ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
रस प्रधान भारत और चीनी स्वाद
01-Sep-2016 12:00 AM 4793     

पश्चिमी लोगों के ख्याल में स्वाद या रस का मतलब केवल शारीरिक जरूरत मिलने के लिए है, सौंदर्यबोध से संबंध नहीं रखा जाएगा। प्लेटो ने कहा था कि अगर हम कहते हैं कि स्वाद और सुगंध न केवल प्रसन्नता है बल्कि सुन्दर भी है, तो लोग हम पर हंसी उड़ाएंगे। इस बात से चीन और भारत एक साथ असहमत हैं, क्योंकि वे दोनों देशों के इतिहास में स्वाद या रस का प्रयोग करके कविता की आलोचना करने का झुकाव मौजूद है। हालांकि भारतीय रस प्रधान काव्य-शास्त्र और चीनी स्वाद प्रधान काव्य-शास्त्र की शुरूआत खाद्य-पदार्थों का स्वाद या रस होता है, फिर भी बाद में विकसित होते हुए विभिन्नता उत्पन्न हुई। चीनी स्वाद प्रधान काव्य-शास्त्र के बारे में ज्यादा विशेष अध्ययन की किताब नहीं हैं, केवल विभिन्न किताबों के कुछ-कुछ भागों में रहता है। बल्कि स्वाद के साथ विचार करने का तरीका पुराने समय से आज तक मौजूद रहता है और स्वाद का मतलब ज्यादा परिवर्तित नहीं हुआ। भारत में स्वाद सिद्धान्त का अध्ययन करने वाली किताबें बहुत सारी हैं और तरह-तरह के संप्रदाय भी हैं। मगर अध्ययन करने के दौरान स्वाद का मतलब बदल गया, खाने का रस छोड़कर भाव के अर्थ से अधिक घनिष्ठ जुड़ा होने लगा। इन दोनों काव्य-शास्त्रों की तुलना से भारत और चीन की संस्कृति की समानता और विभिन्नता समझना लाभदायक है।
चीनी में स्वाद का मतलब खाने की उत्तेजना से जीभ से पैदा हुआ आनंद अनुभव होना है। कन्फ्यूशियस ने कहा था कि उन्हें एक बार किसी संगीत को सुनकर तीन महीने तक मांस का स्वाद मालूम नहीं हुआ। यहां मांस का स्वाद और संगीत की सुन्दरता एक साथ जुड़े हुए हैं। मेंज़ ने भी कहा था कि जिस तरह स्वादिष्ट खाना मेरी जीभ को आनन्द देता है, ठीक उसी तरह धर्म मेरे दिल को प्रसन्नता ही देता है। इससे देखा जा सकता है कि स्वाद का प्रयोग करके शारीरिक संतुष्टि और मानसिक संतुष्टि एक साथ जुड़ने लगे। यहां से चीन का स्वाद प्रधान काव्य-शास्त्र उत्पन्न हो रहा था।
सामंजस्य के साथ विभिन्नता चीन के इतिहास में आज एक महत्वपूर्ण विचारधारा है। इस विचारधारा का स्रोत भी स्वाद प्रधान काव्य-शास्त्र से संबंधित है। एक पुराना चीनी ग्रंथ ज़ंउअ ज़उअन (झ्द्वदृ झ्ण्द्वठ्ठद) में एक ऐसी कहानी है---- एक दिन राजा ने अपने मंत्री यैज़ (ज्ञ्ठ्ठद झ्त्) से कहा इन सारे मंत्रियों में केवल एक मंत्री मेरे विचार से सामंजस्य रखता है। यैज़ (ज्ञ्ठ्ठद झ्त्) ने कहा है कि ऐसी बात ठीक नहीं है, महाराज उस मंत्री का ख्याल केवल आप के विचार के समान है, सामंजस्य नहीं। सामंजस्य का असली मतलब भोजन बनाने के काम से बता सकता हूं। अगर भोजन का स्वाद हलका है तो अधिक मसाला डालना है। अगर भोजन का स्वाद भारी है तो कम समाला डालना है। जो बिना विचारे राजा से हमेशा के लिए सहमत होने वाला व्यवहार है, वह बिल्कुल हलका भोजन और हलका बनाने और भारी भोजन और भारी बनाने की मूर्खता के समान है। सामंजस्य का वास्तविक रूप यही है कि जब राजा किसी कार्य करने से मंज़ूर हैं, तो उस कार्य के नहीं करना चाहिये का कारण बताना है। और जब राजा किसी कार्य करने से असहमत हैं, तो वह कार्य करना चाहिये का कारण बताना है। इसी तरह से राजनीति साफ़ और रौनक बन जाती है।
यह कहानी चीन की सामंजस्य संस्कृति का स्रोत है। इसमें भोजन के स्वाद का प्रयोग करके राजनीति में सुन्दरता का वर्णन किया गया। इसके बाद बहुत पुराने चीनी विचारकों ने स्वाद प्रधान काव्य-शास्त्र का अध्ययन किया। इन अध्ययनों की मुख्य तीन विशेषताएं हैं---
प्रथम विशेषता यही है कि स्वाद कविता का एक महत्वपूर्ण गुण है और कविता की आलोचना करने का एक मानक भी है। ज़ुनरुनग (झ्ण्दृदढ़ ङदृदढ़) ने अपनी किताब कविता का गुण लिखा है कि सबसे उत्तम कविता ऐसी है, जिसमें असीम स्वाद होता है और जिससे पढ़ने वालों के दिल कांपते हैं। सीखूंतू (च्त् ख़्दृदढ़द्यद्व) ने अपनी किताब ली साहब से कविता की चर्चा में लिखा है कि स्वाद पहचानकर ही कविता की चर्चा शुरू हो सकती है। दूसरी विशेषता यही है कि शब्द और वाक्य सीमित होते हैं बल्कि मतलब अमीमित होने पर महत्व देते हैं। अनेक चीनी विचारकों को लगता है कि कविता के स्वाद के बाहर और कुछ स्वाद मौजूद होना चाहिये। यान वांगली (ज्ञ्ठ्ठदढ़ ज़्ठ्ठदथ्त्) ने लिखा है कि कविता समाप्त होने पर भी स्वाद रहा आता है, यही सबसे उत्तम है।
चीनी स्वाद प्रधान काव्य-शास्त्र में सभी स्वादों में सबसे लोकप्रिय फीका स्वाद है। फीकेपन से आशय यही है कि कविता लिखते और पढ़ते समय मन शांत होना चाहिये। चाहे सुख मिले या दुख, मन स्थिर हो। न सफलता के लिए ख़ुशी है, न असफलता के लिए परेशान। ऐसी मन की स्थिति को फीका स्वाद कहते हैं और अधिकतर विचारक इसे चीन के स्वाद-सिद्धांत का सबसे उत्तम मानते हैं। यह चीनी स्वाद प्रधान काव्य-शास्त्र की तीसरी विशेषता है।
प्राचीन भारतीय संस्कृत कविता के विशेषज्ञ रस पर ज़्यादा महत्व देते हैं। उनका ख्याल है कि रस के बिना कविता नहीं होती। यहां तक कि कविता का उद्देश्य और मतलब भी रस होता है। भारतीय रस प्रधान काव्य-शास्त्र की विशेषता पर एक विश्लेषण यों है -
सबसे पहले रस और भाव का घनिष्ठ संबंध होता है। रस भाव से उत्पन्न हुआ या यह भी कह सकते हैं कि रस भाव ही है। भाव साहित्य और कला की आत्मा है। रस भाव की नकल करता है। रस शब्दों से बढ़कर एक किस्म का अनुभव होता है। यही रस प्रधान काव्य-शास्त्र की सब से प्रमुख विशेषता है।
दूसरी विशेषता यही है कि रस का और एक मलतब है कि अपने को त्यागकर किसी मुक्त स्थिति में रहने की हालत हो सकती है। यही मतलब भारतीय धर्मों से संबंधित होती है। हिंदू धर्म मानता है कि आदमी की ज़िन्दगी को चार प्रकार के काल से गुज़रना है- ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास। ब्रह्मचर्य, गृहस्थ और वानप्रस्थ ये तीनों कालों के कार्य संन्यास की तैयारी है यानी अपने को त्याग करने की तैयारी है ताकि परम उद्देश्य--ईश्वर से मिलना पहुंच सके। हिंदू धर्म के अनुसार जीवन के चार लक्ष्ण होते हैं-- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। मोक्ष ही अपने को त्यागकर मुक्त स्थिति है।
तीसरी विशेषता यह है कि रस की उत्पन्नता और अनुभव करना लौकिक वस्तुओं से बढ़ना पड़ेगा और किसी भी बाधा नहीं डालना है। लोगों को कविता पढ़ते समय अपनी पसंद, समय और स्थान आदि अपने से संबंधित सभी कुछ भूलना चाहिये। चाहे बाहर से या अंदर से किसी भी प्रकार की बाधा दूर करना है। ऐसी कोई भी बाधा या परेशानी न होने ही रस का अनुभव है।
भारत और चीन प्राचीन पूर्वी सांस्कृतिक देश हैं और पुराने समय से दोनों देशों के बीच अनेक सांस्कृतिक आदान-प्रदान हुए हैं। इसलिए कुछ हद तक विचार करने के तरीकों में समानताएं हैं। भारतीय रस प्रधान काव्य-शास्त्र और चीनी स्वाद प्रधान काव्य-शास्त्र इन समानताओं के उदाहरण हैं। जैसे दोनों देश मानते हैं कि रस या स्वाद बढ़िया साहित्य जांचने का एक मानक है। यहां तक कि साहित्य की आत्मा है। इसके अलावा दोनों मानते हैं कि रस या स्वाद का आनन्द लेने के दौरान लौकिक वस्तुओं से बचना है और कुछ मनोवैज्ञानिक दूरी रखना है। समानताओं के अलावा कुछ विभिन्नताएं भी हैं। चीनी स्वाद प्रधान काव्य-शास्त्र में स्वाद का मतलब शुरू से अंत तक खाद्य-पदार्थों के स्वाद से जुड़ा हुआ है, जबकि भारतीय रस प्रधान काव्य-शास्त्र में रस का मतलब खाने की चीज़ों के स्वाद से अलग होकर भाव की ओर बदल गया। इसके अलावा दो और विभिन्नताएं  हैं।
प्रथम यह है कि चीनी विचारक मानते हैं कि लोगों के अपने ज्ञान और अनुभव से स्वाद उत्पन्न होता है, जबकि भारतीय विचारक मानते हैं कि अचेतन में छिपे हुए संभावित प्रभाव से रस पैदा होता है। हिंदू धर्म का विचार है कि हर आदमी अपने कर्म के अनुसार अनगिनत बार जन्म लेता है। प्रत्येक जन्म का अनुभव बिल्कुल गायब नहीं होता, बल्कि अचेतन में छिपा होकर आदमियों पर संभावित प्रभाव डालता है। जब लोग कविता पढ़ते हैं तो पिछले जन्म की याद आती है और इस जन्म की परेशानियां विस्मृत होती हैं। इसके साथ ही एक सुन्दर एवं सुखमय अनुभव पैदा होने लगता है, जिसे रस कहा जाता है।
दूसरी असमानता यह है कि चीनी विचारक स्वाद के बाहर स्वाद होने पर ज्यादा महत्व देते हैं और भारतीय विचारक रस में भाव होने पर अधिक मूल्यवान मानते हैं। चीनी में कहते हैं कि शब्द सीमित है बल्कि उनका मतलब और स्वाद असीमित होता है। जिस कविता में अनगिनत स्वाद होता है, वह उत्तम कविता कहते हैं। स्वाद के बाहर स्वाद होता है यह चीनी स्वाद प्रधान काव्य-शास्त्र की प्रमुख विशेषता है। भारत में रस और भाव का संबंध ज्यादा घनिष्ठ है। भाव भारतीय रस प्रधान काव्य-शास्त्र का केंद्र है।
आधुनिक युग में बहुत से भारतीय विद्वान दुनिया भर में अपने काव्य-शास्त्र के सिद्धांतों का प्रसारण करते रहते हैं। यह काम चीनियों को भी करना चाहिये। आधुनिक दुनिया में एकीकरण पर जोर है और पश्चिमी संस्कृति का महत्व बढ़ रहा है, जबकि पूर्वी संस्कृति के मूल्य पूरी तरह से उजागर नहीं हुए है। चाहे चीनी स्वाद हो या भारतीय रस ये दोनों पूर्वी संस्कृति की मूल्यवान विशेषता है, जिनका और कुछ गहरे अध्ययन करने का काम हमारा इन्तज़ार कर रहा है।

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