैं धरणगांव ही रही। यहाँ मेरे चचेरे भाई-बहनोंके अलावा फुफेरे भाई-बहन भी अपने गांवसे दूर पढनेके लिये दादाजीके पास रहते थे। घरमें कुल दस-बारह जनोंका भोजन माँ अकेले बनाती लेकिन हर किसीसे कुछ ना कुछ छोटा काम करवाती थी। मुझसे भी। इस प्रकार मुझमें किसी बडे कामको छोटे टुकडोंमें बाँटकर करनेका संस्कार आया जो आजतक मेरे काम आ रहा है।
उस कठिन समयमें ही माँने अपनी- पढाईको आगे बढानेकी योजना बनाई। नागपूर बहुत पास नहीं तो बहुत दूर भी नहीं था। वहाँकी एसएनडीटी महिला युनिवर्सिटीमें उन दिनों यह व्यवस्था थी कि महिलाएँ बीएके एकेक वर्षके लिये फॉर्म भरें, घरपर रहकर पढाई करें और अन्तिम तीन महीनोंके लिये उनके होस्टेलमें रहकर पढाई और परीक्षा पूरी करें। इसका लाभ उठाते हुए माँने एक-एक कर तीन वर्षोंमें बीए पास कर लिया। जब वह नागपूर जाती तो मैं दादाजीके पास ही रहती। छोटी बहनको पहले वर्ष माँ साथ ले गई। अगले वर्ष उसे भी छोडकर छोटे भाईको लेकर गई। इन कारणोंसे दादाजीको मुझसे लगाव था। उनके सारे पोते-पोतियाँ गणितके नामसे भागते थे, केवल मैं रुककर उनके प्रश्न जबानी सुलझाया करती। इससे जुडा एक मजेदार किस्सा है।
स्लेट पेन्सिल पर लिखकर गणित करनेकी मेरी आदत नहीं थी। सात वर्षकी आयुमें जबलपूरमें पहली बार स्कूल गई। मामूलीसी जुबानी टेस्टमें मेरी गणित व भाषाकी प्रवीणता देख प्रधानाध्यपकने मुझे सीधे तीसरी कक्षामें दाखिला दिया। थोडी देरमें गणितके गुरूजीने टेस्ट रखी थी। खडे होकर एकेक गणित जुबानी सुलझाना, फिर गुरूजी कहें तब बैठकर स्लेटपर उत्तर लिखना और फिर अगले गणितके लिये खडे हो जाना। इस प्रकार दस गणित पूछे गये जो मेरे हिसाबसे मैंने सही हल किये थे। गुरूजी सबकी स्लेट जाँचकर अंक दे रहे थे। थोडी देरमें घोषणा हुई - पहले नंबरके अंक हैं- पचासमें सैंतीस। फिर स्लेट दिखाकर पूछा - ये किसकी स्लेट है? में रो पडी। गुरूजी कहने लगे, क्यों रोती है, तुझे तो पहला नंबर है। मैंने कहा मेरे सभी हल ठीक थे। गुरूजीने स्लेट फिरसे जाँची और देखा कि वाकई सारे हल सही थे लेकिन लिखनेका क्रम उलटपुलट हो गया था। ठीक है, आजके तुम्हारे अंक इतने ही रहेंगे, सैंतीस। आगेसे ध्यान रखना।
यह किस्सा जब घरपर जाकर सुनाया तो दादाजीने कहा अरे, इससे लिखनेका अभ्यास करवाओ। तबसे वे मुझे बडे बडे लिखकर करनेवाले गणित करवाने लगे।
कुल मिलाकर बचपनके सात वर्षोंमें मैंने ग्रामीण जीवनको मजेसे जिया। गायकी देखभाल, गोबरसे लीपना, रंगोली बनाना, तपी हुई काली मिट्टी में दौड लगाना, कुएँके रहाटसे पानी खींचना, किसानोंका खेतमें मोट चलाते देखना व उनके गीत सुनना, गांवकी लकडी घानीपर मूँगफली और तिलका तेल निकलवाकर लाना, ऊखलमें चावल कूटना, घरमें ही जवार या बाजरा पीसना, चूल्हेपर खाना पकाना, ये सारे काम घरकी महिलाएँ, बडी बहनें करतीं और मैं भी बीच बीचमें घुस जाती। उधर सारे भाई लोगोंके साथ गिल्ली डंडा, पतंग उडाना, मांजा बनाना, लट्टू घूमाना, कंचे खेलना और एक-दूसरेके कंचे लूटना ये सब भी करती थी। पडोसमें एक किसान परिवार था। उनका बेटा चंदर हमसे काफी बडा था। उसकी बैलगाडीमें बैठकर यात्राओंमें जाना, दादाजीके साथ पंद्रह दिनमें एक बार उनके खेतका चक्कर लगाना, जवारकी डंठलसे खिलौने बनाना, ये नित्य कर्मके समान थे। वाक - जूटकी तरहका एक पौधा - उससे रस्सी बनाते बुरुड, कलई लगानेवाले लोहारकी धौंकनी, रुई साफकर गद्दे भरनेवाले पिंजारी, तांबेके बर्तनमें पडे छेदको जोडनेवाले औतारी, सोना पिघलाकर गहने बनानेवाले सुनार, लंबी-लंबी नौगजी साडियाँ और मोटी मजबूत दरियाँ बनानेवाले बुनकर, इन सभी ग्रामीण व्यावसायिकोंका काम दादाजी अपने साथ ले जाकर दिखाते।
महाराष्ट्रमें एक बडा ही रूढ शब्द है - बारा बलुतेदार। अर्थात बारह प्रकारके व्यवसायिक जो हर गांवमें चाहिये होते हैं- सोनार, लोहार, चर्मकार, बढई, नाई, दर्जी, बुनकर, पिंजारी, औतारी, कलईकार, चरवाहा, बुरूड, कासार (चूडियाँ भरनेवाला) ये पारंपारिक व्यवसायिक थे तो दूसरी ओर पोस्टमास्टर, स्टेशन मास्टर, बँक मॅनेजर आदि आधुनिक यांत्रिकी युगके माहिर लोग थे। यात्राके लिये आसपास पद्मालय, मनुदेवी, उनपदेव आदि तीर्थ थे। गांवमें ही सायंकालमें हम कई भाई-बहन टोली बनाकर मंदिर जाते थे। गांवके एक छोरपर छोटासा जागृत गणेश मंदिर है चिंतामण मोरया। आज भी धरणगांवका कोई व्यक्ति चाहे विदेशमें ही क्यों न हो, यदि उसे मनौती मांगनी पडे तो वह चिन्तामण मोरयासे ही निवेदन करता है कि आकर तेरे दर्शन करूँगा। धरणगांवसे दूर जाकर भी इस गांवसे मेरा नाता बना रहा क्योंकि बिहारमें नौकरी करते हुए पिताजी हम सबोंको गर्मीकी छुट्टियाँ बिताने यहीं ले आते और रिटायरमेंटके बाद भी वे कुछ वर्ष यहीं रहे। मेरे लिये हर बार धरणगांव जानेका अर्थ था अपनी माटीसे कुछ ऊर्जा लेकर आना।
सात वर्ष पहलेकी घटना है। दादाजीका घर हमलोग पडोसी चंदरको बेच चुके थे और अप्पाके घरका जो इकलौता बेटा अभी भी गाँवमें ही रहा था अर्थात मेरा छोटा चचेरा भाई, उसने भी चिंतामण मोरयाके पास बनी नई पॉश बस्तीमें घर ले लिया था। मैं किसी सरकारी कामसे दौरेपर जलगांव गई तो मन हुआ धरणगांव जाकर एक बार घर देख आऊँ। एक किरायेकी कार ली। गाँवतक आकर पहले मोरया मंदिर गई। थोडी देर बैठी, तबतक पता चला कि भाई-भाभी दूसरे गाँव गये हैं। अब उठकर घरके रास्ते चलूँ, तबतक मनमें एक प्रचंड ज्वार उमड पडा। लगा जैसे आज यदि घरको देखकर उससे विदा ली, तो यह उससे सदाके लिये विदा लेने जैसा होगा, वह सदाके लिये पराया हो जायगा। तो मैं वहाँ गई ही नहीं। और इसीलिये आज भी वह घर मेरा ही है। चंदरकी मृत्यूपश्चात् अब उसका बेटा महेश मेरे संपर्कमें है। कई बार कहता था, ताई, आकर देख जाओ। जैसा दादाजीके समय था, वैसा ही रखा है। चंदरकी पत्नीसे भी मिलना था। तो हालमें मनको धैर्य बँधाकर गई। घरभरमें घूम आई और घरसे तथा महेशसे भी कहा - महेश यह मेरा घर है। उसने भी कहा - हाँ ताई, मैंने कब ना कहा है। तब मैंने एक योजना बनाई। गाँवकी माटीसे उऋण होनेकी योजना। हर वर्ष इस गाँवमें कुछ अच्छे कामके लिये मैं अपनी पेंशनका दसवाँ भाग खर्च करूँगी। पिछले वर्ष नौवीं कक्षा के तीन अलग अलग स्कूलोंके तीन-तीन ऐसे बच्चोंको सम्मानित किया जिन्होंने मराठी, हिंदी और संस्कृतमें अच्छे अंक पाये थे। अब हर वर्ष इन्हीं योजनाओंको निखारकर आग ले जानेकी सोची है।
सरकारको भी एक सुझाव दिया है। इनकम टॅक्समें जिस प्रकार 80जी में छूटका प्रावधान है, वैसा ही कुछ अधिक खास प्रावधान किया जाय ताकि लोग अपने गाँवके लिये कुछ व्यय करें। ऐसा किया तो गाँवोंकी समृद्धिका एक नया रास्ता खुलेगा। इस काममें जलगाँव जिलेके कई कनिष्ठ सरकारी अधिकारी मेरे साथ हाथ बँटा रहे हैं, यह और भी प्रसन्नताकी बात है।
एक बहुचर्चित उपन्यास है - गॉन विथ दी विंड। उसकी नायिकाका वर्णन है कि जब भी कठिनाईके दिनोंमें वह अपने पिताके घर आती है, तो उसे ऊर्जा मिलती है और वह कहती है -- अब यहाँ आ गई हूँ तो कलका दिन नया होगा, सारी कठिनाइयोंसे नया रास्ता दिखानेवाला - ॠढद्यड्ढद्ध ठ्ठथ्थ्, द्यदृथ्र्दृद्धद्धदृध्र् त्द्म ठ्ठददृद्यण्ड्ढद्ध ड्डठ्ठन्र्.
मैंने तीस वर्षकी आयुमें यह उपन्यास पढा। और मैं आश्चर्यचकित रह गई कि उस नायिकाको अपने गांव, अपने घर आकर वही ऊर्जा मिल रही थी जो मुझे भी धरणगांवमें सदा मिलती रही है।

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