ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
पाठकीय टिप्पणी
01-Feb-2019 03:02 PM 423     

ताराशंकर बंद्योपाध्याय बंगाल के एक सुप्रसिद्ध लेखक हैं। कुछ दिन पूर्व इनका साहित्य पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। साहित्य अच्छा है, गहन दृष्टि है। ग्रामीण जीवन का अत्यंत बारीकी से चित्रण भी किया है। विशेषकर अति निम्न वर्ग का। स्वाभाविक है बंगला संस्कृति और जनजीवन का मनोहारी रूप उभरकर आये, सो है भी। इनकी कहानियों में फांसी का प्रयोग बहुलता से पाया जाता है। रूपमति विहंगिनी ने अपने गुरु का खून किया, परिणाम स्वरूप फांसी की सजा पाई। संभवतया लेखक के अचेतन मन में फांसी का कोई दृश्य अटके बैठा हो अथवा उस समय की सामाजिक परिस्थितियों में फांसी का बोलबाला हो। अस्तु जो भी हो यह लेखक के विचारों, बिंबों का प्रतिफलन है या उनकी निजी स्वीकारोक्ति। उनकी रचनाएँ एक विशेष प्रकार की तत्कालीन परिस्थितियों का आंकलन है, जिसमें राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक सभी परिस्थितियों का समावेश है, जो यत्र-तत्र झलकता है, इसमें कोई संदेह नहीं। यह विशेषता ही तो उनकी मौलिकता का आधार हैं, किन्तु उनकी एक पुस्तक "प्रेम कहानी" के मुख्य पृष्ठ के कवर पेज पर उनकी संस्तुति करते हुए जो लिखा गया है, वह कुछ गले उतर नहीं पा रहा है। उदाहरण स्वरूप गांवों और ग्रामीण जनों पर लिखते हुए उन्होंने कोई नई जमीन नहीं तोड़ी, क्योंकि शरत तथा अन्य लेखक भी गाँव के बारे में बहुत कुछ लिख चुके हैं, पर उनके पास ताराशंकर जैसा ज्ञान, विशाल दृष्टि और इतिहास बोध नहीं था। क्या यह सत्य है पाठक गण स्वयं ही निर्णय लें।
शरत ही नहीं अपितु कुछ अन्य लेखक कह कर प्रत्यक्ष रूप से शरत एवं परोक्ष रूप से बंकिमचंद्र, गुरुदेव टैगोर आदि उस समय के प्रचलित बंगला साहित्यकारों पर भी प्रहार किया है। उन शरत पर जिनका लेखन एवं व्यक्तित्व सभी कुछ विचित्रताओं का दिग्दर्शन है, जो न केवल वैचित्र्यपूर्ण है अपितु गहनता एवं संघर्षपूर्ण भी है। अपने अबाध चिंतन एवं सुचारु दृष्टिकोण से जो कुछ उन्होंने इस जगत को दिया, अपने में अनूठा है जिसकी कोई सानी नहीं।
एक बार एक नाटककार श्री रोद जी को जब शरत का "देव पावन" नाटक पढ़ने को दिया गया तो नाटक के नाम पर पहिले तो वे बिगड़ पड़े, पर नाटक पढ़कर अभिभूत हो उठे। उन्होंने शरत को सीने से तो लगाया पर अन्य लेखकों की तुलना कर उन्हें ऊंचा नहीं उठाया। उनके उद्गार इस प्रकार हैं - "कैसी भाषा है, कैसा चरित्र चित्रण, एक प्रसिद्ध नाटककार का अभिभूत होना एक अलग ही अर्थ रखता है।"
शरत की कहानियों में सामाजिक रूप दर्शनीय है। जमीदारों के अत्याचार, सामाजिक कुप्रथाओं पर प्रकाश तो उपलब्ध होता ही है साथ ही स्वतन्त्रता के प्रति अदम्य आकांक्षा के स्वर भी गुंजायमान हैं। इनका मस्तिष्क अनुभवों का एक विशाल कोश था, जो सदा ही इन्हें प्रेरणा एवं सूझ-बूझ प्रदान करता था। इनकी "भरेश" कहानी पढ़कर श्री अरविंद जी ने लिखा था "विस्मित कर देने वाली रचनाशैली, महान सृष्टा, अद्भुद शिल्पी जो मानव हृदय में गंभीर आवेश पैदा करने में सक्षम है।" संस्तुति के पश्चात भी कहीं किसी से कोई तुलना नहीं।
अस्तु विचारणीय बात यह है कि मात्र ताराशंकर जी कि स्तुति होती, उत्तम था किन्तु जब शरत जी और टैगोर जैसे उत्तम कोटि के लेखकों को ताराशंकर जी से तुलना कर उन्हें उनसे निम्न कोटि का ठहराया गया तो बात कुछ गले नहीं उतर पा रही है।
इस प्रकार की तुलना शोध का विषय तो हो सकती है, जहाँ अपने पक्ष को प्रबल दिखाना होता है, पर यहाँ अनुचित सारहीन-सी लग रही है। इस प्रकार कि संस्तुति कर संस्तुतिकर्ता की मानसिक एवं लेखक के प्रति पक्षपात पूर्ण दृष्टिकोण का परिचायक है।

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