ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
रामफल का झोला
08-Jul-2017 08:04 PM 3575     

योअर ऑनर, बड़ा भाई कत्र्ता था। पिता ने जमीन के तीन हिस्से किये थे। एक इनका, एक आवेदक का और एक आवेदक के पुत्र का। बड़े भाई को बच्चा नहीं था। बाद में इनके यहाँ बीस साल के बाद हुआ, इसलिए ये आवेदक के पुत्र का भाग नहीं दे रहे हैं, जबकि इनके पुत्र का हिस्सा दादा ने दिया था और अब उस पर आवेदक के पुत्र का मालिकाना हक और कब्जा है... वकील बिना रुके बोलता जा रहा था और मैं कमिश्नर की कुर्सी पर बैठ कहीं और चला गया।
"बड़ा भाई कत्र्ता था, सब कुछ उसी के हुकुम से चलता था। घर आता तो रोज दोनों भाइयों के बच्चों के लिए दोनों हाथों में कुछ भी लेकर आता था, जो बच्चा जिस हाथ की तरफ होता, सामान उसे मिलता। एक दिन छोटे भाई ने देखा जब बच्चे दौड़ कर आए बड़े भाई ने हाथ बदल दिए और सामान भी दोनों बच्चों में बदल गया। उसी दिन छोटे भाई ने बड़े अदब से बड़े भाई को कहा कि भाई हम अलग हो जाते हो।" रामफल ने लम्बी साँस ली "जब दिल बदला तो हाथ बदल गए।" भाई गौवध्र्दन ने हुंकार भरी, "न्याय दिल से होता है, काग़ज कलम से नहीं। परिवार में दिल की परख़ रखने से और दिल पर नजर रखने से मामला कचहरी तक नहीं जाता।"
शहर में छिटपुट आग लगी थी, हंगामा था, दो धर्मों में कभी भी तकरार के आसार बने हुए थे। मैं कमिश्नर था और डीआईजी, डीएम, एसपी को लेकर गंभीर हालात पर गौर कर रहा था कि अचानक रामफल जहन में उतर आया, "...राजा का बेटा मंत्री के बेटे का इतना गहरा दोस्त हो गया कि बाकी मंत्री जलने लगे और राजा के मन में जहर भर दिया। राजा ने हुक्म दिया कि इनकी दोस्ती तुड़वाने के लिए दूतियाँ बुलवाई जाएँ। एक दूती से पूछा "तुम क्या कर सकती हो?" "मैं आसमान में छेद कर सकती हूँ।" दूसरी ने कहा "मैं आसमान के छेद पर थेकिली लगा कर उसे सील सकती हूँ।" राजा को पहली वाली पर भरोसा हुआ और वो वहाँ चली गई जहाँ राजा का बेटा और मंत्रीपुत्र आखेट खेल रहे थे। मंत्री पुत्र को पास बुला कान में बिना कुछ कहे फुसफुसाई और चलते-चलते कहने लगी राजकुमार को मत बताना नहीं तो तुम्हारे कुनबे को कोल्हू में पिलवा देगा। राजकुमार ने दोस्त से कहा बताओ इसने क्या कहा था। कुछ कहा होता तो मंत्रीपुत्र बताता। राजकुमार ने उसके कुनबे को कोल्हू में पिलवा दिया और क्रूर शासक बना। सो जजमानो! आसमान में थेंिकली लगाने वाली दूती की संसार को कभी ़जरूरत नहीं रही..." मैं सोचने लगा क्या कोई थेकिली लगाने वाली दूती मिल सकती है?
रामफल ने आसन जमा लिया। पौली के बाहर पीपल के निकट सुनहरी बालू पर खाटें बिछ गईं। (पीपल के नीचे भूतों की जगह थी)। हुंकार भरने के लिए वयोवृध्द भाई गौवध्र्दन थे। पाँयते मैं भी तीन साथियों के साथ बैठा था। गर्मी की रात। पहले पहर की ठंडी बयार चल रही थी। एक बच्चे ने पूछा रामफल इतनी सारी बात कहाँ छिपा के रखते हो? रामफल ने कहा अपने झोले में। एक सौ तीस किलो का रामफल एक बड़ा-सा झोला रखता था।
एक तरफ हुक्का आया और जहाँ अधेड़ बैठे थे वहाँ कली (छोटा हुक्का)। इन्तजार था पिता जी का। उनके लिए अलग से खाट पर दरी चादर की व्यवस्था थी। वो आए और रामफल ने उद्घोषणा की... आज अनबोल दे की बात सुनाएँगे।
"सो जजमान! राजकुमारी अनबोल दे ने प्रतिज्ञा कर ली थी वो बोलेगी नहीं। जो युवक उसे बुलवा देगा उससे ब्याह करेगी। बहुत आए। हार गए। एक बांका युवक राजकुमार आया। उसने लय और ताल में बात कहनी शुरू।"
हुक्का बुजुर्गों से चलता रामफल तक पहुँचा। रामफल को चिलम उतारकर दी गई। ऐसा ही रिवाज था। समाज का हुक्का उसे नहीं मिलता था। रामफल ने चिलम से लम्बा कश लिया और चिलम वापस हुक्के पर रख बोलने लगा। "राजकुमार ने मन को मोहने वाली तान में उन्नीस कथा कही। अनबोल दे सुनते-सुनते युवक की बातों में डूबती चली गई। उस पर नशा छा गया। कुछ बोलने को आती, पर प्रतिज्ञा बीच में आ जाती। (रामफल हर कथा को लय में सुना रहा था।) राजकुमार के मोहपाश में राजकुमारी को अपनी प्रतिज्ञा पर गुस्सा आ रहा था। पर राजसी वचन तो वचन था। राजकुमार ने न्याय और नीति से भरपूर उन्नीस कथाएँ गायीं। अचानक बीसवीं कथा में घोर अन्याय की बात कह दी। राजकुमारी चिल्ला उठी ये तो गलत है। घोर अन्याय है। राजकुमार मुस्कुराया और उनका विवाह धूमधाम से सम्पन्न हुआ।"
इस बीच रात का तीसरा पहर जा चुका था। हुक्के की आग बार-बार धधक कर धीमी हो चुकी थी। "सो जजमान, न्याय के सामने प्रतिज्ञा कुछ नहीं।" रामफल बोलता गया, "भीष्म पितामह अन्याय पर प्रतिज्ञा तोड़ देते, महाभारत नहीं होती। चलो अब कल कुछ कहेंगे, कुछ सुनेंगे जजमान!"
पर ऐसा कल कभी नहीं आया, जब कोई और कहता और रामफल सुनता।
राजस्थान के बहुत से गाँवों के नटों के परिवार पाँवों में बाँस बाँधकर चलना, बाँस पकड़कर रस्सी पर चलना, कलाएँ दिखाना आदि सदियों से छोड़ चुके थे। उन्होंने अपना काम चारण और भाटों की तरह बात कहना, लोक-कथाएँ सुनाना सीख लिया था। जहाँ चारण-भाट राज घरानों से जुड़ गए, ये गाँव-गाँव जाकर लोक-कथाएँ सुनाने का काम करते थे। रामफल जब आता बीस दिनों से पहले कभी नहीं गया। हर दिन नई लोक-कथा। प्रत्येक लोक-कथा के बाद उसका निष्कर्ष। कभी इतना मार्मिक कि आँख गीली हो जाती, कभी बड़े-बुजुर्गों को सोचने के लिए मजबूर कर देती।
रामफल गूलर के पेड़ के पास वाले कुएँ पर नहाता था। उसके भारी भरकम शरीर को बच्चे मसल कर नहलाते। खूब ठिठोली होती। उस दिन जब बाकी उसे नहला रहे थे, हमने उसका झोला ढूँढ मारा पर बात नहीं मिली। कनखियों से झाँकते रामफल मुस्कुरा कर बोला ये बात वाला झोला नहीं है। बात वाला झोला उसे दिखेगा जो अच्छे काम करेगा। हम क्या जानें अच्छे काम क्या होते हैं, पर पर हम इसी आस में रहते कि यायद रामफल का झोला मुझे भी दिख जाए।
बरसों-बरस रामफल आया। कुछ ही घर ऐसे थे जो उसे पेटभर भोजन दे सकते थे। कोई रोज चार-आठ आने देता, कोई कुछ नहीं देत। पिताजी एक रुपया देता और वो अपनी एक लम्बी सी तुकबन्दी में आशीष देता। उस समय उसमें चारणों-भाटों की झलक आ जाती।
सैकड़ों बात सुनाई। जहन में हल्की सी याद है। उसकी शक्ल की हल्की सी परछाँई भी है। ऐसा कैसे था। इतना कुछ याद था। नैतिकता थी, विधि-विधान का ज्ञाता था। राज-पाट की बातें सुलझे वकील-सा करता था। दुनियादारी का विद्वान था। उसकी कथा का अपना संविधान था। हुंकारे के लिए सिध्दहस्त जजमान चाहिए, नहीं तो बात नहीं। भाई गौवध्र्दन ही उस कला में फिट बैठते थे। लेकिन भाई गौवध्र्दन के पाँयते भी तीन-चार बालक होने ़जरूरी थे। कथा समारोह का अपना विधि-विधान था, तभी कथा का मूड बन पाता था रामफल का। बीच में हुँकारे के अलावा कोई आवाज नहीं। लोक-कथा का भी अपना एक राज-दरबार होता था। रामफल राजस्थान के रजवाड़ों की अनन्त कथाओं के अलावा जहाजी सिंदबाद तक की लोक-कथाएँ जानता था। अरब की कथाओं में हूरों का विवरण और राजस्थान की कथाओं में अरबी घोड़ों का वर्णन जब करता, उसकी जबान अचंभित कर देती। राजाओं के न्याय-निर्णय का वर्णन ऐसे करता जैसे स्वयं महाराज सिंहासन पर हों।
आज भी रामफल का झोला ढूँढता हूँ। कौन-सा काम होगा, जो झोला दिखेगा। लाखों गरीबों के घरों के निर्माण का कार्य हुआ, लगा रामफल झोला लिए टहल रहा है। सर्दी में जब नि:सहाय व्यक्तियों को कंबल बाँटने जाते तो ऐसा आभास होता जैसे रामफल गुदड़ी से झाँक झोले से आशीष दे रहा हो।
इतने दिनों के जीवन से जाना है कि समाज लोक-कथाओं में जीता है। काग़ज के टुकड़े तो पथरीले कोने से चुभते हैं। राजकीय विधान को विधि का विधान यही बनाती है। जीवन इनकी नाजुक मुट्ठियों में पिघलता है, सिसकता है, पुलकित होता है, उछलता है, उगता है, डूबता है। सही गलत की परख कराता है। संविधान ठोस धरातल पर टन की आवाज करता न्याय का हथौड़ा है। अन्तर्मन छूने वाले भाव-भीने जीवन के क्षणों को जीवन्त लोक-कथाएँ करती हैं। उन रिक्त स्थानों को भरती हैं। वस्तुनिष्ठ क्षणों को व्यक्तिनिष्ठ भावनाओं से ओतप्रोत कर सामाजिक सीमेंट का काम करती हैं। प्रेमचन्द का पंच-परमेश्वर 73वें संविधान संशोधन की सीमाओं से परे निष्कलंक ग्रामीण जीवन के आँसू पोछता है।
इन्हीं की छाप समाज के कानूनों को मान्यता दिलाती है, वरना न्याय की किताब मात्र काग़ज के टुकड़े रह गए होते। राजनैतिक-सामाजिक व्यवस्था में जो भावात्मक छिद्र रह गए, उनको भरने का काम लोक-कथाएँ करती हैं, वरना समाज गीता गैरोला की "पहाड की प्याली" की तरह पथरीली काग़ज की सतह पर सिसक कर मर-खप गया होता। ये व्यवस्था की खामियों को भरने का कार्य करती हैं। उन कमियों से उठने वाली पीड़ा को सहन करने की क्षमता भी प्रदान करती हैं। इनसे उभरे शून्य को सरकारीकरण की कड़क व्यवस्था कभी पाटने में सक्षम नहीं हो सकती। रामफल की लोक-कथाएँ जीवन के हर मोड़ पर प्रकाश-स्तंभ सी मार्गदर्शक का काम करती रही हैं। रामफल का झोला जब-जब दिखा, मन तृप्ति से भर गया।

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