ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
रम्य रचना Next
क्या भूलूँ क्या याद करूँ मैं
क्या भूलूँ क्या याद करूँ मैं

बड़ा मुश्क़िल सवाल है साहब! याद करना - मतलब सबक़ याद करना तो मुश्किल था ही, अब पता चला है कि भूलना उससे भी कठिन काम है। याद की बात पर आपको बता दें कि बचपन में पाठ याद ना करने पर मास्टरनी जी मुर्गा बना ...

01-Aug-2017 11:26 PM 255
लोक की कथाएँ और व्यथाएँ
लोक की कथाएँ और व्यथाएँ

एक बार की बात है... सुनते ही कान खड़े हो जाते हैं। भाइयों और बहनों! इस असार संसार में सर्वाधिक सारगर्भित बात वह होती है जो एकदम सस्ती सुन्दर और टिकाऊ होती है। हम या आप में से कितने लोग शोध ग्रन्थ पढ़ ...

08-Jul-2017 08:16 PM 302
मेरा गाँव मेरा देश
मेरा गाँव मेरा देश

संपादक का फ़रमान था "कुछ भारत के देहातों पर लिखो।" धत्तेरे की, हमें देहाती समझा है क्या जो हम देहात के बारे में लिखें? जनाब! हम शहर में रहते हैं -- वह भी बड़े शहर में जिसे अंग्रेज़ीदाँ लोग मेट्रोपोलिस ...

02-Jun-2017 03:15 AM 473
चलचित्र और चरित्र
चलचित्र और चरित्र

राज कपूर साहब तो हर हीरोइन के साथ इश्क़ फ़रमाते थे। उनके
कथनानुसार असली इश्क़ से अभिनय में वास्तविकता आ जाती है। खूब!
तो भैया कोई हमें यह बतलाये कि मरने के दृश्य में असलियत का प्रभाव
...

01-May-2017 08:31 PM 469
गुजरते समय में पत्रकारिता
गुजरते समय में पत्रकारिता

सुना है कि जब से इंडिया टीवी का मालिक बदल गया है, उसका लहज़ा भी
बदल गया। ज़ाहिर है वे कार्यकर्ता हैं और अपने अन्नदाता की ही भाषा बोलेंगे -
his master's voice! ...

01-Apr-2017 12:40 AM 435
कल-कल निनाद
कल-कल निनाद

आज बात मैं "कल" की करना चाह रहा था। अब आप पूछेंगे, कौन से कल की? जी हाँ, समय से संदर्भित "कल" दो प्रकार के होते हैं। क कल जो बीत गया और एक कल जो आने वाला है। जब तक पूरी बात न कह दें आप समझ ही नहीं ...

01-Mar-2017 08:58 PM 897
बाज़ार से गुज़रा हूँ
बाज़ार से गुज़रा हूँ

जी सरकार, हमारे जैसे बिंदास बशर दुनिया में रहते तो हैं लेकिन उसके तलबगार नहीं होते। अकबर इलाहाबादी की तरह हम भी बाज़ार से गुज़रते हैं, मगर ख़रीदार भी हों ये ज़रूरी नहीं। अब भले ही हम असली ख़रीदार ना हों ...

01-Mar-2017 08:44 PM 870
चलो विलायत
चलो विलायत

आख़िर लोग यात्रा क्यों करते हैं? आराम से घर क्यों नहीं बैठते? लो यह भी कोई पूछने की बात है! यह तो इंसानी  फ़ितरत है साहब। सुना है ना कि खाली दिमाग़ शैतान का घर होता है। जब तक काम काज में मसरूफ़ रह ...

01-Feb-2017 12:34 AM 1045
प्रवासी दिवस के बहाने
प्रवासी दिवस के बहाने

गये ज़माने में जब जनसंख्या कम थी तो लोग मिलजुल कर रहते थे। रिश्तों की क़दर करते थे। अब जनसंख्या विस्फ़ोट के कारण धरती पर भीड़ बढ़ गयी है। संयुक्त परिवार न्यूक्लियर फॅमिलियों में बंट गये हैं। रिश्ते घट ग ...

01-Jan-2017 01:04 AM 2462
राजनीतिक रंगमंच
राजनीतिक रंगमंच

शेक्सपियर ने कहा था कि सारी दुनिया एक रंगमंच है और सभी लोग सिर्फ किरदार हैं। खैर, शेक्सपियर के अनुसार तो हम सब पैदाइशी अभिनेता हैं जिनका सूत्रधार भगवान है। जाने दीजिये। हम उन लोगों की बात कर रहे है ...

01-Dec-2016 12:00 AM 1658
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