ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
रिश्ते
CATEGORY : कविता 01-Mar-2017 11:49 PM 800
रिश्ते

रिश्तों की रंग-बिरंगी कतरनें
रखी हैं संजो कर मैंने।
ये रिश्ते आम हैं, कोई खास नहीं
इनके बनाने-बिगड़ने पर मेरा जोर नहीं।

इन नज़ाकत रिश्तों की
हिफ़ाज़त करो, तो सब है
वर्ना ज़िंदगी विरानी है।

ये रिश्ते हमें दुनियादारी सिखाते हैं
भले-बुरे की पहचान कराते हैं।
धूप-छाँह से, क्षण-क्षण बदलते रिश्ते
खुद से खुद की मुलाकात कराते हैं।

दर्द भरे रिश्ते अपने अन्दर झाँक कर देखना
और स्वयं से मैत्री की महत्ता सिखाते हैं।

कुछ रिश्ते जिंदगी का हिस्सा बनते-बनते
सारी जिंदगी पर हावी हो जाते हैं, और
हमारी एकमात्र पहचान बन जाते हैं।

ऐसे भी होते हैं रिश्ते, जो सार्थक
जीवन की परिभाषा कहलाते हैं।

गरम पानी पड़कर ही चाय का रंग निखरता है
और कच्चे चीथड़ों का रंग बिखरता है।


रिश्तों बगैर ज़िंदगी कागज़ का फूल होगी
बगैर दूध-शक्कर की चाय और बेमज़ा चाट होगी।

सलोनी ज़िंदगी के लिये नमक चाहिये
कुछ खट्टा, कुछ मीठा, कुछ सखत, कुछ नरम चाहिये।
कुछ सफलता, कुछ विफलता चाहिये
कुछ जाना पहचाना, कुछ अनजाना चाहिये।

कुछ रिश्ते पहेली बन कर आते हैं, मूक, निःशब्द
आत्मचेतना का स्वर्णिम पाठ पढ़ा जाते हैं।

इन टुकड़ों की बनी चादर
तन ढकती है, मन हरती है
पहुँचाती है हमें शिखर तक
और अमर कर जाती है।

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