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रवि का सत्य
01-Mar-2018 03:54 PM 1919     

पता है
मुझमें लालिमा क्यूँ है?
शायद
मैंने अमावस भेदकर
उनींदापन और आलस्य भगाकर
जग को ज्योतिर्मय
करने का बीड़ा उठाया है।

लेकिन कोई क्या जाने
मैं रोजाना
रोटी, कपड़ा और मकान
जुटाने की होड़ में
इन्सानियत के रक्त से रंगे
इन्सानों का साक्षी बनकर
गुजारता हूँ
चारों पहर।

पता है
मुझमें लालिमा क्यूँ है?
शायद
मेरे कंधों पर
जड़-चेतन में
जीवन संचार की
जिम्मेदारियाँ है।

लेकिन कोई क्या जाने
मैं व्यक्ति, परिवार, समाज
और राष्ट्र में
निरन्तर पड़ती दरारों
और उनकी मैत्री को चिता में
जलते देखता हूँ।

पता है
मुझमें लालिमा क्यूँ है?
शायद
मैं जनक हूँ
आशा का
हारे, भूले, भटके और फिसले
लोगों का।

लेकिन कोई क्या जाने
सच्चाई और ईमानदारी के
होते कत्ल-ए-आम से
सरेआम बलात्कार से
सम्पन्न, मध्यम और निम्न वर्गों के
भौतिक द्वन्द्व से
गरीब, लाचार, असहाय
और निराश्रित जनों के
अभिशप्त जीवन से
धूँ-धूँ करती धरती का
मैं प्रतिबिम्ब हूँ।

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