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रे अन्नदाता...चिट्ठी-पत्री
02-Jun-2017 03:46 AM 2646     

गुढी पाडवा
प्यारे बेटे जयवर्धन,
कोटिशः आशीर्वाद।
अभी शाम सात बजे मैं सकुशल पहुँची। मुझे विश्वास नहीं हो रहा है कि मैं शहर की उस दमघोटू आबोहवा से निकलकर इस वज्र देहात में अपनी जन्मस्थली में पहुँची हूँ। बेटा, हृदय से प्रसन्न हूँ। जहाँ बैठकर में यह पत्र लिख रही हूँ, यह वही क्षेत्र है जहाँ मेरा जन्म हुआ। गाँव किनगांव-कोपरा, तहसील अहमदपुर जिला लातूर।
दशकों बाद यहाँ आई हूँ पर लगता है जैसे यह गाँव मेरी स्मृतियों में इतना अधिक रचा-बसा है कि मेरे अस्तित्व को इससे अलगाया ही नहीं जा सकता। गर्मियों की रात जब पुरवाइयाँ चलें, ठण्डी सफेद चादरों पर जागें देर तक, तारों को देखते रहें छत पर पड़े हुए। मन में जलतरंग बज रहा है। यहीं है वे गर्माहट भरे रिश्ते, यहीं हैं वे लहलहाती फसलों के खेत, यहीं हैं माटी की महक, यहीं है वह संपन्नता जिसके लिए थैली भर धान, साग-सब्जी, दाल किराने से लाने वाले हम जैसे शहरी लोग तरसते हैं। नदी से घड़े में पानी भरकर लाती बहुएँ यहीं हैं। दिया-बाती के बाद "शुभम् करोति कल्याणम्" सिखाने वाली दादी-नानी यहीं बसा करती हैं।
कुछ ज्यादा ही "पोएटिक" हो रही हूँ क्या? पर सच में जयू, यहाँ टीवी के सामने हाथ पैर पसारकर दुपहरी बिताती या फिर मोबाइल पर घंटों चुगली खाती औरतें नहीं होतीं। मैंने स्मृतियों में सहेजकर रखी हैं, खस के पर्दे भिगोकर, लोकगीत गाती हुई बड़ियाँ तोड़ती, खार (अचार) डालती औरतें, बच्चों की बलैयां लेती हुई, मायके में बाप-भाई की उन्नति की प्रार्थना करती हुई, सोहाग की सलामती की दुवा माँगती औरतें... सुनो जयू, मुझे चूल्हे पर पकी ज्वारी की भाकरी की सोंधी खुशबू महसूस हो रही है। मुक्की से फोड़ा गया प्याज और बिना तेलवाला खार, वाह! इनका स्वाद तो मेरी जिह्वा ही नहीं, मन-मस्तिष्क में बसा हुआ है।
और एक बात, अब उस सीमेंट के जंगल में, कबूतरखानों जैसे घरों में मन नहीं लगता। बड़ी आस है कि एकड़-दो एकड़ खेती लूँ और यहीं बस जाऊँ।
तुम्हारी आई
....
महाराष्ट्र दिन
प्रिय बेटे जयवर्धन
अनंत शुभाशीष।
लगभग तीन दशकों के बाद गाँव में रह रही हूँ। बचपन का देखा हुआ गाँव अब भी स्मृतियों में ताजा है। शायद दशकों बाद गाँव की वही तस्वीर तलाशने का मोह मन में अवश्य रहा होगा। पर अब अतीत और वर्तमान की इन दो तस्वीरों में जमीन-आसमान का-सा अंतर देखती हूँ। बचपन में देखा हुआ गोकुल-सा गाँव अब कहीं नहीं दिखता। वैसे तो हर आए दिन समाचार-पत्र में पढ़ा है कि महाराष्ट्र के किसान कर्ज, फसल की बर्बादी के कारण आत्महत्या कर रहे हैं। बताया जा रहा है कि हर सातवें मिनट पर एक किसान आत्महत्या करता है। लेकिन मैं अभी जिस गाँव में हूँ उस गाँव पर, उस क्षेत्र पर कभी आत्महत्यावादी मानसिकता हावी होगी, ऐसा मैंने कभी सोचा न था। यहाँ की प्रचंड जिजीविषा का अनुभव पूरे देश ने बहुत पहले किया था। यह वही लातूर क्षेत्र हैं जहाँ दशकों पहले हुए भूकंप में हजारों जानें गईं थीं और पलभर में सबकुछ जमीनदोज हुआ था। तब भी इस क्षेत्र ने, मेरे गाँव ने संकट में डिगना नहीं जाना किंतु अब विगत तीन साल का भीषण अकाल इस गाँव की हिम्मत तोड़ चुका है। यहाँ कभी भीषण ओलावृष्टि हुई तो कभी पूरे मौसम में बूंदभर पानी न बरसा। अब मेरा यह गाँव, गाँव क्या, पूरा महाराष्ट्र किसानों का मसान-क्षेत्र माना जा रहा है। पूरा गाँव तपेदिक के रोगी की तरह खून थूक रहा है। ऐसा नहीं गाँव की यह स्थिति मात्र तीन साल के अकाल के कारण हुई। महाराष्ट्र में अकाल का संकट किसान के लिए नया नहीं। 1972 के भयंकर अकाल से जूझकर भी महाराष्ट्र के किसान जीवन की लड़ाई हारे नहीं थे सो आजकल ही ऐसा क्या हुआ कि किसानों को दूधमुँहे बच्चे, वृद्ध जर्जर माता-पिता, गाय-सी पत्नी, अनब्याही बहन सभी को संकट की कगार पर नितांत अकेला छोड़ मौत को गले लगाना बेहतर लग रहा है?
जयू, इस समस्या का न ओर न छोर। दीनानाथ काका से गाँव का सूरत-ए-हाल जानना चाहा। काका पहले तो खेतों के हरे सपने में खो गए फिर सारी बातों को बताने लगे। अपनी बूढ़ी आँखें मिचमिचाकर वे भी अचरज जता रहे थे।
"बिटिया, हम नहीं जानते कि कब और कैसा हुआ यह भीषण परिवर्तन? कुछ तो सरकार की मेहरबानी है और कुछ अपनी ही लापरवाही।"
मैं न समझी तो काका समझाने लगे, देखो, जी तोड़ मेहनत के साथ पूरे खेत जोतकर मक्खन-सी मुलायम जमीन पहली बारिश के बाद बोआई के लिए तैयार रखी जाती है। पहले किसान अपने बीज खुद जतन कर रखता था। धान की बेहतरीन किस्म, जो खूब फलती है, भविष्य के लिए अलग निकाली जाती और फिर उसमें नीम की खूब सारी पत्तियाँ मिलाकर मिट्टी से लीपे कोठारों में सुरक्षित रखा जाता। किसान 1972 के अकाल में भूस, पत्ती खाकर जीते रहे पर बोआई के लिए रखे अनाज को छुआ तक नहीं। तड़पते बाल-बच्चों को देखकर यह खयाल जरुर आता कि कोठार से धान निकालकर पिसवाएं और भूखे बच्चों के सामने रोटी रखे पर कभी उस बीज को खाकर खतम नहीं किया। बूढ़े काका की आँखों में उभरी चमक धूमिल होने लगी काका आगे बताने लगे, अब तो घर का बीज जैसी कोई बात ही नहीं। कुछ ग्राम वजनवाली बीज की थैली के लिए हजारों का दाम चुकाया जाता है। तिस पर यह भरोसा नहीं कि वह फलेगा ही। कई बार तो विज्ञापन देख सुनकर खरीदा गया बीज उगने के नाम पर ठेंगा दिखाता है। ऐसे खोटे बीज किसान को सड़क पर लाकर खड़ा कर देते हैं। ऐसे बीज को बेचनेवाला रैकेट हर दूसरे सूबे में मिल जायेगा। इसके खिलाफ तहसील के मामूली अफसर से लेकर ग्राहक मंच तक किसी के पास की गई किसी शिकायत को कोई नहीं पूछेगा। यदि बड़ी चिल्लपों मचाई गई तो सबूत के तौर पर एक-एक कागज माँगा जायेगा जो कि किसान के पास अमूमन होता नहीं। नतीजा नकली बीज के खिलाफ न कोई शिकायत दर्ज हो पाती है न ही न्याय की कोई उम्मीद की जा सकती है। आज भी किसान कुछ फसलों का ही सही, अपना धान बोआई के लिए सुरक्षित रख सकता है। सोयाबीन जैसी फसल का बीज जतन करना मुश्किल नहीं बिटिया, पर अब यह सब करे कौन? बार-बार दगा देने वाले बाजार का मोह क्यों नहीं छूटता, यह तो राम ही जाने।
जयू, मैं तो काका की बातें सुनकर दंग रह गई। हम शहराती लोग सोने चांदी से लेकर ड्रग्ज तक की तस्करी की बातें सुनते हैं। सिनेमा के टिकटों से लेकर तेल तक की ब्लैक मार्केटिंग के बारे में जानते हैं, फल-फूल से लेकर दवाइयों तक के नकलीपन पर चर्चा करते हैं, लेकिन गाँव-देहात के किसान बीज की तस्करी, ब्लैक मार्केटिंग और नकलीपन से त्रस्त हैं, यह तो कभी भूले से भी सोचा नहीं था।
दीनानाथ काका इस दुष्ट-चक्र की अगली कड़ी समझाने लगे, "जानती तो बिटिया नकली बीज की बोआई जब धोखा दे जाती है तो किसान दोबारा बोआई करने के लिए विवश हो जाता है और इससे ज्यादा कष्टप्रद कोई बात नहीं। एक बार बोआई की पूरी प्रक्रिया कर चुकने के बाद सारी बोआई का निरर्थक हो जाना... भयंकर है। नकली बीज के कारण करनी पड़ी बोआई किसान की बाजार के षडयंत्र से बेखबर होने के कारण थी। लेकिन बेचारे किसान पर कई बार कुदरत भी गाज गिराती है। बीते तीन सालों में अकाल के कारण किसान को कई बार दोबारा बोआई करनी पड़ी। महाराष्ट्र में तो धूल-बोआई का, अपने भविष्य को किस्मत के हवाले करने का, रामभरोसे तरीका भी अपनाना पड़ा।"
दीनानाथ काका पूछ रहे थे, "जानती हो क्या बिटिया, धूल-बोआई क्या होती है?" मैं सिर हिलाकर जताया- ना, तो काका बताने लगे, "इतना तो जानती ही हो कि खूब बारिश में भीगे खेत बोआई के लिए तैयार माने जाते हैं लेकिन बारिश ही न हो और बोआई का समय बीत जाए तो किसान क्या करे? महाराष्ट्र के किसान धूल से भरे सूखे खेतों में अनाज बोते हैं। इस उम्मीद के साथ कि भले आज जमीन सूखी है लेकिन कल बारिश आयेगी और बीज फलेगा। कई बार यह उम्मीद सच साबित होती है पर अधिकतर तो ऐसे बीज चीटियाँ चट कर जाती हैं।
पूरा समय बीत जाता है और अंततः खस्ताहाल किसान साहूकार के व्दार पहुँच जाता है। आज साहूकार का बाह्य रूप बदल गया है। अब वह मलमल की धोती पहने, मुँह में पान का बीड़ा चबाते हुए धौंस देता हुआ नजर नहीं आता पर आंतरिक रूप में उसके मकड़जाल में कोई बदलाव नहीं आया। बल्कि उसका फंदा ज्यादा भयंकर हो गया है। गाँव-शहर के नेता के आश्रय में छिपे इन साहूकारों जितना ही विकराल रूप बैंकों का भी है। कम ब्याज दरों का लालच देकर एक बार किसान को कर्ज के बोझ तले कुछ इस तरह दबाया जाता है कि कर्ज माफ होने की आस लिए किसान दुनिया को अलविदा कहने पर मजबूर हो जाता है। नामालूम-सी ब्याज दरों पर कर्ज उन बड़ी असामियों को मिल जाता है जो केवल नाम भर के लिए किसान हैं, जिनके पास खसारा खत के अलावा किसानी का कोई प्रमाण नहीं। ऐसे ही लोगों को कर्ज से रियायत भी दी जाती है। जो किसान इन सारी सुविधाओं को पाने का अधिकारी है, वह दम तोड़ देता है।"
जयू, मैं सच कहती हूँ, कभी जिस जगह जिंदगियों की मासूम अटखेलियाँ देखी हैं वही आज मैं मौत का तांडव देख रही हूँ। अकाल में आँखें ही नहीं, दिल भी सोख दिए हैं। किसान आसमानी और सुलतानी मार से हलकान हुए जा रहा है। लातूर जैसे जिले में पानी की ऐसी भीषण किल्लत है कि महीने में एक बार नल में पानी आता है। यहाँ पीने के लिए रेलगाड़ी से पानी मंगवाया जा रहा है। ऐसे में खेती किसानी के लिए पानी का इंतजाम कहाँ से हो? न आसमान बरस रहा है, न जमीन फल रही है, न ही सरकार बख्श रही है। ऊपर से बीजों, खादों, जानवरों के चारा आदि में होनेवाला भ्रष्टाचार, कालाबाजारी किसानों के प्राण लिये जा रही है। यह तो किसान का दिल ही जानता है कि एक पूरे परिवार को पालना-पोसना आसान है पर एक बैल जोड़ी को पालना-पोसना कठिन। बेटा, शहरों में भले ही बूढ़े माँ-बाप को वृद्धाश्रम का रास्ता दिखाया जाता हो, आज भी किसान इतना पत्थरदिल नहीं हुआ है बूढ़े बैलों को बाजार का रास्ता दिखाए। बड़ी अजीब स्थिति है। पहले सौ-सौ एकड़ जमीनें हुआ करती थीं, महाकाय मशीनें नहीं थीं सो एक क्या, दो-दो बैलजोड़ी का होना भी कम लगता था। अलगोझ्ये की मेहरबानी से परिवार बँटते गए, एकल परिवार के हिस्से में आई चार-दो एकड़ जमीन के लिए पूरे सालभर बैलों का दानापानी कैसे निभाए? दूसरी ओर जुताई, गोड़ाई, बोआई जैसे सारे काम मशीनों, ट्रैक्टरों से हो रहे हैं। सो किसी जमाने में खेती का प्राणतत्व माने जानेवाले बैल अब गैर जरूरी लगने लगे हैं। कृषि संस्कृति के आधार स्तंभ बैल, गैरज़रूरी? मन सुन्न हो रहा है यह सब देख सुन के बेटा। मैंने दीनानाथ काका से जानना चाहा कि बारानी खेती माने केवल बारिश के भरोसे पर सींची जानेवाली खेती में कमोबेश मात्रा में यह सारे संकट तो थे ही पर ऐसे संकटों के सामने झुककर किसान पहले तो आत्महत्या नहीं करते थे। अब ऐसा क्या हो गया है कि किसानों का हौसला पस्त हो चला है? काका बताने लगे कि, "आज या अभी जैसे पक्के पल तो नहीं बताए जा सकते बिटिया पर हालात खराब हो चले हैं यह सही है। देखो, बारिश के भरोसे पर चलनेवाली खेती और बारिश ही गायब, इस खेती में बोआई के लिए आनेवाले बीज अधिकतर नकली, खाद बेअसर, दोबारा-तिबारा बोआई और कई बार धूल बोआई करने के लिए विवश किसान, साहूकारों का फंदा, बैंकों की मार, झूठे सर्टिफिकेटों के बल पर किसानों के हिस्से की सुविधाओं का लाभ उठानेवाले सफेद पोश लोग... कितनी ही समस्याएँ हैं। सबसे भयंकर बात यह कि फसल का कोई मोल नहीं होता। वो कहते हैं न कि संतान न हो तो बड़ा दुख होता है पर संतान हो और दम तोड़ दे तो उस दुख की कोई सीमा नहीं। बिटिया, यह फसल भी तो संतान ही होवे है। ऐसी संतान जो आखरी पडाव पर दम तोड़ देती है। सामान्य ग्राहक भले ही दालों, सब्जियों की महंगाई से त्रस्त हों, इन्हें उगानेवाले किसान भी बेमोल बाजार के कारण त्रस्त हैं। यह बाजार बेचने वाला और खदीदने वाला दोनों को रुला रहा है और दोनों के बीच बैठा दलाल सारा लाभ निचोड़ लेता है। लागत मूल्य के आधार पर बाजार मूल्य मिले, इसके लिए कितने आंदोलन, कितने सत्याग्रह हुए पर किसान को क्या मिला? मेहनत से उगाई हुई सब्जियाँ-फल किसान सड़क पर फेंकने के लिए विवश हो जाता है। सिनेमा की पाँच सौ रुपये की टिकट बिना मोलभाव किये खरीदने वाला सामान्य आदमी भी किसान से पाई-पाई के लिए हील हुज्जत करता है।
कुल मिलाकर बोआई से पहले से लेकर फसल के बिकने तक की सारी प्रक्रिया किसान को कुछ भी नहीं देती। कई बार तो लाभ छोड़िए, लागत मूल्य भी वसूल नहीं होता और कर्ज का पहाड़ सिर पर चढ़ जाता है। यह पहाड़ राई-रती भर भी घट नहीं पाता और नई फसल की बोआई के लिए किसान नए कर्ज की कतार में खड़ा हो जाता है। उम्मीद की हर आस खतम हो जाती है और हारकर फांसी पर झूल जाना किसान की नियति बन जाती।"
जयू, काका एक-एक बात बताते जा रहे थे और मैं बुत बनी सब यह सब ज्यों का त्यों तुम्हें लिख रही हूं, सुन रही थी। वाकई हिंदी-मराठी सिनेमा में खेती की जो तस्वीर दिखती है, वह कितनी सुहानी है और सच्चाई कितनी वीभत्स। आज तो शायद नींद भी न आए। काका से पूछा कि इन हालात में सुधार की कोई संभावना है भी या नहीं? काका उदास-सी हँसी हँसे और बोले कि "बिटिया, ठान लो तो सुधार होगा वरना भगवान मालिक... क्या कोई अपनी रफ्तार  रोककर सोचेगा क्या कि क्यों आज कोई माँ अपने बेटे को किसान नहीं बनाना चाहती? क्यों कोई लड़की पति के रूप में किसान लड़का नहीं चाहती? वजह केवल खेती की खस्ता हालत, गरीबी या कर्ज बाजारूपन नहीं है। असल वजह यह कि हम इस कुचक्र से निकलकर स्वाभिमान की जिंदगी जीने का प्रयास तक नहीं कर रहे हैं। पेड़-पौधों की बेमुरव्वत कटाई कुछ तरह जारी है कि आखिर बारिश हो तो कैसे हो? हम लोगों के जमाने में कौन अनुदान बाँटता था बिटिया? आज लत लग गई है अनुदान की। बात-बात पर अनुदान। हर फसल का अनुदान। पंप लगवाया - अनुदान। भैंसे खरीदी या मरी, अनुदान। बिटिया, मुफतखोरी की आदत लग चुकी है। बताओ तो जरा जिस धरती माँ की गोद में पल रहे हैं, उसकी सेवा करने में इन नए लड़कों को लाज क्यों आती है? कल मूंछ निकली और आज दिमाग सातवें आसमान पर? गोड़ाई के लिए मजूर न मिले तो खड़ी फसल खराब हो जायेगी पर क्या मजाल जो नए लड़के धरती माँ को संवारने चले। अपने ही खेत में मजूरी करते लाज आती है इन्हें। अभी किसी बात के लिए अनुदान मिलने दो, कल दरवज्जे पर नई मोटर साइकल खड़ी मिलेगी। नये जमाने का मोबाइल फोन हैं इनके पास, फेसबुक और जाने क्या-क्या चाहिए इनको। नई तकनीक को अपनाने में कोई बुराई नहीं पर नई तकनीक का इस्तेमाल अपनी खेती बाड़ी के लिए नहीं किया जा सकता क्या? कितने लोग करते हैं ऐसा? बिटिया, माँ की सेवा में कोताही अच्छी बात नहीं।" काका का स्वर कातर हो चला और अंगोछे के छोर से आँखें पोंछते वे चले गए।
जयवर्धन बेटे, अब मेरा मन भी उचट चला है। आई तो थी अपने सपनों का गाँव देखने और अब लग रहा है जैसे धरती माँ बेबस है, किसान बेबस है, हर खेत संकट से जूझ रहा है। नई तकनीक सुविधा कम, संकट अधिक ले आई। हम ने आधुनिकता के चक्कर में अपना खांटीपन खो दिया। यहाँ सिर्फ अकाल, बाढ़, कर्ज, फसल की तबाही और मौत का तांडव है। कल शहर लौटकर आ रही हूँ बेटा।
शेष ठीक कैसे कहूँ?
तुम्हारी आई

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