ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
रम्य रचना Next

गुजरते समय में पत्रकारिता
01-Apr-2017 12:40 AM 85
गुजरते समय में पत्रकारिता

सुना है कि जब से इंडिया टीवी का मालिक बदल गया है, उसका लहज़ा भी
बदल गया। ज़ाहिर है वे कार्यकर्ता हैं और अपने अन्नदाता की ही भाषा बोलेंगे -
his master's voice!

कल-कल निनाद
01-Mar-2017 08:58 PM 535
कल-कल निनाद

आज बात मैं "कल" की करना चाह रहा था। अब आप पूछेंगे, कौन से कल की? जी हाँ, समय से संदर्भित "कल" दो प्रकार के होते हैं। क कल जो बीत गया और एक कल जो आने वाला है। जब तक पूरी बात न कह दें आप समझ ही नहीं

बाज़ार से गुज़रा हूँ
01-Mar-2017 08:44 PM 533
बाज़ार से गुज़रा हूँ

जी सरकार, हमारे जैसे बिंदास बशर दुनिया में रहते तो हैं लेकिन उसके तलबगार नहीं होते। अकबर इलाहाबादी की तरह हम भी बाज़ार से गुज़रते हैं, मगर ख़रीदार भी हों ये ज़रूरी नहीं। अब भले ही हम असली ख़रीदार ना हों


चलो विलायत
01-Feb-2017 12:34 AM 687
चलो विलायत

आख़िर लोग यात्रा क्यों करते हैं? आराम से घर क्यों नहीं बैठते? लो यह भी कोई पूछने की बात है! यह तो इंसानी  फ़ितरत है साहब। सुना है ना कि खाली दिमाग़ शैतान का घर होता है। जब तक काम काज में मसरूफ़ रह

प्रवासी दिवस के बहाने
01-Jan-2017 01:04 AM 2121
प्रवासी दिवस के बहाने

गये ज़माने में जब जनसंख्या कम थी तो लोग मिलजुल कर रहते थे। रिश्तों की क़दर करते थे। अब जनसंख्या विस्फ़ोट के कारण धरती पर भीड़ बढ़ गयी है। संयुक्त परिवार न्यूक्लियर फॅमिलियों में बंट गये हैं। रिश्ते घट ग

राजनीतिक रंगमंच
01-Dec-2016 12:00 AM 1319
राजनीतिक रंगमंच

शेक्सपियर ने कहा था कि सारी दुनिया एक रंगमंच है और सभी लोग सिर्फ किरदार हैं। खैर, शेक्सपियर के अनुसार तो हम सब पैदाइशी अभिनेता हैं जिनका सूत्रधार भगवान है। जाने दीजिये। हम उन लोगों की बात कर रहे है


त्रिशंकु
01-Nov-2016 12:00 AM 2122
त्रिशंकु

विदेश में बसे भारतवंशियों के लिए रह रहकर एक ही शब्द ज़हन में आकर टकराता है; और वह है - त्रिशंकु। त्रिशंकु महाराज सशरीर स्वर्ग जाना चाहते थे। महान मुनि श्री विश्वामित्र  ने उन्हें पहुँचा भी दिया

हिंदी की चिंदी
01-Oct-2016 12:00 AM 2512
हिंदी की चिंदी

काले बालों वाली के आते ही तू मुझे भूल जायेगा, हिंदुस्तानी मायें अक्सर यह विलाप करती हैं। सही करती हैं। बहू के आते ही माँ पिछली सीट (डठ्ठड़त्त् डद्वद्धदड्ढद्ध) पर भेज दी जाती है। हमेशा ऐसा नहीं होता

हमारा पुस्तक प्रेम
01-Sep-2016 12:00 AM 2516
हमारा पुस्तक प्रेम

पुनर्जन्म को मद्देनज़र रखते हुये रसखान बाबा की यह रचना हमें बड़ी पसन्द है। अब हम गांव में के ग्वालों के बीच में तो नहीं रह सकते, मिज़ाज से थोड़ा शहरी जो हैं; परन्तु "पंछी बनूँ, उड़ती फिरूँ मस्त गगन में"


आज़ाद हूँ दुनिया के चमन म
01-Aug-2016 12:00 AM 333
आज़ाद हूँ दुनिया के चमन म

आह! यह बेरोकटोक जीने का अहसास मन को मुदित कर देता है। यूँ भी क़ैद में कौन रहना चाहता है हुज़ूर? लोग बाग़ तो धरती की सीमाओं को तोड़कर आकाश में उड़ना चाहते हैं। पर क्या यह सम्भव है? रूसो के अमर शब्दों में

हरियाला सावन ढोल बजाता आया
01-Jul-2016 12:00 AM 1278
हरियाला सावन ढोल बजाता आया

इस साल की भयानक गर्मी के बाद -- "सावन आया – धिन तक तक मन के मोर नचाता आया।' वर्षा और मोर का चोली दामन का साथ है। दोनों ही का संबंध नृत्य से भी है और नृत्य तो हर भारतीय की रग-रग में बसा है। मय

कहत कबीर सुनो भई साधो
01-Jun-2016 12:00 AM 1269
कहत कबीर सुनो भई साधो

कबीरदास बड़े ही विलक्षण व्यक्ति थे। एकदम बिंदास, बिलकुल हमारी तरह। उन्हीं की तरह हमारी भी ना किसी से दोस्ती है (अरे, दोस्त तो बहुत हैं हमारे - मगर चमचागिरी वाला रि¶ता किसी से नहीं है।) और ना ही


मुग़ालतों का दौर
01-May-2016 12:00 AM 1200
मुग़ालतों का दौर

जैसे उम्मीद पर दुनिया क़ायम है उसी तरह गलत-फहमियों में क़ायनात टिकी है। आख़िर ¶ाराफ़त भी कोई चीज़ है। अक्सर महफ़िलों में बेसुरे-बेताले मुतरिब (गायक) के लिए भी "बहुत अच्छा', "बहुत बढ़िया' कहना पड़ता है

कुम्भ में जल हो!
01-Apr-2016 12:00 AM 217
कुम्भ में जल हो!

कुम्भ, घड़ा, घट, कलश आदि सब एक ही परिवार के शब्द हैं। लेकिन भगवान "घट घट
 वासी' हैं, घड़े-घड़े वासी नहीं। भक्ति में कलश को कैलाश से जोड़ दिया। अधिक प्यार आया तो किसी घड़े को गागर और गगरी भी कह दिया। अधज

चलो मन गंगा-जमुना के तीर
01-Apr-2016 12:00 AM 249
चलो मन गंगा-जमुना के तीर

मन की शांति के लिए दरिया के किनारे से अच्छा स्थल और कोई नहीं हो सकता। रसखान के "कालिंदी कूल' में जितना आनंद है, उतना ही मथुरा के लोक गीतों में जमुना को लेकर है - आज ठाड़ो री बिहारी जमुना तट पे, मत ज


महिला दिवस और फ्रेंच टोस्ट
01-Mar-2016 12:00 AM 202
महिला दिवस और फ्रेंच टोस्ट

वह महिला दिवस की खुशनुमा सुबह थी। यानी पूरी तरह अपनी, सिर्फ एक महिला की सुबह। इस सुबह में किसी पुरुष का हस्तक्षेप बिलकुल नहीं था। (क्योंकि पुरुष अभी सो रहा था)। मुझे सारा संसार महिलामय दृष्टिगत हो

चल सन्यासी मंदिर में
01-Mar-2016 12:00 AM 200
चल सन्यासी मंदिर में

साहबान! सन्यासी या तो मंदिर में जायेगा या जंगल में। ग़लत! डार्विन के अनुसार जब बन्दर ड्ढध्दृथ्ध्ड्ढ होकर इंसान बन सकता है तो साधु व्यापारी क्यों नहीं बन सकता? बन सकता नहीं हुज़ूर बन चुका है। सुना नही

ए बी सी डी या त्रिशंकु
01-Feb-2016 12:00 AM 240
ए बी सी डी या त्रिशंकु

    जीहाँ एबीसीडी सीखते ही हर भारतवासी अपने आप को "गोरा साहब' समझने लगता है। गलत-    सलत अंग्रेज़ी में गिट-पिट करते ही उसमें एक सुपीरियर कॉम्पलेक्स जन्म ले लेता है और उ


कुछ रूमानी हो जाएँ
01-Jan-2016 12:00 AM 203
कुछ रूमानी हो जाएँ

लफ़्फ़ाज़ी और तक़रीर बहुत हो गयी, आज मन है कि कुछ क़िस्सागोई हो। यानि आज हम अफ़साना-        निगार होना चाहते हैं। ऐसा है साहिबान, भाषण, प्रवचन, तक़रीर, लेक्चर वगैहरा कोई नहीं

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