btn_subscribeCC_LG.gif
भाषा पढ़ें, संस्कृति सीखें
01-Oct-2019 11:04 AM 507     

आजकल कोई भी भाषा सीखने के लिए आवश्यक सामग्री काफ़ी आसानी से मिल सकती है और पढ़ाई के साधनों की जगह सबसे बड़ी चुनौती बन रही है भाषा सीखने के लिए प्रेरणा। आजकल की पीढ़ी को इंटरनेट के द्वारा सारी आवश्यक जानकारी और हर विदेशी शब्द, लेख, निबंध या फ़िल्म का अपनी मातृभाषा में अनुवाद आसानी से उपलब्ध होने के कारण दूसरी भाषाओं को पढ़ने की प्रासंगिकता का अहसास लोगों को कम होता जा रहा है। अगर पहले साहित्य के शौकिन अपने प्रिय लेखकों की रचनाओं को उनके मूल रूप में पढ़ने के लिए भाषाएँ सीखते थे तो आजकल भाषा सीखना क्या, किताबें पढ़ना भी मनुष्य के सबसे प्रिय शौकों में से पीछे हट रहा है।
एक ओर से वैश्विकरण तथा तकनीकि विकास मानव की आत्म शिक्षण की सारी इच्छाओं को पूरा करने में समर्थ होते जा रहे हैं तो दूसरी ओर से इन्हीं परिवर्तनों के कारण कुछ पढ़ने की इच्छा ही कम होती जा रही है। भाषा विद्या पर भी इस सबका पर्याप्त प्रभाव पड़ रहा है। अपनी सरलता, व्यवहारिकता और बहुत से स्थानों में प्रचलित होने के कारण अंग्रेज़ी भाषा का महत्त्व बढ़ता जा रहा है। औपचारिक तौर पर सभी भाषाओं के समान अधिकार होने के बावजूद वैश्विकरण और इंटरनेट के माध्यम से कुछ भाषाओं का सर्वाधिक प्रयोग किया जाता है जबकि दूसरी भाषाओं को केवल कुछ सीमित क्षेत्रों में साहित्यिक एवं बोलचाल की भाषाओं के रूप में स्वीकारा जाता है और विदेशी भाषा के रूप में ऐसी किसी भाषा को पढ़ने के लिए प्रेरणा अगर होती है तो केवल उस भाषा और उस संस्कृति के सच्चे प्रेमियों को।
जहाँ तक हिंदी का प्रश्न है तो यह नहीं कहा जा सकता है कि इस भाषा का प्रयोग-क्षेत्र बड़ा नहीं है और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इसकी लोकप्रियता कम है। फिर भी उन लोगों के लिए जो अपने मूल रूप से भारत या भारतीयों से जुड़े नहीं हैं हिंदी सीखने में कोई व्यवहारिक अर्थ देख पाना काफ़ी कठिन होता है। अगर सीखते भी हैं तो भारतीय संस्कृति, कला या दर्शन के शौक से। ऐसा नहीं है कि भारत के बाहर हिंदी बोलने वाला माहौल कम जगहों में मिलता है, उलटा आजकल भारतीय प्रवासी संसार के हर कोने में अपने अस्तित्व को बड़े शालीन और शांतिपूर्ण ढंग से घोषित कर रहे हैं और जहाँ भी बसे अपने साथ अपना संस्कार, परंपराएँ और धर्म लाने की उनकी क्षमता माननीय अवश्य है। लेकिन फिर भी औपचारिक संप्रेषण और सोशल मीडिया की मुख्य भाषा का दर्जा हिंदी को और देवनागरी लिपी को न विदेश में भारतीय प्रवासियों के समाजों में दिया जाता है न ही स्वयं भारत में। इसी कारण से विदेश में भारत का कोई शौकीन हिंदी पढ़ना चाहे भी और हिंदी में संप्रेषण करने के लिए इंटरनेट में हिंदी बोलनेवाले लोगों से मित्रता करना चाहे तो अक्सर अपनी टूटी-फूटी हिंदी का वह भारतीयों से उत्तर अंग्रेज़ी में पाता है और व्यवहारिक रूप से हिंदी का अभ्यास करना शुरू करने से पहले ही वह व्यक्ति सोचने लगता है कि शायद इस भाषा का व्यवहारिक महत्त्व अधिक नहीं है।
यह वह अनुभव है जिससे युक्रैन में हिंदी पढ़ने वाले मेरे काफ़ी छात्र गुज़रे हैं। ऐसा नहीं है कि इस प्रकार की समस्या केवल हिंदी के साथ है। उदाहरण के लिए जो कोई विदेशी व्यक्ति हमारी उक्राइनी भाषा सीखना और व्यवहारिक तौर पर उसका प्रयोग करना चाहे तो उसको इसी तरह की स्थिति का सामना करना पड़ेगा। बहुत उक्राइनी लोग रूसी भाषा में जवाब देंगे। इसलिए यह कहते हुए मैं केवल भारतीयों को अपनी मातृभाषा के प्रेमी न होने का दोष नहीं दे रहा हूँ, यह एक सामान्य स्थिति है। दुनिया में जिसको हम हिंदी जैसी भाषा सीखने की एक चुनौती कह सकते हैं।
अपने युक्रैन में भारत से न जुड़े मेरे परिचित लोगों को जब पता चलता है कि मैं हिंदी पढ़ा हूँ और पढ़ाता हूँ तो सबसे पहले उनको इस बात का आश्चर्य होता है कि हिंदी जैसी कम सुनने को मिलनेवाली भाषा की भी हमारे विश्वविद्यालय में पढ़ाई होती है। दूसरा प्रश्न यह उठता है कि युक्रैन में लोग हिंदी किसलिए पढ़ते हैं। यही प्रश्न मुझसे भारत में भी लोगों के द्वारा अक्सर पूछा जाता है। युक्रैन में भी और भारत में भी इस सवाल के पीछे ज़्यादातर हिंदी पढ़ने का आर्थिक कारण जानने की इच्छा होती है। "कोई स्कोप है क्या? भारत में तो अंग्रेज़ी से काम चलाया जा सकता है।" कभी-कभी इस सवाल का जवाब देना मुश्किल होता है, क्योंकि सच में हमारे हिंदी विभाग के ऐसे केवल कई चुने हुए स्नातक छात्र हैं जिनको हिंदी की डिग्री प्राप्त होने के बाद इस भाषा का ज्ञान व्यवहारिक रूप से काम आया है। और सभी लोगों को हम यह तो नहीं समझा सकते हैं कि हिंदी और भारत-विद्या पढ़ने के साथ हमें भारतीय संतुलित चेतना तथा उस सहज सनातन अध्यात्मिकता एवं रस-प्रियता की महक महसूस करने को मिलती है जो शायद हमारी अपनी संस्कृति में इतने विद्यमान रूप में नहीं बची है। और वैसे भी किस ने कहा कि हर शिक्षा के पीछे कोई व्यवहारिक या आर्थिक कारण होना आवश्यक है? कुछ ऐसे दीवाने लोगों की भी शायद आवश्यकता है जो संसार को यह साबित करने पर तुले हों कि वैश्विकरण तथा मानव जाति का विकास स्थानीय भाषाओं और संस्कृतियों के धीरे-धीरे मरते जाने के बिना भी संभव है और कि भाषाओं एवं संस्कृतियों की विविधता ही मानवीय समाज की शान का आधार बनाए रखती है।
जैसा मैंने शुरू में कहा है, आजकल के इंटरनेट-युग में हिंदी पढ़ने-पढ़ाने की सामग्री आसानी से मिलती है, लेकिन उससे पुस्तकों का भी महत्त्व कम नहीं होता है, विशेष रूप से अगर मूल व्याकरण सीखने की बात करें। और हमारा मानना यह है कि शुरुआत में उक्राइनी छात्रों को हिंदी का व्याकरण एक अच्छी तरह हिंदी जानने वाले उक्राइनी अध्यापक से समझाया जाए तो बेहतर है क्योंकि शुरू में विदेशी भाषा और मातृभाषा के व्याकरणों की समानताएँ और अंतर विस्तार से समझाए जाएँ तो आगे विदेशी भाषा सीखने में छात्रों को आसानी होती हैं। उसके लिए विदेश में रची हिंदी पाठ्यपुस्तकें बहुत काम आती हैं। जैसे हम अपने पाठ्यक्रम में युक्रेन, रूस, बोल्गेरिया और अंग्रेज़ी बोलनेवाले देशों में प्रकाशित हुई हिंदी पाठ्यपुस्तकों का प्रयोग करते हैं। जब मूल व्याकरण तथा उच्चारण छात्रों की समझ में आ चुका होता है तब भाषा का अधिक से अधिक अभ्यास करने का समय आता है। और फिर अनेक हिंदीभाषी स्रोतों से सहायता मिलनी शुरू करती है। सबसे पहले श्रवण के अभ्यास बहुत ज़रूरी होते हैं क्योंकि हिंदी बोलना शुरू करने से पहले हिंदी को सुनकर समझना आवश्यक होता है। ताकि पढ़ाई भी हो जाए और मज़ा भी आए। शुरू करने वालों के साथ हम हिंदी कार्टून देखते हैं (उदाहरण के लिए बच्चों के लिए बनाए हुए पंचतंत्र के किस्से)। हर वाक्य पर वीडियो को रोककर उस वाक्य का व्याकरण की दृष्टि से विश्लेषण करते हुए और उसको दोहराते हुए। आगे जाकर जब हिंदी समझने की छात्रों की क्षमता बढ़ती जाती है तब कार्टूनों की जगह इसी तरह बालीवुड की फ़िल्में देखी जाने लगती हैं जिनका ऐसे भी बहुत छात्रों को पहले से शौक होता है। श्रवण के साथ-साथ पढ़ने और बोलने के अभ्यास किए जाते रहते हैं और उसमें बहुत गतिविधियाँ हो सकती हैं। उदाहरण के लिए शुरू में छात्र हिंदी बाल साहित्य की कहानियाँ पढ़ते हैं और फिर उनको सुनाकर प्रस्तुत करते हैं। अधिक पढ़े हुए छात्र इसी तरह बाल साहित्य की जगह पत्रिकाओं के निबंधों तथा वयस्क लोगों के लिए साहित्यिक रचनाओं का प्रयोग करते हैं। कई छात्र फिर हिंदी साहित्य की कुछ रचनाओं पर शोध कार्य भी लिखते हैं। इस प्रकार हिंदी भाषा के हर तरह के अभ्यासों के साथ-साथ हिंदी सिनेमा और हिंदी साहित्य से भी काफ़ी गहरा परिचय हो पाता है। भाषा के माध्यम से एक पूरी संस्कृति की शिक्षा प्राप्त की जाती है। हिंदी में बात करने के अभ्यास के लिए छात्रों को युक्रैन में रहने वाले भारतीय लोगों से मिल-जुलने का मौका दिया जाता है। युक्रैन में भारतीय राजदूतावास से कुछ लोग भारतीय सरकार की ओर से पढ़ाने भी आते हैं। इस प्रकार के संप्रेषण से भारतीय संस्कारों और भारतीय स्वभाव का हिंदी छात्रों को और अच्छा अंदाज़ा हो जाता है।
जैसा कि पहले मैंने बताया है, हिंदी सीखने के व्यवहारिक या आर्थिक लाभ का प्रश्न जब उठाया जाता है तो हमारे लिए उक्राइनी भारतवेत्ताओं के लिए इसका उत्तर देना आसान नहीं होता है। हमारे तरास शेव्चेंको कीव राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के भाषा विज्ञान के इंस्टीट्यूट के हिंदी विभाग में जो छात्र पढ़ने आते हैं उनमें भारत की संस्कृति के ऐसे काफ़ी सच्चे शौकीन होते हैं जो अधिकतर अपने आत्म विकास के लिए हिंदी और भारत विद्या पढ़ना चाहते हैं और भविष्य में अपना रोज़गार ज़रूरी तौर पर हिंदी से नहीं जोड़ते हैं। उनको पढ़ने के लिए प्रेरित करने में कोई समस्या नहीं होती है। लेकिन ऐसे छात्र भी होते हैं जो यह आशा लेकर आते हैं कि भारत जैसे जल्दी तरक्की करने वाले देश की राष्ट्रीय भाषा निकटतम भविष्य में अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के क्षेत्र में अधिक प्रचलित हो जाएगी।
खेद की बात यह होती है कि थोड़े समय के बाद ऐसा भी होता है कि उनमें से कुछ लोग औपचारिक और व्यवसायिक स्तर पर हिंदी की स्थिति की वास्तविकता देखकर अधिक प्रभावित नहीं होते हैं और हिंदी की पढ़ाई छोड़ देते हैं। लेकिन जो भी छात्र पढ़ने आते हैं हम उन सबको भारत की आत्मा को करीब से जान लेने के लिए प्रेरित करने की कोशिश करते हैं और अगर आर्थिक दृष्टि से किसी भाषा का ज्ञान हमेशा लाभदायक नहीं होता है तो इसी भाषा को सही ढंग से आत्म विकास और चेतना के विस्तार से जोड़कर जीवन में सुख और सत्य खोजने वाली जवान पीढ़ी को इस भाषा को सीखने के लिए अवश्य प्रेरित किया जा सकता है। और इसका एक बेहतरीन उदाहरण है हिंदी।

QUICKENQUIRY
Related & Similar Links
Copyright © 2016 - All Rights Reserved - Garbhanal - Version 19.09.26 Yellow Loop SysNano Infotech Structured Data Test ^